Friday, 10 July 2020

पुलिस का प्रतिशोध विकास दुबे की मुक्ति। न्याय व्यवस्था पर तमाचा। 8 पुलिस वालों की मौत के लिए गद्दार पुलिस वाले जिम्मेदार।


                    महाकाल मंदिर में विकास दुबे

खादी खाकी मिल गई ख़ाक में।
पुलिस का प्रतिशोध विकास दुबे की मुक्ति।
न्याय व्यवस्था पर तमाचा।

इंद्र वशिष्ठ
विकास दुबे मारा गया या पुलिस ने उसे मुक्त कर दिया ? इस तरह के कथित एनकाउंटर एक तरह से अपराधी को मुक्त करते हैं। यह कोई पहला एनकाउंटर नहीं है।
इस तरह के कथित एनकाउंटर की देशभर में परंपरा रही है।
कथित एनकाउंटरों में शामिल पुलिस वाले बारी से पहले तरक्की और वीरता पदक भी पाते रहे हैं और अपनी कथित बहादुरी की डींग जीवन भर हांकते रहते हैं।
अपराधी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने और मजबूत आरोप पत्र तैयार कर अदालत में पेश करना पुलिस का मुख्य कार्य है। पुलिस के मज़बूत सबूतों और गवाहों के बयान के आधार पर अदालत अपराधी को सज़ा सुनाती हैं।
पुलिस द्वारा बनाए गए मजबूत केस के आधार पर अपराधी को सज़ा सुनाई जाती है तो पुलिस की पेशेवर ईमानदारी और काबिलियत का पता चलता है।

सज़ा नहीं दिलाई मुक्त कर दिया-
एक अपराधी जिसने न जाने कितने लोगों की  जान ली थी। कितने लोगों का जीना हराम कर दिया था क्या उसको उसके किए अपराध की कड़ी सज़ा नहीं मिलनी चाहिए थी ? क्या उसे अपने बुरे कर्मों का फल नहीं भुगतना चाहिए था ? ऐसे अपराधी के खिलाफ मजबूत केस बना कर उसे सज़ा दिलानी चाहिए थी। अपराधी जेल में रहे और सज़ा भुगते तो उसे पता चलेगा कि बुरे काम का नतीजा बुरा होता है। न्यायिक प्रक्रिया से दंडित करने को ही इंसाफ़ कहते हैं।

विकास  का ही उदाहरण लें आठ पुलिस वालों की हत्या करने तक वह अपना जीवन दबंगता/ रौब से जीता रहा। अपनी मर्ज़ी से उज्जैन के महाकाल मंदिर में खुद को पुलिस के हवाले कर दिया। आत्मसमर्पण के 24 घंटे के भीतर ही पुलिस हिरासत में वह एनकाउंटर में मारा गया। 
अब ऐसे में उसने क्या सजा भुगती ? वह तो एक तरह से मुक्त हो गया। सज़ा भुगतता तब ही तो उसे यह अहसास होता कि अपराध की सज़ा भुगतनी ही पड़ती है। 
अपराधी को बिना सज़ा भुगते मार दिया जाना सज़ा नहीं होती सज़ा तो जीते जी भुगतने को ही कहते हैं।
 पुलिस, नेता, न्याय व्यवस्था जिम्मेदार- 
बड़े अपराधी माफिया अदालत से छूट जाते हैैं। जेल जाते भी हैं तो वहां भी न केवल आराम से रहते हैं बल्कि जेल से अपना गिरोह चलाते हैं। 
यह सब बातें सही हैं लेकिन इसके लिए क्या सिर्फ़ अपराधी जिम्मेदार है ? इसके लिए पुलिस, नेता, न्याय व्यवस्था और समाज भी जिम्मेदार है।
सबसे ज्यादा पुलिस जिम्मेदार है। कोई भी अपराधी विकास दुबे ,श्रीप्रकाश शुक्ला, मुखतार अंसारी, बृजेश सिंह जैसा बिना पुलिस के संरक्षण के बन ही नहीं सकता है। अपराधी जब शुरू में छोटे मोटे अपराध करता है या उसके अत्याचार के खिलाफ लोग शिकायत करते हैं तो भ्रष्ट पुलिस उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती हैं। जिससे अपराधी बेख़ौफ़ होता जाता है। अपराधी कुख्यात होने लगता है तो वह अपने बचाव के लिए किसी नेता की शरण में पहुंच जाता है। भ्रष्ट नेता को अपना दबदबा कायम रखने के लिए गुंडों की जरूरत होती है। इसके बाद जिस पुलिस को अपराधी पहले पैसा देकर खरीद लेता था अब वह राजनेता के संरक्षण के चलते पुलिस को भी कुछ नहीं समझता हैं।
 इसका ताजा उदाहरण विकास दुबे है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि बिकरु थाना उसके इशारे पर काम करता था। एक पुलिस वाले को तो उसने पीट भी दिया था। 
भ्रष्ट पुलिस वालों और सत्ता धारी नेताओं के संरक्षण के चलते ही अपराधी इतना बेख़ौफ़ निरंकुश हो जाते हैं कि वह पुलिस पर भी हमला कर देते हैं। लेकिन इस के लिए मुख्य रूप से पुलिस ही जिम्मेदार है। पुलिस अगर ईमानदारी से शुरू से अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें तो किसी अपराधी की इतनी औकात नहीं है कि वह पुलिस पर हमला करने की बात सोच भी ले।

खादी और खाकी सबसे बड़े गुंडे-
 पुलिस और नेताओं से सांठ-गांठ के कारण अपराधी का अहंकार में इतना दिमाग ख़राब हो जाता है कि वह इस भ्रम में जीने लगता है नेता और पुलिस सबसे ऊपर वह ही हैं। जबकि वह यह भूल जाता है कि उससे भी बड़े गुंडे तो उसके आका खादी और खाकी वाले हैं। जो उसके जैसे गुंडे का सिर्फ इस्तेमाल करते हैं। कोई भी समझदार गुंडा कभी भी पुलिस वालों पर गोली नहीं चलाता है पुलिस पर गोली चलाने का मतलब ही होता है कि अपनी मौत को खुद न्योता देना। विकास  ने अपने डेथ वारंट पर खुद हस्ताक्षर किए थे।
एक जज ने  बहुत साल पहले पुलिस को वर्दी वाले गुंडे कह दिया था।
गद्दार पुलिस वालों का एनकाउंटर कौन करेगा ? -
आईपीएस अफसर ईमानदार हैं तो उन सभी गद्दार पुलिस वालों को गिरफ्तार करें जो विकास  को संरक्षण देते थे। जिन पुलिस वालों ने विकास के लिए मुखबिरी की थी। आठ पुलिस वालों की हत्या  के लिए वह भ्रष्ट पुलिस वाले विकास से ज्यादा कसूरवार है। विकास दुबे से सांठ-गांठ और मुखबिरी के आरोप में एसओ विनय तिवारी और सब इंस्पेक्टर कृष्ण कांत शर्मा को गिरफ्तार किया गया है।

अपराधी में कानून का डर हो-
दिल्ली पुलिस ने एक बार पंजाबी बाग के व्यापारी वेद गोयल के अपहरण के मामले में मुख्तार अंसारी को गिरफ्तार किया था। पुलिस हिरासत में अंसारी को नंगा करके उसकी टांगें चौड़ी करा दी  थी। ऐसा कराने वाले पुलिस अफसर ने बताया कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि अपराधी का मनोबल टूटे और उसे पूरी जिंदगी याद रहे कि पुलिस क्या होती है। अपराधी में कानून और पुलिस का डर बिठाना ज़रुरी है।
दूसरी ओर जेलों में ऐसे अफसर भी होते है जो जेल में इस तरह के अपराधियों को सारी सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं।
पुलिस वाले ही मुकर गए-
असल में समस्या यह है कि पुलिस सत्ताधारी नेताओं और न्याय व्यवस्था को दोषी ठहरा कर अपना पल्ला झाड़ लेती है। पुलिस कहती है हम मेहनत और अपनी जान जोखिम में डालकर अपराधी को पकड़ते हैं और अदालत उसे छोड़ देती है। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती लेकिन पूरी तरह सही नहीं है।
असल में पुलिस अपराधी के खिलाफ केस ही मजबूत नहीं बनाती, पुख्ता सबूत नहीं जुटाती है और तो और पुलिस वाले तक अपराधी के खिलाफ गवाही देने से मुकर जाते हैं।
 विकास  ने थाने के अंदर मंत्री संतोष शुक्ला की हत्या की। इस मामले में थाने में वारदात के समय मौजूद पुलिस वाले ही विकास  के खिलाफ गवाही देने से मुकर गए। अदालत ने विकास  का बरी कर दिया। अब इस मामले में अदालत को भला कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। जब पुलिस वाले ही अपराधी के खिलाफ गवाही देने के अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते तो आम आदमी बेचारा अपराधी के खिलाफ गवाही देने की हिम्मत कहां से जुटाएगा।
व्यवस्था का पतन-
पुलिस, नेता,जेल अफ़सर और जज  पूरी व्यवस्था के पतन के लिए जिम्मेदार है। अपना काम ईमानदारी से न करके अपनी नाकामियों के लिए एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट -
कथित एनकाउंटर के आधार पर बारी से पहले तरक्की और वीरता पदक पाने वाले पुलिस अफसरों को सरकार को कश्मीर और छत्तीसगढ़ में भी तैनात कर देना चाहिए। ऐसे कथित "बहादुर" अफसरों की सेवाएं आतंकवादियों और नक्सलियों का एनकाउंटर करने के लिए लेनी चाहिए। सेना और अर्धसैनिक बलों को जिन आतंकवादियों को मारने में कई बार कई कई दिन लग जाते हैं।  ऐसे बहादुर अफ़सर उनको कुछ ही मिनटों में ढ़ेर कर देंगे। दिल्ली पुलिस में भी वीरता पदक धारी ऐसे "बहादुर" पुलिस अफसरों की भरमार है।

एनकाउंटर-
वैसे एनकाउंटर किसे कहते है आठ पुलिस अफसरों के शहीद होने ने यह बता दिया। वरना पुलिस तो ज्यादातर मामलों में दावा करती है कि मारा गया अपराधी अचूक निशाने बाज था। लेकिन अचूक निशाने बाज अपराधी की गोली किसी पुलिस वाले की जान नहीं ले पाती?  गोली ज्यादातर बुलेट प्रूफ जैकेट से टकरा कर या शरीर से रगड़ कर ही निकल जाती है।

आत्मसमर्पण करने वाला क्यों भागेगा ? -
 देश का कानून पुलिस को यह अधिकार नहीं देता कि वह ख़ुद ही अपराधी को सज़ा दे सकते हैं।
हर एनकाउंटर के बाद पुलिस का रटा रटाया ज़वाब होता है और अपराधी ने पुलिस पर गोली चलाई या हथियार छीन कर भागने की कोशिश की। जवाबी कार्रवाई में मारा गया।

विकास दूबे के मामले में भी यही कहा जा रहा है।
विकास  ने खुद आत्म समर्पण किया था फिर भला वह भागने की कोशिश क्यों करता ?
हालांकि हर एनकाउंटर के बाद मामला भी दर्ज़ किया जाता है और एनकाउंटर की तफ्तीश भी की जाती है। लेकिन यह सब खानापूर्ति ही होती है। एनकाउंटर में शामिल पुलिस वालों के खिलाफ भला वहीं की पुलिस ईमानदारी से जांच कर सकती हैं ? मरने वाले अपराधी होते है इसलिए मामले रफा-दफा हो जाते हैं।

पुलिस अफसर ईमानदार हो-
अपराधियों पर अंकुश लगाने का सिर्फ एक ही  रास्ता है अफसर ईमानदार हो। पुलिस अफसर ईमानदारी से अपराध की सही एफआईआर दर्ज करें। पुख्ता सबूत जुटा कर अदालत में पेश करें जिसके आधार पर अदालत सज़ा सुना सके। अपराधी जेल में सज़ा भुगते तभी अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। 

समाज की भूमिका- समाज और मीडिया को अपराधियों का महिमा मंडन नहीं करना चाहिए। समाज द्वारा अपराधी का बहिष्कार करने की बजाए उन्हें सम्मानित किया जाता है।

रक्षक बने भक्षक-
विकास एक दिन में तो इतना बड़ा अपराधी बना नहीं। 
 एनकाउंटर में शहीद हुए सीओ देवेंद्र मिश्र ने
विकास  की चौबेपुर थाने के एसओ विनय तिवारी से सांठ-गांठ की शिकायत  कानपुर एस एस पी  से की थी।  असल में विकास से ज्यादा खतरनाक तो वह पुलिस वाले और नेता हैं जो इतने सालों से विकास को संरक्षण दे रहे थे।
विकास के मरने से इनको कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि इन्होंने न जाने कितने विकास तैयार कर रखे है या दूसरा विकास तैयार कर लेंगे।
पुलिस का प्रतिशोध-
विकास  ने पुलिस वालों को मार दिया इसलिए पुलिस द्वारा उसे मार कर बदला लिया जाना तो तय था ही। अगर विकास  पुलिस वालों को नहीं मारता तो पुलिस की कृपा से उसका राज़ क़ायम रहता।
पुलिसवाले मारे गए तो पुलिस ने तुरंत विकास  के मकान को भी तोड़ दिया।
विकास दुबे  ने मकान अवैध रूप से बनाया हुआ था तो पुलिस ने मकान पहले क्यों नहीं तोड़ा।
पुलिस को  मकान तोड़ने या तुड़वाने का अधिकार किस कानून ने दिया है ?
पुलिस वाले मारे गए तो पुलिस ने कानूनी/ ग़ैर क़ानूनी सारे तरीके इस्तेमाल कर लिए। दूसरी ओर आम आदमी के साथ हुए अपराध की तो एफआईआर तक आसानी से दर्ज नहीं की जाती है।
अदालत बंद कर दो-
पुलिस द्वारा प्रतिशोध में एनकाउंटर करना उचित है तो आम आदमी द्वारा भी प्रतिशोध/ बदला लेने को जायज़ ठहराया जा सकता है। फिर तो देश में अदालतों को बंद कर देना चाहिए। 
बलात्कारियों का एनकाउंटर-
कुछ दिन पहले हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कारियों को एनकाउंटर में मार दिया था। लोगों ने उस समय भी खुशी जाहिर की थी।
ख़ुशी ज़ाहिर करके लोग एक तरह से जंगल राज को बढ़ावा दे रहे हैं। जिसे किसी भी सभ्य समाज में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।
आम आदमी ही नहीं पुलिस वाले भी विकास  के मारे जाने पर खुशी जता रहे हैं। इस खुशी में पुलिस वाले  यह भूल रहे हैं कि आठ पुलिस वालों को मारने का दुस्साहस विकास ने पुलिस में मौजूद गद्दारों के दम पर किया था।
डीएसपी को पुलिस वालों ने मार दिया-
इसी उत्तर प्रदेश में 1982 में गोंडा के डीएसपी के पी सिंह की एनकाउंटर के दौरान उनके मातहत गद्दार पुलिस वालों ने ही गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में पुलिस वालों को सज़ा हुई।

पुलिस पर अंकुश ज़रुरी-
पुलिस इतनी ईमानदार और काबिल नहीं हैं कि वह जो भी करेगी सही ही करेगी।
पुलिस निरंकुश न हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है कि पुलिस को अदालत में सबूतों के साथ यह साबित करना होता है कि जिसे उसने पकड़ा है वह वास्तव में अपराध में शामिल है।
पुलिस की सुनाई कहानी पर मीडिया और आम आदमी ही भरोसा कर सकते हैं। अदालत तो पुलिस की बात पर नहीं सिर्फ़ सबूतों के आधार पर भरोसा करती है।

न्याय व्यवस्था पर तमाचा-
इस तरह के एनकाउंटर पुलिस की नाकामी और काबिलियत की पोल खोलते हैं। पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण पुलिस ने पेशेवर ईमानदारी और काबिलियत का रास्ता छोड़ कर खुद ही अपराधी को सज़ा देने का आसान रास्ता पकड़ लिया है। पुलिस के इस तरीके को जनसमर्थन मिल रहा है। लेकिन यह तरीका बहुत ही ख़तरनाक है। पुलिस का यह तरीका एक तरीके से न्याय व्यवस्था पर तमाचा है। इससे लोगों का न्याय व्यवस्था से भरोसा ख़त्म हो जाएगा।  न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका सबके कार्य और सीमा निर्धारित है।
पुलिस ही अगर सब कार्य ख़ुद करने लगे तो फिर न्यायपालिका की जरूरत ही क्या है। 

एनकाउंटर का हल्ला मचा-
विकास दूबे के आत्म समर्पण के साथ ही यह चर्चा शुरू हो गई थी कि उसका एनकाउंटर किया जाएगा। 
आईपीएस ने उठाए सवाल-
उत्तर प्रदेश पुलिस में आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने तो टि्वटर पर  भी लिख दिया था कि हो सकता है विकास भागने की कोशिश करे और मारा जाए। इस मामले में सामने आई पुलिस की गंदगी के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। एनकाउंटर के बाद भी आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने टि्वट किया कि  इतनी क्या हड़बड़ी थी ?  किसे बचाया जा रहा था ?
निरंकुश पुलिस-
इसके बावजूद पुलिस द्वारा एनकाउंटर कर दिया जाना दिखाता है पुलिस कितनी निरंकुश और दुस्साहसी हो गई है। पुलिस को अदालत का भी डर या परवाह नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट को कानून का राज कायम रखने के लिए  इस मामले में संज्ञान लेना चाहिए नहीं तो देश में  निरंकुश पुलिस राज़ को बढ़ावा मिलेगा।

भ्रष्ट पुलिस वाले पालते हैं अपराधी को-
दिल्ली पुलिस के एक एसीपी उसके आपरेटर  कंझावला थाने के एसएचओ सहित 8 पुलिस वालों की शराब तस्करों से सांठ-गांठ  का मामला सामने आया है। इन पुलिस वालों ने अप्रैल में एक शराब तस्कर को छोड़ दिया उसके बदले उसके एक नौकर को गिरफ्तार दिखा दिया। शराब तस्करी में इस्तेमाल गाड़ी भी बदल दी। इन पुलिस वालों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई।
स्पेशल स्टाफ की करतूत-
उत्तरी जिला पुलिस के स्पेशल स्टाफ ने इस साल मई में  शराब तस्करी के मामले में कालकाजी मंदिर के पुजारी सत्यनारायण भारद्वाज उर्फ पोनी निवासी जखीरा को गिरफ्तार किया था। इस मामले में उसके एक साथी ने खुद बताया कि वह पुलिस से सैंटिग करके छूट गया।

इन दोनों मामलों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्ट पुलिस वाले कैसे अपराधी को बड़ा अपराधी बनने में मदद करते हैं।
पुलिस जब अपराधियों को छोड़ देती है तो वह बेख़ौफ़ होकर बड़े अपराध करने लगता है।

सब इंस्पेक्टर की हत्या-
कई साल पहले मंगोल पुरी थाना इलाके में शराब तस्कर ने अपराध शाखा के एक सब इंस्पेक्टर की गला काट कर हत्या कर दी थी। शराब का धंधा पुलिस की मिलीभगत से ही चलता है।
इस मामले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस की मिलीभगत से ही अपराधी इतना दुस्साहसी हो गया कि सब इंस्पेक्टर की ही हत्या कर दी।
हत्या करने वाले सांसी को पुलिस ने कथित एनकाउंटर में मार दिया।








                      अमिताभ ठाकुर IPS












Monday, 6 July 2020

कश्मीर के गद्दार DSP और पाकिस्तान उच्चायोग का नापाक गठजोड़ बेनकाब।


कश्मीर के गद्दार डीएसपी और पाकिस्तान का नापाक गठजोड़ बेनकाब।

इंद्र वशिष्ठ
आतंकवादियों का मददगार जम्मू कश्मीर पुलिस का गद्दार डीएसपी देविंद्र सिंह पाकिस्तान उच्चायोग के साथ संपर्क में रहता था।
नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारियों ने डीएसपी देविंद्र सिंह को संवेदनशील जानकारी देने के लिए तैयार किया था।
सोशल मीडिया से संपर्क-
जांच के दौरान एनआईए को पता चला कि डीएसपी देविंद्र सिंह सोशल मीडिया के सुरक्षित माध्यम से पाकिस्तान उच्चायोग के अधिकारियों के संपर्क में रहता था।

आरोप पत्र दाखिल-
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने आतंकवादी गतिविधियों में शामिल डीएसपी देविंद्र सिंह समेत 6 अभियुक्तों के खिलाफ अदालत में दाखिल आरोप पत्र में यह खुलासा किया है।

डीएसपी आतंकवादियों का साथी-
कश्मीर पुलिस ने इस साल 11 जनवरी को  काजीगुंड थाना इलाके में एक सूचना के आधार पर डीएसपी देविंद्र सिंह की कार को रोका। कार में डीएसपी देविंद्र सिंह के साथ हिजबुल मुजाहिदीन का जिला कमांडर  आतंकवादी सैयद नवीद मुश्ताक उर्फ़ नवीद बाबू, रफ़ी अहमद राठेर और इरफान शफी मीर उर्फ़ वकील सवार थे। इनके पास से एक ए के 47 रायफल, तीन पिस्तौल और विस्फोटक सामग्री बरामद हुई।
रक्षक बना भक्षक-
डीएसपी देविंद्र सिंह अपनी कार में इन आतंकवादियों को श्रीनगर से जम्मू में सुरक्षित ठिकाने पर छोड़ने जा रहा था। कश्मीर पुलिस ने इन चारों को गिरफ्तार किया। इस मामले की जांच 17 जनवरी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई।

धन, हथियार,शरण देने वाले-
एनआईए ने इन सबसे पूछताछ के बाद इस मामले में सैयद इरफान अहमद, तारिक अहमद मीर और तनवीर अहमद वानी को गिरफ्तार किया। इन तीनों को आतंकवादियों को धन, हथियार मुहैया कराने,शरण देने और आतंकवादियों की साज़िश में मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। सैयद इरफान अहमद आतंकवादी नवीद बाबू का छोटा भाई है। 
तनवीर अहमद  एलओसी यानी नियंत्रण रेखा इलाके के व्यापारियों की एसोसिएशन का पूर्व अध्यक्ष हैं। तनवीर व्यापारियों से धन जुटा कर आतंकवादियों को देता था।
 आईएसआई और आतंकियों से मिला- 
एनआईए ने तफ्तीश में पाया कि इरफान शफी उर्फ़ वकील पाकिस्तान में हिजबुल मुजाहिदीन के डिप्टी चीफ सईद सलाउद्दीन, आमिर खान, आपरेशनल प्रमुख खुर्शीद आलम,वित्तीय प्रमुख नज़र महमूद के अलावा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के उमर चीमा, अहसान चौधरी, सोहेल अब्बास आदि से मिला था।
इन लोगों ने इरफान शफी को हवाला के माध्यम से आतंकवादियों को धन पहुंचाने का काम सौंपा था।
पाकिस्तान उच्चायोग ने धन दिया-
 एनआईए ने तफ्तीश में पाया कि इरफान शफी नई दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के कुछ अधिकारियों के संपर्क में था। इन अधिकारियों द्वारा कश्मीर में भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इरफ़ान को धन दिया जाता था। इस धन का इस्तेमाल भारत विरोधी सेमिनार कराने और लोगों को संगठित करने के लिए किया जाता था।
यह भी पता चला कि कश्मीरियों को पाकिस्तान जाने के लिए वीज़ा दिलाने में भी वह मदद करता था।
कश्मीर पुलिस का सिपाही आतंकवादी -
हिजबुल मुजाहिदीन का गांदरबल और शोंपिया जिले का कमांडर नवीद मुश्ताक कश्मीर पुलिस का भगोड़ा सिपाही है। वह हथियार लेकर भागा था। कश्मीर में ट्रक चालकों और मजदूरों की हत्या समेत हत्या की अनेक वारदात में नवीद मुश्ताक शामिल है।
कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने के बाद नवीद मुश्ताक भोले भाले कश्मीरी मुस्लिम युवाओं को बरगला कर हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल करने की कोशिश कर रहा था। 
नवीद को आतंकवादी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के  व्यापारियों से भी तनवीर अहमद के माध्यम से धन मिलता था।
सीमा पार के हथियार तस्करों और डीएसपी देविंद्र सिंह की मदद से वह हथियार और गोला बारूद जुटाता था।

आतंकवादियों के लिए ठिकाने का इंतजाम-
जांच में पता चला कि डीएसपी देविंद्र सिंह ने फरवरी 2019 में भी आतंकवादियों के लिए जम्मू में  सुरक्षित ठिकाने का इंतजाम किया था। आतंकवादियों को अपनी कार में जम्मू ले कर गया।

तारिक अहमद मीर और अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच जारी है।

दिल्ली पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान-
 निलंबित डीएसपी देविंद्र सिंह को पिछले महीने एक अन्य मामले में दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट से जमानत मिल गई थी । तय समय पर दिल्ली पुलिस द्वारा अदालत में आरोप पत्र  दाखिल नहीं करने के कारण जमानत मिल गई।

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दिल्ली  को दहलाने की साजिश के मामले में देविंद्र सिंह को गिरफ्तार किया था। इसी मामले में जमानत मिली, लेकिन फिलहाल आरोपी देविंद्र सिंह अभी जेल में ही है क्योकि एनआईए के केस में भी वह आरोपी हैं।

डीएसपी  पहले भी विवादों में-
श्रीनगर एयरपोर्ट पर एंटी हाइजैकिंग टीम में तैनात डीएसपी देविंद्र सिंह साल 2013 में उस समय चर्चा में आया था जब संसद हमले में शामिल अफज़ल गुरु ने एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें दावा किया गया था डीएसपी देविंद्र सिंह ने उसे संसद हमले में शामिल एक आतंकवादी को दिल्ली साथ ले जाने और उसके रहने की व्यवस्था करने को कहा था।





                      सरोकार 8-7-2020

Thursday, 2 July 2020

पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले में शामिल एक और आतंकवादी गिरफ्तार।


                          मोहम्मद इकबाल

NIA ने पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले में शामिल एक और आतंकवादी को गिरफ्तार किया।

इंद्र वशिष्ठ
पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के मामले में एक और आतंकवादी को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने गिरफ्तार किया है।
पाकिस्तानी आतंकी गिरोह जैश ए मोहम्मद के इस आतंकवादी का नाम मोहम्मद इकबाल  (25) निवासी फुतली पुरा, बड़गाम, चरार ए शरीफ़ कश्मीर हैं।
पुलवामा हमले का मुख्य साजिशकर्ता मोहम्मद उमर फारूक अप्रैल 2018 में नेशनल हाईवे के पास स्थित अतंरराष्ट्रीय सीमा से जम्मू भारत में घुसा था।
आतंकवादियों की मदद-
एनआईए की प्रवक्ता डीआईजी सोनिया नारंग ने बताया कि मोहम्मद इकबाल  ने मोहम्मद उमर फारूक की आतंकी गतिविधियों के लिए मदद की थी। मोहम्मद उमर फारूक और उसके साथियों ने ही पुलवामा हमले में इस्तेमाल बम बनाया था।
जैश ए मोहम्मद के एक अन्य मामले में मोहम्मद इकबाल सितंबर 2018 से जेल में बंद था।
7 दिन का रिमांड-
राष्ट्रीय जांच एजेंसी को जांच के दौरान मोहम्मद इकबाल के पुलवामा हमले में शामिल होने का पता चला। एनआईए ने इस मामले में मोहम्मद इकबाल  को आज  गिरफ्तार कर जम्मू में एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया। एनआईए ने पूछताछ के लिए उसे सात दिन के लिए हिरासत/ रिमांड में लिया है।
पाकिस्तानी आकाओं से लगातार संपर्क-
राष्ट्रीय जांच एजेंसी को शुरुआती जांच के दौरान पता चला कि मोहम्मद इकबाल पाकिस्तान में मौजूद जैश ए मोहम्मद के अपने आकाओं के निरंतर संपर्क में था। सुरक्षित मैसेंजिंग एप्लिकेशन के माध्यम से वह अपने आकाओं से बातचीत करता था।
 आतंकवादियों के लिए गाड़ी का इंतजाम- 
मोहम्मद इकबाल जैश ए मोहम्मद के  आतंकवादियों के लिए वाहन सुविधा उपलब्ध कराने यानी ट्रांसपोर्टेशन माड्यूल  के रूप में काम करता था।

मोहम्मद इकबाल की गिरफ्तारी के साथ ही पुलवामा हमला मामले में गिरफ्तार अभियुक्तों की संख्या 6 हो गई है।
40 जवान शहीद-
14  फ़रवरी 2019 को जैश ए मोहम्मद के आत्मघाती आतंकी आदिल मोहम्मद डार ने विस्फोटक से भरी वैन से सीआरपीएफ के काफिले की बस पर हमला किया था। हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए थे।



Tuesday, 30 June 2020

मंत्री और पुलिस कमिश्नर का अनाड़ीपन, पुलिस ने ही पीटा ढिंढोरा।


 गृह राज्य मंत्री और पुलिस कमिश्नर का अनाड़ीपन, पुलिस ने ही पीटा ढिंढोरा।

इंद्र वशिष्ठ
प्रधानमंत्री "दो गज दूरी,  बहुत है जरूरी" का पालन करने के लिए लगातार कह रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की बात का उनके मातहत मंत्री, सांसद और दिल्ली पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव भी पालन नहीं कर रहे हैं।
पुलिस मुख्यालय में मंगलवार को एक समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी भी उपस्थित थे। सांसद प्रवेश वर्मा के एनजीओ की ओर से पुलिस को मास्क और सेनेटाइजर दिए जाने के अवसर पर यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
मंत्री, संतरी सबका अनाड़ीपन उजागर- 
इस अवसर पर पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव, गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी और सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने दो गज दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन नहीं किया। 
कमिश्नर क्या इतने अनाड़ी हैं ? - 
मास्क और दो गज दूरी के नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी पुलिस की है। पुलिस इन नियमों का पालन कराने के लिए कई बार आम आदमी से न केवल बदतमीजी से बात करती है बल्कि डंडे मारने से भी नहीं चूकती है। 
नियमों का पालन न करने पर 500 रुपए जुर्माना या  एफआईआर तक दर्ज की जाती है।
ऐसे में उस पुलिस बल के मुखिया कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव का खुद नियमों का पालन न करना उनकी "समझदारी" पर सवालिया निशान लगाता हैं। 
पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव का गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी के साथ बिल्कुल सट कर खड़ा होने से पता चलता है कि कमिश्नर कितने अनाड़ी/ अज्ञानी हैं। 
 जाहिलों की जमात- 
गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी, सांसद प्रवेश वर्मा और पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव ने ऐसा करके खुद को पढ़ें लिखे अनाड़ी/ अज्ञानी/ जाहिल लोगों की जमात में शामिल कर लिया है।
इस जमात में देश के मुख्य न्यायाधीश अरविंद बोबडे, रामदेव, बालकृष्ण और जयपुर के निम्स यूनिवर्सिटी के चांसलर डाक्टर बलबीर सिंह तोमर आदि  पहले ही शामिल हो चुके हैं।
इन सबने भी सार्वजनिक रूप से नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं।  
खुद ही ढिंढोरा पीट दिया-
पुलिस ने मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के फोटो और खबर प्रचार के लिए मीडिया को भेजे  हैं।
मीडिया में प्रचार के मोह में 'समझदार' पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव ने खुद ही एक तरह से अपने अनाड़ीपन का ढिंढोरा पीट दिया है।  
प्रधानमंत्री कार्रवाई करके दिखाओ-
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि एक देश के प्रधानमंत्री पर बिना मास्क लगाए सार्वजनिक स्थल पर जाने के कारण 13 हजार रुपए जुर्माना लगाया गया है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में भी स्थानीय प्रशासन को नियमों को लागू कराने के लिए इसी चुस्ती के साथ काम करना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि गांव का प्रधान हो देश का प्रधानमंत्री कोई भी नियमों से ऊपर नहीं है।
प्रधानमंत्री जी आप भी ऐसे जाहिलों के खिलाफ कार्रवाई करके दिखाओ तो जाने। वरना आप दो गज दूरी का जितना मर्ज़ी आलाप करते रहो ऐसे अनाड़ी अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे।
क्या नियम/ कायदे/ कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही हैं ? 
 कानून का पाठ पढ़ाओ-
मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अरविंद बोबडे, रामदेव, बालकृष्ण, डाक्टर बलबीर सिंह तोमर आदि डाक्टरों और अपने मातहतों गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी, सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा के खिलाफ कार्रवाई करके दिखाओ। 
इसके साथ ही पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव के खिलाफ कार्रवाई करके दिखाओ। क्योंकि नियम लागू कराने वाला  ख़ुद ही नियमों की धज्जियां उड़ाए तो समाज में ग़लत संदेश जाता है। पुलिस कमिश्नर का नियम तोड़ना ज्यादा गंभीर मामला है। 
भारत में किसी में दम है ?
 उल्लेखनीय है कि बिना मास्क के सार्वजनिक स्थान पर जाने के कारण बुल्गेरिया के प्रधानमंत्री बॉयको बोरिसोव, उनके काफिले के अफसरों और पत्रकारों पर 170 डॉलर यानी 13 हजार रुपए जुर्माना लगाया गया।
रोमानिया के प्रधानमंत्री पर भी मास्क न पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन न करने पर 600 डॉलर यानी 45 हजार रुपए जुर्माना लगाया गया था।


                    सरोकार 1-7-2020





                      सरोकार 2-7-2020




Monday, 29 June 2020

सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस क्या इतने अनाड़ी/अज्ञानी हैं ? मास्क,दो गज दूरी चीफ़ जस्टिस के लिए नहीं है ज़रुरी ?

                 चीफ़ जस्टिस अरविंद बोबडे
             
 सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस क्या इतने अनाड़ी हैं ? नियमों की धज्जियां उड़ाई।
मास्क, दो गज दूरी क्या चीफ़ जस्टिस के लिए नहीं है ज़रुरी ? 
इंद्र वशिष्ठ
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे का हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल के साथ फोटो मीडिया में छाया हुआ हुआ है। 
हैरानी की बात है कि चीफ़ जस्टिस ने मुंह पर न तो मास्क लगाया हुआ है और न ही देह से दूरी/ शारीरिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया है।
ऐसी हरकत ने चीफ़ जस्टिस को भी पढ़ें लिखें अनाड़ी/ जाहिल की जमात में शामिल कर दिया है।
दो गज दूरी क्या चीफ़ जस्टिस के लिए नहीं है जरुरी ? -
दुनिया भर में डाक्टर और भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी भी बार बार " देह से दो गज दूरी, बहुत है जरूरी" और मास्क पहनने के लिए लोगों से
कह रहे हैं। 
मोबाइल फोन पर भी इन दोनों नियमों का पालन करने की टेप लगातार चल रही है। कोरोना के खिलाफ ज़ंग में यह दो सबसे अहम हथियार है। इनका पालन करने से ही कोरोना से बचा जा सकता है।
 मास्क न पहनने और दो गज दूरी के नियमों का पालन न करने पर जुर्माना और एफआईआर तक दर्ज की जा रही हैं।
गरीबों और कमजोर लोगों पर पुलिस यह लागू करवाने के लिए डंडे तक चला रही है।

शर्मनाक-
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे द्वारा इन दोनों ही नियमों की धज्जियां उड़ाना शर्मनाक है।
देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश की इस हरकत से लोगों में गलत संदेश जाता है।
क्या मुख्य न्यायाधीश इन नियम कायदों से ऊपर है ? 
क्या नियम/ कायदे/ कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही हैं ? 
मुख्य न्यायाधीश को अपने व्यक्तिगत आचरण से भी एक मिसाल/ आदर्श पेश करना चाहिए। लेकिन यहां तो मुख्य न्यायाधीश खुद नियम तोड़ कर समाज को ग़लत संदेश दे रहे हैं। 

मुख्य न्यायाधीश कानून का सम्मान करो।-
मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे में अगर जरा सा भी नियम कायदों के प्रति सम्मान है तो उनको तुरंत अपने इस अनाड़ीपन के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। इसके अलावा इन नियमों को तोड़ने के लिए खुद ही कानूनी प्रावधान के अनुसार अपने खिलाफ भी जुर्माना और एफआईआर की कार्रवाई करनी/ करवानी चाहिए। 

मुख्य न्यायाधीश का यह फोटो नागपुर राजभवन परिसर का है। मोटरसाइकिल भाजपा के स्थानीय नेता सोनबा मुसाले के बेटे रोहित मुसाले की बताई गई है। मोटरसाइकिल के आसपास अनेक लोग खड़े हुए। इनमें दो व्यक्ति तो मुख्य न्यायाधीश के पास ही बिना मास्क लगाए खड़ा हुआ है। 

चीफ़ जस्टिस को तो ऐसा नहीं करना चाहिए-
मुख्य न्यायाधीश महोदय आपको तो औरों से भी ज्यादा इस बात का ख्याल रखना चाहिए था कि आप जाने अनजाने ऐसा कुछ न करें जिससे न्यायधीश के आचरण पर सवालिया निशान लग जाए।
रामदेव और डाक्टर इतने जाहिल हैं ?-
रामदेव, बालकृष्ण और निम्स के चांसलर डाक्टर बलबीर सिंह तोमर समेत 9 लोगों द्वारा मास्क न पहनने और दो गज दूरी के नियमों का पालन न करने का मामला इस पत्रकार द्वारा  उजागर किया गया।
आईपीएस क्या इतना निकम्मा, जाहिल हो सकता है।-
सीबीआई के मामले में वांटेड डीएचएफएल कपिल वधावन और उसके भाई  धीरज समेत 23 लोगों को तालाबंदी के दौरान खंडाला जाने की इजाजत /अनुमति वरिष्ठ आईपीएस अफसर अमिताभ गुप्ता द्वारा दी गई। लेकिन वांटेड अपराधियों की मदद करने वाले महाराष्ट्र के गृह विभाग के प्रधान सचिव पद पर तैनात अमिताभ गुप्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि वांटेड अपराधियों की भागने में मदद करना ऐसा अपराध है जिसके लिए अमिताभ गुप्ता को जेल भेजा जाना चाहिए था।
इन मामलों से लगता है कि नियम कायदे सिर्फ आम आदमी के लिए ही हैं।

गोरे गए काले अंग्रेज़ बन गए राजा -
अंग्रेजों  के जाने के बाद दरअसल देश में शासकों के रुप में तीन तरह के नए राजाओं का राज कायम हो गया है।  इनमें पहले नंबर पर हैं नेता जो सत्ता में आने के बाद अंग्रेजों से भी ज्यादा संवेदनहीन, अहंकारी हो जाते हैं दूसरे नौकरशाह यानी आईएएस /आईपीएस और तीसरे न्यायधीश। इन तीनों का जीवन, कार्य शैली,आचरण, बिल्कुल राजाओं की तरह होता हैं। 
ये तीनों मिलकर अपने अपने लोगों को बचाते भी हैं। कोई जज यदि भ्रष्टाचार या ग़लत आचरण में लिप्त पाया जाता है तो उसे गिरफ्तार कर जेल भेजने की बजाए उससे केवल पद से इस्तीफा लेकर उसे खुला छोड़ दिया जाता है। 
इसी तरह नेता और नौकरशाह अपने बेईमान सहयोगियों को बचाते हैं।
राजाओं की तरह काफिला-
प्रधानमंत्री के काफिले को रास्ता देने के लिए पुलिस द्वारा जैसे आम आदमी को रोक दिया जाता है इस तरह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों और पुलिस कमिश्नर के काफिले तक के लिए रास्ता बिल्कुल साफ रखा जाता है ताकि उनका काफिला बिना किसी रुकावट के आसानी से गुजर सके। इन सबको कोई असुविधा न हो। 
 इन‌ सब की नजर में आम जनता की हैसियत/ औकात गुलाम प्रजा से ज्यादा कुछ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की भूमिका पर सवालिया निशान-
हाल के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के आचरण ने न्यायधीशों की काबिलियत और विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट से राज्य सभा का सफर-
सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ उनके स्टाफ में तैनात महिला ने यौन शोषण का आरोप लगाया था।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार कोई भी अपने मामले में जज नहीं हो सकता। लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायधीश रंजन ने इस मामले में स्वयं तीन न्ययाधीशों की पीठ की अध्यक्षता की।
क्लीन चिट-
सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने कहा कि चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों में कोई दम नहीं है।
शिकायतकर्ता ने इसे 'अन्याय' बताया  कहा  कि, "मुझे जो डर था वही हुआ और देश के उच्चतम न्यायालय से इंसाफ़ की मेरी सभी उम्मीदें टूट गईं हैं."
रंजन गोगोई नेताओं की तरह बयान-
 रंजन गोगोई ने उस समय कहा था कि उनके खिलाफ साजिश की गई है लेकिन रंजन गोगोई आज़ तक नहीं बता पाए कि साजिश किसने की थी।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ अगर कोई साजिश थी तो चीफ जस्टिस तो इतना ताकतवर होता है कि वह जांच एजेंसी से तुरंत जांच करा कर साजिश कर्ताओं को जेल भेज सकता है।
इससे तो यही पता चलता है कि रंजन गोगोई ने सिर्फ नेताओं की तरह बयान दिया था।
यह वही रंजन गोगोई है जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अपने साथी जजों के साथ सुप्रीम कोर्ट के लॉन में ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस की थी।
सरकार की मेहरबानी से रंजन गोगोई अब राज्यसभा सदस्य हैं। 

मी लॉर्ड बन गए गवर्नर-
अमित शाह के मामले की सुनवाई करने वाले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी  सदाशिवम सेवानिवृत्ति के बाद  केरल के राज्यपाल बनाए गए। 
हालांकि कांग्रेस शासन काल में भी सेवानिवृत्त न्यायधीशों को राज्य सभा सांसद या अन्य पदों पर नियुक्त  किया गया था। लेकिन भाजपा के भी ऐसा करने से साबित हो गया कि कांग्रेस और भाजपा में कोई फ़र्क नहीं है।

जजों पर यौन शोषण के मामले-

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एके  गांगुली और स्वतंत्र कुमार पर भी कानून की दो छात्राओं ने यौन उत्पीडन के आरोप लगाए थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति ने माना कि एके गांगुली पर छात्रा द्वारा लगाए आरोप सही हैं। लेकिन घटना के समय गांगुली सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हो चुके थे इसलिए उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कार्रवाई नहीं कर सकता है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम के अनुसार एके गांगुली मामले में 5 दिसंबर 2013 को अदालत के फैसले के अनुसार इस न्यायायल के पूर्व जजों के खिलाफ आए मामलों पर सुप्रीम कोर्ट प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं हो सकती हैं। स्वतंत्र कुमार के खिलाफ छात्रा की शिकायत को सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर स्वीकार नहीं किया।

                      सरोकार 2-7-2020