Tuesday, 14 April 2020

कमिश्नर निरंकुश पुलिस पर अंकुश लगाओ, महामारी के दौर में तो पुलिसवालों इंसानियत दिखा दो।


कमिश्नर निरंकुश पुलिस पर अंकुश लगाओ,
कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव बताएं कि कौन से कानून के तहत पुलिस बेकसूर लोगों को डंडे मार रही है।
महामारी के दौर में तो पुलिसवालों इंसानियत दिखा दो।
  
इंद्र वशिष्ठ
वकीलों से पिटने वाली पुलिस महामारी के भयंकर संकट के दौर में भी आम लोगों पर डंडे चला कर अपनी बहादुरी दिखाने में लगी हुई है।
इस दौर में भी पुलिस का पारंपरिक संवेदनहीन चरित्र और चेहरा दिखाई दे रहा है। 

खुद के पिटने पर रोने वाली पुलिस लोगों को पीट कर खुश-
यह वही पुलिस है जिसकी डीसीपी मोनिका भारद्वाज द्वारा वकीलों के आगे डर कर हाथ  जोड़ने और जमात सहित दुम दबाकर कर भागने की वीडियो पूरी दुनिया ने देखी। यह वही दिल्ली पुलिस है जिसे वकीलों ने पीटा तो अनुशासन भूल कर अपने परिवारजनों  के साथ पुलिस मुख्यालय पर अपना दुखड़ा रोने जमा हो गई थी।

उस समय आम आदमी पुलिस के पिटने पर खुश हुआ था उसकी मुख्य वजह यह है कि आम आदमी पुलिस के दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, अत्याचार और अकारण लोगों को पीटने से त्रस्त हैं। इसलिए वकीलों ने पीटा तो आम आदमी ने कहा कि पुलिस के साथ ठीक हुआ।
वकीलों के खिलाफ तो डीसीपी मोनिका भारद्वाज ने अपने साथ हुई बदसलूकी की खुद एफआईआर तक दर्ज कराने की हिम्मत नहीं दिखाई।
हिंसा, आगजनी और पुलिस अफसरों तक को बुरी तरह पीटने  वाले वकीलों पर तो इस कथित बहादुर पुलिस ने आत्म रक्षा में भी पलट कर वार नहीं किया। उस समय जिस पुलिस के हाथों में लकवा मार गया था वहीं पुलिस अब आम कमजोर आदमी पर खुल कर हाथ छोड़ रही है।
आम आदमी को पीटने वाली बहादुर पुलिस-
माना कि जीवन रक्षा के लिए लॉक डाउन और सामाजिक दूरी का पालन कराना सबसे पहली
प्राथमिकता है। लेकिन इसके लिए निहत्थे कमजोर बेकसूरों  को डंडे मारना न केवल गैरकानूनी है बल्कि अमानवीय भी है। कानून और संविधान तो किसी अपराधी तक को डंडे मारने की इजाजत नहीं देता है। 
पुलिस तो उन लोगों तक को डंडे मार रही है जो बहुत ही जरूरी काम या जीवन के लिए जरूरी चीजें दूध, सब्जी आदि सामान लेने के लिए मजबूरी में ही बाहर निकल रहे हैं। यही नहीं पुलिस दूध, सब्जी बेचने वालों तक पर जमकर अत्याचार कर रही है।
पुलिस तो उन गरीब लोगों तक को डंडे मार रही है जो सरकार द्वारा दिए जा रहे भोजन को लेने जाते हैं।
प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि गरीब रोज़ कमाते हैं और रोज़ की कमाई से अपनी जरुरतें पूरी करते हैं। लेकिन पुलिस उस गरीब पर ही अत्याचार कर रही है।

केशव पुरम थाना पुलिस की बहादुरी-
उत्तर पश्चिम जिला के  केशव पुरम थाना के इलाके में त्री नगर वर्धमान वाटिका के बाहर छोटी सी सब्जी मंडी लगती है। पुलिस ने 13 अप्रैल को यहां सब्जी बेचने वालों को बैठने ही नहीं दिया। सब्जी वालों के साथ न केवल बदतमीजी की, पिटाई की उनकी सब्जी आदि तक फेंक दी गई।

चांदनी महल पुलिस ने दूध वाले को पीटा-
चांदनी महल इलाके का भी मामला सामने आया है जिसमें दूध बेचने वाले दुकानदार को पुलिस ने बुरी तरह पीटा। जिसके विरोध में दुकानदारों ने पुलिस अफसरों को शिकायत भी की है।
दिल्ली पुलिस सोशल मीडिया पर न केवल सक्रिय हैं बल्कि उस पर नजर भी रख रही हैं। इसलिए यह तो पक्का है कि पुलिस द्वारा ज्यादती किए जाने के जो वीडियो मीडिया या सोशल मीडिया में वायरल हुए उनकी जानकारी भी अफसरों को होगी ही। इसके बावजूद भी पुलिस के अत्याचार जारी।

कौन-सा कानून बेकसूर को पीटने की इजाजत देता है ?

पुलिस कमिश्नर एस एन श्रीवास्तव ने 25 मार्च को पुलिस को दिए संदेश में कहा कि पुलिस चेकिंग के दौरान दुर्व्यवहार न करें संयम से काम करें।

लेकिन दूसरी ओर सच्चाई यह भी है कि पुलिस कमिश्नर एस एन श्रीवास्तव को भी ऐसे वीडियो भेजे गए हैं लेकिन पुलिस कमिश्नर द्वारा कार्रवाई करना तो दूर कोई जवाब तक नहीं दिया जाता है।
क्या पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव बता सकते हैं कि किस कानून या संविधान ने पुलिस को यह अपराध करने की इजाजत दी है कि जीवन के लिए आवश्यक सामान लेने/ देने वाले निहत्थे , शांति से जा रहे बेकसूरों को बिना वजह पुलिस डंडे मार सकती है।
कमिश्नर या तो वह कानून की वह धारा बताए नहीं तो यह माना जाएगा कि  पुलिस द्वारा यह  अपराध और  अमानवीय व्यवहार कमिश्नर की सहमति और आदेश से किया जा रहा है।

कमिश्नर की भूमिका पर सवालिया निशान -
कमिश्नर की जानकारी मे पुलिस के अत्याचार का मामला लाए जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती है
शाहदरा पुलिस की करतूत-
इसका अंदाजा इस मामले से लगाया जा सकता है शाहदरा में बाबू राम स्कूल के बाहर मोटरसाइकिल पर दूध के डिब्बों के साथ जा रहे युवक को पुलिसवाले  ने रोका और उस पर डंडे बरसाने शुरू कर दिए। जबकि दूध सप्लाई आवश्यक सेवाओं में शामिल है। 
इस मामले का वीडियो तुषार सचदेव ने पुलिस कमिश्नर को टि्वटर पर  31 मार्च को भेजा। लेकिन कमिश्नर ने उसका कोई जवाब नहीं दिया। 
तुषार ने दो अप्रैल को कमिश्नर को फिर टि्वट कर पूछा कि इस मामले में क्या कार्रवाई की गई लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं दिया गया।
यह तो सिर्फ उदाहरण है सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक वीडियो वायरल हुए जिसमें पुलिस लोगों से बिना यह जाने की वह किस मजबूरी में घर से बाहर निकले है बस डंडे बरसाने लग जाती।

पुलिस अफसरों को क्या इतनी मामूली-सी बात भी समझ नहीं आती कि महामारी के दौर में सबको अपनी जान प्यारी है ऐसे में सिर्फ वही लोग बाहर निकल रहे हैं जिनको जीवन के लिए आवश्यक सामान आदि लेने जाना है।

जाहिल ही नहीं मानसिक रोगी हैं ये-
हां यह बात भी सही है कि कुछ जाहिल लोग जिनमें युवा भी शामिल है। उन जाहिलों को इस बीमारी की गंभीरता का अंदाजा नहीं है या जानबूझकर खतरा मोल ले तफरीह के लिए निकल पड़ते हैं। इन लोगों को तो जाहिल ही नहीं मानसिक रोगी समझना चाहिए जिन्हें न अपनी और न ही दूसरों की जान की परवाह है। लेकिन ऐसे लोगों को भी पीटना नहीं चाहिए। समझा कर वापस भेज देना चाहिए, समझाने पर भी न माने तो कानूनी कार्रवाई की जाए।

IPS खाकी को ख़ाक मत मिलाओ-
यह पुलिस आम आदमी पर ही डंडे बरसा कर बहादुरी दिखा सकती। वरना इस पुलिस के आईपीएस कितने बहादुर है यह सारी दुनिया ने उस वीडियो में देखा है जब भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर को गिरेबान से पकड़ा और एडिशनल डीसीपी राजेंद्र प्रसाद मीणा को खुलेआम धमकी दी। तब पुलिस कमिश्नर और इन आईपीएस अधिकारियों की हिम्मत मनोज तिवारी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज करने की नहीं हुई।

पुलिस की पेशेवर काबिलियत का पता तब चलता है जब वह सब्जी बेचने वालों, अन्य दुकानों और खरीदने वालों के बीच सामाजिक दूरी बनाए रखने की सही व्यवस्था करे। सब्जी बेचने वालों को भगा देना तो पेशेवर काबिलियत पर सवालिया निशान लगाते हैं। इससे तो यही पता चलता है कि पुलिस व्यवस्था करने में नाकाम हो गई है।

IPS  क्या जाने लोगों की मुश्किलें-
हालांकि ज्यादातर आईपीएस सामान्य परिवारों से ही आते है। लेकिन आईपीएस बनने के बाद भी आम आदमी के दुःख दर्द को समझने वाले  संवेदनशील अफसर कम ही होते हैं। ज्यादातर पर तो वर्दी की  ताकत का नशा सिर चढ़कर बोलता है।
आईपीएस अफसरों को तो सब्जी आदि खरीदने खुद जाना नहीं पड़ता। उनके पास तो अपने निजी काम के लिए अपने मातहतों की फौज हैं जिसका इस्तेमाल वह अपने गुलामों की तरह हमेशा से करते ही रहे हैं।
इसलिए आम आदमी को क्या मुश्किलें आ रही है यह वह क्या जाने और इसकी उनको परवाह भी नहीं है।

लोगों और संस्थाओं की मदद से मिले सामान को जरुरतमंदों तक बांट कर और उसका प्रचार कर पुलिस अपनी छवि अच्छी बनाने की कोशिश कर रही है लेकिन जब तक पुलिस का आम आदमी के साथ व्यवहार अच्छा नहीं होगा पुलिस की छवि ख़राब ही रहेगी।

जागो IPS जागो -
किसी के भी पिटने पर किसी को ख़ुश नहीं होना चाहिए लेकिन वकीलों ने पुलिस को पीटा तो लोग खुश हुए। आईपीएस अफसरों को इस पर चिंतन कर पुलिस का व्यवहार सुधारने की कोशिश करनी चाहिए। वरना ऐसी आशंका है कि एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि पुलिस के अत्याचार से परेशान हो कर आम आदमी भी डंडे बरसाने वाली पुलिस पर आत्म रक्षा में पलटवार करने लगेगा। इस सबके लिए सिर्फ और सिर्फ आईपीएस अफसर ही जिम्मेदार होंगे।
पुलिस को अपनी बहादुरी और मर्दानगी दिखाने की हिम्मत और शौक है तो अपराध करने, कानून तोड़ने वाले नेताओं, रईसों और गुंडों पर  दिखाएं।
गुंडों, शराब माफिया तक से पिटने वाली पुलिस द्वारा
वर्दी के नशे में आम शरीफ़ आदमी पर अत्याचार करना बहादुरी नहीं होती।









Sunday, 12 April 2020

तब्लीगी जमात के पाप गिनवाने से पुलिस के पाप कम नहीं हो जाते। कमिश्नर और IPS की भूमिका पर सवालिया निशान


तब्लीगी जमात के पाप गिनवाने से पुलिस के पाप कम नहीं हो जाते।
कमिश्नर और IPS की भूमिका पर सवालिया निशान।
NSA का आना कमिश्नर की नाकामी।
मरकज में हजारों जुटते रहे पुलिस सोती रही। 

इंद्र वशिष्ठ
तब्लीगी जमात और मरकज को कोरोना फैला कर देश को मरघट तक बनाने का दोषी ठहराया जा रहा है लेकिन सिर्फ मरकज को दोषी करार देकर पुलिस और केंद्र/ दिल्ली की सरकारों की नाकामी पर पर्दा डालना भी सही नहीं हैं। मरकज के मुखिया मौलाना साद का यह जघन्य अपराध किसी भी तरह से माफ़ी के काबिल नहीं हैं। इस मौलाना ने न केवल अपने तब्लीगी जमात के भाइयों और अपनी क़ौम की जान को ख़तरे में डाला बल्कि पूरे देश के लोगों की जान से खिलवाड़ किया है। इस कथित मौलाना के आपराधिक जाहिलपन के कारण मुस्लिमों को देश भर में दुश्मन की तरह देखा जा रहा है और इस क़ौम को ही महामारी फैलाने का जिम्मेदार माना जा रहा है।
लेकिन पुलिस ने अगर समय पर कार्रवाई की होती तो कोरोना संकट का रुप इतना भयावह न हो पाता और न ही इतना हड़कंप मचा हुआ होता।

मरकज में धार्मिक आयोजन में शामिल हो कर अडंमान लौटे  6 जमातियों के कोरोनाग्रस्त पाए जाने का मामला 25 मार्च को उजागर हो गया था। इसके बावजूद सरकार और पुलिस ने घोर लापरवाही बरती।

दिल्ली पुलिस कमिश्नर और IPS जिम्मेदार-

निजामुद्दीन मरकज मामले में तब्लीगी जमात तो दोषी है ही लेकिन सिर्फ जमात को दोष देने से पुलिस का दोष खत्म नहीं हो जाता।
निजामुद्दीन थाने के एसएचओ  द्वारा रिकॉर्ड किए गए वायरल वीडियो से भी यह साफ़ हो जाता है कि दिल्ली पुलिस ने इस मामले में जबरदस्त लापरवाही बरती है।

वीडियो में एस एच ओ मुकेश वालिया खुद यह बात कहता है कि मरकज की गतिविधियों के बारे में  इंटेलिजेंस  और बड़े अफसरों को जानकारी है। तो ऐसे में अफसर भी जिम्मेदार हैं।
एस एच ओ मुकेश वालिया 24 मार्च को मरकज वालों को मरकज  खाली करने का नोटिस देता है। जबकि मरकज के लोग एस एच ओ से साफ़ कहते हैं  कि लॉक डाउन के कारण हम इतने लोगों को कैसे यानी किस तरह निकाले  , गाड़ियों के पास के लिए एसडीएम से संपर्क किया है।
 एस एच ओ उनसे एस डी एम से बात करने को कहता हैं। मरकज वाले एस एच ओ से एस डी एम का नंबर मांगते तो एस एच ओ नाराज़ हो कर कहता है कि क्या आपको एस डी एम का नंबर भी नहीं मालूम है। फिर अचानक शायद एस एच ओ को याद आया होगा कि रिकार्डिंग हो रही है तो वह कहता हैं कि एस डी एम का नंबर देता हूं।

मरकज वालों को नोटिस थमा कर पुलिस द्वारा सिर्फ खानापूर्ति की गई लगती है।
मरकज वालों ने नोटिस के बाद भी मरकज से लोगों को नहीं हटाया था तो पुलिस को खुद ही उनको वहां से हटाने का इंतजाम करना चाहिए था जैसा कि नोटिस दिए जाने के कई दिनों बाद 30 मार्च को भी तो किया गया। 

इस वीडियो में एस एच ओ का हड़का कर बात करने का लहजा ऐसा है जैसे कि वह किसी संस्था के नुमाइंदों से नहीं बल्कि अपने ग़ुलाम सिपाहियों से बात कर रहा है।  
सच्चाई यह है कि ज्यादातर एस एच ओ आम आदमी से सीधे मुंह बात तक नहीं करते हैं। इस वीडियो से तो यही लगता है कि एस एच ओ ने इस लहज़े में यह सिर्फ इसलिए रिकॉर्ड किया ताकि अपने अफसरों को दिखाया जा सके कि उसने कितनी सख्ती से मरकज वालों को मरकज खाली करने को कहा है। 

 सच्चाई यह है पुलिस के आला अफसर और  एसएचओ में अगर वाकई पेशेवर काबिलियत होती और कोरोना की गंभीरता को समझते तो मरकज में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

मरकज में हजारों लोगों की उपस्थिति के लिए पुलिस अफसर जिम्मेदार हैं। एक तो पुलिस ने उनको हजारों की संख्या में मरकज में जमा होने दिया, दूसरा इनको वहां से तुरंत निकालने की कार्रवाई/व्यवस्था नहीं की। मौलाना और उसके 6 साथियों के खिलाफ एफआईआर भी 31 मार्च को दर्ज की है।

मरकज में हजारों जमाती जुटते रहे पुलिस सोती रही-

थाने से सटे हुए मरकज में जो हुआ उसके लिए सबसे पहले तो एस एच ओ ही जिम्मेदार है। 
आला अफसरों को तो सबसे पहले इस एस एच ओ मुकेश वालिया के खिलाफ ही कार्रवाई करनी चाहिए थी जिसने अगर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन किया होता तो कानून का उल्लघंन करने वाले हजारों लोग मरकज में जमा ही नहीं हो सकते थे।
इससे आईपीएस अफसरों की पेशेवर काबिलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है।

दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के बाद तक भी पुलिस ने धारा 144 पूरी दिल्ली में लगाईं हुई थी।
कोरोना के मामले सामने आने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 13 मार्च को आदेश जारी कर 200 से ज्यादा लोगों के जमा होने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया। अरविंद केजरीवाल ने 16 मार्च को दूसरा आदेश जारी कर 50 से ज्यादा लोगों के इकठ्ठा होने पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया।
इसके बावजूद मरकज में हजारों लोगों का जमावड़ा पुलिस की जबरदस्त लापरवाही और निक्कमापन ही दिखाता है।

प्रधानमंत्री ने 22 मार्च को एक दिन के जनता कर्फ्यू का ऐलान किया। उसके बाद अरविंद केजरीवाल ने 31 मार्च तक दिल्ली में लॉक डाउन लागू किया।
इसके बाद प्रधानमंत्री ने 25 मार्च से 21 दिन के लॉक डाउन की घोषणा की।

पुलिस ने धारा 144 और दिल्ली सरकार के लोगों के जमा होने पर रोक के दोनों आदेश का जमकर उल्लंघन होने दिया और मरकज वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की। 

लॉक डाउन लागू होने के बाद भी पुलिस ने मरकज को तुरंत ख़ाली कराने की कार्रवाई नहीं की। पुलिस महामारी के भयंकर संकट के दौर में भी सिर्फ मरकज वालों को नोटिस थमा कर चेतावनी देकर अपनी खानापूर्ति करती रही।

पुलिस भी गुनाहगार-
मरकज का मुखिया मौलाना साद अगर कानून का पालन नहीं कर रहा था तो पुलिस को उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से कौन रोक रहा था? लेकिन पुलिस ने मौलाना के खिलाफ उसी समय एफआईआर तक दर्ज नहीं की।
पुलिस ने तो मौलाना साद के खिलाफ एफआईआर भी उप राज्यपाल के आदेश के बाद दर्ज की है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने उपराज्यपाल से एफआईआर दर्ज कराने के लिए कहा था।

मौलाना तो दोषी है ही लेकिन पुलिस का भी दोष कम नहीं है बल्कि पुलिस का दोष इस मायने में ज्यादा है क्योंकि पुलिस का कर्तव्य है लोगों की जान की सुरक्षा करना और लोगों की जान को ख़तरे में डालने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना।
पुलिस अपने यह दोनों ही कर्तव्य का पालन करने में बुरी तरह नाकाम रही है।

लॉक डाउन लागू होने के बाद मरकज वाले चाह कर भी खुद बिना पुलिस और सरकार की मदद और व्यवस्था के मरकज से बाहर नहीं निकल सकते थे।  पुलिस और सरकार ने मरकज को खाली कराने में बहुत देर कर दी जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
NSA का आना , पुलिस कमिश्नर की नाकामी?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल द्वारा 28-29 मार्च को आधी रात को मरकज के मौलाना से मिलना। इसके बाद मरकज से लोगों को निकालना शुरू करना।
इससे पता चलता है कि क्या दिल्ली पुलिस कमिश्नर एस एन श्रीवास्तव और वरिष्ठ आईपीएस अफसर इस मामले से निपटने में असफल/ नाकाम हो गए थे?
क्या पुलिस कमिश्नर और वरिष्ठ आईपीएस अफसर मरकज जैसे मामले को अपने स्तर पर सुलझाने के काबिल नहीं हैं ?
अगर ऐसा है तो यह बहुत ही चिंताजनक बात है इस मामले ने आईपीएस अधिकारियों की पेशेवर काबिलियत पर सवालिया निशान लगा दिया है।

मरकज के  मुखिया का एफआईआर दर्ज होने के बाद फरार हो जाना भी पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हैं।
दिल्ली में दंगों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल  दंगा ग्रस्त इलाकों में गए थे।
उस समय दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता तक ने  कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को अगर सड़कों पर उतरना पड़ा है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

अब ऐसे में मरकज के मामले में भी अजीत डोभाल के जाने से एक बार फिर पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारियों की नाकामी उजागर हुई है।

मरकज में 2361 जमाती- 
मरकज से सबसे पहले 29 मार्च को कोरोना के लक्षण वाले 34  लोगों को निकाल कर अस्पताल में भर्ती कराया। तीस मार्च से  एक अप्रैल तक मरकज में मौजूद सभी 2361 लोगों को निकाल कर क्वारटींन सेंटर में भेज दिया गया।



रोजनामा मेरा वतन 15-4-2020





Friday, 10 April 2020

CBI ढूंढ़ती रह गई, IPS ने भगा दिए Wanted अपराधी ? , IPS और रईसों की जाहिल जमात की करतूत

अमिताभ गुप्ता
कपिल वाधवान
CBI ढूंढ़ती रह गई, IPS की मदद से भाग कर छिपे Wanted अपराधी।
IPS और रईसों की जाहिल जमात की करतूत उजागर।

इंद्र वशिष्ठ
तब्लीगी जमात और मरकज आज-कल कोरोना फैलाने को लेकर खूब सुर्खियों में है। लेकिन जाहिलों की जमात किसी एक धर्म, समुदाय या राजनैतिक दलों तक ही सीमित नहीं है। जाहिल आईपीएस अफसर तो लॉक डाउन तोड़ने, अपराधियों को भागने/ छिपने तक में मदद करने का अपराध करने में पीछे नहीं है।
 इस मामले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश का भट्ठा बिठाने में नेताओं से भी ज्यादा कुछ ऐसे जाहिल नौकरशाहों और बड़े बड़े उद्योगपतियों की जमात  की अहम भूमिका है।

CBI ढूंढती रह गई, IPS ने भगा दिया।-

महाबलेश्वर में  लॉक डाउन/ सामाजिक दूरी के उल्लंघन  की सूचना पर पुलिस एक बंगले/ फॉर्म हाउस पर पहुंची। वहां पर कपिल वाधवान, धीरज वाधवान, उनके परिवार और नौकरों समेत  23 लोग पाए गए। यह लोग पांच कारों में खंडाला से आए थे।  
इन लोगों ने पुलिस को एक पत्र  दिखाया। जिसमें महाराष्ट्र सरकार के गृह विभाग के  प्रधान सचिव अमिताभ गुप्ता ने आदेश दिया था कि इन लोगों को खंडाला से महाबलेश्वर जाने दिया जाए।  अमिताभ गुप्ता ने पत्र में वाधवान  को अपना "पारिवारिक मित्र" बताया और महाबलेश्वर जाने का कारण "पारिवारिक इमरजेंसी" बताया।

पुलिस ने लॉक डाउन का उल्लघंन करने के आरोप में इन‌ सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और इन सब को सरकारी क्वारंटीन सेंटर में भेज दिया।

महामारी के समय पारिवारिक इमरजेंसी के नाम पर 23 लोगों को महाबलेश्वर जाने देने का आदेश/अनुमति देना अमिताभ गुप्ता की काबिलियत और भूमिका पर सवालिया निशान लगाते है।
इस मामले के मीडिया में उजागर होने के बाद महाराष्ट्र सरकार ने अमिताभ गुप्ता को छुट्टी पर भेज दिया। इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

IPS ने किया गुनाह -

मामला सिर्फ लॉक डाउन के उल्लंघन का ही नहीं है। आईपीएस अमिताभ गुप्ता ने तो ऐसा अपराध किया है जिसके लिए उनको जेल भेजा जाना चाहिए।
सीबीआई ने 7 मार्च 2020 को येस बैंक घोटाला मामले में एफआईआर दर्ज की थी
उसमें बैंक के पूर्व सीईओ राणा कपूर के साथ दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड के मालिक कपिल वाधवान और धीरज वाधवान भी आरोपी हैं राणा कपूर को ईडी द्वारा  गिरफ्तार किया जा चुका है।
 DHFL के  कपिल और धीरज को जांच के लिए सीबीआई ने नोटिस जारी किए थे लेकिन दोनों हाजिर नहीं हुए और अपने घरों पर भी नहीं मिले थे। 

ग़ैर ज़मानती वारंट-
सीबीआई ने 17 मार्च को इन भगोड़ों के खिलाफ कोर्ट से गैर जमानती वारंट जारी करवा लिए। इसके बावजूद यह दोनों पेश नहीं हुए। इन दोनों पर रिश्वत दे कर येस बैंक से करोड़ों-अरबों का लोन लेने के आरोप है

सीबीआई ने 9 अप्रैल को इनके सतारा में पंचगनी के सरकारी क्वारंटीन सेंटर में होने का पता चलने पर वहां के डीएम और एसपी को कहा है कि इनको पुलिस हिरासत में लिया जाए ताकि यह फरार न हो पाए। सीबीआई या कोर्ट के आदेश के बिना उनको रिहा न किया जाए। 

IPS इतना निकम्मा और जाहिल तो नहीं हो सकता ?-

गृह विभाग के विशेष प्रमुख सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात 1992 बैच के आईपीएस अफसर अमिताभ गुप्ता को इतना निकम्मा तो नहीं माना जा सकता कि कपिल और धीरज को सीबीआई तलाश कर रही थी और अमिताभ गुप्ता को यह बात मालूम नहीं होगी।
आईपीएस अमिताभ ने अपने पत्र में लिखा है कि वाधवन उनके पारिवारिक मित्र हैं। 
ऐसे में पारिवारिक मित्र को भी दोस्त की सच्चाई तो मालूम होती है।
आईपीएस अफसर और पारिवारिक मित्र दोनों ही नातों से यह बिल्कुल साफ पता चलता है कि अमिताभ गुप्ता को सच मालूम था। इसके बावजूद उन्होंने जानबूझ कर सीबीआई के वांटेड अपराधियों को फरार होने और छिपने में मदद करके संगीन और गंभीर अपराध किया है।
अमिताभ गुप्ता का पत्र




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Sunday, 29 March 2020

दिल्ली पुलिस पर हुए 700 हमले, निर्बल को पीटती-सबल से पिटती पुलिस। खाकी से बेख़ौफ़ हुए गुंडे-बदमाश।



दिल्ली में पुलिस कर्मियों पर हुए 700 हमले।

NIA में तीन सौ से ज्यादा पद खाली। 

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली में पुलिस वालों पर हमला करने के मामले दिनों-दिन बढ़ रहे हैं। गुंडे-बदमाश, शराब माफिया और ट्रैफिक नियमों को तोड़ने वाले ही नहीं कानून के ज्ञाता वकील तक पुलिस पर हमला कर देते हैं।

दूसरी ओर यह भी सच्चाई है कि आम आदमी से पुलिस सीधे मुंह बात तक नहीं करती और निर्बल को लाठी मार कर अपनी बहादुरी/ मर्दानगी दिखाती है।

पिछले सवा तीन सालों में दिल्ली पुलिसकर्मियों पर हमलों की 700 वारदात हुई हैं। हालांकि पुलिस ने हमला करने वाले करीब 14 सौ लोगों को गिरफ्तार भी किया है। संसद में इसी महीने यह जानकारी दी गई।

राज्य सभा में सांसद जुगल सिंह माथुरजी लोखंडवाला द्वारा पुलिसकर्मियों पर हमलों में वृद्धि पर पूछे  गए सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने बताया था कि साल 2017 में 230 , साल 2018 में 220, साल 2019 में 203 और इस साल 29 फरवरी 2020 तक दिल्ली पुलिस के कर्मियों पर हमलों के 47 मामले दर्ज़ किए गए हैं।  इस अवधि में क्रमशः 435, 451, 446 और 66 लोगों को हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

दिल्ली दंगें--
गृह राज्य मंत्री ने बताया कि दंगों में 52 लोगों की मौत हो गई और 545 लोग घायल हो गए। 100 पुलिस कर्मी घायल हुए हैं। 226 मकान और 487 दुकानों का नुक़सान हुआ है। 
12 मार्च 2020 तक 3304 लोगों को गिरफ्तार /हिरासत में किया गया।

NIA में सैंकड़ों पद खाली- 

राष्ट्रीय जांच एजेंसी( एनआईए ) में तीन सौ से ज्यादा पद खाली/ रिक्त हैं। एनआईए को 5 साल में जांच के लिए 229 मामले सौंपे गए हैं।
गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने कुमारी शैलजा द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में राज्यसभा में बताया कि स्वीकृत किए गए 1133 पदों में से, विभिन्न ग्रेडों के 328 पद रिक्त हैं। 
एनआईए की जनशक्ति संबंधी आवश्यकताओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और सीधी भर्ती, प्रतिनियुक्ति, अनुबंध आदि के माध्यम से रिक्तियों को भरने के समग्र प्रयास किए जाते हैं।
एनआईए ने 229 मामलों की जांच की-
गृह  राज्य मंत्री ने बताया कि पिछले पाँच वर्षों के दौरान केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी  को जांच के लिए 229 मामले सौंपे हैं। इनमें से 22 मामले निपटाए जा चुके हैं, 148 मामलों में अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिए गए और 59 मामलों में जांच जारी है।
एनआईए  में लंबित  मामले-
एनआईए  में लंबित मामलों की संख्‍या को कम करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जिनमें, एनआईए की विशेष अदालतों का गठन, दिन-प्रतिदिन के आधार पर एनआईए मामलों की सुनवाई, एनआईए मामलों के लिए विशेष लोक अभियोजकों और वरिष्‍ठ लोक अभियोजकों की नियुक्ति करना शामिल है।





Thursday, 26 March 2020

दिल्ली में अपराध की 3 लाख से ज्यादा FIR दर्ज़।संसद में उठा अपराध वृद्धि का मामला,FIR जरुर दर्ज़ कराएं।



दिल्ली में अपराध में वृद्धि, 3 लाख से ज्यादा FIR दर्ज़।
अपराध में बढ़ोतरी का मामला संसद में उठा।
FIR दर्ज़ कराने के लिए लोगों को अड़ना चाहिए।

इंद्र वशिष्ठ

देश की राजधानी में दिनों-दिन बढ़ रहे अपराध का मामला संसद में भी उठाया गया।
दिल्ली पुलिस द्वारा 2019 में अपराध के 316261 मामले दर्ज़ किए गए। साल 2018 में 262612 मामले दर्ज़ किए गए थे।
राज्य सभा में सांसद मोतीलाल वोरा ने दिल्ली में अपराधों की संख्या में लगातार वृद्धि के बारे में सरकार से सवाल किया था। उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि दिल्ली के लोगों को अपराध मुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा क्या कदम उठाए गए हैं। आपराधिक मामलों की तेज़ी से जांच और अपराधियों को शीघ्र दण्डित किया जाना सुनिश्चित करने के लिए भी क्या-क्या कदम उठाए गए हैं।
गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्य सभा में बताया कि दिल्ली पुलिस द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, मोटर वाहनों और अन्य सम्पत्तियों की चोरी के संबंध में ई-एफआईआर के ऑनलाइन पंजीकरण के प्रावधान सहित अपराध की सूचना देने तथा उसके पंजीकरण को सुगम बनाने के लिए अनेक उपाय किए गए हैं, जिसके कारण दिल्ली में पंजीकृत केसो की संख्या में वृद्धि हुई होगी। 
पिछले तीन सालोंं और इस साल 15.02.2020 तक के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा पंजीकृत किए गए आपराधिक मामलों का ब्यौरा निम्नानुसार है।
साल में 2017 में 244714 मामले, साल 2018 में-262612 मामले, साल 2019 
में 316261 मामले और इस साल 15-2-2020 तक अपराध के 42777 मामले दर्ज़ किए गए हैं।

अपराध की रोकथाम के लिए उपाय-
गृह राज्य मंत्री ने बताया कि दिल्ली पुलिस ने अपराधों की रोकथाम करने और उनका शीघ्र पता लगाने के लिए अनेक उपाय किए हैं। इन उपायों में, अन्य बातों के साथ-साथ, संगठित अपराध के विरूद्ध कार्रवाई, कुख्यात अपराधियों की गिरफ्तारी/निगरानी, पुलिस की मौजूदगी को बढ़ाने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में संयुक्त सामूहिक गश्त, बीट पुलिस व्यवस्था पर अधिक जोर देना, अपराधियों की गहन निगरानी, कार्रवाई हेतु संबंधित एजेंसियों के साथ अंधेरे वाले स्थानों से संबंधित सूचना साझा करना और ‘जनसंपर्क’ तथा अन्य सामुदायिक संपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से नागरिक-केंद्रित पुलिस व्यवस्था शामिल हैं।

अपराधियों को सज़ा दिलाने के लिए क़दम-

गृह राज्य मंत्री ने बताया कि आपराधिक मामलों की शीघ्र जांच और आपराधियों हेतु दंड के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं जिनमें, अन्य बातों के साथ-साथ, बेहतर दोषसिद्धि दर प्राप्त करने के लिए मामलों की पैरवी की निगरानी करने और विभिन्न न्यायालयों द्वारा पारित आदेशों का दैनिक आधार पर विश्लेषण करने हेतु विधिक प्रकोष्ठ की स्थापना करना; जांच अधिकारियों (आईओ) के मार्गदर्शन हेतु विधिक विशेषज्ञों की सहायता प्राप्त करना; वैज्ञानिक जांच, प्रत्यर्पण संबंधी कानून, महत्वपूर्ण मामला अध्ययन, साइबर-अपराध आदि जैसे विशिष्ट पाठ्यक्रमों में आईओ का प्रशिक्षण; प्रशिक्षण पाठ्यक्रम का प्रमुख भाग दंड विधि, दंड प्रक्रिया, वैज्ञानिक जांच, फॉरेंसिक विज्ञान और साइबर अपराध के अत्याधुनिक पहलुओं के लिए समर्पित करना; और जांच अधिकारियों के कौशल में सुधार करने के लिए जिला न्यायालयों द्वारा जारी की गई विभिन्न टिप्पणियों/निर्देशों का सारांश नियमित तौर पर सभी जिलों/इकाइयों को भेजा जाना शामिल है।
पुलिस  FIR ही सही दर्ज़ नहीं करती।
पुलिस द्वारा दिए गए उपरोक्त आंकड़े सच्चाई से कोसों दूर है।
दिल्ली में दिनों-दिन अपराध बढ़ने का मुख्य कारण है पुलिस का वारदात को सही दर्ज न करना। अपराध के  मामले सही दर्ज होंगे तो अपराध में वृद्धि उजागर होगी और पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का दवाब बनेगा। पुलिस यह चाहती नहीं इसलिए पुलिस की कोशिश होती है कि अपराध के मामले कम से कम दर्ज किए जाए या फिर हल्की धारा में दर्ज किया जाए। लेकिन ऐसा करके पुलिस एक तरह से अपराधियों की ही मदद करती हैं। इसीलिए  बेख़ौफ़  लुटेरों ने आतंक मचा रखा है। महिला हो या पुरुष कोई भी कहीं पर भी सुरक्षित नहीं हैं।
लूटपाट और लुटेरों पर अंकुश लगाने में नाकाम पुलिस अपराध के आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का दावा करने में जुटी हुई हैं।

लोगों को FIR दर्ज कराने के लिए अड़ना चाहिए।
लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस ने उनके साथ हुई वारदात की सही एफआईआर दर्ज की  है या नहीं है। यानी लूट को लूट और चोरी को चोरी में ही दर्ज़ किया गया है।