Wednesday, 22 June 2016

मेट्रो चोर-चोरनी के चंगुल में ।

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मेट्रो में चोरी की 2700  वारदात ,   सिर्फ 109 चोर पकड़े गए ।
मेट्रो  चोर-चोरनी  के चंगुल में ,  पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान ,
  इंद्र वशिष्ठ
 सावधान-  मेट्रो  रेल मे सफर के दौरान चौकन्ने रहें , खास तौर पर उतरते समय  वर्ना  नकदी और  कीमती सामान गंवा देंगे । मेट्रो में सक्रिय जेबकत्तरे और चोरनियों के गिरोह  पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते है। चोर- चोरनियों  के कई गिरोह  तो सालों  से मेट्रो मे चोरी कर रहे है । मेट्रो में पांच महीने में  ही चोरी और जेबतराशी की 2700 से ज्यादा वारदात  दर्ज हुई  है  सिर्फ 109 चोर पकड़े गए।
कंधे पर बैग निशाना--  चोर-चोरनी के गिरोह कंधे पर बैग लटकाने वाले को निशाना बनाते है।  पुलिस द्वारा पकड़ी गई महिला चोरों ने पूछताछ में बताया कि उनको अंदाजा रहता है कि महिलाए  नकदी और जेवर आदि छोटे पर्स में रख कर उसे बैग में रखती है। कंधे पर बैग लटका कर सफर करने  वाली महिला को  चोरनियों का गिरोह घेर कर खड़ा हो जाता है। मेट्रो के अंदरउतरते समय या एस्कलेटर पर जहां भी मौका मिला भीड़ की आड़ में  ये चोरनियां बैग की जिप खोल कर सामान चोरी कर  लेती है । चोरी करने वाली माल तुरन्त अपनी साथियों को पास कर देती है।
मोबाइल और लैपटाप  --जेबकत्तरे  पर्स चोरी करने के अलावा मोबाइल और लैपटाप  चोरी करते है।  मेट्रो में चोरी के मामले पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते है।
109 चोर--  पुलिस ने 31 मई 2016 तक मेट्रो में चोरी के 2337 और जेबतराशी के 423 मामले दर्ज किए है । पुलिस सिर्फ 100 चोरों और 9 जेबकत्तरों को ही गिरफ्तार कर पाई है।  पुलिस के अपराध  के आंकड़े सचाई से कोसों दूर होते है।  क्योंकि अपराध कम दिखाने के लिए पुलिस जेब कटने के सभी मामलों को दर्ज नहीं करती ।  जेबकाटते या बैग से चोरी करते हुए  अपराधियों के फोटो सीसीटीवी  कैमरों में कई  बार पाए गए है। इसके बावजूद पुलिस जेबकत्तरों पर अंकुश नहीं लगा पा रही है।
 इन स्टेशनों पर रहें चौकन्ना--पुलिस के अनुसार जेबकत्तरों के  गिरोह भीड़ भाड़ वाले राजीव चौक , कश्मीरी गेट.चांदनी चौक  और चावड़ी बाजार स्टेशनों  पर सबसे ज्यादा सक्रिय है। मेट्रो में बढ़ती भीड़ जेबकत्तरों के लिए माहौल मुफीद बना देती है। मेट्रो में सवार होते समय लोगों द्वारा की जानी वाली धक्का मुक्की भी जेबकत्तरों और चोरों को मौका देती है।
मेट्रो में रोजाना  25 लाख  से  ज्यादा लोग सफर करते है। सुरक्षा सीआइएसएफ और  दिल्ली पुलिस के पास है।  मेट्रो में होने वाले अपराध की  रोकथाम और जांच का जिम्मा पुलिस के पास है।  
25 लाख के हीरों के जेवरात--मेट्रो मे 25 लाख के हीरों के जेवरात  की चोरी को  महिला चोर ने अंजाम दिया । बीकानेर निवासी मांगी लाल 23 मई को  मेट्रो से चांदनी चौक से द्वारका जा रहा था। उसके बैग मे डिब्बे में हीरे के  जेवर के 5 सैट थे । पुलिस ने सीसीटीवी की फुटेज को खंगाला तो एक औरत  बैग से  चोरी करते और जेवर के डिब्बे के साथ नई दिल्ली स्टेशन पर उतरती दिखाई दी ।  पुलिस ने उस औरत की पहचान पूजा के रूप में की । पूजा  को  पकड़ लिया गया । उससे पूछताछ पर उसके रिश्तेदार के घर  से  25 लाख के जेवरात बरामद हो गए । पूजा मेट्रो में एक दशक से  भी ज्यादा समय से चोरी कर रही है। मेट्रो में चोरी के आरोप में पूजा को 2002 और 2015 में भी गिरफ्तार किया गया था ।  पूजा अकेली ही चोरी करती है।
 6 लाख के जेवर--- मेट्रो में गुडगांव की सुनीता खन्ना के बैग से 1 जून को 6 लाख के हीरे और सोने के जेवर चोरी हो गए ।  नई दिल्ली  स्टेशन पर  सीसीटीवी की फुटेज मे दिखाई दिया कि सुनीता जब उतर रही थी तब उसे औरतों के गिरोह ने घेर रखा था । उनमें से एक राखी की पहचान हो गई। राखी ,ललित,सुरेखा और तुलसा को पकड़ लिया गया ।  राखी इस गिरोह की सरगना है। ये चारों मेट्रो में चोरी और जेबकाटने के आरोप में पहले भी  पकड़ी जा चुकी है।  चारों शादीशुदा है।

Tuesday, 14 June 2016

दिल्ली में अवैध बंदूकों का बोलबाला,



  दिल्ली में अवैध बंदूकों का बोलबाला,
 अवैध बंदूक  बनाने में बिहार बना पाकिस्तानमध्य प्रदेश भी पीछे नहीं

 इंद्र  वशिष्ठ,
  दिल्ली और एनसीआर में  पिछले 4-सालों में  हत्या, लूट और जबरन वसूली  जैसे  संगीन अपराध  में देसी पिस्तौल के इस्तेमाल में जबरदस्त इजाफा हुआ है । उम्दा किस्म के देसी पिस्तौल का आसानी से मिल जाना इसका मुख्य कारण है।   
मुंगेर गढ़-  अपराध में अवैध पिस्तौलों के बढ़़ते इस्तेमाल को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने एक स्टडी कीजिसमें पता चला कि उम्दा किस्म के ये देसी पिस्तौल बिहार के मुंगेर में बनाए जाते है। क्वालिटी के मामले में ये हथियार भारतीय आयुध फैक्टरी में बने हथियार से किसी भी तरह कम नहीं है। मुंगेर में बनी पिस्तौल से एक बार में 7-8 गोलियां तक आसानी से चलाई जा सकती है। इसलिए इन  पिस्तौलों की  अपराधियों में जबरदस्त मांग है। तफ्तीश के दौरान पता चला कि मुंगेर में छोटी-छोटी फैक्टरियों में हथियार बनाए जाते है और संगठित गिरोह द्वारा पूरे देश में सप्लाई किए जाते है। यह भी पता चला कि अवैध हथियार मेरठ,आगरा और इलाहाबाद के हथियार तस्करों द्वारा सप्लाई किए जाते है। हथियार बिहार से लाकर दिल्ली और आसपास के राज्यों में सप्लाई किए जाते है। हथियारों की तस्करी में महिलाओं का भी इस्तेमाल किया जाता है। उन पर शक न हो इसलिए वह महिलाओं के साथ परिवार की तरह यात्रा करते है।
आतंकियों और नक्सलियों को भी सप्लाई-पुलिस ने पाया कि हथियार तस्कर मध्य प्रदेश,उड़ीसा,बिहार और झारखंड के नक्सलियों को भी हथियार सप्लाई करते है। 19-9-2010 को जामा मस्जिद के बाहर विदेशियों पर गोलियां चलाने और पुणे बम धमाकों के आरोप में पकड़े गए इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों से भी मुंगेर की बनी 4 पिस्तौल बरामद हई थी।
मुंगेर बना दर्रा----पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम फरंटियर इलाके में दर्रा- नामक इलाके में  अवैध हथियार बनाना बड़े कुटीर उद्योग की तरह है। उसी तरह भारत में मुंगेर उम्दा किस्म के देसी पिस्तौल/रिवाल्वर बनाने के बड़े  स्त्रोत के रूप में उभरा है। पुलिस के अनुसार सरकार ने मुंगेर में कुछ साल पहले बंदूक बनाने के लिए 32 फैक्टरियों को लाइसेंस दिए थे। इनमें काम करने वाले या रिटायर हुए कुछ लोग मोटा पैसा कमाने के लिए अवैध हथियार बनाने लगे। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगरकैराना में भी देसी तमंचे बनाए जाते है। हरियाणा के मेवात में भी हथियार बनाए जाने की भी जानकारी पुलिस को मिली है।
मध्य प्रदेश भी गढ़- मुंगेर के बाद अवैध हथियार बनाने में मध्य प्रदेश का नंबर आता है। पुलिस ने स्टडी में पाया कि मध्य प्रदेश के भिंड,  खरगौनधार और  सेंधवा, बरवानी में भी अवैध पिस्तौले बनाई जाती है। ये पिस्तौल  दिल्ली समेत कई राज्यों के अपराधियों को सप्लाई किए जाते है। 
दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता डीसीपी राजन भगत ने बताया कि दिल्ली पुलिस ने  15 मई 2016 तक 288 पिस्तौल/रिवाल्वर/ बंदूक जब्त की है । साल 2012 में 586,साल 2013 में 700,साल 2014 में 868 और साल 2015 में 433पिस्तौल/रिवाल्वर जब्त की गई ।
स्पेशल सेल ने 4 जून 2016 को मथुरा के उतवार का नंगला गांव निवासी सलामुद्दीन को गिरफ्तार किया । उसके पास से 27 पिस्तौलें  बरामद हुई । सलामुद्दीन मथुरा के छाता निवासी  मुश्ताक के लिए काम करता है।  मध्य प्रदेश के सेंधवा से पिस्तौल की एक खेप लाने के एवज में उसे 5000 रूपए मिलते थे । मुश्ताक दिल्ली,एनसीआर और अन्य इलाकों में हथियार सप्लाई करता है।
 देसी को विदेशी बताते है।-मोटे मुनाफे के लिए इन पिस्तौलों को विदेशी बता कर बेचने के लिए इन पर  मेड इन इंग्लैंड और यूएसए भी लिख दिया जाता है। मुंगेर से पिस्तौल 10-12 हजार रुपए में लाकर हथियार तस्कर 25-30 हजार रुपए में अपराधियों को बेचते है।
99 मुंगेरी पिस्तौल की सबसे बड़ी खेप - दिल्ली पुलिस ने  जुलाई 2013 में मुंगेर से लाई गई 99 पिस्तौल और 198 मैगजीन  बरामद की थी । एम्बेसडर कार की हेडलाइटों के पीछे बनाए गए विशेष स्थान पर ये पिस्तौले छिपा कर लाई गई थी।  इस मामले में गिरफ्तार किए गए  मुंगेर निवासी निरंजन मिश्र और फिरोज आलम ने  पुलिस को बताया कि वह देश के ज्यादातर हिस्से में हथियार सप्लाई करते है। इन्होंने ने यह भी बताया कि वह हर महीने हथियारों की कम से कम एक खेप  दिल्ली और आसपास के राज्यों में सप्लाई करते है।  उन्होंने मुजफ्फर नगर के हाजी उर्फ मुल्लाजी को 85 पिस्तौले सप्लाई की थी। बरामद पिस्तौल पर ‘आर्मी सप्लाई केवल’ और ‘मेड इन यूएसए ’ लिखा हुआ है।
 12 जनवरी 2014 को स्पेशल सेल ने खरगौन के दिनेश और सुनील को १६ अवैध पिस्तौलों के साथ गिरफ्तार किया था । इन दोनों ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि ये दोनों दिल्ली ,एनसीआर के अलावा मुजफ्फरनगर ,आगराअलीगढ़ और हाथरस में हर पखवाड़े हथियारों की एक खेप  सप्लाई करते रहे  है। 5 फरवरी 2014 को स्पेशल सेल ने मध्यप्रदेश के बरवानी निवासी मोह बाई उर्फ मुन्नी को उस समय पकड़ा जब वह मथुरा निवासी शम्सु को 9 पिस्तौलें सौंप रही थी। मुन्नी ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि गांव में अवैध पिस्तौल बनाने वाले व्यकित के लिए वह हथियार सप्लाई करती है। हथियार की एक खेप पहुंचाने की एवज में उसे 2500 रूपए मिलते है। मुन्नी अवैध हथियारों के साथ पहले बीना जिला सागर और सेंधवा में भी पकड़ी जा चुकी है। 19 फरवरी 2014 को स्पेशल सेल ने ही हाथरस के संजू को 10 पिस्तौलों के साथ पकड़ा। संजू ने पुलिस को बताया कि खरगौन में वीरपाल सिंह अवैध पिस्तौलें बनाता है और वहीं मुख्य सप्लायर भी है। संजू खरगौन से हथियार लाकर हाथरस के ही हमबीर के माध्यम से देश के ज्यादातर हिस्से में सप्लाई करता था ।

Friday, 8 April 2016

केजरीवाल लुटा रहा आम आदमी का खजाना



राजनीति के लिए  खजाना लुटाता केजरीवाल
इंद्र वशिष्ठ
एनआईए के डीएसपी तंजील अहमद की हत्या की गुत्थी सुलझने से पहले ही केजरीवाल ने उनके परिवार को एक करोड़ रूपए मुआवजे का ऐलान कर दिया । तंजील की हत्या निजी रंजिश के कारण उसके रिश्तेदार ने कराई। ऐसे मे तंजील की मौत शहीद की श्रेणी में नहीं आती । केजरीवाल द्वारा पुलिस जांच पूरी होने के पहले ही  मुआवजे का ऐलान  करना दिखाता है कि वह  सरकारी खजाने का इस्तेमाल कितनी गैर जिम्मेदारी से करता है।
केजरीवाल  तंजील के परिवार को एक करोड़ रूपए देते है तो दिल्ली के उन सैंकड़ो परिवार को भी एक- एक करोड़ रूपए मिलना चाहिए, जिनके परिवार के सदस्य की हत्या कर दी गई। दिल्ली में हर साल हत्या की सैंकड़ों वारदात होती है। ऐसे में अपराध पीड़ित हर परिवार एक करोड़ के मुआवजे का हकदार है।
केजरीवाल यानी प्रचारवाल-  कांग्रेस, बीजेपी को कोस कर खुद को उनसे अलग बताने वाला केजरीवाल भी इन दलों जैसा निकला । अपनी छवि बनाने के लिए केजरीवाल विज्ञापनों पर सरकारी खजाने का करोड़ो रूपए खर्च करने में दूसरे दलों से किसी तरह कम नहीं है। दिल्ली के बाहर के अखबारों में भी विज्ञापन देकर दिल्ली की जनता के पैसे को बर्बाद कर रहा है। खबरों की शक्ल में भी दिए जाने से आम आदमी को यह पता भी नहीं चलता कि वह सरकारी विज्ञापन है।
विज्ञापनबाजी पर पैसा बर्बाद  करने की बजाए यह रकम सरकारी अस्पतालों में मरीजों के इलाज पर खर्च की जानी चाहिए । केजरीवाल सरकारी अस्पतालों में जाएं तो पता चलेगा कि विज्ञापनों पर जो करोड़ों रूपए वह फूंक रहे है उस रकम से  कितने मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
कथनी, करनी में अंतर- केजरीवाल ने कहा था कि गाड़ी,बंगला , सुरक्षा कुछ नहीं लूंगा, लेकिन सत्ता मिलते ही यह सब ले लिया ।  केजरीवाल का दूसरे दलों  से अलग होने का दावा खोखला निकला ।
चाणक्य से सीखें सरकारी खजाने का इस्तेमाल- चाणक्य से एक बार एक विदेशी मिलने आया, वह उस समय कुछ कार्य रहे थे। कार्य समाप्त करने के बाद  चाणक्य ने दीया बुझा दिया । विदेशी के पूछने पर चाणक्य ने कहा कि दीये  में जल रहा तेल सरकारी खजाने का था। आपसे बातचीत के दौरान उसका इस्तेमाल करना उचित नही है। 

Monday, 13 July 2015

बदमाशों को कारतूस सप्लाई , हथियार डीलर शक के घेरे में



आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस इस्तेमाल करते है अपराधी  ,  हथियार डीलर शक के घेरे में

इंद्र वशिष्ठ
 देसी यानी अवैध पिस्तौलों मे इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के या विदेशी कारतूस का ही इस्तेमाल किया जाता है। यह खुलासा चौंकाने वाला है। क्योंकि विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस लाइसेंसशुदा ​​हथियार डीलर द्वारा लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही बेचे जाते है। दिल्ली पुलिस का मानना है कि अवैध पिस्तौलों के कारोबार पर रोक लगानी है तो कारतूस की सप्लाई पर रोक लगाने का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। इससे संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा।
दिल्ली पुलिस द्वारा बरामद अवैध पिस्तौलों के मामलों की स्टडी में यह निष्कर्ष निकला कि ​​हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के एक-एक कारतूस का  पूरा/पुख्ता हिसाब  लिया जाना चाहिए  है। पुलिस का मानना है कि अपराधियों को कारतूस की सप्लाई रोकने के लिए यह कदम उठाना सबसे जरूरी है। दिल्ली पुलिस ने केंद्र सरकार को इस बारे में कई सुझाव दिए है।
 ​​हथियार डीलर शक के घेरे में - पुलिस का मानना है कि अवैध पिस्तौलों के धंधे को बढ़ावा देने में कुछ ​​हथियार डीलर भी शामिल हो  सकते है। पुलिस ने तफ्तीश में पाया कि मुंगेर की बनी अवैध पिस्तौलों में विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस का ही हमेशा इस्तेमाल किया गया है।  प्रयोगशाला  की  जांच  में भी यह स्पष्ट  पाया गया  कि बरामद कारतूस देसी यानी अवैध रुप से बने हुए नहीं है बल्कि इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के बने हुए या विदेशी है । लाइसेंसशुदा हथियार डीलर ही लाइसेंसशुदा हथियारधारक को कारतूस बेचते है। ऐसे में इन दोनों के माध्यम से ही कारतूस अपराधियों के पास पहुंचने की संभावना अधिक  है। इसलिए अगर अवैध हथियार के धंधे को खत्म करना है तो अपराधियों तक कारतूसों की सप्लाई रोकना सबसे जरूरी है।
 एक-एक गोली का  पुख्ता हिसाब - लाइसेंसशुदा हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूस अपराधियों तक न पहुंचे, इसे रोकने के लिए एक पुख्ता निगरानी और जांच व्यवस्था बनाने की जरुरत है हथियार डीलर ने लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही कारतूस बेचे है इसकी पुष्टि/तस्दीक लाइसेंसशुदा हथियारधारक से करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। पुलिस को स्टडी में पता चला कि  इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी से मिलने  वाले कारतूस के कोटे को कुछ हथियार डीलर  उसी राज्य या दूसरे राज्य के ​​हथियार डीलरों  को बेच देते है।  इससे इस कोटे के दुरूपयोग और कारतूसों के अपराधियों के पास पहुंच जाने की संभावना रहती है। सरकार को इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के  कारतूस के कोटे को आपस में  दूसरे हथियार डीलरों को बेचने पर रोक लगानी चाहिए। इससे कारतूस की कालाबाजारी और कारतूस अपराधियों के पास पहुंचना बंद होगा। लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूसों का भी पुख्ता हिसाब होना/देखना चाहिए और इस्तेमाल किए कारतूस के खाली खोखे को जमा कराने पर ही ओर कारतूस दिए जाने  चाहिए।
 कारतूस  रोकने से अपराध पर असर पड़ेगा-पुलिस ने यह भी पाया कि मेरठ,कानपुर,झारखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों के  कुछ हथियार  डीलर दूसरे राज्यों के हथियार डीलरों से कारतूस की बड़ी खेप/कोटा खरीदते है। पुलिस का मानना है कि इसके बाद कुछ हथियार डीलर अपने बिक्री रजिस्टर में हेराफेरी करके उन कारतूस को मोटा मुनाफा पाने के लिए अपराधियों को बेच देते है। पुलिस का मानना  है कि सरकार यदि उपरोक्त कदम उठाए तो इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के कारतूसों को अपराधियों के पास पहुंचने से रोका जा सकता है। इससे संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा। क्योंकि यह देखा गया है कि उम्दा किस्म के कारतूस अवैध रूप से बनाना असंभव और मुश्किल है।
राज्य पिस्तौलों की पूरी जांच कराए- केंद्र सरकार को सभी राज्यों को खासकर पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,राजस्थान और बिहार को यह निर्देश देने चाहिए कि बरामद होने वाले सभी पिस्तौलों(मैगजीन वाली)और रिवाल्वर की प्रयोगशाला में बैलेस्टिक के अलावा फिजिक्स डिवीजन से भी पूरी जांच  जरूर कराई जानी चाहिए। ऐसे पिस्तौल की पूरी जांच कराने से यह पता चल सकता है। कि क्या वह किसी एक फैक्टरी में  मशीनों से बनाया गया है। सीबीआई इन पिस्तौलों की बनावट आदि का मुआयना और स्टडी करे और मुंगेर में वैध हथियार फैक्टरियों में मौजूद मशीनों से उसकी मिलान करकेे देखे।
मुंगेर की बंदूक बनाने वाली वैध फैक्टरियों पर प्रशासन को कड़ी निगरानी औऱ समय-समय पर अचानक छापा मार कर चेकिंग करनी चाहिए। ताकि पता चल सके कि वहां पर  अवैध हथियार तो नहीं बनाए जा रहे।

Thursday, 9 July 2015

क्राइम रिपोर्टिंग: अपराध की खबर सतर्क और जागरूक करती है।






       (Press Club of India की पत्रिका The Scribes World)



इंद्र वशिष्ठ

अपराध की खबर सिर्फ किसी वारदात की सूचना भर नहीं होती है अपराध की खबर लोगों को सतर्क और जागरूक करती है। अपराधी वारदात के कौन से तरीके अपना कर लोगों को अपना शिकार बना रहे है इसकी जानकारी अपराध के समाचारों से मिलती है। लोग यदि अपराध के समाचार में दी गई जानकारी पर ध्यान दें तो वह अपराधियों के चंगुल के आने से खुद को काफी हद तक बचा सकते है।
 लेकिन अफसोस की बात है कि लोग ऐसी खबरों को गंभीरता से नहीं लेते और अपराधियों के चंगुल में फंस जाते है। इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। कि ठगी/जालसाजी/ धोखाधड़ी के समाचार निरंतर आते रहते है। इसके बावजूद ऐसे अपराध के मामले बढते जा रहे है। इससे पता चलता है कि अपराध के समाचारों से लोग कुछ सबक नहीं लेते या फिर अपने लालच के कारण ठगों के जाल में फंसते जाते है।

अपराध की रिपोर्टिंग सिर्फ वारदात की सूचना तक ही सीमित नहीं है। इसके माध्यम से लोगों को कानून और अधिकारों के बारे में भी जानकारी देकर जागरूक किया जाता है। अपराध पीड़ित के क्या क्या  अधिकार और पुलिस का क्या कर्तव्य है। यह भी क्राइम रिपोर्टिंग से बताया जाता है।
क्राइम रिपोर्टिंग गंभीर और जिम्मेदारी से किया जाने वाला कार्य है

 लेकिन न्यूज चैनलों के आने के बाद से इसमें काफी गिरावट आ गई है। सबसे पहले दिखाने की अंधी दौड़ में गलत खबरें तक दे दी जाती हैै। बिना यह समझे कि गलत खबर से किसी पर क्या बीतेगी। कुछ समय पहले लाइव इंडिया चैनल ने दिल्ली की टीचर उमा खुराना के बारे में यह खबर चला दी कि वह छात्राओं से देह व्यापार कराती है। पुलिस ने भी बिना तफतीश किए तुरन्त उमा को जेल में डाल दिया। बाद में तहकीकात में पुलिस ने पाया कि उमा बेकसूर है और उसके बारे में दिखाई खबर फर्जी है।

कुछ साल पहले की बात है एक सुबह न्यूज चैनलों ने खबर दी कि नोएडा में स्कूल बस दुर्घटना में पांच बच्चों की मौत हो गई। जबकि उस दुर्घटना में किसी की मौत नहीं हुई थी। एक अन्य मामले में तो सनसनीखेज खबर दिखाने के चक्कर ने दिल्ली में एक युवक की जान ले ली। खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने वाले एक चैनल ने खबर चला दी कि इस युवक ने अपनी रिश्तेदार लड़की से बलात्कार किया है। इस खबर के कारण शादीशुदा इस युवक ने आत्म्हत्या कर ली। गैर जिम्मेदाराना और संवेदनहीन क्राइम रिपोर्टिंग के ये तो कुछ उदाहरण है। इसके अलावा भी यह देखा गया है कि सबसे पहले दिखाने की होड़ में गलत या एकतरफा खबर दिखा दी जाती हैंं। पुलिस के दावे को ही प्रमुखता दी जाती है चाहे बाद में वह दावा कोर्ट में खोखला कयों न निकलेंं। 

दिल्ली में क्राइम रिपोर्टिंग का स्तर गिरता जा रहा है इसका प्रमुख कारण है पुलिस अफसरों पर निर्भरता। यह स्थिति खतरनाक है क्योंकि ऐसे में पुलिस अपने मन मुताबिक रिपोर्टरों का इस्तेमाल करती है। इसके लिए पूरी तरह से रिपोर्टर जिम्मेदार है। बड़े बड़े समाचार पत्र समूहों और चैनलों तक के रिपोर्टर जब आईपीएस अफसरों के पैर छूते हो तो अंदाजा लगा सकते है कि उनकी रिपोर्टिंग कितनी सही और निष्पक्ष होगी?

क्राइम रिपोर्टिंग का मतलब है कि पुलिस के दावे की भी पड़ताल कर सचाई का पता लगाना है । अपराध पीड़ित ही नहींआरोपी का भी पक्ष लेकर सभी पहलु/तथ्य समेत निष्पक्ष खबर दी जाए। सिर्फ पुलिस के दावे आधार पर ही किसी को मुजरिम करार देना क्राइम रिपोर्टिंग नहीं होती। आरोपी मुजरिम है या नहीं यह कोर्ट ही तय कर सकती है। अपराध पीड़ितपुलिस और आरोपी की बात को वैरीफाई करके सही तथ्य अपनी रिपोर्ट में देने चाहिए।

 अक्सर पाया गया कि पुलिस डकैती को लूट में तथा लूट और स्नैचिंग को चोरी में दर्ज करती है। पुलिस जब डकैती या लूट के मामले सुलझाने के दावे करती है। क्राइम रिपोर्टर को तब यह पड़ताल करनी चाहिए कि पुलिस ने जो मामले सुलझाने का दावा किया है क्या वह सभी मामले पुलिस ने वारदात के बाद दर्ज किए थे या नहीं । और दर्ज ​है तो क्या वह आईपीसी की सही धारा  में दर्ज किए गए। इसके लिए ​क्राइम रिपोर्टर को आईपीसी की प्रमुख धाराओं की जानकारी भी होनी चा​हिए। 
आंकड़ों के द्वारा अपराध कम दिखाने के लिए पुलिस अपराध के सभी मामलों को या तो दर्ज नहीं करती या फिर उनको हल्की धारा में दर्ज करती है। पुलिस ने मामला सही धारा में दर्ज किया है या नहीं इसका पता  अपराध पीड़ित से बात करके लगाया जा स​कता है।  

  पुलिस की भूमिका.. अपराध करने वाला अगर कोई बड़ा आदमी यानी पैसे वाला या सत्ताधारी दल से जुड़ा हुआ है तो पुलिस उसके बारे में जानकारी नहीं देती। अपराध में आम आदमी शामिल है तो उसके पूरे परिवार तक के बारे में ढ़िढ़ोरा पीट कर बताती है।

देश की राजधानी में क्राइम रिपोर्टिंग करना एक चुनौती भरा कार्य है। क्योंकि य​हां पर जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के बीच कार्य करना पड़ता है। राजधानी में ​घटी किसी भी बड़ी वारदात पर पूरे देश की नजर र​हती है। ऐसे में क्राइम रिपोर्टर पर उस मामले में अलग से खास खबर देने का दबाव रहता है। चुनौती,दबाव,तनाव और प्रतिस्पर्धा के बावजूद अच्छी बात यह ​है कि ​यहां ​​अच्छा कार्य करने वाले क्राइम रिपोर्टर की पहचान का दायरा बड़ा हो जाता है। जो कि उसे और अच्छा कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

क्राइम रिपोर्टिंग ऐसा क्षेत्र है जिसमें 24 घंटे ​ही सत​र्क र​हना पड़ता है। अपराध की सूचना मिलते की मौका ए वारदात पर सबसे पहले प​हुंचने का जुनून रिपोर्टर में रहता है। जोकि उसे चुस्त और चौकन्ना रखता है।

कुछ बातें जो कि क्राइम रिपोर्टर को मालूम होना चाहिए। जैसे कि ..

संज्ञेय और असंज्ञेय अपराध कौन सा ​होता है।
जमानती और गैर जमानती अपराध कौन सा होता है।
एफआईआर,रोजनामचा,डी डी एंटरी,तहरीररूक्काकलंदरा,विसरा और पंचनामा क्या होता है।
आईपीसी,सीआरपीसी की मुख्य धाराओं के साथ ​ही पुलिस एक्ट के बारे में जानकारी ​होनी चाहिए।
पुलिस के काम काज में उर्दू के शब्दों का भी इस्तेमाल होता ​है। इसलिए उनके अर्थ मालूम होने चाहिए।
हिरासत और गिरफतारी में अंतर की जानकारी होनी चाहिए।

पुलिस की कार्य प्रणाली खास कर तफतीश आदि के बारे में जानकारी होने से क्राइम रिपोर्टिंग बेहतर होती है।


Press Club of India की पत्रिका 
The Scribes World 


Thursday, 18 September 2014

मेट्रो जेबकतरों के चंगुल में





मेट्रो  जेबकतरों के चंगुल में

इंद्र वशिष्ठ

सावधान दिल्ली मेट्रो में सफर के दौरान अपनी जेब और सामान का पूरा ध्यान रखें और चौकन्ना रहें। मेट्रो में जेबकतरों के कई गिरोह सक्रिय है। जेबकटने के मामलों में जबरदस्त
बढ़ोतरी हो रही है। इस साल सितंबर के शुरू तक ​ही पुलिस ने कुल 1447 मामले दर्ज किए। इनमें से ज्यादातर मामले जेबकटने के है। जेबकतरे पर्स चोरी करने के अलावा मोबाइल और लैपटाप चोरी भी करते ​है। वर्ष 2013 में चोरी के 875 मामले दर्ज ​हुए थे। मेट्रो में बढ रहे चोरी के मामले पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते ​​है। हालांकि पुलिस के अपराध के आंकडे सचाई से कोसों दूर होते ​​है क्योंकि अपराध कम दिखाने के लिए पुलिस जेबकटने के ज्यादातर मामलों को दर्ज नहीं करती है। फिर भी पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामलों से भी यह साफ पता चलता है कि पहले की तुलना में मेट्रो में होने वाले अपराध के मामलों में  बढोतरी हुई है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार जेबकतरों के गिरोह ज्यादा भीड़ भाड़ वाले राजीव चौक,कश्मीरी गेट,चांदनी चौक और चावडी बाजार स्टेशनों पर सबसे ज्यादा सक्रिय है। पुलिस के अनुसार मेट्रो में बढती भीड जेबकतरो के लिए माहौल मुफीद बना देती है।
मेट्रो में सवार होते समय लोगों द्वारा की जानी वाली धक्का मुक्की भी जेबकतरों को जेबकाटने या सामान चोरी करने का मौका देती है। जेबकाटते या बैग से नकदी आदि चोरी करते हुए अपराधियो के फोटो मेट्रो में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों में कई बार पाए भी गए ​है। इसके बावजूद जेब​कतरों पर पुलिस अंकुश नहीं लगा पा रही है।

मेट्रो के कुल 145 स्टेशन ​है रोजाना लगभग 25 लाख लोग सफर करते ​है। मेट्रो की सुरक्षा सीआइएसएफ और दिल्ली पुलिस के हवाले ​है। मेट्रो में ​होने वाले अपराध की रोकथाम और जांच का जिम्मा दिल्ली पुलिस के पास है। इस कार्य के लिए 200 पुलिसकर्मी/अफसर तैनात है। पुलिस अफसर मेट्रो के लिए इतने पुलिसवालों को पर्याप्त् नहीं मानते। मेट्रो के लिए कम से कम 2000 पुलिसवालों की जरूरत है। तभी अपराध और अपराधियों पर ​कंट्रोल किया जा सकता है। 
पुलिस द्वारा गुम सामान/दस्तावेज की आन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने की सेवा इस साल 27 फरवरी को शुरू की गई। इस सेवा के शुरू होने के दो महीने के अंदर ही मेट्रो में सफर के दौरान सामान गुम होने की लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करवाने का आंकडा पचास हजार के करीब प​हुंच गया था। अब ऐसे में यह शक होना लाजिमी है कि क्या वाकई मेट्रो के मुसाफिरों के सामान इस कदर गु​म ​हो रहे ​​है या फिर असल में ये चोरी के मामले ​है।

Monday, 15 September 2014

Lost Report,-- ​ पांच लाख लोगों के सामान / दस्तावेज गुम हो गए




​ पांच लाख लोगों के सामान या दस्तावेज गुम हो गए,  आॅन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट

इंद्र वशिष्ठ
गुम हो गए दस्तावेज या सामान की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए थाने के चक्कर काटने के दिन गए। अब आॅन लाइन पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है। इसके लिए आप दिल्ली पुलिस की वेबासाइट www.delhipolice.nic.in पर जाए। वेबसाइट पर लॉस्ट रिपोर्ट के लिंक पर जाकर अपनी रिपोर्ट दर्ज करा सकते है। ध्यान रहे यह केवल लॉस्ट रिपोर्ट होगी और इसमें पुलिस आपके सामान को खोजने के लिए कोई जांच आदि नहीं करेंगी। यह भी ध्यान रहे कि अगर आपका सामान दिल्ली में गुम हुआ है तभी यह रिपोर्ट दर्ज करा सकते है। सावधान अगर आपकी रिपोर्ट झूठी पाई गई तो आपके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
दिल्ली पुलिस की वेबसाइट पर आपको एक बॉक्स दिखाई देगा जिसमें उपर लॉस्ट रिपोर्ट लिखा होगा। बांई ओर री—ट्रीव,नीचे एफएक्यू और दांई ओर रजिस्टर लिखा होगा। रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए रजिस्टर पर क्लिक करना होगा। इसके बाद आपके सामने एक पेज ओपन हो जाएगा। इसमें शिकायतकर्ता को अपना नाम,पता,मोबाइल नंबर,ई मेल आई डी,सामान गुम होने का स्थान,तारीख और समय अगर याद है तो और सामान की डिटेल देनी होगी। इसके बाद दिए गए कोड नंबर को देख कर उसे लिखकर सबमिट करना होगा। सबमिट करते ही आपके द्वारा दी गई ईमल पर लॉस्ट रिपोर्ट की कॉपी सैंड कर दी जाएगी। उसमें आपको एक नंबर भी दिया जाएगा। इसकी आप कॉपी ले सकते है। बस हो गई रिपोर्ट दर्ज।
(*)स्टार का मतलब—पेज के जिन—जिन बॉक्स की राइट साइड में स्टार दिखाई देगा। उस बॉक्स में मांगी गई जानकारी देना जरूरी होगा। अगर उसे खाली छोड़ दिया जो आपकी रिपोर्ट सबमिट नहीं हो पाएगी।
री ट्रीव— अगर आप किसी अफसर या किसी अन्य के सामने अपनी लॉस्ट रिपोर्ट की
विश्वसनीयता को चेक कराना चाहते है तो री—ट्रीव वाले आॅप्शन पर क्लिक करे। वहां पर दिए गए लॉस्ट रिपोर्ट नंबर और उस ई मेल आई डी को डालना होगा जो रिपोर्ट दर्ज कराते समय दिया था। इसके बाद सर्च करते ही आपके सामने आपकी लॉस्ट रिपोर्ट होगी।
मोबाइल एप से— अगर आपका मोबाइल फोन विंडो और एंड्रॉयड है तो आप उस पर भी गूगल प्ले स्टोर पर दिल्ली पुलिस लॉस्ट रिपोर्ट नाम की इस एप को सर्च कर डाउनलोड कर सकते है।
अगर आपको कोई संदेह है तो एफएक्यू पर क्लिक कर सकते है। यहां से भी परेशानी दूर नहीं होती तो आप पुलिस के हेल्प लाइन नंबर 23237006 पर संपर्क कर सकते है।
 27 फरवरी 2014 से दिल्ली पुलिस ने लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज कराने की यह मोबाइल और वेब एप्लीकेशन शुरू की थी। 16 सितंबर 2014 तक चार लाख 76 हजार 777 लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज ​​की गई। इनमें से चार लाख 54 हजार 218 लोगों ने वेबसाइट पर और 22 हजार 559 लोगों ने मोबाइल फोन से अपने गुम हुए सामान या दस्तावेज की लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज कराई।