Monday, 4 November 2019

खाकी की छाती पर काले कोट का तांडव, पुलिस में रोष,वकीलों की दादागिरी पर अंकुश की दरकार



खाकी की छाती पर काले कोट का तांडव।

इंद्र वशिष्ठ

तीस हजारी कोर्ट में आगजनी, हिंसा, मारपीट कर कानून हाथ में लेने वालों को सिर्फ गुंडे या अपराधी ही माना जाना चाहिए। गुंडागर्दी करने वालों को उसी तरह सज़ा मिलनी चाहिए जैसे किसी अन्य अपराधी को दी जाती।
कानून की नजर में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि कानून हाथ में लेने वाले खाकी वर्दी में थे या काले कोट में।

वैसे कानून की नजर में सब सामान होते हैं। अपराध के आधार पर ही अपराधी को सज़ा दी जाती हैं।
लेकिन अक्सर देखा जाता हैं कि जांच करने वाले आरोपी के पेशे,रसूख आदि के प्रभाव में भी आ जाते हैं। यानी आरोपी खाकी वर्दी वाला, वकील,राज नेता ,रसूखदार/ प्रभावशाली, अल्पसंख्यक समुदाय आदि से हो तो उस मामले में पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों द्वारा निष्पक्ष जांच की गुंजाइश कम हो जाती हैं। 
तीस हजारी कोर्ट में जो हुआ उसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस मामले में न्यायिक जांच बिठा दी है।
कानून हाथ में लिया कानूनविदों ने-

इस मामले जो भी जानकारी अब तक सार्वजनिक हुई है उसके आधार पर यह तो साफ़ है कि वकीलों को किसी भी सूरत में कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए था। 
हवालात का गेट तोड़ कर अंदर घुस कर पुलिस वालों को जमीन पर गिरा कर और दौड़ा दौड़ा कर बेरहमी से पीटना, वाहनों को आग लगाना, तोड़फोड़ करना साफ़ तौर पर संगीन अपराध ही तो हैं।

अफसोसजनक बात यह है कि कानून हाथ में ले कर  यह हरकत उन कुछ वकीलों द्वारा की गई जिन्हें कानून का ज्ञाता माना जाता है और जिन पर पीड़ित लोगों की बात अदालत में पेश कर न्याय दिलाने जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।

ऐसी हरकत से उन्होंने अपने पेशे को तो शर्मसार किया ही है। इससेे यह भी पता चलता हैं कि कानून के ज्ञाता ऐसे वकीलों को ही नजर में कानून, संविधान की कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है और उनको न्याय व्यवस्था पर तनिक भी विश्वास नहीं है।

घटना के बारे में जो बात सामने आई है उससे पता चलता है कि पुलिस ने एक वकील को हवालात के बाहर कार खड़ी करने से रोका। इस पर हुए विवाद ने ही जबरदस्त हिंसक बवाल का रुप ले लिया।
पुलिस ने उस वकील को हवालात में बंद कर दिया। वकीलों का आरोप है कि वकील की पिटाई भी की गई।
पुलिस और वकीलों  द्वारा एक दूसरे को दौड़ा दौड़ा कर पीटने के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं।


वकीलों द्वारा पुलिस पर लगाए गए सारे आरोपों को अगर सही भी मान लिया जाए तब भी वकीलों द्वारा कानून को हाथ में लेने को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता हैं। 
कानून के जानकार वकीलों को तो अपने कानूनी ज्ञान के माध्यम से गलत व्यवहार करने वाले पुलिस कर्मियों को ऐसा कानूनी सबक सिखाना चाहिए था कि आगे अन्य कोई ऐसी हिम्मत नहीं करता।
लेकिन वकीलों ने तो कानून हाथ में लेकर दिखा दिया कि पुलिस, प्रशासन, कानून और न्याय व्यवस्था पर उनको भरोसा नहीं है।

इस मामले को शुरुआत से देखें और निष्पक्ष होकर विचार करें तो यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस पक्ष की गलती है।

पुलिस की कीमत दो कौड़ी भी नहीं -

पुलिस कर्मी ने जब वकील को कार हवालात के बाहर खड़ी करने से मना किया तो कानून के ज्ञाता वकील को क्या उस पुलिस कर्मी के आदेश/ निर्देश का पालन नहीं करना चाहिए था ?

पुलिस वाला वहां अपनी ड्यूटी निभा रहा था। लेकिन पुलिस के निर्देश का पालन नहीं करने से साफ़ है कि वकील की नजर में कानून व्यवस्था की रखवाली करने वाली पुलिस की कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है। उसकी नज़र में कानून का कोई सम्मान नहीं है।

लगता है कि अहंकार के कारण वकील को एक अदना से पुलिस वाले की बात पर अमल करना गवारा नहीं हुआ। जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस कर्मी का पद  चाहे कोई हो पुलिस वाले का मतलब होता हैं शासन का प्रतीक। कानून व्यवस्था और लोगों सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले पुलिस कर्मियों के निर्देशों का पालन तो सभी नागरिकों को करना ही चाहिए।

पर उपदेश कुशल बहुतेरे।-
यह बात इन वकीलों पर लागू होती है। दूसरों को कानूनी सलाह देने वालों ने खुद कानून का रास्ता छोड़ कर कानून हाथ में लेने का रास्ता अपनाया ।

वकील को अगर पुलिस ने हिरासत में ले कर हवालात में बंद कर दिया था।
वकीलों को लगा कि पुलिस की कार्रवाई ग़लत हैं तो उनको वरिष्ठ पुलिस अफसरों से इस मामले की शिकायत करनी चाहिए थी। वरिष्ठ पुलिस अफसर अगर उनकी बात पर ध्यान नहीं देते तो उनके पास पुलिस कमिश्नर और गृहमंत्री तक गुहार लगाने का रास्ता था। उपरोक्त स्तर पर वकीलों की शिकायत पर कार्रवाई न की जाए ऐसा असंभव है। लेकिन एक मिनट के लिए मान लें कि उपरोक्त स्तर पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती तो वकीलों के पास कोर्ट में गुहार लगाने का रास्ता  तो था ही। 
यही रास्ता तो वकील ऐसे ही मामले में अपने क्लांइट को दिखाया करते हैं। 

वकीलों ने अगर यह प्रक्रिया अपनाई होती तो बवाल होता ही नहीं।

पुलिस चुपचाप पिटती रहती ?-

वकील हवालात का गेट तोड़ अंदर घुस गए और पुलिस वालों को पीट पीट कर अधमरा कर दिया। वाहनों को आग लगा दी। ऐसे में पुलिस अपने बचाव में और हिसंक भीड़ को खदड़ने के लिए लाठीचार्ज नहीं करती तो क्या चुपचाप पीटती रहती ?
पुलिस अनुशासित बल है और उसकी हर कार्रवाई की जबावदेही तय है।  सोचो पिटते हुए पुलिस वालों ने अगर संयम से काम नहीं लिया होता और खुल कर फायरिंग कर दी होती तो कितना ख़ून ख़राब हो जाता। 

दूसरी ओर कुछ ऐसे वकील हैं जिन्होंने एक वकील को हिरासत में लेने की बात पर ही संयम खो दिया और कानून अपने हाथ में ले लिया। 

पुलिस हो या वकील किसी के भी द्वारा  किसी को पीटना अपराध है और किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है।

कितनी अजीब बात है कि कानून की पढ़ाई करने वाले वकीलों को तो कानून की पूरी समझ होती हैं लेकिन इसके बावजूद उनके द्वारा ही कानून की धज्जियां उड़ाई गई। ऐसे वकीलों द्वारा खुद को नियम कायदों से ऊपर मान लिया जाता हैं।

ग़लत करने वाले का भी पूरी जमात साथ देती हैं।
कोर्ट के बाहर भी देखा जा सकता हैं। वकीलों की दादागिरी के डर से ट्रैफिक पुलिस वहां खड़ी वकीलों की कारों के चालान तक नहीं करती है। 

कानून के जानकार वकीलों को तो नियम कायदों का पालन कर कानून का सम्मान कर आदर्श पेश करने चाहिए। लेकिन कुछ ऐसे वकील होते है जो उल्टा अपने पेशे का रौब दिखाकर पूरे पेशे को बदनाम कर देते हैं। पुलिस हो या वकील हर पेशे में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपनी हरकतों से पूरी बिरादरी को शर्मसार कर देते हैं।
ऐसे ही कुछ वकीलों ने मीडिया वालों के साथ भी लगातार दो दिनों तक बदसलूकी की।


लडैं बराबर रोवैं ज्यादा

वकीलों ने कानून हाथ में लेकर पुलिस को पीट भी दिया आगजनी भी की। इसके बाद पुलिस पर ज़ुल्म करने का आरोप भी लगा दिया और पुलिस वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग भी कर दी।

इस मामले की न्यायिक जांच की जा रही हैं। एएसआई पवन और कामता प्रसाद को निलंबित भी कर दिया गया है। 
विशेष पुलिस आयुक्त संजय सिंह और उत्तरी जिले के अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त हरेंद्र सिंह का तबादला भी कर दिया गया है। 
लेकिन एक सवाल यह उठता है कि जांच पूरी होने से  पहले ही वरिष्ठ पुलिस अफसरों का तबादला करना क्या सही है?

दूसरी ओर वकीलों की संस्थाओं ने बिना किसी जांच के पुलिस को दोषी ठहराते हुए घटना की तो निंदा की,  लेकिन उन  वकीलों के कृत्य की निंदा नहीं की जिन्होंने कानून की धज्जियां उड़ाने में गुंडों को भी पीछे छोड़ दिया। जिनकी करतूत वायरल वीडियो में सारी दुनिया देख रही हैं।

वकीलों की संस्थाओं को बिना किसी भेद-भाव के यह मांग करनी चाहिए थी कि निष्पक्ष जांच जल्द से जल्द पूरी की जाए और कानून हाथ में लेने वालों वकीलों और पुलिस वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
वकीलों की संस्थाओं को अपने बीच मौजूद ऐसे निरंकुश वकीलों के खिलाफ अपने स्तर पर भी कार्रवाई करनी चाहिए जो कानून हाथ में लेकर पूरी जमात को बदनाम करते हैं। 

पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए तो बकायदा नियम कायदों की पूरी व्यवस्था है जिसकी वजह से उन पर कड़ी कार्रवाई कर अंकुश लगाया जा सकता है। 

लेकिन ऐसे वकील तो किसी के प्रति जबावदेह नहीं है।

 पुलिस में रोष।-

इस मामले में  वरिष्ठ पुलिस अफसरों को जांच पूरी  होने से पहले हटा दिए जाने से पुलिस बल में रोष है। इससे पुलिस का मनोबल गिरता है।
तर्क यह दिया जाता है कि निष्पक्ष जांच के लिए तबादला ज़रुरी होता हैं।
क्या दो अफसरों के तबादले से ही जांच निष्पक्ष होना पक्का/तय है। मान लीजिए अगर पुलिस ने जांच प्रभावित ही करनी होगी तो पूरी पुलिस एक हो सकती हैं।  
दूसरा बिना जांच रिपोर्ट सामने आए कोई यह कह भी कैसे सकता हैं कि जांच प्रभावित की गई है या नहीं।
अगर अफसरों को हटाने से ही जांच निष्पक्ष होती है तो फिर सबसे पहले तो पुलिस कमिश्नर का ही तबादला किया जाना चाहिए था। पुलिस बल का मुखिया होने के नाते पुलिस कमिश्नर तो आसानी से जांच प्रभावित कर सकता है। 

पहले भी वकीलों के दबाव में आकर उत्तरी जिले की तत्तकालीन डीसीपी किरण बेदी का तबादला कर सरकार ने गलत परंपरा शुरू की थी। तबादले को वकीलों द्वारा अपनी जीत माना गया और वह पहले से ज्यादा निरंकुश हो गए।

गृहमंत्री अमित शाह संसद में भी पुलिस बल का मनोबल बढ़ाने वाले भाषण देते हैं। अब देखना है कि वह इस मामले में पुलिस का साथ देकर अपनी बात पर कितने खरे उतरते हैं।

डरपोक जजों और राजनेताओं के कारण वकील हुए निरंकुश--

हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस एन ढींगरा ने मीडिया से  इस मामले में  कहा है कि वकीलों को कभी भी और किसी भी हालात में क़ानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए।
किसी को घेर कर पीटना, गाड़ियों में आग लगाना, आगजनी करना कानून हाथ में लेना ही तो है। 

बवाल करना वकीलों का चरित्र-

वर्ष 1988 में भी एक वकील की गलती के कारण बवाल हुआ था।  एक वकील को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वकील की गिरफ्तारी से वकीलों ने तीस हजारी कोर्ट परिसर में हंगामा कर दिया था तत्कालीन डीसीपी किरण बेदी तक के साथ बदसलूकी की, घेराबंदी की। जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया।
पूर्व न्यायाधीश का कहना है कि छोटे छोटे मुद्दों पर बवाल करना पूरे देश के वकीलों का चरित्र रहा है। 

जज और नेता जिम्मेदार-

पूर्व न्यायाधीश एस एन ढींगरा ने वकीलों के इस रवैये के लिए जजों और सरकारों को भी जिम्मेदार ठहराया है। जज इसके लिए जिम्मेदार हैं जो वकीलों के खिलाफ कार्रवाई करने से डरते हैं। राजनेता इसलिए जिम्मेदार हैं कि वे अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इन्हें ऐसी हरकतों के बाद भी संरक्षण देते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तक ने कहा वकील जजों को धमकाते हैं।-

सुप्रीम कोर्ट के तत्तकालीन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने एक मामले में कहा कि कोई वकील अगर गलती करें तो भी पूरी जमात उसके साथ खड़ी होकर जजों को धमकाने लगती है। ऐसे में बेहतर होगा कि हम सुप्रीम कोर्ट ही बंद कर दें। वकील मोहित चौधरी ने कोर्ट रजिस्ट्री कार्यालय पर हेरा-फेरी का आरोप लगाया था। जिस पर मोहित को अवमानना का नोटिस भेजा गया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान बड़े नामी गिरामी वकील और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारी पेश हुए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब कोई वकील कोर्ट की अवमानना करता है तो वकीलों की पूरी जमात साथ खड़ी होकर उसका बचाव करती है। आप जजों को धमकाते हैं इकट्ठे होकर दबाव बनाते हैं। मन मुताबिक काम न हो तो कोई भी आरोप लगा देते हैं। हेरा-फेरी का आरोप लगा कर मोहित ने अदालत की अवमानना की है। ऐसे में माफी का सवाल ही नहीं उठता।

साकेत और कड़कड़डूमा कोर्ट में भी पुलिस कर्मी को पीटा-

सोमवार को कड़कड़डूमा कोर्ट में भी वकीलों द्वारा एक पुलिस वाले की पिटाई कर दी गई।
साकेत कोर्ट में वकील द्वारा मोटरसाइकिल सवार पुलिस कर्मी को पीटा गया।













Sunday, 20 October 2019

PM की भतीजी लुटी तो परिजनों की सादगी हुई उजागर। प्रधानमंत्री के परिजनों में भी सादगी मुमकिन है।



                            दमयंती बेन मोदी

लुटेरों के कारण मोदी के परिजनों की सादगी हुई उजागर।
प्रधानमंत्री के परिजनों में भी सादगी मुमकिन है।

इंद्र वशिष्ठ

प्रधानमंत्री मोदी को फेंकू, लाखों के सूट-बूट पहनने वाला, नौटंकीबाज और न जाने क्या क्या कहा जाता हैं।
लेकिन एक मामला ऐसा सामने आया है जिससे मोदी के परिजनों की  सादगी का पता चलता हैं। यह सादगी दुनिया के सामने लाने में मोदी का रत्ती भर भी योगदान नहीं है।
मीडिया में अपनी छवि बनाने के लिए मोदी चाहे जो हथकंडे अपनाते हो। लेकिन दिल्ली के लुटेरों के कारण मोदी के परिजनों की सादगी का यह मामला इत्तफाक से सामने आया है।

मोदी की भतीजी लुटी -

12 अक्टूबर की सुबह सिविल लाइंस इलाके में एक महिला से स्कूटी सवार दो लुटेरों ने पर्स लूट लिया। पर्स में नकदी और और 2 मोबाइल फ़ोन आदि था।
दमयंती बेन नामक इस महिला ने वारदात की सूचना पुलिस को दी और बताया कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भतीजी  हैं। दमयंती नरेन्द्र मोदी के छोटे भाई प्रह्लाद मोदी की बेटी हैं। यह सुनते ही पुलिस अफसरों में हड़कंप मच गया। पुलिस ने चौबीस घंटे में ही लुटेरों को गिरफ्तार कर लूटा गया सामान भी बरामद कर लिया।
दमयंती बेन अपने परिजनों के साथ सुबह ही अमृतसर से आई थी पुरानी दिल्ली स्टेशन से वह गुजराती समाज भवन ऑटो रिक्शा में पहुची। गुजराती समाज भवन के बाहर ही लुटेरों ने उनका पर्स लूट लिया। दमयंती बेन ने बताया कि वह पहली बार दिल्ली आई है।
प्रधानमंत्री की भतीजी के साथ लूट हुई तो मामला सुर्खियों में आना ही था।

सादगी का उदाहरण -

इस मामले के कारण ही यह बात सामने आई कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के परिजन आम आदमी की तरह ऑटो में सवार थे। 
आज़ के माहौल में विधायक, सांसद, मंत्री के परिजन  ऑटो में शायद ही सफर करते हैं।‌‌‌‌ ऐसे राजनेता भी हैं जो हेलिकॉप्टर, चार्टर्ड विमान का टैक्सी की तरह इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के परिजनों द्वारा ऑटो में सफर करना समाज के सामने अच्छा उदाहरण है। इससे लोगों में भी अच्छा संदेश जाता हैं। राजनेताओं और नौकरशाहों को भी इससे सीख लेनी चाहिए।
सच्चाई यह है कि अगर मोदी के परिजन चाहते तो दिल्ली में उनको वीवीआईपी आवास और सत्कार मिलता। वह गाड़ियों के काफिले में चल सकते थे। 

ऑटो में सफर करना और गुजराती समाज भवन में ठहरने से पता चलता हैं कि  परिजन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री होने का मामूली-सा लाभ भी नहीं लेना चाहते थे।

दूसरी ओर आज समाज में यह खूब देखा जा सकता हैं कि राजनेता और उनके परिजन ही नहीं उनके दूर के रिश्तेदार, जानकर आदि भी पद का रौब रुतबा दिखाने और उसका लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं।

दमयंती बेन ने यह भी बताया कि वह दिल्ली पहली बार आई है। दूसरी ओर ऐसे नेता भी है जो दिल्ली में आने के बाद न केवल अपने परिजनों, रिश्तेदारों बल्कि अन्य जानकारों तक को भी यहीं बुला लेते हैं। ऐसे नेता नियमों को ताक पर रख कर अपने लोगों के लिए सरकारी आवास तक आवंटित करा लेते हैं। कुछ समय पहले यह उजागर हुआ था कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोती लाल वोरा ने अपने परिजनों, अतिथियों आदि के लिए 9 बंगले/फ्लैट आवंटित करा रखे थे।

प्रधानमंत्री कानून व्यवस्था पर भी ध्यान दें--

भतीजी के लुट जाने से लगता है कि शायद अब प्रधानमंत्री मोदी  दिल्ली की बिगड़ती कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने की ओर ध्यान दे। 

दिल्ली की महिलाओं को लुटेरों के जिस कहर का सामना करना पड़ रहा है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भतीजी ने खुद उसका अनुभव किया है।
प्रधानमंत्री को शायद अब  उन महिलाओं के दर्द का भी अहसास हो  जो लुटेरों का शिकार हुई  है। इनमें ऐसी महिलाएं भी शामिल हैं जिनकी पुलिस ने रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की थी।

पुलिस बिना भेदभाव ईमानदारी से करें कर्तव्य पालन --

 दिल्ली पुलिस के उन एसएचओ और आईपीएस अफसरों को भी इस मामले से सीख लेनी चाहिए जो सरकारी गाड़ियों का इस्तेमाल अपने निजी कार्यों  बच्चों को स्कूल भेजने, पत्नी को शॉपिंग, रिश्तेदारों को भी एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन से लाने पहुंचाने आदि कामों के लिए करते हैं। 

पुलिस को  सिर्फ खास लोगों के साथ हुई लूट के मामले सुलझाने के बजाए आम आदमी के साथ हुई लूट के मामले सुलझाने में भी इतनी ही तत्परता और ईमानदारी से काम करना चाहिए। जितनी मुस्तैदी प्रधानमंत्री की भतीजी के मामले में दिखाई।









   

Tuesday, 1 October 2019

कमिश्नर खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ,बाजीगरी बंद कर लुटेरों पर अंकुश लगाओ, लूटपाट को दर्ज करो तब ही लूट कम होंगी।

कमिश्नर, IPS खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ।
बाजीगरी बंद कर लुटेरों पर लगाम लगाओ, 
IPS ईमानदार हो तो ईमानदार नज़र आना ज़रूरी है।

FIR  दर्ज न कर लुटेरों की मदद करती है पुलिस।
लूट को दर्ज़ करो तब ही लूट कम होंगी।

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली में बेख़ौफ़ लुटेरों ने आतंक मचा रखा है। महिला हो या पुरुष कोई भी कहीं पर भी सुरक्षित नहीं हैं
लूटपाट और लुटेरों पर अंकुश लगाने में नाकाम पुलिस अपराध के आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का दावा करने में जुटी हुई हैं। लूटपाट की वारदात को दर्ज़ न करके या हल्की धारा में दर्ज कर पुलिस एक तरह से लुटेरों की ही मदद कर रही हैं।
पुलिस के ऐसे हथकंडों के कारण ही अपराध बढ़ रहे हैं और अपराधी बुलंद हौसले के साथ बेख़ौफ़ होकर लगातार वारदात कर रहे हैं। 

महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होने के पुलिस दावे की पोल खुल गई-

महिलाओं की चेन, पर्स, मोबाइल लूटने के मामले दर्ज तक न करना पुलिस के महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने के दावे की पोल खोल रहा है।

'आपके लिए, आपके साथ, सदैव' का दावा करने वाली पुलिस की हरकतों से तो लगता है कि पुलिस "अपराधी के लिए, अपराधी के साथ, सदैव" हैं।


प्रधानमंत्री की भतीजी लुट गई तो पुलिस ने
कुछ घंटों में ही लुटेरे पकड़ लिए।-

12 अक्टूबर की सुबह प्रधानमंत्री की भतीजी दमयंती बेन का पर्स स्कूटी सवार दो लुटेरों ने लूट लिया। वारदात सिविल लाइंस इलाके में गुजराती समाज भवन के सामने उस समय हुई जब वह ऑटो रिक्शा से उतरी। दमयंती बेन ने बताया कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भतीजी लगती हैं। यह सुनते ही पुलिस अफसरों में हड़कंप मच गया। पुलिस ने 24 घंटे के भीतर ही लुटेरों को पकड़ कर दमयंती का पर्स, मोबाइल और नकदी आदि सब कुछ बरामद कर लिया।
 इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि शिकायतकर्ता वीवीआईपी हो तो पुलिस कुछ घंटों में ही लुटेरों को पकड़ लेती। आम आदमी के मामले में भी पुलिस इतनी ही तत्परता से कार्रवाई करें और लुटेरों को पकड़े तब ही अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाया जा सकता हैं।

महिला लुट गई गिर गई, पुलिस ने लूट की बजाए चोरी की रिपोर्ट लिखी।

4 अक्टूबर को रोहिणी सेक्टर 13 में  सुबह स्कूटर से जा रही ज्योति राठी से बाइक सवार लुटेरों ने चेन लूट ली। ज्योति स्कूटर से गिर गई। लुटेरे इसके बाद भी ज्योति के पास पहुंच गए और चेन का टूटा हुआ लॉकेट ले जाने लगे,शोर मचाने पर  वह लॉकेट नहीं ले जा पाएं।

प्रशांत विहार थाना पुलिस ने  लूट/झपटमारी की एफआईआर दर्ज करने की बजाए चोरी की
 ई-एफआईआर दर्ज कर दी। पुलिस वालों ने ज्योति से कहा कि " मैडम ऐसा रोजाना ही होता हैं क्या करें"।
ज्योति ने खुद इलाके में घूम घूम कर सीसीटीवी फुटेज लिया और पुलिस को दिया। ज्योति ने इस मामले का वीडियो बना कर टि्वटर पर अपलोड कर दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने एफआईआर में लूट की धारा जोड़ी।

आला अफसर कसूरवार-
 इस मामले में  एएसआई सखाराम को निलंबित कर दिया गया। एएसआई को निलंबित करना सिर्फ खानापूर्ति हैं। लूट को चोरी में दर्ज़ करने के लिए असल में आला अफसर जिम्मेदार होते हैं। एसएचओ, एसीपी और डीसीपी की मर्जी/सहमति/आदेश के बगैर एएसआई लूट को चोरी में दर्ज़ नहीं कर सकता।


महिला लुटी और कार के नीचे आते-आते बची।  पुलिस ने एफआईआर तक  दर्ज नहीं की--

16 सितंबर को सदर बाजार इलाके में स्कूटर सवार  लुटेरे ने एक महिला से चेन छीनने में ऐसा झटका मारा कि वह सड़क पर गिर गई। महिला के पीछे से वैन और सामने से कार आ रही थी महिला कार के नीचे आते-आते बची। पुलिस को 100 नंबर पर  कॉल की गई। पीसीआर महिला को थाने ले गई। पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। महिला से एक सादे काग़ज़ पर शिकायत लिखवा ली गई। महिला के पति ने खुद लोगों के पास जाकर सीसीटीवी फुटेज दिखाने की गुहार लगाई। इसके बाद वारदात का सीसीटीवी फुटेज सामने आया। वारदात की जगह पर पुलिस का सीसीटीवी कैमरा भी लगा हुआ है लेकिन वह शो-पीस बन हुआ है। आरोप है कि सीसीटीवी फुटेज पुलिस को दिए जाने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। वारदात को अंजाम देने के बाद भी वह लुटेरा इलाके में ही घूमता देखा गया। सीसीटीवी फुटेज में लुटेरे के स्कूटर का नंबर भी साफ़ है। 23 सितंबर को समाचार पत्र में यह मामला उजागर होने पर  पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।

आईपीएस मोनिका भारद्वाज को कुछ समय पहले ही
उत्तरी जिला पुलिस उपायुक्त के पद पर तैनात किया गया है। 
महिला डीसीपी के होते हुए पीड़ित महिला की रिपोर्ट न दर्ज करने से पुलिस का संवेदनहीन चेहरा उजागर हो गया।

डीसीपी मोनिका भारद्वाज का कारनामा,
88 वारदात एक ही एफआईआर में दर्ज कर दी।-

पश्चिम जिला पुलिस उपायुक्त के पद पर रहते हुए भी मोनिका भारद्वाज द्वारा अपराध के मामलों की  FIR सही दर्ज नहीं की जाती थी। ऐसा ही एक मामला इस पत्रकार द्वारा उजागर किया गया था

तिलक नगर थाना इलाके में इस साल एक से दस मई  के अंदर अलग-अलग स्थानों पर लगे एटीएम से अपराधियों ने लोगों का डाटा चोरी कर उनके बैंक खातों से लाखों रूपए निकाल लिए।
वारदात के शिकार हुए लोगों ने  पुलिस को शिकायत की लेकिन पुलिस ने उसी समय एफआईआर दर्ज नहीं की। जब करीब 88 शिकायतें पुलिस को मिल गई तब जाकर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।
इसमें भी पुलिस ने अलग-अलग एफआईआर दर्ज करने की बजाए सारे मामले एक ही एफआईआर में दर्ज कर दिए। जो कि कानून गलत है।

पुलिस ने दिया अपराधियों को मौका--

पुलिस अगर सबसे पहले मिली शिकायत पर ही एफआईआर दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर देती तो अपराधी पहले ही पकड़ में आ जाते और इतने सारे लोगों की रकम चोरी होने से बच जाती।

पुलिस कमिश्नर अपराध के आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का दावा करते हैं। --

पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को शायद आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम दिखाने में माहिर आईपीएस अफसर ही ज्यादा पसंद है इसलिए ऐसे अफसरों को ही बेहतर/ महत्वपूर्ण माने जाने वाले जिलों में डीसीपी लगाते हैं।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस कमिश्नर की सहमति और शह के कारण ही अपराध सही दर्ज न करने या हल्की धारा में दर्ज किए जाते हैं। पुलिस के आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर होते हैं।

इस तरह आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का दावा कर पुलिस कमिश्नर, डीसीपी और एस एच ओ तक खुद को सफ़ल अफसर दिखाते हैं।

अपराध दर्ज न कर अपराधी की मदद करने वाले पुलिस अफसर पर दर्ज की जानी चाहिए एफआईआर--

लेकिन ऐसा करके ये सब पुलिस अफसर एक तरह से  अपराधी की ही मदद कर उसके अपराध में शामिल हो जाते हैं। जिस तरह किसी अपराधी की मदद करने या शरण देने वाले व्यक्ति को भी अपराधी माना जाता हैं । ऐसे में यह अफसर भी अपराधी माने जाने चाहिए। अपराध को दर्ज न कर अपराधी को फायदा पहुंचाने वाले ऐसे पुलिस अफसरों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।  तब ही अपराध के मामले सही दर्ज किए जाने लगेंगे। फिर अपराध और अपराधी पर अंकुश लग सकेगा।

वारदात की सही FIR दर्ज नहीं करती पुलिस---

अब तो हालत यह है कि लुटेरों को भी मालूम है कि अगर पकड़े भी गए तो उनके द्वारा की गई अनगिनत वारदात में से सिर्फ कुछेक वारदात ही पुलिस ने दर्ज की होंगी। ऐसे में लुटेरे जल्द जमानत पर रिहा हो कर फिर से बेख़ौफ़ होकर वारदात करने लगते हैं।

लूटपाट रोकने और लुटेरों पर अंकुश लगाने का सिर्फ एक ही रास्ता लूट की सभी और सही एफआईआर दर्ज की जाएं--

लूटपाट को रोकने और लुटेरों पर अंकुश लगाने का सिर्फ और सिर्फ एक मात्र रास्ता है कि पुलिस लूट की सभी वारदात को दर्ज़ करें।
ऐसे में लुटेरे को सभी मामलों में जल्द जमानत भी नहीं मिल पाएगी और  सज़ा होने पर जेल में ज्यादा समय तक बंद रहना पड़ेगा। इस तरीके से ही अपराध और अपराधियों पर अंकुश लग पाएगा। 
लेकिन अफसनोक बात यह है कि पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अफसर ऐसा नहीं करते हैं। ऐसे अफसरों के कारण ही एस एच ओ भी निरंकुश हो जाते हैं।
अपराध दर्ज होगा तो अपराध में वृद्धि उजागर होगी।
पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का दवाब रहेगा। पुलिस को अपराधी को पकड़ने के लिए मेहनत करनी पड़ेगी जो वह करना नहीं चाहती हैं। इसलिए वह अपराध को दर्ज ही न करने का तरीका अपना कर खुद को काबिल अफसर दिखाना चाहते हैं।  लेकिन ऐसा करके वह अपराध और अपराधियों को बढ़ावा दे रहे हैं। अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन न करके ऐसे पुलिस अफसर बहुत बड़ा अपराध करते हैं।

महिला पत्रकार को लूटा-

22 सितंबर को चितरंजन पार्क थाना इलाके में एएनआई की पत्रकार ऑटो में जा रही थी बाइक सवार लुटेरों ने मोबाइल छीना, तब वह ऑटो से नीचे गिर गई। जिससे उन्हें गंभीर चोट लगी। इस मामले में ड्यूटी में लापरवाही बरतने के आरोप में एक सब-इंस्पेक्टर और दो सिपाहियों को निलंबित किया गया। पुलिस ने इस मामले में एक संदिग्ध को पकड़ा है।

महिला पत्रकार का भी केस चोरी में दर्ज कर दिया-
23 सितंबर को एक अन्य मामले में ओखला औद्योगिक क्षेत्र में महिला पत्रकार से बाइक सवार लुटेरों ने मोबाइल फोन लूट लिया। लेकिन पुलिस ने लूट/झपटमारी की बजाए चोरी में एफआईआर दर्ज की।

मैडम इतनी रात को कर क्या रहे थे ?-

 29 सितंबर की रात में ऑटो में बैठ कर घर जा रही एक महिला पत्रकार से बाइक सवार लुटेरों ने पर्स छीन लिया। घटना कैलाश कालोनी मेट्रो स्टेशन के पास हुई। आरोप है कि महिला पत्रकार ने पुलिस को फोन किया तो पुलिस कर्मी ने उनकी समस्या का समाधान करने की बजाए उनसे कहा कि मैडम आप इतनी रात को कर क्या रहे थे ?  हालांकि बाद में अमर कालोनी थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई।

100 नंबर की भूमिका पर सवाल-
30 सितंबर को दो लुटेरों ने ऑटो में सवार एक पत्रकार का मोबाइल छीन लिया।  आश्रम चौक से शुरू हुआ यह मामला सनलाइट कालोनी थाना इलाके तक जा पहुंचा। आरोप है कि पीड़ित ने 100 पर कॉल भी किया लेकिन कुछ रिस्पांस नहीं मिला।

सिविल लाइंस में भी महिला को लूटा-

29 सितंबर को सिविल लाइंस इलाके में ऑटो में जा रही महिला का पर्स छीनने के लिए बाइक सवार लुटेरों ने ऐसा झपट्टा  मारा कि महिला ऑटो से नीचे गिर गई। बैग में दस हज़ार रुपए और अन्य सामान था। सिविल लाइंस थाने में एफआईआर दर्ज की गई है।

लुटेरों के शिकार हुए लोगों के यह तो सिर्फ वह मामले हैं जो मीडिया में आ गए।

इसके अलावा रोजाना लूट-झपटमारी की अनगिनत वारदात होती हैं जिनकी सूचना मीडिया तक पहुंच भी नहीं पाती है। गली मोहल्ले तक में बेख़ौफ़ लुटेरे महिलाओं और पुरुषों को अपना शिकार बना रहे।

पिस्तौल दिखाकर चेन लूटी--
कुछ दिन पहले ही केशव पुरम थाना क्षेत्र के तोताराम बाजार में मदर डेयरी/जैन पनीर वाले के पास की एक गली में पिस्तौल दिखाकर कर लुटेरे ने महिला की चेन लूट ली। यह वारदात सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई।

दिल्ली भर में हो रही इस तरह की वारदात के न जाने कितने वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर होते हैं। 
पीड़ित खुद सीसीटीवी फुटेज तक पुलिस को देते हैं। लेकिन पुलिस कार्रवाई नहीं करती है।

कई मामलों में तो पीड़ितों ने कई दिनों तक घटनास्थल पर खुद निगरानी रख कर लुटेरों को खुद पकड़ कर पुलिस के हवाले किया है। 

दिल्ली के सबसे सुरक्षित  इलाके में भी लुटेरे बेख़ौफ़ पुलिस नदारद - 

 20 सितंबर को सुबह स्कूटी सवार विनोद भंडारी अपनी पत्नी अमृता के साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जा रहे थे नई दिल्ली इलाके में हैली रोड की रेड लाइट से पहले लुटेरे उनके पीछे लग गए। लुटेरों से बचने के लिए अमृता ने अपनी चेन उतार कर लुटेरों की तरफ  फेंक दी। लेकिन पिस्तौल लिए लुटेरों ने फिर भी पीछा जारी रखा। कनाट प्लेस में आउटर सर्किल पर स्कूटी फिसल जाने से विनोद और अमृता गिर गए और घायल हो गए। तब लुटेरे भाग गए। 

विनोद ने बताया कि लुटेरों ने क़रीब डेढ़-दो किलोमीटर तक उनका पीछा किया।इस दौरान उन्हें कहीं भी किसी पुलिस पिकेट, पीसीआर या गश्त करते पुलिस वाले नज़र नहीं आए।

एफआईआर दर्ज करने के लिए घंटों तक थाने-थाने घुमाया पुलिस ने --

विनोद के अनुसार इसके बाद उन्हें जिस तरह की प्रताड़ना झेलनी पड़ी वह ज्यादा दुखदायी साबित हुई। यह उनके लिए किसी हाऊस अरेस्ट जैसी स्थिति थी और उन्हें ऐसा लग रहा था कि वह पीड़ित नहीं बल्कि आरोपी हैं। 
सबसे पहले उन्हें बाराखंबा रोड थाने की पुलिस ने घटनास्थल पर बुलाया। जब उन्होंने पूरी बात बताई तो पुलिस वाले ने कहा आपका केस तिलक मार्ग थाने में दर्ज होगा। तिलक मार्ग थाने के पुलिस वाले ने कहा कि आप जाकर संसद मार्ग थाने में केस दर्ज कराओ। संसद मार्ग थाने की पुलिस को सारी बात तो उन्होंने कहा पिस्तौल टालस्टाय मार्ग पर दिखाई गई और लुटेरों ने पीछा आउटर सर्किल तक किया था। इसलिए केस कनाट प्लेस थाने में दर्ज होगा। आखिर उन्हें कनाट प्लेस थाने में ले जाया गया। क़रीब पांच घंटे बाद उनको छोड़ा गया। शाम सात बजे एफआईआर की कॉपी दी। थाने से निकल कर वह अस्पताल पहुंचे तो डाक्टर ने बताया कि उनकी पत्नी के कंधे का आपरेशन करना पड़ेगा।





Saturday, 7 September 2019

पुलिस के सामने फिरौती के साथ व्यापारी के परिजनों को भी ले गया अपहरणकर्ता।


                आलोक कुमार IPS

अपहरणकर्ता फिरौती की रकम के साथ 
अपहृत व्यापारी के परिजनों को भी ले गया।
               पुलिस देखती रह गई।



इंद्र  वशिष्ठ
फिरौती वसूल करने आया अपहरणकर्ता  रकम के साथ साथ फिरौती देने आए अपहृत व्यकित के परिजनों को ही अगवा करके ले गया।  यह सब पुलिस की आंखों के सामने हुआ। पुलिस कुछ समझ पाती तब तक अपहरणकर्ता अपहृत के परिजनों को लेकर  भाग गया। 
लेकिन कुछ क्षण के लिए स्तब्ध हो गए पुलिस अफसर तुरंत हरकत में आए और आखिरकार अपहरणकर्ता को पकड़ लिया गया। दिल्ली में  26 साल पहले हुआ अपहरण का यह अपनी तरह का शायद यह इकलौता मामला है।
इस अनोखे मामले में अपहरण कनाट प्लेस के एक रेस्तरां से किया गया और फिरौती की रकम भी कनाट प्लेस के ही एक दूसरे रेस्तरां के बाहर मंगाई गई।  
तीस लाख रुपए फिरौती मांगी- 
ड्राई फ्रूट्स का कारोबार करने वाले प्रमोद धमीजा (निवासी किंग्सवे कैंप)  का 9 मार्च 1993 को कनाट प्लेस में वोल्गा रेस्तरां से अपहरण हो गया था। अपहरणकर्ता ने उसके परिजनों से तीस लाख रुपए फिरौती मांगी। उस समय यह पत्रकार "दिल्ली मिड-डे "  समाचार पत्र में अपराध संवाददाता था।
धर्मेंद्र कुमार  अपनी बात पर खरे उतरे--
अपहरण की  इस वारदात का पता चला तो 11 मार्च की सुबह इस पत्रकार ने व्यापारी के घर फोन किया। व्यापारी का फोन पुलिस सुन रही थी।  इसलिए मेरे पास तुरंत नई दिल्ली जिला के तत्कालीन डीसीपी धर्मेंद्र कुमार का फोन आया। उन्होंने खबर न छापने का अनुरोध किया और बताया कि अपहरणकर्ता को वह जल्द ही पकड़ कर व्यापारी को मुक्त करा लेंगे। धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि अपहरणकर्ता का फिरौती  के लिए स्थान बताने के लिए फोन आने ही वाला है।
इस पर इस पत्रकार ने धर्मेंद्र कुमार से कहा कि आप मुझे भी पुलिस टीम के साथ भेज देना।
धर्मेंद्र कुमार अपनी कही बात पर खरे उतरे। जैसे ही अपहरणकर्ता का  फोन आया धर्मेंद्र कुमार ने इस पत्रकार को  बता दिया कि अपहरणकर्ता कनाट प्लेस नरुला रेस्तरां फिरौती की रकम लेने आएगा। यह पत्रकार वहां पहुंच गया।
धर्मेंद्र कुमार कनाट प्लेस थाने में बैठ कर अपहरणकर्ता को पकड़ने की कार्रवाई का संचालन/ निगरानी  कर रहे थे।
अपहरणकर्ता फिरौती के साथ व्यापारी के परिजनों को भी ले गया--
कनाट प्लेस के तत्कालीन एसीपी आलोक कुमार और एसएचओ वी के मल्होत्रा आदि पुलिसकर्मियों की टीम ने नरुला रेस्तरां के आसपास मोर्चा संभाल लिया।
एसीपी आलोक कुमार रेस्तरां के अंदर खड़े होकर  शीशे के दरवाजे से बाहर निगरानी करने लगे। रेस्तरां के बाहर मारुति वैन में व्यापारी का भाई और पत्नी  रकम लिए अपहरणकर्ता के आने का इंतजार कर रहे थे। पुलिस की योजना थी कि जैसे ही अपहरणकर्ता फिरौती की रकम लेकर जाने लगेगा उसे दबोच लेंगे। उससे पूछताछ कर अपहृत व्यापारी को उनके ठिकाने से मुक्त करा लेंगे।
पुलिस ने तो अपनी ओर से यह फुल प्रूफ योजना बनाई हुई थी। 
रेस्तरां के अंदर से बाहर नज़र रख रहे एसीपी आलोक कुमार ने देखा कि एक युवक आया और  व्यापारी के परिजन की वैन में आकर बैठ गया। 
अगले ही पल जो हुआ उसे देखकर कर आलोक कुमार  कुछ पल के लिए हक्के बक्के स्तब्ध रह गए। उस युवक के वैन में बैठते ही वैन चल पड़ी।
हुआ यह कि  अपहरणकर्ता ने व्यापारी के परिजनों की वैन में बैठते ही रिवाल्वर निकाल लिया और ड्राइवर से वैन चलाने को कहा। अपहरणकर्ता के आदेश अनुसार ड्राईवर  वैन कनाट प्लेस इनर सर्कल में ले गया।
हक्के बक्के आलोक कुमार एकदम रेस्तरां से बाहर आए और तुरंत वायरलैस पर उस वैन के बारे में सूचना  दी।
एसीपी आलोक कुमार को लगा कि अपहरणकर्ता मिंटो ब्रिज की ओर से बाहर जा सकता हैं। वह एक निजी कार में  अन्य पुलिस कर्मियों के साथ आउटर सर्किल से  मिंटो ब्रिज की दिशा में गए। अंदाजा सही निकला वैन उधर जाती हुई दिखाई दी। 
बुजुर्ग हवलदार की मुस्तैदी से पकड़ा गया अपहरणकर्ता-- 
मिंटो ब्रिज पिकेट पर तैनात एक बुजुर्ग पुलिसकर्मी ने वैन के बारे में वायरलैस पर संदेश सुना तो वह बैरीकेड लगा कर खड़ा हो गया। मारुति वैन जैसे ही वहां पहुंची उस पुलिस कर्मी ने स्टेनगन तान कर वैन रोकने का इशारा किया। इसी दौरान पीछे से एसीपी आलोक कुमार आदि पहुंच गए।  
पुलिस टीम ने उस वैन को घेर लिया आलोक कुमार ने अपहरणकर्ता पर रिवाल्वर से वार किया तो उसने अपनी रिवाल्वर आलोक कुमार के हवाले कर दी।
अपहरणकर्ता को पकड़ कर कनाट प्लेस थाने लाया गया। अपहरणकर्ता का नाम दिनेश ठाकुर था उससे दशमलव 38 बोर की रिवाल्वर बरामद हुई। मूलतः उत्तर प्रदेश के बंगूसार गांव का निवासी दिनेश ठाकुर 1989 से ही जबरन वसूली और अपहरण की वारदात में सक्रिय था।
दिनेश ठाकुर से पूछताछ के बाद सफदरजंग इलाके में निर्माणधीन इमारत पर छापा मारकर वहां से व्यापारी को मुक्त कराया गया। व्यापारी को नशा देकर लोहे की चेन से बांध कर रखा गया था।
व्यापारी पर निगरानी कर रहे दिनेश के साथी सतीश और चौकीदार जगन्नाथ पांडे  को भी गिरफ्तार किया गया। सतीश उत्तर प्रदेश के एक आईएएस अफसर रोशन लाल का बेटा है।
डीआरआई अफसर बन कर व्यापारी से मिला-
खारी बावली में मेवा के व्यापारी प्रमोद से दिनेश ठाकुर राजस्व गुप्तचर निदेशालय का अफसर बन कर मिला। दिनेश ने प्रमोद से कहा कि मुंबई में पकड़े गए कुछ लोगों ने उसका नाम लिया है। प्रमोद के यहां पहले भी छापा पड़ चुका था। उसके खिलाफ फेरा कानून के तहत मामला चल रहा था।  दोबारा छापा न पड़ जाए इस डर से दिनेश ठाकुर के बुलावे पर वोल्गा रेस्तरां चला गया था। दिनेश और सतीश ने वहां से उसे वैन में बिठाया और नशा मिला दूध पिला कर अपहरण कर लिया।
व्यापारी का हवाला का धंधा-- 
दिनेश ठाकुर ने पुलिस को बताया मोहन सिंह प्लेस में यूरो ट्रैवल्स के मालिक पुष्पेंद्र गुलाटी उर्फ पिंकी ने उसे जानकारी दी थी कि प्रमोद हवाला का धंधा करता है। उसके अपहरण से पचास लाख रुपए तक मिल सकते हैं। पुष्पेंद्र गुलाटी को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस की इज्जत बच गई- 
इस घटना को याद करते हुए आईपीएस आलोक कुमार कहते हैं उस दिन तो भगवान ने इज्जत बचा ली।  उस समय तो लगा था आज तो पुलिस पर बहुत भारी धब्बा लग जाएगा। सब कहेंगे कि  पुलिस अपहृत व्यापारी को तो छुड़ा नहीं पाई उल्टा पुलिस की आंखों के सामने अपहरणकर्ता उसके परिजनों को भी ले गया।
पुलिस की योजना के अनुसार फिरौती की रकम के लिए नोटों के बंडल ऐसे बनाए गए थे जिसमें ऊपर नीचे ही असली नोट थे। इसलिए यह भी डर था कि अगर अपहरणकर्ता वह नोट देख लेगा तो वह परिजनों को भी नुकसान पहुंचा सकता था।
आलोक कुमार दिनेश ठाकुर के पकड़े जाने के लिए उस बुजुर्ग हवलदार राजकुमार को श्रेय देते हैं जिसने वायरलैस मैसेज सुन कर बैरीकेड लगा कर चेकिंग शुरू कर दी थी। इसी वजह से वह दिनेश ठाकुर को पकड़ने में सफ़ल हो पाए।
अपराधी ने सिखाया पुलिस को सबक-- 
आलोक कुमार ने बताया कि इस घटना से पुलिस को काफी सीखने को मिला। पुलिस ने आगे इस तरह के मामले में पुलिस टीम इस तरह से तैनात करनी शुरू कर दी ताकि अपहरणकर्ता किसी तरह बचने न पाए।
एसीपी आलोक कुमार के साथ एसएचओ वी के मल्होत्रा, इंस्पेक्टर एस के गिरि और सब-इंस्पेक्टर हरचरण वर्मा भी थे। अपहरणकर्ता ने व्यापारी के घर में फोन किया तो उसकी आवाज को सुनकर एस के गिरि ने बताया था कि अपहरणकर्ता दिनेश ठाकुर हो सकता हैं।
दिनेश ठाकुर ने  बहाने से व्यापारी को बुलाया और अपहरण कर लिया था अपहरणकर्ता ने फिरौती की रकम लेने के लिए पहले कमल सिनेमा के पास बुलाया था इसके बाद उसने तीन अलग-अलग जगहों पर बुलाया। आखिर में कनाट प्लेस में नरुला रेस्तरां पर बुलाया।
व्यापारी का भाई वैन चालक बन गया था और रकम लेकर व्यापारी की पत्नी बैठी थी।
एसीपी आलोक कुमार का अपहरण के मामले की तफ्तीश का यह पहला मौका था।
इसके बाद उन्होंने अपहरण के एक अन्य मामले में कनाट प्लेस से ही अपहृत किए गए बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी को भी अपहरणकर्ता के चंगुल से  मुक्त कराया था।
आलोक कुमार IPS का शानदार इतिहास -- 
अपराध शाखा के संयुक्त पुलिस आयुक्त के पद पर रहते हुए भी  अपहरण के दो सनसनीखेज मामले आलोक कुमार के नेतृत्व में सुलझाए गए। 1-1-2018 को बिजनेसमैन के बेटे का वसंत कुंज से अपहरण कर लिया गया था। अपहरणकर्ताओं को गिरफ्तार कर युवक को मुक्त कराया गया। 
25-1-2018 को पूर्वी दिल्ली के शाहदरा इलाके में स्कूल बस के चालक को गोली मारकर कर एक बच्चे के अपहरण से सनसनी फ़ैल गई थी। अपराध शाखा की टीम ने साहिबाबाद के एक फ्लैट में छापा मारा कर बच्चे को मुक्त कराया। इस दौरान एक अपहरणकर्ता पुलिस की गोलीबारी में मारा गया।
साल 2018 में अपराध शाखा के संयुक्त पुलिस आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हुए आलोक कुमार के खाते में अनेक महत्वपूर्ण मामले सुलझाने का श्रेय हैं।
अपराध शाखा के तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह , अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त आलोक कुमार के नेतृत्व में ही दिल्ली में 1996-1997 में हुए सिलसिलेवार 42 बम धमाकों में शामिल आतंकवादियो को पकड़ा गया ।
स्पेशल सेल के तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त कर्नल सिंह और डीसीपी आलोक कुमार के नेतृत्व में ही 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सिलसिलेवार 5 बम धमाकों में शामिल आतंकवादियों को खोज निकाला गया। इन आतंकवादियों के साथ 19 सितंबर 2008 को बटला हाउस में एनकाउंटर हुआ जिसमें दो आतंकवादी मारे गए। इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए।
तंदूर कांड--
 युवा कांग्रेस नेता सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की हत्या कर उसके शव को बगिया रेस्तरां में जलाने की कोशिश की थी। इस मामले की तफ्तीश में भी आलोक कुमार की अहम भूमिका थी।
31 जुलाई 95 को दिल्ली के अशोक विहार इलाके में  दिनेश ठाकुर उत्तर पश्चिम जिला के तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह की टीम के इंस्पेक्टर रविशंकर आदि की टीम के हाथों कथित एनकाउंटर में मारा गया।
दिल्ली पुलिस में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे 1984 बैच के आईपीएस धर्मेंद्र कुमार 2018 में रेलवे पुलिस फोर्स के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हो गए।

(लेखक इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1990 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।)





धर्मेंद्र कुमार IPS





दैनिक बन्दे मातरम 11-9-2019



Friday, 6 September 2019

कमिश्नर निखिल कुमार ने माफी तक नहीं मांगी, कनाट प्लेस फर्जी एनकाउंटर, 2 बिजनेसमैन की हत्या, ACP सत्यवीर राठी टीम समेत उम्रकैद।


            तत्कालीन पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार
                      पूर्व एसीपी सत्यवीर सिंह राठी

माफ़ी मांगना कब सीखेंगी पुलिस।

दिल्ली पुलिस का काला दिन 31 मार्च 1997

दिल्ली पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार ने मृतकों के परिजनों से माफ़ी तक नहीं मांगी।


इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस के एसीपी सत्यवीर सिंह राठी की टीम द्वारा कनाट प्लेस में दिनदहाड़े बदमाश के धोखे में दो व्यवसायियों प्रदीप गोयल और जगजीत सिंह की अंधाधुंध गोलियां मार कर हत्या कर दी गई। इनका साथी तरुण घायल हो गया।
पुलिस ने इनको न केवल अपराधी बताया बल्कि इनके खिलाफ केस दर्ज कर दिया था। इनसे पिस्तौल भी बरामद दिखा दी।जबकि ये तीनों बेकसूर थे।

पुलिस की पोल तुरंत ही खुल गई तो हड़कंप मच गया।
नई दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त के कार्यालय में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में तत्कालीन पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार ने मुस्कराते हुए कहा  कि यह घटना "पहचानने में गलती" के कारण हो गई। पुलिस टीम बदमाश यासीन को पकड़ने गई थी।

पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार की भूमिका--

इस पत्रकार ने पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार से पूछा कि बेकसूर लोगों की हत्या करने वाली पुलिस टीम के खिलाफ आप क्या कार्रवाई कर रहे हैं ? यह भी कहा कि आप पुलिस वालों के खिलाफ एक्शन लेकर मीडिया को बता दें। जिससे लोगों को बेकसूर व्यवसायियों की हत्या की इस खबर के साथ यह भी पता चल जाए कि दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई हैं।

लेकिन निखिल कुमार शायद इस मामले की गंभीरता/ संवेदनशीलता और इसके परिणामों को समझ नहीं पाए या अपने राजनैतिक परिवार के रुतबे के कारण निश्चिंत थे। इसलिए उन्होंने उस समय कोई कार्रवाई नहीं की।

निखिल कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस के बाद वहां से जाते हुए कहा कि कल मिलते हैं मेरे मुंह से अचानक ही निकल गया कल आप मिलोगे ? (मतलब पद पर)।
वहीं हुआ अगले दिन निखिल कुमार को पुलिस आयुक्त के पद से हटा दिया गया।

बहुत बेआबरु होकर तेरे कूचे से हम निकले-

पुलिस कमिश्नर के पद से तबादला या सेवानिवृत्त होने वाले  अफसर को समारोह पूर्वक विदाई दी जाती हैं। उस अफसर की कार को फूलों वाली रस्सी से वरिष्ठ अफसरों द्वारा खींचा जाता हैं। लेकिन निखिल कुमार के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। निखिल कुमार ख़ुद अपनी कार चला कर पुलिस मुख्यालय से विदा हुए।

उप-राज्यपाल ने पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया--

उप-राज्यपाल ने बेकसूरों की हत्या के मामले में एसीपी सत्यवीर सिंह राठी, इंस्पेक्टर अनिल समेत दस पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया और निलंबित कर दिया। इस मामले की तफ्तीश सीबीआई को सौंपी गई।

पुलिस कमिश्नर ने माफ़ी तक नहीं मांगी--

जबकि यह कार्रवाई तो निखिल कुमार को पहले ही दिन करनी चाहिए थी। पुलिस का मुखिया होने के नाते उन्होंने मृतकों के परिजनों से माफ़ी तक नहीं मांगी।

सामान्यत मातहत  पुलिस वालों की कोई गंभीर गलती पता चलते ही वरिष्ठ पुलिस अफसरों द्वारा उन्हें तुरंत निलंबित कर जांच शुरू करने की कार्रवाई की जाती हैं।
लेकिन पुलिस कमिश्नर निखिल कुमार ने तो दो व्यवसायियों की हत्या जैसे गंभीर अपराध को  करने वाली पुलिस टीम के खिलाफ यह सामान्य और स्वभाविक कार्रवाई/ प्रक्रिया  भी उसी समय नहीं की।

फर्जी एनकाउंटर मामले में उत्तराखंड की पहली महिला पुलिस महानिदेशक ने माफ़ी मांग कर बनाई इंसानियत की मिसाल --

ऋषिकेश में एक बेकसूर महिला की पुलिस ने गोलियां मार कर हत्या कर दी और उसे आतंकवादी बता दिया था।
 उस समय उत्तराखंड की पहली महिला पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने सच पता लगाया। पुलिस वालों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कराया और उनको जेल भेजा। इसके बाद कंचन चौधरी भट्टाचार्य मृतक महिला के घर गई और उसके परिजनों से पुलिस महकमे की ओर से माफ़ी मांगी। 

उम्रकैद--
अदालत ने हत्या, हत्या की  कोशिश, सबूत नष्ट करने और झूठे सबूत बनाने के आरोप में पूर्व एसीपी सत्यवीर सिंह राठी, इंस्पेक्टर अनिल कुमार, सब-इंस्पेक्टर अशोक राणा, हवलदार शिव कुमार, तेज़ पाल, महावीर सिंह सिपाही सुमेर सिंह, सुभाष चन्द्र,सुनील कुमार और कोठारी राम को उम्रकैद की सज़ा सुनाई।
 
अपडेट- अक्टूबर 2020 में पूर्व एसपीपी सत्यवीर सिंह राठी समेत सभी 10 पूर्व पुलिस कर्मियों को जेल से रिहा कर दिया गया। सेन्टेेंस रिव्यू बोर्ड (एसआरबी) की सिफारिश पर इन को जेल से छोड़ा गया है। इन सभी को 2007 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।


राठी पर फर्जी एनकाउंटर का आरोप पहले भी लगा।---

26-11-1992 को कुख्यात बदमाश सतबीर गूजर पश्चिम जिला के तत्कालीन डीसीपी धर्मेंद्र कुमार के मातहत इंस्पेक्टर सत्यवीर राठी की टीम के हाथों कथित एनकाउंटर में  मारा गया।
सतबीर गूजर के परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसकी हत्या करके मुठभेड़ दिखा दी है।
तिलक नगर के तत्कालीन एस एच ओ सत्यवीर राठी को इस मामले में बारी से पहले तरक्की देकर एसीपी बना दिया गया।

यासीन पकड़ा गया--
अपराध शाखा के तत्कालीन एसीपी अजय कुमार की टीम ने 4-4-1997 को दरिया गंज में मोती महल रेस्तरां के बाहर से यासिन को गिरफ्तार कर लिया। जिस यासीन को बहुत ख़तरनाक बताया गया था उसे पुलिस ने बिना किसी ख़ून ख़राबे के पकड़ लिया। 




10-4-1997


सतबीर गूजर





Thursday, 5 September 2019

ACP राजबीर सिंह अंत तक विवादों में, IPS अफसरों और मीडिया का बनाया " Super Cop" "एनकाउंटर स्पेशलिस्ट"


ACP राजबीर सिंह यादव अंत तक विवादों में ,
IPS अफसरों और मीडिया का " Super Cop"

राजबीर सिंह की पैसों के चक्कर में उसके ही दोस्त प्रापर्टी डीलर विजय भारद्वाज ने 24 मार्च 2008 को गुरुगांव में गोली मार कर हत्या कर दी। राजबीर ने अपनी वसूली की कमाई के करीब एक करोड़ रुपए निवेश के लिए विजय को दिए हुए थे। विजय ने जिस रिवाल्वर से हत्या की वह भी राजबीर ने ही उसे दी थी।

सब-इंस्पेक्टर के रुप में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए राजबीर सिंह यादव शुरू से ही विवादों में घिरे रहे। 
मौत भी बदनामी वाली होने के कारण राजबीर के अंतिम संस्कार में वह आईपीएस अफसर तक भी नहीं गए, जिनकी आंखों का वह तारा होता था। 
जबकि यह आईपीएस अफसर अगर अपने स्वार्थ को छोड़कर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करते और  राजबीर सिंह पर शुरू से ही अंकुश लगाते तो शायद राजबीर का अंजाम ऐसा नहीं होता। 
राजबीर सिंह के ऐसे अंजाम के लिए और उसे निरंकुश बनाने के लिए उसके बॉस रहे ऐसे आईपीएस अफसर भी जिम्मेदार है। 
राजबीर सिंह की मौत से  पुलिस वालों को सबक लेना चाहिए।
पुलिस वालों को अपना आचरण, चरित्र, व्यवहार, दिमाग और संगत बिल्कुल सही रखना चाहिए।












                                2-4-2002

                                21-1-2003