Tuesday, 25 July 2017

दिल्ली पुलिस अपराध के सारे मामले दर्ज करें, तो अपराध कम होंगे।

शांति,सेवा,न्याय का दावा खोखला,लुटे-पिटे को भी धोखा देती है पुलिस, 
अपराध पर अंकुश के लिए सारे अपराध दर्ज करना ही एकमात्र रास्ता,

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली में दिनोंदिन अपराध बढ़ रहे है। अपराध बढ़ने का मुख्य कारण है पुलिस का सभी वारदात को दर्ज न करना। अपराध के सभी मामले दर्ज होंगे तो अपराध में वृद्धि उजागर होगी और पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का दवाब बनेगा। पुलिस यह चाहती नहीं इसलिए पुलिस की कोशिश होती है कि अपराध के मामले कम से कम दर्ज किए जाए या फिर हल्की धारा में दर्ज किया जाए। लेकिन ऐसा करके पुलिस अपराधियों की ही मदद करती है। अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने का एकमात्र और सटीक रास्ता सिर्फ अपराध के सभी मामलों को दर्ज करना ही है। अपराध को दर्ज न करके आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का झूठा दावा करने की परंपरा है। ऐसी बाजीगरी से ही पुलिस कमिश्नर अपने को सफल कमिश्नर साबित करने की कोशिश करते है इसी तरीके से एसएचओ और डीसीपी अपने को सफल अफसर दिखाते है। केंद्र में सरकार चाहे किसी दल की हो उसकी शह पर ही पुलिस यह तरीका अपनाती है। सरकार भी आंकड़ों की इस बाजीगरी के दम पर कानून-व्यवस्था अच्छी होने का झूठा दावा करती है। पिछले 26 साल में सिर्फ तत्कालीन पुलिस कमिश्नर वी एन सिंह और भीम सेन बस्सी ने ही ईमानदार कोशिश की थी कि अपराध के मामले सही दर्ज किए जाए। बस्सी को कुछ हद तक इसमे सफलता भी मिली। इसका पता आंकड़ों से भी चलता है जुलाई 2013 से फरवरी 2016 तक बस्सी पुलिस कमिश्नर रहे। साल 2012 में आईपीसी के तहत दर्ज मामलों की संख्या 54287 थी। साल 2013 में 80184 ,साल 2014 में 155654,साल 2015 में 191377 और साल 2016 में 209519 मामले दर्ज हुए।
जागो लोगों जागो -पुलिस मोबाइल/चेन/पर्स की लूट/स्नैचिंग,चोरी, या जेबतराशी के शिकार हुए लोगों को बहका कर उनसे ही यह लिखवा लेती है कि उनका मोबाइल या अन्य सामान गिर या खो गया है या शिकायतकर्ता को खुद ही ऑन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने को कह देते है। शिकायतकर्ता महिला हो तो उसे कह देते है कि केस दर्ज कराओंगी तो अपराधी की पहचान करनी पड़ेगी, कोर्ट में भी चक्कर काटने पड़ेंगे आदि। पुलिस वाले इस अंदाज में महिला को समझाते है कि महिला को लगता कि पुलिसवाला उसका शुभ चिंतक है और पुलिस के बहकावे में आकर वह पुलिस के मुताबिक अपनी रिपोर्ट लिख देती है। आपके लिए, आपके साथ, सदैव की दुहाई देने वाली पुलिस इस तरह लोगों के साथ धोखा करती है। अपराध की एफआईआर न दर्ज करने के लिए पुलिस ऐसा करती है।
लोगों को पुलिस के बहकावे में नहीं आना चाहिए और अपराध की एफआईआऱ ही दर्ज कराने के लिए अड़ना चाहिए। क्योंकि अपराध दर्ज होगा तो रिकार्ड में आएगा और अपराधियों को पकड़ने का पुलिस पर दवाब बनेगा। लूट,चेन स्नैचिंग, चोरी,जेबकटने के मामलों में पीड़ित 100 नंबर पर पुलिस को सही सूचना देता है। लेकिन पुलिस पीड़ित को लॉस्ट रिपोर्ट पकड़ा देती है। ज्यादातर लोग इस लॉस्ट रिपोर्ट को ही एफआईआऱ समझते है। कई लोग यह सोचते है कि एफआईआऱ की बजाए लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने से उनको क्या फर्क पड़ेगा यह भी पुलिस रिपोर्ट तो है ही। यह सोच ही गलत है। लोगों को मालूम नहीं कि ऐसा करके पुलिस के साथ वह भी अपराधियों की मदद कर रहे है। दूसरा उनको मालूम नहीं की जिस लॉस्ट रिपोर्ट के आधार पर वह यह मान रहे है कि पुलिस अपराधी को पकड़ लेगी और उनका सामान बरामद हो जाएगा। तो आप भ्रम में हैं क्योंकि जब पुलिस ने एफआईआऱ ही दर्ज नहीं की तो वह तफ्तीश ही नहीं करेगी । तो ऐसे में उनके सामान की बरामदगी को तो सवाल ही नहीं उठता।
दर्ज होगा तभी तो अंकुश लगेगा अपराध और अपराधी पर-- कुल अपराध दर्ज होने पर ही अपराध और अपराधियों की वास्तविक और सही तस्वीर सामने आएगी । अपराध की सही तस्वीर के आधार पर ही अपराध और अपराधियों से निपटने की कोई भी योजना सफल हो सकती है। अपराध को दर्ज न करना या हल्की धारा में दर्ज करना अपराधी की मदद करना और अपराध को बढ़ावा देना है। मान लो एक लुटेरा पकड़े जाने पर 100 वारदात करना कबूल करता है लेकिन उसमें से दर्ज दस भी नहीं पाई जाती है अगर 100 की 100 वारदात दर्ज होती तो लुटेरे को सभी मामलों में जमानत करानी पड़ती ,जेल में काफी समय तक रहता। जमानत और इतने केसों को लड़ने के लिए उसे वकीलों को इतना पैसा देना पड़ता कि उसकी हालत खराब हो जाती। इसके अलावा इतने सारे केस में से कुछ में तो सजा होने की संभावना रहती । ऐसे में वह लंबे समय तक जेल में रहता। इस तरह अपराध और अपराधी पर अंकुश लग सकता है। अब हालात ये है कि अपराधी को मालूम है कि पुलिस सारी वारदात दर्ज नहीं करती है इसलिए वह बेखौफ वारदात की सेंचुरी बनाता है। पकड़ा भी जाता है तो जल्द जेल से बाहर आकर फिर से वारदात करने लगता है।

11 लाख लॉस्ट रिपोर्ट -- इस साल अब तक 11 लाख से ज्यादा लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज हो चुकी है इसमें से 5 लाख 70 हजार तो मोबाइल फोन खोने की ही दर्ज हुई है। क्या आप यकीन करेंगे कि दिल्ली में 11 लाख लोग इतने लापरवाह है कि उनका मोबाइल या अन्य सामान खो गया होगा। सचाई यह है इनमें अधिकांश मामले लूट,चोरी, जेबकटने के होते है। जिन्हें पुलिस लॉस्ट रिपोर्ट में दर्ज करती है या शिकायतकर्ता को ही ऑन लाइन दर्ज करने के लिए कह देती है। अगर 11 लाख में से आधे मामले भी लूट, चोरी या जेबकटने के मान लें तो इस साल के 6 महीने में ही आईपीसी के मामलों की संख्या ही 5 लाख से ज्यादा होती है। जिस दिन ईमानदारी से अपराध के सारे मामले दर्ज होने शुरू हो जाएंगे तो एक साल में आईपीसी के दर्ज मामलों की संख्या दस लाख तक पहुंच जाएगी। य़ह भी सचाई है कि अपराध और अपराधियों पर अंकुश भी उस दिन से लगना शुरू हो  जाएगा।

Friday, 7 July 2017

दिल्ली में 11 लाख मोबाइल ‘खोए ’, चोरी य़ा छीने गए ?

दिल्ली में 330 करोड़ के मोबाइल ‘ खोए /चोरी ’ ?
दिल्ली में 11 लाख मोबाइल  खोए ’,  चोरी  य़ा छीने गए ?  ,बरामद सिर्फ 6720 ,
 इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली में  रोजाना तीन हजार से ज्यादा मोबाइल फोन चोरी या खो जाते है । इस साल 30 जून तक ही 5,88,237 मोबाइल चोरी या खो जाने के मामले दर्ज  हुए है। यह चौकाने वाला खुलासा है क्योंकि पिछले साल  30 जून तक करीब 25 हजार मोबाइल फोन ही चोरी या खो जाने के मामले दर्ज हुए थे । साढ़े तीन साल में मोबाइल चोरी या खोने के लगभग 11 लाख मामले दर्ज हुए है । इनमें से करीब साढ़े 9 लाख मामले तो पिछले डेढ़ साल के ही है। एक फोन की औसत कीमत कम से कम अगर 3हजार रूपए भी मान लें तो 11 लाख फोन की कीमत 330 करोड़ रूपए है । गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने  पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक की मौजूदगी में ही मोबाइल फोन की बिल्कुल ही कम बरामदगी पर पूछे गए सवाल को हंसी में उड़ा दिया । इसके पहले गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने तो राज्यसभा में यह तक कह दिया था कि छोटे मामले सुलझाने में पुलिस को तकलीफ होती है। कुल अपराध के 75 फीसदी मामलों को सुलझाने में विफल पुलिस को फटकार की बजाए संसद में गृह मंत्री राजनाथ शाबशी देंगे तो पुलिस भला मेहनत वाली तफ्तीश क्यों करेंगी । यही नेता विपक्ष में हो तो ऐसे मामलों पर खूब हल्ला मचाते है । सचाई यह है मोबाइल फोन खोने में दर्ज हुए अधिकांश मामले चोरी और झपटमारी के ही होते है। झपटमारी ,चोरी में एफआईआर दर्ज करनी पड़ेगी और अपराध के आंकड़े से अपराध की वृद्धि उजागर हो जाएगी। इस लिए पुलिस में यह परंपरा है कि झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी के अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज न की जाए। झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी की रिपोर्ट कराने पहुंचे व्यकित को पुलिस कह देती है रिकवरी के चांस तो है नहीं और तुम्हारा काम तो खोने की पुलिस रिपोर्ट से भी चल जाएगा । पहले ऐसे मामलों में पुलिस एनसीआर दर्ज करके या कागज पर लिखी शिकायत पर थाने की मोहर लगा देती थी । अब यह काम ऑन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट से हो जाता है ।  पुलिस अगर ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करे तो उस पर झपटमारों, चोरों को पकड़ने का दवाब बनेगा  है । पुलिस को तफ्तीश में मेहनत करनी पड़ेगी। जो वह करना नहीं चाहती । इसलिए अपराध  को दर्ज न करना एसएचओ,डीसीपी और पुलिस कमिश्नर से लेकर गृह मंत्री तक के अनुकूल है । लेकिन ऐसा करके ये अपराधियों की मदद कर रहे है । अपराधी को मालूम है कि अगर पकड़ा भी गया तो उसके खिलाफ दर्ज मामले तो बहुत ही कम मिलेंगे । पुलिस लुटेरों को गिरफ्तार करके कई बार सैकड़ों केस सुलझाने के दावे करती है लेकिन कभी भी उन सैकड़ों केसों की सूची नहीं देती । सचाई यह है अपराधी द्बारा की गई सभी वारदात पुलिस ने दर्ज ही नहीं कर रखी होती । इसलिए पुलिस प्रचार पाने के लिए तो दावा कर देती है लेकिन सूची नहीं दे सकती । क्राइम रिपोर्टर भी पुलिस के दावे पर ही निर्भर रहते है और खुद पड़ताल कर य़ह सचाई मालूम करने कोशिश ही नहीं करते कि पुलिस ने जितने केस सुलझाने का दावा किया है असल में उसमें से कितने केस दर्ज है।
30 जून 2017 तक मोबाइल फोन खो जाने के 5
,69,824 और 15 जून 2017 तक फोन चोरी के 18413 मामले दर्ज हुए है । जबकि पिछले साल  दिल्ली पुलिस ने  30 जून 2016 तक मोबाइल फोन चोरी या खो जाने के 24482 मामले दर्ज किए । इनमें से  सिर्फ 1068  मोबाइल फोन ही जून 2016 तक पुलिस बरामद कर पाई थी । साल 2017 में मई तक मोबाइल झपटने के 2409 मामले दर्ज किए गए है इनमें से 903 मामले सुलझाने का पुलिस ने दावा किया है।
 साढ़े तीन साल में लगभग 11 लाख फोन चोरी/खोए- साल 2014 से 30 जून 2017 तक 1,068,839 फोन चोरी /खो जाने के मामले दर्ज हुए है। करोड़ों रूपए के फोन चोरी / खो गए है लेकिन पुलिस की फोन बरामद करने में बिल्कुल रूचि नहीं होती है। इसकी पुष्टि नीचे दिए आंकड़ों से भी होती है। पुलिस की रिकवरी दर शर्मनाक है इस लिए 2016 में और 30 जून 2017 तक  कितने फोन बरामद हुए यह जानकारी पुलिस ने नहीं दी । दिल्ली पुलिस के पीआरओ की ओर से  इंस्पेक्टर (प्रेस )संजीव  ने बताया कि फोन रिकवरी का डाटा नहीं होता है । साल 2016 में 3,32,818 मोबाइल फोन खोने और 18687 फोन चोरी के मामले दर्ज हुए। साल 2015 में मोबाइल चोरी या खोने के 62373 और साल 2014 में 66724 मामले दर्ज हुए थे ।  पुलिस साल 2015 में 3415  और साल 2014 में 2237  मोबाइल फोन ही बरामद कर पाई है।  साल 2014 ,2015 और 30 जून 2016 तक  मोबाइल चोरी या खो जाने के 153579 मामलों में पुलिस सिर्फ 6720 मोबाइल फोन ही बरामद कर पाई है । चोरी या खोए मोबाइल फोन  का पता लगाने के लिए साल 2014 में 47310साल 2015 में 47976 और साल 2016 में 19698 फोन को निगरानी/ सर्विलांस पर रखा गया । पुलिस ने  6632 फोन उनके मालिकों को सौंप दिए  है । राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने 30 जून 2016 तक के मामलों की जानकारी दी ।  दिल्ली में मोबाइल फोन चोरी के बारे में सांसद राम कुमार कश्यप और हिशे लाचुंगपा ने सरकार से सवाल पूछे थे।
  उल्लेखनीय है कि मोबाइल फोन का आई.एम.ई.आई. नंबर  पुलिस को दिए जाने और सर्विलांस पर रखे जाने के बावजूद मोबाइल मालिक को न तो  कोई सूचना दी जाती है और न  ही मोबाइल खोजा जाता है।  पुलिस द्वारा मोबाइल फोन की  बरामदगी  के आंकड़ों से ही यह बात साबित होती है कि पुलिस की  फोन खोजने में  कोई रूचि  नहीं होती ।
पुलिस का कहना है कि चोरी हुए मोबाइल फोन का पता लगाने और उसे बरामद करने के लिए  जांच अघिकारी द्वारा सभी प्रकार के प्रयास किए जाते है ।  इन मामलों की जांच को बंद करने तक चोरी हुए मोबाइल के मालिकों को समय समय पर मामले की जांच की प्रगति की जानकारी दी जाती है । 

Tuesday, 4 July 2017

बदमाशों को कारतूस की सप्लाई , हथियार डीलर शक के घेरे में

बदमाशों को  कारतूस की सप्लाई  ,   हथियार डीलर शक के घेरे में ,  देसी  पिस्तौलों मे आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस का इस्तेमाल , हरेक गोली का हिसाब हो , 
इंद्र वशिष्ठ
 देसी यानी अवैध पिस्तौलों मे इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के या विदेशी कारतूस का ही इस्तेमाल किया जाता है। यह खुलासा चौंकाने वाला है। क्योंकि विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस लाइसेंसशुदा हथियार डीलर द्वारा लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही बेचे जाते है। दिल्ली पुलिस का मानना है कि अवैध पिस्तौलों के कारोबार पर रोक लगानी है तो कारतूस की सप्लाई पर रोक लगाने का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। इससे संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा।
दिल्ली पुलिस द्वारा बरामद अवैध पिस्तौलों के मामलों की स्टडी में यह निष्कर्ष निकला कि ​​हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के एक-एक कारतूस का  पूरा/पुख्ता हिसाब  लिया जाना चाहिए  है। पुलिस का मानना है कि अपराधियों को कारतूस की सप्लाई रोकने के लिए यह कदम उठाना सबसे जरूरी है। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने  स्टडी के आधार पर  केंद्र सरकार को इस बारे में कई सुझाव दिए थे ।
 ​​हथियार डीलर शक के घेरे में - पुलिस का मानना है कि अवैध पिस्तौलों के धंधे को बढ़ावा देने में कुछ ​​हथियार डीलर भी शामिल हो  सकते है। पुलिस ने तफ्तीश में पाया कि मुंगेर(बिहार) या मध्य प्रदेश की बनी अवैध पिस्तौलों में विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस का ही हमेशा इस्तेमाल किया गया है।  प्रयोगशाला  की  जांच  में भी यह स्पष्ट  पाया गया  कि बरामद कारतूस देसी यानी अवैध रुप से बने हुए नहीं है बल्कि इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के बने हुए या विदेशी है । लाइसेंसशुदा हथियार डीलर ही लाइसेंसशुदा हथियारधारक को कारतूस बेचते है। ऐसे में इन दोनों के माध्यम से ही कारतूस अपराधियों के पास पहुंचने की संभावना अधिक  है। इसलिए अगर अवैध हथियार के धंधे को खत्म करना है तो अपराधियों तक कारतूसों की सप्लाई रोकना सबसे जरूरी है।
 एक-एक गोली का  पुख्ता हिसाब - लाइसेंसशुदा हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूस अपराधियों तक न पहुंचेइसे रोकने के लिए एक पुख्ता निगरानी और जांच व्यवस्था बनाने की जरुरत है हथियार डीलर ने लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही कारतूस बेचे है इसकी पुष्टि/तस्दीक लाइसेंसशुदा हथियारधारक से करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। पुलिस को स्टडी में पता चला कि  इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी से मिलने  वाले कारतूस के कोटे को कुछ हथियार डीलर  उसी राज्य या दूसरे राज्य के ​​हथियार डीलरों  को बेच देते है।  इससे इस कोटे के दुरूपयोग और कारतूसों के अपराधियों के पास पहुंच जाने की संभावना रहती है। सरकार को इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के  कारतूस के कोटे को आपस में  दूसरे हथियार डीलरों को बेचने पर रोक लगानी चाहिए। इससे कारतूस की कालाबाजारी और कारतूस अपराधियों के पास पहुंचना बंद होगा। लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूसों का भी पुख्ता हिसाब होना/देखना चाहिए और इस्तेमाल किए कारतूस के खाली खोखे को जमा कराने पर ही ओर कारतूस दिए जाने  चाहिए।
 कारतूस  रोकने से अपराध पर असर पड़ेगा-पुलिस ने यह भी पाया कि मेरठ,कानपुर,झारखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों के  कुछ हथियार  डीलर दूसरे राज्यों के हथियार डीलरों से कारतूस की बड़ी खेप/कोटा खरीदते है। पुलिस का मानना है कि इसके बाद कुछ हथियार डीलर अपने बिक्री रजिस्टर में हेराफेरी करके उन कारतूस को मोटा मुनाफा पाने के लिए अपराधियों को बेच देते है। पुलिस का मानना  है कि सरकार यदि उपरोक्त कदम उठाए तो इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के कारतूसों को अपराधियों के पास पहुंचने से रोका जा सकता है। इससे संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा। क्योंकि यह देखा गया है कि उम्दा किस्म के कारतूस अवैध रूप से बनाना असंभव और मुश्किल है।
राज्य पिस्तौलों की पूरी जांच कराए- केंद्र सरकार को सभी राज्यों को खासकर पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,राजस्थान और बिहार को यह निर्देश देने चाहिए कि बरामद होने वाले सभी पिस्तौलों(मैगजीन वाली)और रिवाल्वर की प्रयोगशाला में बैलेस्टिक के अलावा फिजिक्स डिवीजन से भी पूरी जांच  जरूर कराई जानी चाहिए। ऐसे पिस्तौल की पूरी जांच कराने से यह पता चल सकता है। कि क्या वह किसी एक फैक्टरी में  मशीनों से बनाया गया है। सीबीआई इन पिस्तौलों की बनावट आदि का मुआयना और स्टडी करे और मुंगेर में वैध हथियार फैक्टरियों में मौजूद मशीनों से उसकी मिलान करके देखे । मुंगेर की बंदूक बनाने वाली वैध फैक्टरियों पर प्रशासन को कड़ी निगरानी औऱ समय-समय पर अचानक छापा मार कर चेकिंग करनी चाहिए। ताकि पता चल सके कि वहां पर  अवैध हथियार तो नहीं बनाए जा रहे।
मेडल विजेता शूटर कारतूस बेचता था—मई 2016 में स्पेशल सेल ने मेडल विजेता शूटर मुकर्रम अली को गिरफ्तार किया । उसके पास से अलग-अलग बोर के  5533 कारतूस बरामद हुए । अली ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि वह एक अन्य शूटर अक्षय से कारतूस खरीद कर सोनू और मुजफ्फर नगर के मेहंदी को बेचता था । इस मामले ने भी पुलिस की स्टडी को सही साबित किया है ।

Monday, 3 July 2017

दिल्ली में अवैध बंदूकों का बोलबाला,

  दिल्ली में अवैध बंदूकों का बोलबाला,
 अवैध बंदूक  बनाने में बिहार बना पाकिस्तान, मध्य प्रदेश भी पीछे नहीं
इंद्र  वशिष्ठ,
  दिल्ली और एनसीआर में  पिछले 5-7 सालों में  हत्या, लूट और जबरन वसूली  जैसे  संगीन अपराध  में देसी पिस्तौल के इस्तेमाल में जबरदस्त इजाफा हुआ है । उम्दा किस्म के देसी पिस्तौल का आसानी से मिल जाना इसका मुख्य कारण है।  15 मई 2017 तक  ही दिल्ली पुलिस 371  पिस्तौल/रिवाल्वर/बंदूक बरामद कर चुकी है। पुलिस ने करीब साढ़े 5 साल में 3733 पिस्तौल/रिवाल्वर/बंदूक बरामद की है। इतनी बड़ी संख्या में हथियारों की बरामदगी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अवैध हथियार कितनी बड़ी संख्या में बनाए जा रहे है । पिस्तौल का आसानी से मिलना भी अपराध को बढ़ा रहा है । दिल्ली में  शायद ही कोई दिन ऐसा जाता है जब वारदात में गोली नहीं चली हो ।
मुंगेर गढ़-  अपराध में अवैध पिस्तौलों के बढ़़ते इस्तेमाल को देखते हुए दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर नीरज कुमार ने अपराध शाखा से  एक स्टडी कराई थी । जिसमें पता चला कि उम्दा किस्म के ये देसी पिस्तौल बिहार के मुंगेर में बनाए जाते है। क्वालिटी के मामले में ये हथियार भारतीय आयुध फैक्टरी में बने हथियार से किसी भी तरह कम नहीं है। मुंगेर में बनी पिस्तौल से एक बार में 7-8 गोलियां तक आसानी से चलाई जा सकती है। इसलिए इन  पिस्तौलों की  अपराधियों में जबरदस्त मांग है। तफ्तीश के दौरान पता चला कि मुंगेर में छोटी-छोटी फैक्टरियों में हथियार बनाए जाते है और संगठित गिरोह द्वारा पूरे देश में सप्लाई किए जाते है। यह भी पता चला कि अवैध हथियार मेरठ,आगरा और इलाहाबाद के हथियार तस्करों द्वारा सप्लाई किए जाते है। हथियार बिहार से लाकर दिल्ली और आसपास के राज्यों में सप्लाई किए जाते है। हथियारों की तस्करी में महिलाओं का भी इस्तेमाल किया जाता है। उन पर शक न हो इसलिए वह महिलाओं के साथ परिवार की तरह यात्रा करते है।
आतंकियों और नक्सलियों को भी सप्लाई-पुलिस ने पाया कि हथियार तस्कर मध्य प्रदेश,उड़ीसा,बिहार और झारखंड के नक्सलियों को भी हथियार सप्लाई करते है। 19-9-2010 को जामा मस्जिद के बाहर विदेशियों पर गोलियां चलाने और पुणे बम धमाकों के आरोप में पकड़े गए इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों से भी मुंगेर की बनी 4 पिस्तौल बरामद हई थी।

मुंगेर बना दर्रा----पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम फरंटियर इलाके में दर्रा- नामक इलाके में  अवैध हथियार बनाना  कुटीर उद्योग की तरह है। उसी तरह भारत में मुंगेर उम्दा किस्म के देसी पिस्तौल/रिवाल्वर बनाने के बड़े  स्त्रोत के रूप में उभरा है। पुलिस के अनुसार सरकार ने मुंगेर में कुछ साल पहले बंदूक बनाने के लिए 32 फैक्टरियों को लाइसेंस दिए थे। इनमें काम करने वाले या रिटायर हुए कुछ लोग मोटा पैसा कमाने के लिए अवैध हथियार बनाने लगे। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर, कैराना में भी देसी तमंचे बनाए जाते है। हरियाणा के मेवात में भी हथियार बनाए जाने की भी जानकारी पुलिस को मिली ।
मध्य प्रदेश भी गढ़- मुंगेर के बाद अवैध हथियार बनाने में मध्य प्रदेश का नंबर आता है। पुलिस ने स्टडी में पाया कि मध्य प्रदेश के खरगौन, धार और  सेंधवा, बरवानी में भी अवैध पिस्तौले बनाई जाती है। ये पिस्तौल  दिल्ली समेत कई राज्यों के अपराधियों को सप्लाई किए जाते है। 
दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने 4 जून 2017 को अलीगढ़ के हरेंद्र, पुष्पेंद्र और मोहित को गिरफ्तार किया । इनसे 13 पिस्तौल और 100 कारतूस बरामद हुए । अलीगढ़ निवासी हरेंद्र और पुष्पैद्र भाई है। ये मध्य प्रदेश के धार जिले से हथियार सप्लायर ईश्वर सिंह से हथियार लाकर दिल्ली,उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बेचते थे ।
3733 पिस्तौल बरामद-- दिल्ली पुलिस ने  इस साल 15 मई 2017 तक 371 पिस्तौल/रिवाल्वर/ बंदूक जब्त की है । साल 2012 में 586,साल 2013 में 700,साल 2014 में 868, साल 2015 में 433 और साल 2016 में 775 पिस्तौल/रिवाल्वर/बंदूक जब्त की गई ।
देसी को विदेशी बताते है।-मोटे मुनाफे के लिए इन पिस्तौलों को विदेशी बता कर बेचने के लिए इन पर  मेड इन इंग्लैंड और यूएसए भी लिख दिया जाता है। मुंगेर से पिस्तौल 10-12 हजार रुपए में लाकर हथियार तस्कर 25-30 हजार रुपए में अपराधियों को बेचते है।

99 मुंगेरी पिस्तौल की सबसे बड़ी खेप - दिल्ली पुलिस ने  जुलाई 2013 में मुंगेर से लाई गई 99 पिस्तौल और 198 मैगजीन  बरामद की थी । एम्बेसडर कार की हेडलाइटों के पीछे बनाए गए विशेष स्थान पर ये पिस्तौले छिपा कर लाई गई थी।  इस मामले में गिरफ्तार किए गए  मुंगेर निवासी निरंजन मिश्र और फिरोज आलम ने  पुलिस को बताया कि वह देश के ज्यादातर हिस्से में हथियार सप्लाई करते है। इन्होंने ने यह भी बताया कि वह हर महीने हथियारों की कम से कम एक खेप  दिल्ली और आसपास के राज्यों में सप्लाई करते है।  उन्होंने मुजफ्फर नगर के हाजी उर्फ मुल्लाजी को 85 पिस्तौले सप्लाई की थी। बरामद पिस्तौल पर ‘आर्मी सप्लाई केवल’ और ‘मेड इन यूएसए ’ लिखा हुआ है।
 2014 में स्पेशल सेल ने मध्यप्रदेश के बरवानी निवासी मोह बाई उर्फ मुन्नी को उस समय पकड़ा जब वह मथुरा निवासी शम्सु को 9 पिस्तौलें सौंप रही थी। मुन्नी ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि गांव में अवैध पिस्तौल बनाने वाले व्यकित के लिए वह हथियार सप्लाई करती है। हथियार की एक खेप पहुंचाने की एवज में उसे 2500 रूपए मिलते है। मुन्नी अवैध हथियारों के साथ पहले बीना जिला सागर और सेंधवा में भी पकड़ी जा चुकी है।  स्पेशल सेल ने 2016 में मथुरा के उतवार का नंगला गांव निवासी सलामुद्दीन को गिरफ्तार किया । उसके पास से 27 पिस्तौलें  बरामद हुई । सलामुद्दीन मथुरा के छाता निवासी  मुश्ताक के लिए काम करता है।  मध्य प्रदेश के सेंधवा से पिस्तौल की एक खेप लाने के एवज में उसे 5000 रूपए मिलते थे । मुश्ताक दिल्ली,एनसीआर और अन्य इलाकों में हथियार सप्लाई करता है।








Monday, 19 June 2017

जेटली, टाइम्स आफ इंडिया का संपादक बेनकाब। मोदी,मीडिया ,सारे नेता खामोश।


जेटली, टाइम्स आफ इंडिया का संपादक बेनकाब।
 मोदी,मीडिया ,सारे नेता खामोश।



इंद्र वशिष्ठ
प्रधानमंत्री जी क्या आपका 56 इंच की छाती ठोक कर यह  कहना "ना खाऊंगा ना खाने दूंगा " 'भ्रष्टाचार"​ बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा भी जुमला बन कर रह गया है । आप की​ नाक के नीचे आपके खासमखास अरुण जेटली और मीडिया मठाधीश अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग का धंधा करते हैं और आपको भनक तक नहीं लगी।आपके सुपर काप जासूस एनएसए अजीत डोभाल को भी क्या सांप सूंघ गया था कि वह यह सब नहीं सूंघ पाए। कहां जाता है कि राजा वहीं कामयाब होता है जिसका खुफिया तंत्र मजबूत होता है। अगर ऐसा है तो यह ख़तरे की घंटी है लेकिन अब तो आपकी जानकारी में यह मामला आ चुका हैं फिर भी अभी तक आपके द्वारा चहेते जेटली के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना आपकी भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है। जिससे आपमें और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं लगता हैं। राजनीतिक बयान बाजी पर केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का  केस करने वाले जेटली ने इस मामले के सार्वजनिक होने पर ना तो कोई बयान दिया और ना ही मामला उजागर करने वालों पर मानहानि का केस किया है। भाजपा के पाले मीडिया मठाधीश रजत शर्मा द्वारा सर्टिफाइड ईमानदार जेटली की चुप्पी से स्पष्ट​ हैं  कि ख़बर सही है।
 टाइम्स आफ इंडिया के संपादक  की इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के एक अफसर की लंदन में पोस्टिंग के लिए अरुण जेटली से सांठगांठ का सनसनीखेज खुलासा pgurus.com  ने किया है। संपादक का नाम है टाइम्स आफ इंडिया के एग्जीक्यूटिव एडिटर दिवाकर अस्थाना और  इकोनोमिक टाइम्स के पूर्व संपादक  पी आर रमेश। कहावत है कि पाप का घड़ा एक दिन जरूर फूटता है। इस पूरे मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली, उसके  प्राइवेट सैकेटरी सीमांचल दाश और दलाल संपादक के गठजोड़ का खुलासा भी कुछ अच्छे पत्रकारों के कारण हो पाया है। 2004 बैच  का आईआरएस अफसर अनुपम सुमन प्राइवेट फंड से स्टडी लीव पर लंदन में है। अनुपम लंदन में  ट्रैक ब्लैक मनी आपरेशन के लिए बने पद पर तैनात होना चाहता है  उसकी चाहत को पूरा करने का ठेका इस दलाल संपादक ने लिया। अनुपम की पोस्टिंग के लिए इन दलालों,  अरुण जेटली और उसके पीएस दाश के बीच क्या क्या बात हुई और जेटली ने क्या आश्वासन दिया । यह सब बताने के लिए दिवाकर ने 31मई को चार बजे अनुपम को व्हाट्सऐप पर मैसेज  भेजा। लेकिन मैसेज भेजने के बाद किसी ने दिवाकर को बताया कि उसकी काली करतूत का वह मैसेज गलती से  टाइम्स के पत्रकारों के ग्रुप पर पहुंच गया है। टाइम्स के ही किसी पत्रकार ने संपादकों और जेटली की सांठगांठ के इस मैसेज को pgurus.com को पहुंचा दिया जिसने 8 जून को इस नापाक गठजोड़ को उजागर कर इन सबको नंगा कर दिया। कांग्रेस के समय नीरा राडिया टेप मामला सामने आने पर हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक वीर सिंघवी और एनडीटीवी की बरखा दत्त की करतूत उजागर हुई थी। उनका भी आज तक कुछ नहीं बिगड़ा है।इन दोनों दलालों दिवाकर और रमेश का भी अभी तक कुछ नहीं बिगड़ा है। टाइम्स आफ इंडिया ने भी इस दलाल को नहीं निकाला है। टाइम्स आफ इंडिया के  मालिक समीर जैन और विनीत जैन भी अपने फायदे के लिए  दलाल दिवाकर को इतने सालों से पाले हुए हैं। दिवाकर  की करतूत से उजागर हो गया कि मीडिया का वाच डॉग तो क्या वाच मैैन बनने लायक भी उसका चरित्र नहीं है। दिवाकर भी उन मीडिया मठाधीश  में शुमार है जो अपने फायदे के लिए नेताओं के  पोतडे धोते हैं और इतराते घूमते हैं।

मीडिया की आज़ादी की दुहाई देकर मोदी को कोसने वाले अरुण शौरी, कुलदीप नैयर,एचके दुआ , बाबू मोशाय प्रणय रॉय, और आजतक के मालिक अरूण पुरी की भी इस मामले में बोलती बंद हो गई है। क्या इस मामले  में एनडीटीवी की वह पत्रकारिय प्रतिभा किसी को दिखाई  दी जिसका वह झूठा  ढिंढोरा​ पीटता है।किसी चैनल और अखबार ने इस मामले में छोटी सी खबर भी नहीं दी। इस मीडिया मठाधीश के खिलाफ एडिटर गिल्ड ने प्रेस क्लब के साथ मिलकर अब क्यों नहीं आवाज उठाई। ये सिर्फ मीडिया महाराक्षसो के समर्थन में ही आवाज उठाते हैं।इससे मेरी बात एक बार फिर साबित हो गई कि मीडिया मठाधीश चोर चोर मौसेरे भाई हैं।कांग्रेस तो क्या कम्युनिस्ट पार्टी और  भ्रष्टाचार के आरोप में घिरे केजरीवाल जैसे भोंपू भी चुप है। जेटली के नंबर वन दुश्मन  सुब्रमण्यम स्वामी ,राम जेठमलानी और कीर्ति आजाद  की जुबान को भी लकवा मार गया लगता है। भ्रष्ट लालू के समर्थक बिहारी भांड शाट गन शत्रुघ्न​ के कारतूस भी  बुझ गए हैं। देश द्रोह के नारे लगाने वालोें को पटक  कर मारने का बयान देने वाले बयान बहादुर आर के सिंह की औकात नहीं है कि  देश को दीमक की तरह चाट रहे इन असली देश द्रोहियों के खिलाफ बयान भी हलक से निकाले। भाजपा का धुर विरोधी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा जमूरा लालू भी चुप है। इस मामले में अगर बिहारी बाबू दिवाकर शामिल नहीं होता तो ये सारे बिहारी बाबू भी जेटली के खिलाफ बयान बहादुर बन जाते। इससे स्पष्ट है कि मीडिया मठाधीश और भ्रष्ट नेता एक ही गैंग के है। दिल्ली पुलिस में मौजूद प्रभाकर भी अपने इस मठाधीश भाई और भ्रष्ट आईपीएस अफसरों के दम पर ही मलाईदार पद पर रहा है।इस समय भी एफआरआरओ के अहम पद पर तैनात हैं। ईमानदारी का ढोंग करने वाले  प्रभाकर के  किस्से भी  जगजाहिर है।

जागो लोगों जागो अब तो समझ जाइए कि मीडिया​ को इसलिए आम आदमी की समस्या से कोई मतलब नहीं है। असली देशद्रोही ये भ्रष्ट नेता , मीडिया के राक्षस और भ्रष्ट नौकरशाह हैं। छोटे-छोटे मामलों में खुद संज्ञान लेने वाला सुप्रीम कोर्ट इस मामले में संज्ञान ले तो पता चलेगा कि देश में न्याय व्यवस्था जिंदा।

इंद्र वशिष्ठ 
पूर्व विशेष संवाददाता दैनिक भास्कर
पूर्व क्राइम रिपोर्टर सांध्य टाइम्स टाइम्स ग्रुप




Thursday, 15 June 2017

ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , नेताओं के पोतडे धोने वाले पत्रकारों से देश को खतरा।




ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर , नेताओं के पोतडे धोने वाले पत्रकारों से देश को खतरा।

इंद्र वशिष्ठ
NDTV--सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, फुल आपरेशन हो।----- 
प्रधानमंत्री जी अगर आपकी नीयत सही है तो जिन मीडिया मठाधीशों पर CBI, ED, Police में केस दर्ज है उनके मामलों की जांच को 6 महीनों के अंदर पूरी कराएं और कोर्ट में जांच एजेंसी की ओर से मामला न लटके यह सुनिश्चित करें। ऐसा होने पर ही मीडिया की गंदी मच्छलियों को जल्द सबक मिलेगा।
 अगर आप ऐसा नहीं करते तो स्पष्ट हो जाएगा कि आप में और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं है। और मामले को जान बूझ कर लटका कर रखने का मकसद मीडिया को डरा कर अपना भोंपू बनाना है। मीडिया के महाराक्षसो का सफाया करने के लिए बड़े आपरेशन की सख्त जरूरत है। वरना NDTV पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक भी सिर्फ मीडिया को डराने वाली और अपने को दबंग दिखाने का मोदी का पुलिसिया तरीका माना जाएगा। किसी समय गंगा के समान पवित्र माने जाने वाले पत्रकारिता का पेशा अब गंगा से भी ज्यादा मैला हो गया है। पत्रकारिता की पवित्रता को बहाल करने के लिए बड़े स्तर पर सफाई अभियान की शुरूआत की जरूरत है। मीडिया महाराक्षसों, कांग्रेस ,भाजपा, अंबानी का नापाक गठजोड़ इसके लिए बराबर जिम्मेदार हैं।

कलम के सिपाही की तलाश----
कृपया कोई यह बता दें कि NDTV के प्रणय रॉय पर CBI द्वारा दर्ज धोखाधड़ी यानी 420 के मामले को मीडिया पर हमला मान कर कथित नेशनल मीडिया के अंग्रेजी, हिंदी के कितने संपादकों ने अपनी कलम की पैनी धार से मोदी की निंदा, आलोचना में संपादकीय, लेख लिखा है। 
हर मामले में मदारी की तरह चीख चीख कर बहस कराने वाले कितने चैनल ने इस मामले में मोदी की आलोचना के लिए बहस कराई थी। मैं ऐसे कलम के सिपाही संपादकों के लेख पढ़ना चाहता हूं।
 फेसबुक पर मीडिया पर हमला प्रचारित करने वाले नव भारत टाइम्स के पूर्व पत्रकार शकील अख़्तर से मैंने यह जानकारी मांगी तो उनकी बोलती बंद हो गई और सवाल को ही वाहियात बता दिया। हद तो यह हो गई कि उनके कांग्रेसी छुट भईया नेता भी फेसबुक पर बकवास करने लगे । तब मैंने शकील और कांग्रेस के पोतडे धोने वालों को उनकी औकात वाला आईना दिखाया जिसे देखते ही शकील ने फेसबुक पर मुझे ब्लाक कर दिया। किसी को पुष्टि करनी हो तो शकील से कहें फेसबुक पर हुआ पूरा वार्तालाप दिखाएं। 
शकील की इस हरकत ने उसके संस्कार और उसकी कांग्रेस भक्ति मय पत्रकारिता की पोल खोल दी। शकील से मैंने यह भी पूछा कि मीडिया पर हमला है तो सभी मठाधीश संपादक प्रेस क्लब में क्यों नहीं पंहुचे थे।
 सचाई यह है कि आपराधिक मामले को प्रेस की आजादी पर हमले का मामला बनाने की बाबू मोशाय और उनकी मंडली द्वारा ही कोशिश की जा रही है । 
वैसे आजकल मीडिया के सभी मठाधीश मालिक संपादक तो मोदी के सामने दंडवत हैं। अरे मोदी के खिलाफ लिखने का दम नहीं है तो उन उद्योपतियों के खिलाफ ही लिखों जो बैंकों का लाखों करोड़ डकार गए। ऐसे उद्योपतियों को पूरी जिंदगी कांग्रेस ने पाला और अब मोदी ने गोद ले लिया। लेकिन मीडिया मठाधीश उनके खिलाफ भी नहीं लिखेंगे। मी
मालिक भी तो उद्योगपति हैं। मीडिया के मठाधीश संपादक भी कोई भाजपा तो कोई कांग्रेस​ तो कोई अंबानी का पाला हुआ है। अब मीडिया का आलम यह है कि आम आदमी की समस्याओं​ से उसे कोई मतलब नहीं। कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा का राग दरबारी गाते हुए बेशर्मी और अकड़ के साथ संपादक होने पर इतराते घूमते हैं। पत्रकारिता धर्म का रत्ती भर भी पालन नहीं करते। यह स्थिति देश के लिए सबसे ख़तरनाक है। मीडिया का पतन देश के लिए सबसे ज्यादा नुकसान दायक है।

---NDTV तो एक मौका है किसी समय गंगा की तरह पवित्र माने जाने वाले पत्रकारिता के पेशे की पवित्रता को वापस बहाल होना चाहिए। छोटे से भी अपराध में आरोपी का पोस्ट मार्टम करने में मीडिया अपनी पूरी प्रतिभा झोंक देता है। कोर्ट में बाद में वह चाहे बरी हो जाए लेकिन मीडिया की दी सज़ा वह पूरी जिंदगी भुगतता है।
 दूसरी ओर मीडिया के किसी मठाधीश पर आपराधिक मामले में जांच होने के पहले ही उसे क्लीन चिट ही नहीं दे देते बल्कि उसे मीडिया की आज़ादी पर हमला स्वयं भू मठाधीश घोषित कर देते है। क्या यह मीडिया का दोगलापन नहीं है। मीडिया के बीच मौजूद महाराक्षसो को मीडिया वाले बाहर नहीं करेंगे तो क्या कोई पाकिस्तानी​ आकर करेगा।
 मीडिया के महाराक्षस और भ्रष्ट नेताओं​ का गठजोड़ राजनीति और मीडिया का ही नहीं देश का भट्ठा बिठाते रहेंगे। नेता या पुलिस के भ्रष्ट होने की तुलना में जज और मीडिया का पतन देश के लिए सबसे ज्यादा ख़तरनाक है। ईमानदार पत्रकारों की तकलीफ़ ये मठाधीश क्या जाने।

 छाछ बोले तो बोले छलनी भी बोले जिसमे सत्तर छेद---
मोदी का भूत कांग्रेस माता भक्तों में ही नहीं भाजपा के कट्टर भाजपा भक्तों में भी किस कदर समाया हुआ है इसकी बानगी पेश है। पंजाब केसरी के बुजुर्ग पत्रकार मनमोहन शर्मा ने मुझे मोदी भक्त कह दिया। शर्मा जी को दिया जवाब आपसे साझा कर रहा हूं । जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। शर्मा जी क्षमा सहित पूछना चाहता हूं आपके पंजाब केसरी के खिलाफ केशव पुरम थाने में जमीन कब्जा करने का जो केस दर्ज हुआ। उसके बारे में कभी भूल कर भी आपने पत्रकारिय प्रतिभा दिखाई क्या। 

दूसरों पर अंगुली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए। ब्राह्मण और पत्रकार दोनों का धर्म समाज को सच और सही राह दिखाना है। आपने ब्राह्मण​ और पत्रकार दोनों के ही धर्म का पालन नहीं किया । इसलिए आपको यह भी नज़र नहीं आया कि मैं आशंका जता रहा हूं कि कहीं यह सब मीडिया को डरा कर भोंपू बनाने की नीयत तो नहीं।आपका तो मालिक ही भाजपा की गोद में बैठ कर सांसद बना हैं। आप ईमानदार हैं तो मोदी से कह कर कब्जा करने वाले अश्विनी को गिरफ्तार कराए और कब्जा हटवा के दिखाए। 

आपका मालिक भक्ति से भाजपा सांसद बन गया है और भक्त मुझे बता रहे हैं। आपकी समझ पर तरस आता है। जिंदगी में आपने भी अपने मालिक की तरह भक्ति भरी पत्रकारिता की होगी। मै तो ब्राह्मण और पत्रकार दोनों के धर्म 27साल से लट्ठ गाड के निभा रहा हूं। मेरी खबरें ही मेरी पहचान है। आप की तरह भक्ति मय पत्रकारिता नहीं करता। मेरे बारे में किसी से ज्ञान वर्धन कर ले या मेरा ब्लॉग http://indervashisth.blogspot.com पढ़ लें आपको पता चल जाएगा कि पत्रकारिता क्या होती। आपने अपने बुजुर्ग होने की भी मर्यादा नहीं रखी तथ्य के आधार पर बात करने​ की बजाए भक्त कह कर मुझे जवाब देने को मजबूर किया। 
आप तथ्यों के आधार पर मेरे लेख में कमी निकालते तो आपका स्वागत करता।यह जवाब उन सभी पत्रकारों के लिए भी है जो आपने आका नेताओं​ को खुश करने के लिए बकवास कर रहे हैं। 
मैं तो अब भी अपना कर्म उस साधु की तरह कर रहा हूं जो बार बार डंक मारने वाले बिच्छू को भी डूबने से बचाने का अपना कर्म करना नहीं छोड़ता है।
अक्ल के अंधे कांग्रेस माता और भाजपा दाता के उन सभी भक्त पत्रकारों के लिए जिन्हें पढ़ना तो दूर शायद गिनती तक नही आती। वह घर में अपने बच्चों से भी लेख में मौजूद मठाधीशों के नाम​ की गिनती करा लेते तो पता चल गया होता कि ज्यादा नाम भाजपा से जुड़े मठाधीशों के है। पंजाब केसरी के अश्वनी कुमार, जी न्यूज के लाला सुभाष चन्द्र,सुधीर चौधरी, रजत शर्मा, चंदन मित्रा, अरुण शौरी, शेखर गुप्ता,अर्णब गोस्वामी और दीपक चौरसिया को भी कांग्रेसी​ अंध भक्त क्या अब अपने प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई,बरखा दत्त, तरुण तेजपाल की तरह कांग्रेसी​ ही मानने लगे हैं।।असल समस्या यह है कि कांग्रेस भाजपा देखने वाले ज्यादातर पत्रकार उन दलों के प्रवक्ताओं​ से भी ज्यादा वफादारी दिखाने की होड़ में हैं।
 हीरा तहां ना खोलिए जहां कुंजडो की हाट।

इंद्र वशिष्ठ
पूर्व विशेष संवाददाता, दैनिक भास्कर
पूर्व क्राइम रिपोर्टर सांध्य टाइम्स( टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप)






Monday, 12 June 2017

NDTV​ खाप पंचायत, बिल्ली हज को चली।



NDTV खाप पंचायत, बिल्ली हज को चली।
इंद्र वशिष्ठ
NDTV की अपने आपराधिक मामले को मीडिया पर हमला बनाने की साज़िश फेल हो गई। प्रेस क्लब में हुई सभा खाप पंचायत और मोदी स्यापा सभा बन कर रह गई। सभा में​ वह नामचीन कथित पत्रकार मौजूद थे जो मंत्री पद से लेकर ब्रिटेन, डेनमार्क में राजदूत और राज्यसभा सांसद के रुप में सत्ता का सुख भोगने के बाद आराम से जुगाली कर रहे हैं। क्या सरकार का राग दरबारी गाए बिना किसी को यह सुख नसीब हो सकता है ।अब इनके मुख से प्रेस की आजादी की बात करना ठीक ऐसे हैं कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। बुजुर्ग पत्रकार कुलदीप नैयर से माफी सहित पूछना चाहता हूं कि क्या आपने कभी भी उन सरकारों के खिलाफ अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल किया था जिनकी दया से 1990में आपने उस विलायत में राजदूत का सुख भोगा जिसके लिए आईएफएस अफसर भी तरस जाते हैं। कुलदीप जी फिर 1997में राज्यसभा सुख भी भोगा। अरुण शौरी जी आपने अपनी प्रतिभा पूरी जिंदगी क्या केंद्रीय मंत्री बनने के लिए ही दिखाई थी। मंत्री बनने से तो यह बिल्कुल स्पष्ट ​हो गया था कि आपने पत्रकारिता धर्म का पालन नही किया था। मंत्री पद का सुख भोगने के दौरान आपके अंदर का पत्रकार तब कहां था जब कश्मीर टाइम्स के इफ्तिखार गिलानी को देश द्रोह के झूठे केस में आपकी ही सरकार ने आईबी और दिल्ली पुलिस की मदद से जेल में सड़ाया। अरूण जी क्या​ यह सच नहीं है कि इंडियन एक्सप्रेस के खिलाफ दरिया गंज थाने में जमीन कब्जा करने के आरोप में केस दर्ज हुआ था बाद में कोर्ट के माध्यम से वह प्लाट एक्सप्रेस को मिला। ​इस तरह प्रेस एरिया में एक्सप्रेस​ के दो प्लाट हो गए जबकि अन्य के पास तो सिर्फ एक एक है।ऐसी बुनियाद पर खड़ा यह समूह पत्रकारों को सम्मानित किया करता है। ऐसे मामलों में आपकी पत्रकारिय प्रतिभा कभी देखने को नहीं मिली। न ही तब जब एक्सप्रेस की हड़ताल खत्म कराने के लिए बीजेपी के खुराना की मदद से अखबार निकाला। ऐसे मामलों में आप जैसे दिग्गज मठाधीश कभी नहीं बोलें तो शेखर गुप्ता बिचारे की तो हैसियत क्या है। एच के दुआ जी क्या आपने कभी भूल से भी अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल उन सरकारों की पोल खोलने​ को किया जिनकी मेहरबानी से डेनमार्क में राजदूत और राज्य सभा का सुख भोगा। दुआ जी में जरुर सुरखाब के पर लगे हैं। कांग्रेस हो या बीजेपी या हो तीसरा दल यह सदा सत्ता के दरबार में रहे। प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल और अटल बिहारी वाजपेई के भी मीडिया सलाहकार रहे तो कांग्रेस से राज्यसभा का सुख लिया। पूरी जिंदगी सरकारी बंगले में गुजारी और अब जगत गुरु अंबानी के एक​ फाउंडेशन से जुड़े हुए हैं।
शौरी जी आपको अब मंत्री नहीं बनाया गया तो आपका पत्रकार जागृत हो गया। आप सब पत्रकारिता को पायदान की तरह इस्तेमाल कर सत्ता सुख तक भोग चुके हैं। नाम, पैसा,पावर सब आपके पास है।आप क्या जानें ईमानदारी से पत्रकारिता करने वालों की तकलीफ़। आप सब को तो प्रणय जैसे मठाधीश पर दर्ज आपराधिक मामला भी प्रेस की आजादी पर हमला लगता है। 


कुंए के मेंढक की तरह सिर्फ दिल्ली या उत्तर भारत के अखबार , चैनल को ही नेशनल मीडिया घोषित कर स्वयं भू मठाधीश बने बैठे हैं । जबकि दक्षिण भारत में भी ऐसे अखबार और चैनल है जिनके मुकाबले दिल्ली के मठाधीश कहीं नहीं टिकेंगे। आपराधिक मामले को मीडिया पर हमला बता आरोपी प्रणय रॉय को बचाने के लिए तो आप एक जुट हो गए ।आप एक कार्य और कर दीजिए कि ED Police , CBI की खबरें देना बंद कर दीजिए क्योंकि जो भी पकड़े जाते हैं वह खुद को बेकसूर बताते हैं। उन बेकसूरों की आवाज़ भी इसी तरह उठाएं तो लगे कि आपने भी कभी पत्रकारिता की थी।अब छोटा सा सवाल जो नामचीन वकील​ फली नरीमन के बयान से उपजा है फली जी ने कहा कि जिस तरह प्रणय के साथ किया गया "लगता" है कि प्रेस की आजादी पर हमला हैं।फली जी कृपया मेरा ज्ञान वर्धन करें कि किसी आपराधिक मामले में कोर्ट सबूत के आधार पर निर्णय करती हैं या लगता है पर। आपकी बात से जज थरेजा याद आ गए जिसने आईपीएस जेपी सिंह के बेटे संतोष को यह कहते हुए बरी किया था कि मुझे मालूम है कि प्रियदर्शिनी मट्टू की हत्या तुमने की है। हालांकि बाद में हाई कोर्ट से उसे सजा हुई। फली जी अगर" लगता" हैं के आधार पर बात की जाए तो मुझे तो मीडिया मठाधीश माफिया से कम नहीं लगते और मोदी और कांग्रेस भी एक जैसे ही लगते है। फली जी आपका भी मठाधीशों की तरह दोहरा चरित्र है बात प्रेस की आजादी की करते हो और कोर्ट में केस मजीठिया वेज बोर्ड का विरोध करने वाले प्रेस मालिकों का लड़ते हैं। लगता है कि आपका धर्म भी सिर्फ पैसा ही हैं।
फली जी आप तो इतने बडे वकील है कोर्ट में दो मिनट में साबित कर सकते हैं कि सच क्या​ हैं फिर बाहर नेता की तरह क्यों कमजोर दलील दी। कोर्ट भरे हुए हैं बेकसूरों के केस से कृपया उनको भी ऐसी मुफ्त​ सेवा दीजिए। आप लोगो ने जिसे नेशनल मीडिया घोषित कर रखा है वह आपके साथ दिखा नहीं। TOI, HT, NBT, हिंदुस्तान, जागरण,अमर उजाला के मालिक /संपादक ही नहीं पत्रकारिता का इस्तेमाल कर दो बार राज्य सभा का सुख भोग चुके पायनियर के करोड़ पति चंदन मित्रा और जमीन कब्जा के आरोपी सांसद पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार तक भी नहीं थे। राजीव शुक्ला, और रजत शर्मा जैसे मठाधीश भी आपकी अदालत मे हाजिर नहीं हुए। बाबू मोशाय अब बताओ मैंने तो पहले ही कह दिया था मीडिया के मठाधीश एकजुट नहीं होंगे क्योंकि जैसे आप किसी की गोद में है वैसे ही वह बेचारे भी किसी की गोद में है अब भला आपका कथित नेशनल मीडिया ही आप के साथ नहीं है फिर भी आप इसे मीडिया पर हमला बता रहे हैं। ठीक लालू की तरह जो अकूत संपत्ति के मामले में यह कुतर्क देता है कि मेरे खिलाफ फासीवादी ताकतें हैं। बाबू मोशाय तो यह है आपका स्तर है। 
बाबू मोशाय और हद तो यह हैं कि जेल भोगी सुब्रत रॉय सहारा ,सुधीर चौधरी, तरुण तेजपाल तक ने भी आपको सहारा नहीं दिया।100करोड़ की वसूली के आरोपी जी न्यूज के लाला सुभाष चंद्र तक ने भी आपका साथ नहीं दिया। मदारी की तरह चीख चीख कर पत्रकारिता का तमाशा बनाने वाले आपके शिष्य अर्नब गोस्वामी की भी पोल खुल चुकी है । अर्नब गोस्वामी बाबू मोशाय की ओर अंगुली उठा कर क्यों नहीं कहता "नेशन वांटस"।आज तक के मालिक बिजनस मैन अरुण पुरी के अलावा किसी अन्य चैनल के मालिक/संपादक ने भी बाबू मोशाय के दरबार में हाजिरी नहीं लगाई। दिल्ली छावनी में फौजियों के साथ मारपीट करने का आरोपी दीपक चौरसिया भी आपकी चौपाल में नहीं था। घर में पुलिस के कब्जे में मौजूद पत्रकार गिलानी को चौरसिया ने मदारी की तरह चीख चीख कर भगोड़ा घोषित किया था। बाबू मोशाय, राजदीप सरदेसाई,बरखा दत्त जैसे मठाधीशों के लिए कहावत हैं कि छाछ तो बोले सो बोले छलनी भी बोले जिसमें सत्तर छेद। 
हरियाणवी बुद्धि से मैं तो इतना ही समझा हूं कि घर वालों की भी अगर हां में हां न मिलाएं तो वह भी आपको किनारे कर देते हैं । तो बिना राग दरबारी गाए भला सत्ता​ सुख किसे मिला होगा। सत्ता से सांठ गांठ करके ही बाबू मोशाय जैसे मीडिया मठाधीशों का माफिया खड़ा हुआ है। अगर मोदी ईमानदार हैं तो ऐसे सभी मठाधीशों के खिलाफ कार्रवाई करके दिखाए जिन पर CBI, ED Policeमें केस दर्ज है।अगर ऐसा नहीं किया गया तो साफ हो जाएगा कि कार्रवाई करने की धमकी देकर मीडिया को अपना भोंपू बनाने की नीयत हैं।
इंद्र वशिष्ठ
पूर्व विशेष संवाददाता दैनिक भास्कर,
पूर्व क्राइम रिपोर्टर सांध्य टाइम्स(टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप)