Tuesday, 15 January 2019

तिहाड़ जेल से बिना आदेश कैदी रिहा, डिप्टी सुपरिटेंडेंट को नौकरी से निकाला।


तिहाड़ जेल से बिना आदेश कैदी रिहा।
डिप्टी सुपरिटेंडेंट को नौकरी से निकाला।

इंद्र वशिष्ठ

तिहाड़ जेल से एक कैदी को अदालत के आदेश के बिना ही छोड़ देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इसके अलावा जेल अफसरों की मिलीभगत से कैदियों की बाहरी लोगों से मुलाकात कराने का भी खुलासा हुआ है। इन मामलों में शामिल जेल के एक डिप्टी सुपरिटेंडेंट को नौकरी से निकाला गया है।

दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव विजय कुमार देव ने जेल सुपरिटेंडेंट जगदीश सिंह को नौकरी से निकालने के आदेश दिए। जगदीश सिंह के खिलाफ की गई विभागीय जांच में यह पाया गया कि जगदीश सिंह ने अदालत के उचित आदेश के बिना ही एक कैदी को जेल से रिहा कर दिया।
 इसके अलावा जांच में यह भी पाया गया कि जगदीश सिंह  कैदी की गैरकानूनी तरीके से बाहरी लोगों से मुलाकात भी करवाता था। विभागीय जांच में दोषी पाए जाने पर जगदीश सिंह को नौकरी से निकालने के लिए अनिवार्य सेवानिवृत्ति     (कंपल्सरी रिटायरमेंट) की  सज़ा दी गई।

सरकारी धन का गबन-
एक अन्य मामले में स्वास्थ्य  विभाग के स्टोर परचेज सुपरवाइजर कृष्ण माहली को भी मुख्य सचिव ने नौकरी से निकालने के आदेश दिए हैं। कृष्ण माहली को विभागीय जांच में सरकारी धन के गबन/अनियमितता का दोषी पाया गया।
 कृष्ण को अस्पतालों के स्टोर के लिए करीब 47 लाख की कंज्यूमबेल आइटम की ख़रीद मामले में अनियमितता/गबन का  दोषी पाया गया। कृष्ण को भी नौकरी से निकालने के लिए अनिवार्य सेवानिवृत्ति  की सज़ा दी गई।

इस मामले से यह साबित हो गया है कि तिहाड़ जेल में बंद रसूखदार/ दबंग कैदी पैसे के दम पर जेल अफसरों की मिलीभगत से मनचाही सुख-सुविधा हासिल कर लेते हैं।

डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने बिना आदेश के  कैदी को रिहा करके अपराध किया है इसलिए डिप्टी सुपरिटेंडेंट के खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया जाना चाहिए।
इस तरह करीब 47 लाख की खरीदारी के मामले में  सुपरवाइजर द्वारा  सरकारी धन का गबन/अनियमितता के मामले में भी आपराधिक मामला दर्ज किया जाना चाहिए।


       (दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव विजय कुमार देव)

Sunday, 6 January 2019

चोर चुस्त, पुलिस सुस्त,लोग त्रस्त, दिल्ली पुलिस चोरी के 86% मामले सुलझाने में विफल


दिल्ली में 4 लाख से ज्यादा चोरियां हुई।
पुलिस ने सिर्फ 57 हजार मामले सुलझाए।
पुलिस चोर पकड़ने में फिसड्डी।

 इंद्र वशिष्ठ
देश की राजधानी में लोग सबसे ज्यादा चोरों से त्रस्त है। घर बाहर कहीं भी सुरक्षित नहीं है। हर समय नकदी, सामान, गाड़ी आदि चोरी हो जाने का डर बना रहता है।  जेब से लेकर घर, दुकान, फैक्ट्री, गोदाम , गाड़ी आदि सब कुछ चोरों के निशाने पर हैं।
दिल्ली पुलिस के अपराध के आंकड़ों से भी पता चलता है कि सबसे ज्यादा चोरी की वारदात होती हैं। यह अपराध सबसे ज्यादा हो रहा है इसके बावजूद पुलिस चोरों को पकड़ने और चोरी का माल बरामद करने में फिसड्डी साबित हुई हैं। इसका पता पुलिस के आंकड़ों से चलता है। पिछले तीन साल में चोरी के 461989 मामले दर्ज किए गए ।  सिर्फ 57100 मामले पुलिस ने सुलझाए है। सिर्फ 27216 मामलों में ही चोरी का माल बरामद किया गया है। पुलिस ने सिर्फ 18581 मामलों में अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया है। इससे पता चलता है कि चोरी के मामलों को सुलझाने में पुलिस की बिल्कुल रुचि नहीं है।

 गृह राज्य मंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने राज्य सभा में बताया  साल 2018 में नवंबर तक पुलिस ने चोरी के 165296 मामले दर्ज किए। इनमें से 18194 मामले रद्द किए गए। 147102 मामलों में से पुलिस ने सिर्फ 20141 मामले सुलझाए है। इनमें से भी सिर्फ 7852 मामलों में चोरी हुआ सामान बरामद हुआ है। 23776 चोरों को गिरफ्तार किया गया है।
साल 2017 में चोरी के 165765  मामले दर्ज किए गए। इनमें 19796 मामले रद्द किए गए। चोरी के 145969 मामलों में से 22438 मामले सुलझाने में पुलिस सफल हुई। सिर्फ 10406 मामलों में चोरी का सामान बरामद कर पाई। 26337 चोर गिरफ्तार किए गए।
साल  2016 में चोरी के 130928  मामले दर्ज किए गए। इनमें से  8999 मामले रद्द किए गए। चोरी के 121929 मामलों में से 14521 मामले सुलझाए गए सिर्फ 8958 मामलों में चोरी का सामान बरामद किया गया। 17685 चोर गिरफ्तार किए गए।

पुलिस की तफ्तीश का आलम यह है कि  साल 2016 में 8003, साल 2017 में  7411और  साल 2018 में 3167 मामलों में ही  अदालत में आरोपपत्र /चालान दाखिल किया गया।
गृह राज्य मंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने सांसद रवि प्रकाश वर्मा के सवाल पर राज्य सभा में यह जानकारी दी।
हालांकि पुलिस के यह आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर है। क्योंकि पुलिस अपराध कम दिखाने के लिए अपराध के सभी मामलों को सही दर्ज ही  नहीं करती है।  अगर पुलिस ईमानदारी से जेब कटने और मोबाइल चोरी के ही मामले दर्ज करे तो चोरी के मामलों का आंकड़ा दस लाख से भी ऊपर पहुंच सकता है। इसका पता इससे लगाया जा सकता है कि  दिल्ली में हर महीने ही करीब दो लाख मोबाइल फोन चोरी/गुम ,लूट/झपट लिए जाते है। यानी रोजाना लगभग सात हजार  लोग अपना मोबाइल फोन गंवा देते है।
30जून 2018 तक ही मोबाइल चोरी/ खोने/ लूट  के करीब बारह लाख  (1158637)मामले दर्ज  हुए है । इनमें 1129820 मामले मोबाइल गुम/खोने ,  26440 चोरी,  1715 झपटमारी  और  662 लूट  के तहत दर्ज हुए है ।
सचाई यह है मोबाइल फोन खोने( लॉस्ट रिपोर्ट)  में दर्ज हुए अधिकांश मामले चोरी और झपटमारी के ही होते है। झपटमारी ,चोरी में एफआईआर दर्ज करनी पड़ेगी और अपराध के आंकड़े से अपराध की वृद्धि उजागर हो जाएगी। इस लिए पुलिस में यह परंपरा है कि झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी के अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज न की जाए। झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी की रिपोर्ट कराने पहुंचे व्यक्ति को पुलिस कह देती है रिकवरी के चांस तो है नहीं और तुम्हारा काम तो खोने की पुलिस रिपोर्ट से भी चल जाएगा । पहले ऐसे मामलों में पुलिस एनसीआर दर्ज करके या कागज पर लिखी शिकायत पर थाने की मोहर लगा देती थी । अब यह काम ऑन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट से हो जाता है ।
पुलिस अगर ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करे तो उस पर झपटमारों, चोरों को पकड़ने का दवाब बनेगा  है । पुलिस को तफ्तीश में मेहनत करनी पड़ेगी। जो वह करना नहीं चाहती । इसलिए अपराध  को दर्ज न करना एसएचओ,डीसीपी और पुलिस कमिश्नर से लेकर गृह मंत्री तक के अनुकूल है । लेकिन ऐसा करके ये अपराधियों की मदद कर रहे है । अपराधी को मालूम है कि अगर पकड़ा भी गया तो उसके खिलाफ दर्ज मामले तो बहुत ही कम मिलेंगे । पुलिस चोरों/ लुटेरों को गिरफ्तार करके कई बार सैकड़ों केस सुलझाने के दावे करती है लेकिन कभी भी उन सैकड़ों केसों की सूची नहीं देती । सचाई यह है अपराधी द्बारा की गई सभी वारदात पुलिस ने दर्ज ही नहीं कर रखी होती । इसलिए पुलिस प्रचार पाने के लिए तो दावा कर देती है। लेकिन सूची नहीं दे सकती।

Friday, 4 January 2019

दिल्ली पुलिस साइबर क्राइम सेल की चींटी सी चाल, 3 साल में सिर्फ 22% मामलों की जांच पूरी की।

दिल्ली पुलिस साइबर क्राइम सेल चला चींटी की चाल
 तीन साल में सिर्फ 102 मामलों की  जांच पूरी की ।

इंद्र वशिष्ठ

एक ओर साइबर क्राइम के मामले दिनों-दिन  बढ़ रहें हैं। दूसरी ओर साइबर क्राइम के मामलों को  सुलझाने में दिल्ली पुलिस का  साइबर क्राइम सेल चींटी की चाल चल रहा है। साइबर क्राइम सेल साल 2018 में साइबर 
क्राइम के सिर्फ 26 मामलों की ही जांच  पूरी कर पाया  है।  नवंबर 2018 तक साइबर क्राइम के 160 मामले साइबर क्राइम सेल में दर्ज हुए थे। इनमें सिर्फ 26 मामलों की जांच पूरी हुई है। 5 मामले कैंसल/अनट्रेस हुए हैं।
पिछले तीन साल में साइबर क्राइम सेल में 465 मामले दर्ज हुए हैं। जिनमें साइबर क्राइम सेल सिर्फ 102 मामलों की ही तफ्तीश अब तक पूरी  कर पाया हैं। इस तरह पुलिस साइबर क्राइम के सिर्फ  22 फीसदी मामलों की  जांच पूरी  कर पाई हैं। 

राज्य सभा में गृह राज्य मंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने बताया कि दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम सेल ने साल 2016 में 138 , साल 2017 में 167, नवंबर 2018 तक 160 मामले साइबर क्राइम के दर्ज किए। साइबर क्राइम सेल ने  साल 2016 में 31, साल 2017 में 45 और साल  2018 मे  साइबर क्राइम के 26 मामलों की ही जांच पूरी की है। 
साइबर क्राइम से निपटने और मामलों की तफ्तीश के लिए साइबर क्राइम सेल में पर्याप्त पुलिस कर्मी भी नहीं है। साइबर क्राइम सेल में सभी रैंक के कुल 205 पुलिसकर्मी तैनात हैं।  
   
राज्यसभा  में गृह राज्यमंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने  बताया कि जांच लंबित होने संबंधी कारणों में अन्य बातों के साथ साथ मध्यस्थ लोगों विशेषकर विदेशी सेवा प्रदाताओं से सूचना का लंबित होना,  पत्रों के उत्तर लंबित होना,विधि विज्ञान संबंधी परिणामों का लंबित होना और आईपी लॉग, सोर्स पोर्ट आदि जैसे मध्यस्थों द्वारा अधूरी सूचना दिया जाना शामिल हैं।
 साइबर क्राइम सेल द्वारा  दिल्ली पुलिस के 1323 अधिकारियों को साइबर क्राइम की जांच कार्य में प्रशिक्षित किया गया हैं। 
 सांसद अमर सिंह के सवाल पर  गृह राज्य मंत्री ने यह जानकारी राज्य सभा में  दी।


Tuesday, 1 January 2019

दिल्ली से 8 हजार बच्चे लापता, मासूमों को तलाश करने में पुलिस नाकाम

दिल्ली से आठ हज़ार बच्चे लापता

इंद्र वशिष्ठ

देश की राजधानी  दिल्ली से करीब आठ हज़ार बच्चे गायब/ लापता हो गए हैं।  पिछले चार साल में 27356 बच्चे दिल्ली से लापता हुए हैं। इनमें से 19596 बच्चे मिल गए हैं। करीब आठ हज़ार बच्चे अभी तक लापता हैं। इन हजारों बच्चों के  लापता होने से  पुलिस की भूमिका/ कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो जाते हैं। लापता बच्चों के  माता-पिता पर क्या  बीत रही होगी उनके दुःख का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। 
 साल 2018 में नवंबर तक 6053 बच्चों के लापता होने की रिपोर्ट दिल्ली  पुलिस ने दर्ज की है। इनमें 3706 बच्चें मिल गए हैं।  2347 बच्चों को पुलिस तलाश /बरामद नहीं कर पाई है।

     राज्य सभा में  गृह राज्य मंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने बताया कि दिल्ली से साल 2015 में 7928, साल 2016 में 6921, साल 2017 में 6454 बच्चे लापता हो गए । इनमें से साल 2015 में 6390, साल 2016 में 5109 और साल 2017 में 4391 बच्चे मिल गए।

गृह राज्य मंत्री ने बताया कि लापता बच्चों की जांच के लिए पुलिस ने अनेक कदम उठाए हैं। लापता बच्चों के मामले में पुलिस कर्मी की 
 ड्यूटी के बारे में पुलिस कर्मियों को स्थायी आदेश  में भी बताया गया है। मानव तस्करी निरोधक यूनिट द्वारा ऐसे मामलों की जांच की प्रगति की समीक्षा के लिए रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्तों द्वारा हर महीने बैठक भी की जाती है।
सांसद अनिल अग्रवाल द्वारा पूछे गए सवाल पर गृह राज्य मंत्री ने राज्य सभा में यह जानकारी दी।

 सच्चाई यह है कि अनेक बार देखा गया है कि  लापता होने वाला बच्चा रसूखदार/ अमीर परिवार से हो तो पुलिस की  बच्चे को तलाश करने में  तत्परता दिखाई देती है लेकिन बच्चा गरीब कमजोर वर्ग से हो तो  पुलिस उसे उतनी तत्परता और गंभीरता से नहीं लेती। ऐसे में पीड़ित खुद ही अपने स्तर पर अपने बच्चे की तलाश करने को मजबूर होता हैं। बच्चे की तलाश में जाने के लिए पुलिस  गाड़ी की व्यवस्था भी  शिकायतकर्ता से ही करवाती है। पुलिस अगर  संवेदनशीलता  और गंभीरता से कोशिश करें तो हजारों बच्चे ऐसे लापता नहीं रह सकते। 

उल्लेखनीय है  बच्चों को अगवा करके बेचने वाले मानव तस्करों के गिरोह देश भर में सक्रिय हैं। ऐसे बच्चों से गिरोह  भीख मंगवाने  का धंधा करते हैं। बच्चे यौन शोषण के शिकार भी होते हैं। देह व्यापार के धंधे में भी ऐसे बच्चों को धकेल दिया जाता है। खेती या अन्य कामों में ऐसे बच्चों को बंधुआ मजदूर बना कर रखा जाता हैं।  

पहाड़ गंज के होटलों में डांस-  गृह राज्य मंत्री ने एक अन्य सवाल के जवाब में बताया कि पहाड़ गंज के होटलों में गैरकानूनी तरीके से डांस आयोजित करने के मामलों में पुलिस ने आईपीसी और दिल्ली पुलिस एक्ट के तहत चार मामले दर्ज किए हैं। मंत्री ने बताया कि होटलों में आधीरात के बाद मुजरा होने की कोई सूचना पुलिस को नहीं मिली है।




Wednesday, 26 December 2018

दिल्ली और आसपास बम धमाकों की साज़िश। NIA ने ISIS समर्थक 10 लोगों को गिरफ्तार किया।

दिल्ली और आसपास बम धमाकों की साज़िश। 
NIA ने ISIS समर्थक 10 आतंकी गिरफ्तार किए।


इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली और आसपास के इलाकों में बम धमाके और फिदायीन हमले की साज़िश का एनआईए ने पर्दाफाश किया है। इस सिलसिले में आईएसआईएस प्रेरित/ समर्थक आतंकी गिरोह हरकत उल हरब ए  इस्लाम के  दस आतंकियों को गिरफ्तार किया गया है।

 एक देसी राकेट लांचर, 25 किलो विस्फोटक सामग्री, 12 पिस्तौल,150 कारतूस,91 मोबाइल फोन, 134 सिम,112 अलार्म घड़ी, 51 पाइप,   तीन लैपटॉप के अलावा साढ़े सात लाख रुपए बरामद हुए हैं। आईएसआईएस से संबंधित दस्तावेज भी बरामद हुए हैं। दीवाली पर फोड़े जाने वाले हरे रंग के सुतली बम भी बरामद हुए हैं।
एनआईए के आईजी आलोक मित्तल के अनुसार इस आतंकवादी गिरोह का सरगना उत्तर प्रदेश के अमरोहा का निवासी मुफ्ती मोहम्मद सुहेल उर्फ हज़रत है। अमरोहा के एक मदरसे का मुफ्ती  मोहम्मद सुहेल आज कल दिल्ली के जाफराबाद में रह रहा था। मुफ्ती ने गिरोह के लोगों को आतंकवाद के लिए हथियार, विस्फोटक सामग्री जुटाने, आईईडी और पाइप बम आदि बनाने के लिए कहा था। 
एनआईए को सूचना मिली थी कि आईएसआईएस प्रभावित/ समर्थक कुछ लोगों ने आतंकी गिरोह बना कर  दिल्ली और आसपास के इलाकों में भीड़ भाड़ वाले, महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील स्थानों पर बम धमाके और फिदायीन हमले की साज़िश रची है।

दिल्ली पुलिस और उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ मिलकर एनआईए ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश में 17 स्थानों पर  छापे मारकर इस गिरोह के दस लोगों को पकड़ा है। दिल्ली में जाफराबाद और सीलमपुर में 6 स्थानों पर कार्रवाई की गई। अमरोहा में 6, लखनऊ में 2,हापुड़ में,2 और मेरठ में एक स्थान छापा मारा गया है।
 सरगना मुफ्ती मोहम्मद सुहेल  के अलावा जाफराबाद के अनस युनुस, राशिद जफर, ज़ैद मलिक उसके भाई जुबेर मलिक, सीलमपुर के मुहम्मद आज़म को गिरफ्तार किया गया। मुहम्मद आज़म की सीलमपुर में दवाईयों की दुकान है। मुहम्मद आज़म हथियार का इंतजाम करने में शामिल हैं। ज़ैद मलिक और जुबैर ने जाली काग़ज़ से मोबाइल सिम आदि का इंतजाम किया। अनस युनुस नोएडा से सिविल इंजीनियरिंग कर रहा है। राशिद का गारमेंट का कारोबार है। इन दोनों ने भी बैटरी आदि सामान का इंतजाम किया।
अमरोहा से सईद और उसके भाई रईस अहमद को गिरफ्तार किया गया।  इनकी वैल्डिंग की दुकान है। आरोप है कि इन्होंने आईईडी और पाइप बम  आदि बनाने के 25 किलो विस्फोटक सामग्री/ गन पाउडर ख़रीदा था देसी राकेट लांचर बनाया। अमरोहा से पकड़े गए तिपहिया स्कूटर चालक मुहम्मद इरशाद ने मुफ्ती के लिए विस्फोटक सामग्री आदि रखने के लिए  ठिकाने का इंतजाम  किया था।

 हापुड़ में सिंभावली के सादिक इफ्तखार को पकड़ा गया। सादिक बक्सर में जामा मस्जिद का इमाम है। मुफ्ती की हथियार  खरीदने में मदद करने के आरोप में इमाम को पकड़ा गया है।

Friday, 9 November 2018

IPS जागो, खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ।

खाकी पर ख़ाक डालते IPS और नेता,
सत्ता के लठैत बन पिटते IPS,
कानून पर जहां आंच आए तो टकराना ज़रूरी है।
IPS ईमानदार हो तो ईमानदार नज़र आना ज़रूरी है।

इंद्र वशिष्ठ
 आईपीएस अफसरों जागो, खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ, पुलिस की साख दांव पर मत लगाओ। खाकी वर्दी पर आंच आए तो सबक सिखाना ज़रूरी है। आईपीएस अगर ईमानदार हो तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है। सत्ता के लठैत बन अपने निजी स्वार्थ के लिए पुलिस बल का मनोबल मत गिराओ। पुलिस का मनोबल गिरेगा तो दिल्ली में जंगल राज हो जाएगा। गुंडे और छुटभैये नेता पुलिस वालों को दौड़ा दौड़ा कर मारेंगे।
फिल्मों में नेताओं और गुंडों द्वारा पुलिस अफसर की बेइज्जती या पिटाई के दृश्य दिखाए जाते हैं लेकिन यह दृश्य हकीकत में दिल्ली में दिखाई देगा यह कोई सोच भी नहीं सकता था। सत्ता के नशे में चूर एक गवैये/नौटंकीबाज ने दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी को गिरेबान से पकड़ कर साबित कर दिया कि आईपीएस अफसर की भी हैसियत उसकी नज़र में सत्ता के लठैत/गुलाम से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
हालांकि फिल्म में तो हीरो पुलिस अफसर ऐसे नेताओं को जबरदस्त सबक सिखाता है लेकिन हकीकत में हुई इस घटना में आईपीएस डीसीपी ने वर्दी का अपमान करने वाले नेता को सबक सिखाना तो दूर उसके खिलाफ मुकदमा तक दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई। इस मामले से नेताओं के गिरते स्तर और रीढ़ विहीन पुलिस कमिश्नर की असलियत उजागर हुई है। दूसरे राज्यों में पुलिस के बड़े-बड़े अफसरों के साथ बदतमीजी के मामले सामने आते रहे हैं लेकिन देश की राजधानी में एक आईपीएस अफसर के साथ इस तरह की हरकत खतरनाक हैरान परेशान करने वाली हैं।
इस मामले ने पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और आईपीएस एसोसिएशन की  भूमिका पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।
 सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन के मौके पर पुलिस द्वारा रोकें जाने से तिलमिलाए  दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष सांसद मनोज तिवारी द्वारा उत्तर पूर्वी जिले के डीसीपी अतुल ठाकुर की गिरेबान पकड़ने और अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त राजेंद्र प्रसाद मीणा को धमकाने का दृश्य मीडिया के माध्यम से सबने देखा लेकिन पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक आंख मूंदकर बैठे हैं। पुलिस कमिश्नर अगर काबिल होते तो डीसीपी की गिरेबान में हाथ डालने, हाथापाई करने वाले मनोज तिवारी और उसके साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे हवालात में डाल कर कानून का राज स्थापित करते हैं। लेकिन अमूल्य पटनायक ने ऐसा कुछ नहीं किया। दूसरी ओर खुद सक्षम होते हुए डीसीपी अतुल ठाकुर ने भी इस मामले में मनोज तिवारी के खिलाफ कार्रवाई ना करके अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया। ऐसा करके इन अफसरों ने खाकी वर्दी को शर्मिंदा किया है।  इससे पता चलता है कि पुलिस सिर्फ कमजोर आदमी  या विपक्षी दलों के खिलाफ ही कार्रवाई कर सकती हैं। कोई भी ईमानदार और स्वाभिमानी आईपीएस अफसर होता तो वर्दी का अपमान करने वाले  सांसद को गिरफ्तार कर अपने कर्तव्य  पालन की मिसाल कायम करता। जो जिला पुलिस उपायुक्त अपने साथ हुए अपराध के मामले में ही कार्रवाई नहीं करता है वह भला अपने मातहतों और समाज के सामने क्या आदर्श पेश करेगा ? ऐसे अफसरों के कारण ही नेता ऐसी हरकत करने का दुस्साहस करते हैं। ऐसे पुलिस अफसर भूल जाते हैं कि उनके ईमानदारी से कर्तव्य पालन ना करने से ही मातहत पुलिस वालों का मनोबल गिरता है। वैसे यह वही डीसीपी अतुल ठाकुर है जो आपराधिक मामलों के आरोपी से चांदी का ताज पहन कर सम्मानित होने के कारण चर्चा में आए थे। आईपीएस अफसरों संभल जाओ जिन नेताओं के इशारे पर निजी लठैत की तरह व्यवहार करते हो उन नेताओं ने सरेआम तुम्हारी गिरेबान पर हाथ डाल कर दिखा दिया कि उनकी नज़र में अफसरों की भी क्या हैसियत है।
मुख्य सचिव से मुख्यमंत्री निवास में मारपीट के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने वाली दिल्ली पुलिस को अब क्या सांप सूंघ गया। सरेआम आईपीएस अफसर की गिरेबान पर हाथ डालने वाले मनोज तिवारी के खिलाफ कार्रवाई न करने से साबित हो गया कि आईपीएस अफसर सत्ता के लठैत की तरह ही काम करते हैं। आईपीएस अफसरों में अगर जरा भी  स्वाभिमान  है तो खाकी वर्दी और कानून का सम्मान क़ायम करना चाहिए।  पुलिस बल का मनोबल गिराने के लिए नेताओं से ज्यादा ऐसे  आईपीएस अफसर ही जिम्मेदार होते हैं। मुख्य सचिव के  पक्ष में तो आईएएस एसोसिएशन , कांग्रेस और भाजपा भी खुल कर सामने आ गए थे लेकिन इस मामले में तो आईपीएस एसोसिएशन की भी बोलती बंद हैं। आईपीएस अफसरों को यह दिखाना चाहिए कि उनका मालिक सिर्फ संविधान और कानून हैं।

नेताओं की कृपा से महत्वपूर्ण पद पाने या अपने किसी अन्य निजी स्वार्थ में आईपीएस अफसरों द्वारा इस मामले में कार्रवाई ना करने से पुलिस में निचले स्तर तक मनोबल गिरता है। कल को छुटभैये नेता भी  पुलिस वालों से बदतमीजी करने लगेंगे। जिससे कानून का राज और पुलिस का डर खत्म होने से शरीफ़ लोगों का जीना मुश्किल हो जाएगा।

बिना किसी राजनीतिक योगदान/ संघर्ष के सिर्फ गायन,अभिनय के कारण  भाजपा की कृपा से सत्ता में आए इस नेता की हरकत ने साबित कर दिया कि वह इस पद का  हकदार नहीं हैं। सत्ताधारी दल का ही सांसद होने के बावजूद जो पुलिस अफसर की गिरेबान पकड़ कर हमला करता है वह नेता लोगों के सामने क्या आदर्श पेश करेगा ? सत्ताधारी दल का सांसद ही जब कानून और वर्दी का सम्मान नहीं करता तो लोग भी वैसा ही करेंगे।
कांग्रेस, भाजपा हो या कोई अन्य दल प्रदर्शन के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज के भी शिकार होते रहे हैं। पुलिस की ज्यादती पर पुलिस अफसर  हटाएं भी जाते हैं लेकिन किसी भी दल के प्रदेशाध्यक्ष स्तर के नेता ने कभी किसी डीसीपी को ऐसे गिरेबान से नहीं पकड़ा और ना ही ऐसे हमला किया होगा। इससे यह भी पता चलता है कि वरिष्ठता और योग्यता को दर किनार कर जब बिना किसी राजनीतिक योगदान के अनुभवहीन, कनिष्ठ,  बाहरी और दूसरे  कार्य क्षेत्र के व्यक्ति को अध्यक्ष जैसे पद पर थोपा जाता है तो ऐसा व्यक्ति ही  सत्ता के अहंकार में कानून और वर्दी का अपमान करने जैसी हरकतें करता है। वह ऐसी हरकत करते समय यह भी भूल जाता है कि जिस डीसीपी की गिरेबान में हाथ डाल रहा है वह उनकी ही केंद्र सरकार के मातहत है।
प्रधानमंत्री को वर्दी का अपमान कर कानून की धज्जियां उड़ाने वाले ऐसे नेता को सबक सिखाना चाहिए ताकि आगे से कोई ऐसी हरकत करने की हिम्मत ना करें। 
इसके पहले मनोज तिवारी ने एक डेयरी पर लगाई गई सील तोड़ कर भी कानून की धज्जियां उड़ाई। इस मामले में भी पुलिस ने मनोज तिवारी के खिलाफ मामला तो दर्ज किया लेकिन उसे गिरफ्तार नहीं किया गया। जबकि कोई अन्य ऐसा करता तो पुलिस उसे गिरफ्तार भी करती। मनोज तिवारी की यह हरकत सिवाय नौटंकी के कुछ भी नहीं है क्योंकि अगर वह वाकई सीलिंग की समस्या से लोगों को निजात दिलाना चाहते हैं तो अपनी पार्टी से कह कर संसद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उसी तरह क्यों नहीं पलटवा देते जैसे एससी-एसटी एक्ट मामले में उनकी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा है।

1994-95 की बात है कांग्रेस के दिग्गज मंत्री  जगदीश टाइटलर ने सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों की मदद करने के लिए उत्तर पश्चिमी जिला के तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह से कहा। कर्नल सिंह ने ऐसा करने से इंकार कर दिया तो सत्ता के नशे में चूर  टाइटलर ने कर्नल सिंह से बदतमीजी से बात की। लेकिन कर्नल सिंह ने टाइटलर को ऐसी डांट लगाई कि वह जिंदगी भर नहीं भूलेगा। तिलमिलाए टाइटलर ने कर्नल सिंह की शिकायत करने के लिए सज्जन कुमार को पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार के पास चलने के लिए कहा लेकिन सज्जन कुमार ने टाइटलर के साथ जाने से यह कह कर मना कर दिया कि बात तो कर्नल सिंह उसकी भी नहीं मानते लेकिन अफसर वह अच्छा है। कानून तोड़ने वाले और बदतमीजी करने वाले नेताओं से पुलिस अफसरों को इसी तरीके से निपटना चाहिए। 
पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को सुस्त ही नहीं एक ऐसे पुलिस कमिश्नर के रूप में भी याद किया जाएगा जिनके समय में डीसीपी तक सुरक्षित नहीं है। अतुल ठाकुर पर तो सांसद मनोज तिवारी ने हमला कर दिया। इसके पहले  उत्तर पश्चिमी जिला की महिला डीसीपी असलम खान के बारे में तो अमूल्य पटनायक  के ही  दफ्तर में तैनात हवलदार देवेंद्र ने ही फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी।डीसीपी असलम खान ने पुलिस कमिश्नर से शिकायत की थी लेकिन पुलिस कमिश्नर ने कोई कार्रवाई नहीं की। इस पत्रकार द्वारा यह मामला उजागर करने के बाद पुलिस कमिश्नर ने हवलदार को निलंबित किया।

आईपीएस अफसर भी गुलाम की तरह पुलिस का इस्तेमाल करते है।-- 
देश की राजधानी दिल्ली में ही पुलिस जब नेता के लठैत की तरह काम करती है तो बाकी देश के हाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। 4-6-2011 को रामलीला मैदान में रामदेव को पकड़ने के लिए सोते हुए औरतों और बच्चों पर तत्कालीन पुलिस आयुक्त बृजेश कुमार गुप्ता और धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल कर फिरंगी राज को भी पीछे छोड़ दिया। उस समय ये अफसर भूल गए कि पेशेवर निष्ठा,काबलियत को ताक पर रख कर लठैत की तरह लोगों पर अत्याचार करने का खामियाजा भुगतना भी पड़ सकता है। इसी लिए प्रमुख दावेदार होने के बावजूद अन्य कारणों के साथ इस लठैती के कारण भी धर्मेंद्र कुमार का दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनने का सपना चूर चूर हो गया। 
धर्म ना देखो अपराधी का -- 
रामलीला मैदान की बहादुर पुलिस को 21 जुलाई 2012 को सरकारी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की कोशिश करने वाले गुंड़ों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। माहौल बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार बिल्डर नेता शोएब इकबाल के खिलाफ पुलिस ने पहले ही कोई कार्रवाई नहीं की थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि गुंड़ों ने पुलिस को पीटा, पथराव और आगजनी की। लेकिन अफसरों ने यहां गुंड़ों पर भी  रामलीला मैदान जैसी मर्दानगी दिखाने का आदेश पुलिस को  नहीं दिया। इस तरह आईपीएस अफसर भी नेताओं के इशारे पर पुलिस का इस्तेमाल कहीं बेकसूरों को पीटने के लिए करते है तो कहीं गुंड़ों से भी पिटने देते है। अफसरों की इस तरह की हरकत से निचले स्तर के पुलिसवालों में रोष पैदा हो जाता है।
बुखारी का भी बुखार क्यों नहीं उतारती सरकार ---दिल्ली पुलिस ने जामा मस्जिद के इमाम को सिर पर बिठाया हुआ है। कोर्ट गैर जमानती वारंट तक भी जारी करती रही हैं लेकिन दिल्ली पुलिस कोर्ट में झूठ बोल कह देती है कि इमाम मिला नहीं। जबकि इमाम पुलिस सुरक्षा में रहता है। मध्य जिले में तैनात रहे कई डीसीपी  तक इमाम अहमद बुखारी को सलाम  ठोकने जाते रहे हैं। दिल्ली पुलिस में आईपीएस कर्नल सिंह ने ही  इमाम की सुरक्षा कम करने की हिम्मत दिखाई थी। शंकराचार्य जैसा व्यक्ति जेल जा सकता है तो इमाम क्यों नहीं? एक मस्जिद के अदना से इमाम को सरकार द्वारा सिर पर बिठाना समाज के लिए खतरनाक है। इमाम को भला पुलिस सुरक्षा देने की भी क्या जरूरत है। कानून सबके लिए बराबर  होना चाहिए। अहमद बुखारी के खिलाफ कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं इसका भी खुलासा सरकार को करना चाहिए। 



Saturday, 27 October 2018

Super Cop कर्नल सिंह IPS , इंसानियत, काबिलियत, बहादुरी की मिसाल


                    कर्नल सिंह IPS 

इंसानियत, काबिलियत, बहादुरी की मिसाल।


इंद्र वशिष्ठ

देश के बेहतरीन आईपीएस अफसरों में शुमार 1984 बैच के आईपीएस कर्नल सिंह अपनी पारी सफलतापूर्वक पूर्ण कर प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हो गए। 
कर्नल सिंह प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) में निदेशक पद पर तैनात होने वाले दूसरे आईपीएस अफसर थे इसके पहले इस पद पर  आईएएस और आईआरएस अफसर ही तैनात किए जाते थे।

कर्नल सिंह ने अपनी काबिलियत के दम इस एजेंसी को इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि आज़ सीबीआई से भी ज्यादा सक्रिय और चर्चित यह जांच एजेंसी हो गई है। काले धन को सफेद करने वालों , हवाला, बेनामी संपत्ति और बैंकों के साथ धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ जबरदस्त अभियान छेड़ा गया। पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम और उसके बेटे के खिलाफ जांच पूरी कर कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल करने के अलावा लालू यादव और उसके परिवार, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विजय माल्या जैसों की हजारों करोड़ की सम्पत्ति को जब्त करने  के कार्य  किए ।

कर्नल सिंह के निदेशक के रूप में तीन साल के कार्यकाल में 536 मामलों में 33563 करोड़ की सम्पत्ति जब्त की गई। जबकि इसके पहले के दशक में 2045 मामलों में 9003 करोड़ मूल्य की संपत्ति ही  जब्त की गई थी। अहमद पटेल के करीबियों के अलावा कोयला खदान घोटाले, स्टर्लिग बायोटेक, अगस्ता वेस्टलैंड, सारदा रोज वैली चिटफंड,पीएसीएल,एनएससीएल आदि मामलों की जांच की गई। 
कर्नल सिंह की सेवानिवृत्ति वैसे तो पिछले साल अगस्त में हो जाती लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पद पर दो साल की अवधि अनिवार्य किए जाने के कारण वह अब सेवानिवृत्त हुए हैं। कर्नल सिंह 2011 में दिल्ली पुलिस से प्रवर्तन निदेशालय में स्पेशल डायरेक्टर के पद पर प्रतिनियुक्ति पर गए थे।

दिल्ली पुलिस में  शानदार पारी-- 
कर्नल सिंह दिल्ली पुलिस के उत्तर पश्चिमी जिला के उपायुक्त रहे उस समय कुख्यात अपहरणकर्ता दिनेश ठाकुर को इंस्पेक्टर रविशंकर की टीम ने कथित मुठभेड़ में मार गिराया। दिनेश ठाकुर के साथी आफताब अंसारी को गिरफ्तार किया गया इसी अंसारी ने बाद में आमिर रजा के साथ मिलकर  इंडियन मुजाहिदीन आतंकी  गिरोह बनाया।
इंस्पेक्टर पीपी सिंह और सब- इंस्पेक्टर अरुण शर्मा की टीम ने कुख्यात बदमाश गोपाल ठाकुर को मार गिराया। रविशंकर और पीपी सिंह को इन मामलों में बारी से पहले तरक्की देकर एसीपी और अरुण शर्मा को इंस्पेक्टर बनाया गया। (रविशंकर  साल 2017 में डीसीपी के पद से सेवानिवृत्त हो गए)।
 इसके बाद कर्नल सिंह सतर्कता विभाग, अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाई गई एसटीएफ और अपराध शाखा में डीसीपी रहे। 

42 बम धमाकों में शामिल 26 आतंकियों को गिरफ्तार किया-
 लश्कर ए तैयबा के इशारे पर अहले हदीस के अब्दुल करीम टुंडा ने 1996-97 में  दिल्ली और आसपास के इलाकों में 42 बम धमाके कर आतंक मचा दिया था। तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह के नेतृत्व में अपराध शाखा के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त आलोक कुमार, एसीपी रविशंकर आदि की टीम  ने कई महीने तक कड़ी मेहनत कर 8 पाकिस्तानी समेत 26 आतंकियों को गिरफ्तार कर  बम धमाकों के 42 मामले सुलझाए।  इस मामले में शामिल 8 पाकिस्तानी 2 बांग्लादेशी और  बर्मा के 1 आतंकी ने अदालत में अपना अपराध कबूल कर लिया सज़ा पूरी होने पर उन्हें उनके देश भेज दिया गया। हालांकि इस मामले में पकड़े गए कई आतंकियों को सज़ा दिलाने में पुलिस सफल नहीं हो पाई।  इस मामले में की गई बेहतरीन तफ्तीश की मिसाल दी जाती है। 
श्रीप्रकाश शुक्ला एनकाउंटर -
अपराध शाखा ने कर्नल सिंह के नेतृत्व में ही उत्तर प्रदेश पुलिस को साथ लेकर कुख्यात श्रीप्रकाश शुक्ला को कथित मुठभेड़ में मार गिराया गया । इसके अलावा गोल्फ लिंक से अपहृत बच्चे तरुण पुरी  को मेरठ में अपहरणकर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराने जैसे समेत अनेक मामले सुलझाए गए।
अपराध शाखा ने उपहार अग्निकांड के आरोपी सुशील अंसल और उसके बेटे प्रणब अंसल को  मुंबई में ढूंढ कर पकड़ लिया।
 कर्नल सिंह उत्तरी रेंज और स्पेशल सेल  के संयुक्त पुलिस आयुक्त भी रहे। 

बटला हाउस एनकाउंटर--  13-9-2008 में दिल्ली में सिलसिलेवार 5 बम धमाके करने वाले आतंकियों का कर्नल सिंह के नेतृत्व में स्पेशल सेल ने 6  दिनों के भीतर ही पता लगा लिया था। 19 सितंबर को आतंकियों को गिरफ्तार करने के दौरान  बटला हाउस एनकाउंटर हुआ जिसमें दो आतंकवादी मारे गए और इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए। दिल्ली में सिनेमा हॉल में हुए बम धमाकों में शामिल आतंकियों को पकड़ने के अलावा अनेक आतंकियों और जेल से फरार हो गए फूलन देवी के हत्यारे शेर सिंह राणा को गिरफ्तार करने आदि जैसे कार्य का श्रेय कर्नल सिंह के खाते में है। 
दिल्ली में बीजेपी सांसद गंगा राम  के घर से उत्तर प्रदेश के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह के हत्यारे  कुख्यात बदमाश राजन तिवारी को पकड़ने की हिम्मत कर्नल सिंह ने दिखाई थी। 
टाइटलर को टाइट किया-
एक बार की बात है कांग्रेस के जगदीश टाइटलर ने जमीन कब्जा करने वाले पहलवानों की मदद करने के लिए कर्नल सिंह से कहा लेकिन उत्तर पश्चिमी जिला के डीसीपी कर्नल सिंह ने ऐसा करने से इंकार कर दिया तो सत्ता के नशे में चूर टाइटलर ने कर्नल सिंह के साथ अभद्र व्यवहार किया लेकिन कर्नल सिंह ने टाइटलर को ऐसी डांट लगाई कि वह उनकी शिकायत करने पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार के दरबार में पहुंच गया।

मेहनती-
कर्नल सिंह शुरू से ही खुद भी टीम के साथ दिन रात एक कर तफ्तीश में जुटे रहने वाले अफसर रहे हैं । इस वजह से उनके साथ काम करने वाली टीम का भी उत्साह बढ़ता था। कर्नल सिंह ने अनेक पुलिस वालों को बारी से पहले तरक्की और वीरता पदक दिला कर टीम का हौसला बढ़ाया।  
पुलिस में ऐसे भी अफसर रहे हैं जो जुगाड से खुद वीरता पदक और भारी सुरक्षा व्यवस्था ले लेते हैं।इस मामले में भी बहादुर कर्नल सिंह ने मिसाल कायम की है  सालों तक आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई  करते रहे लेकिन ना तो कोई अतिरिक्त सुरक्षा ली और ना ही वीरता पदक।

दूसरी ओर कर्नल सिंह के बैच के दीपक मिश्रा हैं जिन्होंने 1996 में एक सिख को गिरफ्तार कर बम धमाके के 5 मामले सुलझाने का दावा कर सात पुलिस वालों को बारी से पहले तरक्की भी दिला दी। जबकि कुछ दिन बाद ही राजस्थान पुलिस ने बम धमाकों में शामिल असली आतंकियों को पकड़ कर इनके झूठे दावे की पोल खोल दी।
आईपीएस के 1984 बैच में अपने साथियों दीपक मिश्रा और धर्मेंद्र कुमार से वरिष्ठता सूची में तीसरे नंबर पर रहे कर्नल सिंह ने बहादुरी, मेहनत और पेशेवर काबिलियत के दम पर अपनी एक अलग पहचान बनाई।  

आतंकियों और कुख्यात बदमाशों के अनेक एनकाउंटर कर्नल सिंह के नेतृत्व में उनकी टीम ने किए इसके बावजूद कर्नल सिंह ने कभी खुद को एनकाउंटर स्पेशलिस्ट या सुपर कॉप जैसा प्रचारित करने की ज़रा भी कोशिश नहीं की। 
बहादुरी, पेशेवर काबिलियत और कड़ी मेहनत से अपनी छाप छोड़ने वाले कर्नल सिंह सही मायने में सुपर कॉप हैं।
दागी भी पसंद -
निजी रूप से बेहद सादगी और सरलता का जीवन जीने वाले संवेदनशील व्यक्ति हैं हालांकि उनकी सरलता का फायदा कई चालाक/ धूर्त /चापलूस/बेईमान मातहतों ने भी उठाया ।
 कर्नल सिंह पहले दागी या बदनाम पुलिस अफसरों को नापसंद करते थे लेकिन बाद में ऐसे अफसर भी उनके मातहत आ गए और उनके ख़ास तक बन गए।
दागी और बदनाम लोगों को  मातहत रखने के बारे में मैंने एक बार कर्नल सिंह से पूछा तो उन्होंने कहा कि व्यक्ति को घी की तरह होना चाहिए यानी अपना असर दूसरे पर छोड़ना चाहिए किसी दूसरे का असर अपने पर नहीं आने देना चाहिए।
 हालांकि  मेरा मानना है कि आईपीएस अफसर अच्छे कार्य करने वाले मातहत को इनाम तो जरुर दे, लेकिन गलत कार्य करने पर उसे बिल्कुल बख्शा नहीं जाना चाहिए। ईमानदार आईपीएस अफसर अगर ऐसा करें तभी मातहतों को निरंकुश और भ्रष्ट होने से रोका जा सकता है।
दिल्ली पुलिस के अलावा गोवा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश पुलिस में भी कर्नल सिंह तैनात रहे।
गुजरात में हुए इशरत जहां एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी के मुखिया भी कर्नल सिंह बनाए गए थे लेकिन उन्होंने इस पद को कुछ दिनों बाद खुद ही छोड़ दिया था।

गांव का छोरा-
मूल रूप से पूर्वी दिल्ली में शाहदरा गांव के महराम मौहल्ले के निवासी कर्नल सिंह दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक और कानपुर से एमटेक के बाद आईपीएस अफसर बने। 
पुलिस में रहते हुए एलएलबी और एमबीए भी किया। इसके अलावा भारतीय विद्या भवन से ज्योतिष शास्त्र की शिक्षा ली साथ ही वहां समय समय पर ज्योतिष के छात्रों को पढ़ाया भी। I
कर्नल सिंह के अलावा कुछ समय पहले दिल्ली पुलिस से रिटायर हुए स्पेशल सीपी पुरूषोत्तम नारायण अग्रवाल और किशन कुमार भी शाहदरा गांव के महराम मौहल्ले के ही मूल निवासी हैं।