Wednesday, 31 December 2025

सीजीएसटी की डिप्टी कमिश्नर, 2 सुपरिटेंडेंट 70 लाख लेते हुए गिरफ्तार, 1.60 करोड़ रुपये बरामद, वकील और कंपनी मालिक भी गिरफ्तार

सीजीएसटी की डिप्टी कमिश्नर, 2 सुपरिटेंडेंट 70 लाख लेते हुए गिरफ्तार,1.60 करोड़ रुपये बरामद


इंद्र वशिष्ठ, 
सीबीआई ने उत्तर प्रदेश के झांसी में सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (सीजीएसटी) के ऑफिस में रिश्वतखोरों के गिरोह का पर्दाफाश किया है। 70 लाख रुपये की रिश्वतखोरी के मामले में सीजीएसटी की डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी, सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी, सुपरिटेंडेंट अजय कुमार शर्मा, वकील नरेश कुमार गुप्ता और मैसर्स जय दुर्गा हार्डवेयर कंपनी के मालिक राजू मंगतानी को गिरफ्तार किया है। लगभग 1.60 करोड़ रुपये बरामद हुए हैं।

सीबीआई ने 30 दिसंबर को डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी (आईआरएस), सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी, सुपरिटेंडेंट अजय शर्मा, वकील, प्राइवेट कंपनियों के मालिकों और कुछ अज्ञात लोगों के खिलाफ जीएसटी चोरी के मामलों में प्राइवेट फर्मों को फायदा पहुंचाने के लिए 1.5 करोड़ रुपये रिश्वत मांगने के आरोप में मामला दर्ज किया।
सीबीआई ने जाल बिछाया और डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी के कहने पर 70 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी और अजय शर्मा को रंगे हाथों पकड़ा। सीजीएसटी के दोनों सुपरिटेंडेंट और डिप्टी कमिश्नर, वकील और कंपनी के मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया। 
सीबीआई को बाद में तलाशी में लगभग 90 लाख रुपये नकद, कई प्रॉपर्टी के दस्तावेज और भारी मात्रा में ज्वेलरी/सोना बरामद हुआ है। तलाशी अभी भी जारी है और आगे की जांच चल रही है। अब तक कुल लगभग 1.60 करोड़ रुपये नकद जब्त किए गए हैं।


Friday, 26 December 2025

आतंकवाद के खिलाफ क्रूर दृष्टिकोण ही हमें सुरक्षित रखेगा, संगठित अपराध पर 360 डिग्री प्रहार की तैयारी: अमित शाह

आतंकवाद के खिलाफ क्रूर दृष्टिकोण ही सुरक्षित रखेगा: अमित शाह

संगठित अपराध पर 360 डिग्री प्रहार की तैयारी


इंद्र वशिष्ठ, 
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि आने वाले दिनों में संगठित अपराध पर 360 डिग्री प्रहार करने की योजना ला रहे हैं। मल्टी-लेयर सिक्योरिटी मॉडल बनाना और आतंकवाद के खिलाफ क्रूर दृष्टिकोण  के साथ काम करना, यही हमें आने वाले दिनों में सुरक्षित रख सकता है। गृह मंत्री ने शुक्रवार को ‘आतंकवाद निरोधी सम्मेलन’ में कहा कि संगठित अपराध नेटवर्क शुरूआत में तो फिरौती और उगाही के लिए काम करते हैं लेकिन जब इनके सरगना विदेशों में जाकर बैठ जाते हैं तो वे अपने आप आतंकवादी संगठनों के संपर्क में आ जाते हैं और फिरौती और धन उगाही का उपयोग देश में आतंकवाद फैलाने के लिए करते हैं। हर राज्य को एनआईए और सीबीआई के तत्वाधान में आईबी का सहयोग लेकर और  डेटाबेस का उपयोग कर अपने यहां इसे समाप्त करना है
उन्होंने एनआईए द्वारा अपडेट किए गए अपराध मैनुअल का विमोचन, हथियार ई-डेटाबेस और संगठित अपराध नेटवर्क डेटाबेस जारी किया। 
कॉमन एटीएस स्ट्रक्चर 
अमित शाह ने कहा कि एनआईए ने एक कॉमन एंटी टेरर स्कवॉयड (एटीएस) स्ट्रक्चर बनाकर राज्यों की पुलिस को भेजा है। राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को इसका जल्द से जल्द अनुपालन करना चाहिए। सभी राज्यों की एटीएस को निदान ( एनआईडीएएएन ) और नेटग्रिड के उपयोग की आदत डालनी चाहिए। जांच में निदान और नेटग्रिड का उपयोग करने से केस के अदृश्य लिंक भी सामने आते हैं। कॉमन एटीएस स्ट्रक्चर और ऑपरेशनल यूनिफॉर्मिटी आतंकवादियों को सज़ा कराने  में फायदा देती है। जब तक हम ऑपरेशनल यूनिफॉर्मिटी नहीं लाते तब तक हम खतरे का सही आकलन, इंटेलीजेंस शेयरिंग का सही उपयोग और कोऑर्डिनेटेड काउंटर एक्शन नहीं ले सकते। हमें जांच से लेकर अभियोजन और काउंटर एक्शन तक यूनिफॉर्मिटी को सुनिश्चित करना है।
डेटा बिना गोली की बंदूक-
अमित शाह ने कहा कि साइबर एवं सूचना का प्रसार युद्ध, आर्थिक नेटवर्क का दुरुपयोग और आतंकवाद के हाइब्रिड फॉर्मैट के लिए हमें राष्ट्रीय ग्रिड के तौर पर एक सजग और तत्काल परिणामलक्षी कार्यवाही करने वाला सुदृढ़ तंत्र विकसित करना होगा और यह ऐसे सम्मेलनों से ही हासिल हो सकता है।  सभी को साझा करने का कर्तव्य (डयूटी टू शेयर) के सूत्र के साथ आगे बढ़ना चाहिए। केन्द्र की एजेंसियों और राज्यों की पुलिस ने अपने-अपने स्तर पर टेक्नॉलजी का अच्छा इस्तेमाल किया है, लेकिन एसआईएलओएस में डेवलप की हुई टेक्नॉलजी और एकत्र किया हुआ डेटा बिना गोली के बंदूक की तरह है। अगर सारे डेटा एक-दूसरे से संवाद करें और उन्हें एक ही टेक्नॉलजी से बनाया गया हो तो बेहतर है। इसके लिए गृह मंत्रालय, एनआईए और आईबी को चर्चा कर राष्ट्रीय स्तर पर टेक्नॉलजी और डेटा का एक निर्बाध ढांचा विकसित करना चाहिए और राज्यों को इसे मजबूत करने में सहयोग करना चाहिए। आतंकवादियों और अपराधियों के डेटाबेस को ज़ीरो टेरर का कोर असेट बनाना चाहिए। राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से अपेक्षा है कि वे इस डेटाबेस के प्रारूप का शब्दशः क्रियान्वयन करेंगे।  
टीम इंडिया-
केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि भगोड़े अपराधी की अनुपस्थिति में सुनवाई से जुड़े विवादों से डरे बिना इसे आगे बढ़ाना है। इससे भगोड़े देश लौटने को मजबूर होंगे।  भारत सरकार की सारी एजेंसियां और राज्यों की पुलिस से मिलकर एक ऐसी ‘टीम इंडिया’ बने जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए प्रभावी तरीके से काम करे। उन्होंने दोहराया कि जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा, हमारी चुनौतियाँ बढ़ती जाएंगी। ऐसे में हम सबकी जिम्मेदारी है कि देश और अधिकारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए हम एक ऐसा मजबूत आतंकवाद निरोधी ग्रिड बनाए जिससे वे आने वाली चुनौतियों का मजबूती से सामना कर सकें।



Monday, 22 December 2025

पंडित नेहरू के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल, मुग़ल काल के कोतवाल ईमानदारी की मिसाल, दिल्ली पुलिस का इतिहास

Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित लेख



पंडित नेहरू के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल




इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली पुलिस की छवि आज़ भले ही उतनी अच्छी नहीं है। लेकिन पुलिस का इतिहास सुनहरा रहा है। एक समय ऐसा था कि दिल्ली के कोतवाल की ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। कोतवाल की ईमानदारी के क़िस्सों का दिल्ली पुलिस ने अपने इतिहास में प्रमुखता से उल्लेख किया है लेकिन आज़ के दौर में ऐसा कोई पुलिस अफसर नज़र नहीं आता, जिसकी तुलना उस समय के कोतवाल से की जा सके। आज़ तो आलम यह है कि पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त है। पुलिसवाले ही जबरन वसूली, लूट, अपराधियों से सांठगांठ जैसे संगीन अपराध तक में शामिल पाए जाते हैं। 
पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है और पुलिसकर्मी निरंकुश है। अपराध को आंकड़ों के माध्यम से कम दिखाने के लिए पुलिस अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर तक दर्ज नही करती।
सच्चाई यह है कि पुलिस सभी अपराध के मामलों की सही और उचित धारा में एफआईआर दर्ज करे, तो ही अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। 
अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है कि पुलिस अपराध के सभी मामलों की सही और उचित धारा में एफआईआर दर्ज करे। 
ईमानदारी की कसौटी-
सिर्फ रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं होता। पुलिस अफसर ने अगर अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से नहीं किया, जिस व्यक्ति का जो अधिकार/हक है वह उसे नहीं दिया, अपराध के मामले को दर्ज ही नहीं किया, किसी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करना, किसी बेकसूर को फंसाना/ गिरफ्तार करना, अपराधियों से सांठगांठ करने वाले मातहत पुलिसकर्मी को बचाना आदि तो भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि संगीन अपराध भी है। आईपीएस अफसरों द्वारा घरेलू/ निजी काम के लिए पुलिसकर्मियों को रखना/फटीक कराना। सरकारी खजाने से फिजूल खर्ची करना। सरकारी कारों का जमकर परिवार के लिए इस्तेमाल करना भी भ्रष्टाचार ही होता है।  रिटायर्ड आईपीएस अफसर भी अवैध रूप से पुलिसकर्मियों, सरकारी कार/ ड्राइवर/ रसोईया रखते हैं।
ईमानदारी नजर आना ज़रूरी-
दरअसल जो वाकई ईमानदार होता है उसे ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं होती। उसके कार्य और आचरण से यह स्पष्ट रूप से जग जाहिर हो जाता है। वैसे भी जो ईमानदार हो तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है।
एफआईआर दर्ज नहीं करती-
पुलिस आज भले ही अपराध कम दिखाने के लिए अपराध के सभी मामलों को सही दर्ज तक नहीं करती हैं। लेकिन अंग्रेजों के समय में तो दो आने कीमत के संतरों और पैंतालीस आने मूल्य का सामान चोरी होने तक के मामलों की भी रिपोर्ट यानी मुकदमा /एफआईआर दर्ज की जाती थी।
पहली एफआईआर-
उत्तरी दिल्ली के सब्जी मंडी थाने में 18 अक्टूबर 1861 को पहली एफआईआर उर्दू/फारसी भाषा में दर्ज हुई थी। कटरा शीश महल निवासी मोइनुद्दीन वल्द मोहम्मद यार खान की शिकायत पर यह एफआईआर दर्ज की गई। आठ बर्तन (देगची, देगचा, कटोरा, लोटा), हुक्का, कुल्फी और महिलाओं के वस्त्र चोरी के मामले में यह एफआईआर दर्ज की गई थी। चोरी हुए सामान का मूल्य पैंतालीस आने (2.81 रुपए)था।
सब्जी मंडी थाने में ही दो आने कीमत के 11 संतरे चोरी का मामला 16 फरवरी 1891 को दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता राम प्रसाद ने संतरे चोरी करने वाले राम बक्श सुपुत्र अल्लाह बक्श को रंगे हाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था। अदालत ने 23 दिसंबर 1891 को राम बक्श को एक महीना कैद की सजा सुनाई।
"रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात"-
एफआईआर/ प्राथमिकी को उस समय "रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात" के नाम से जाना जाता था। एफआईआर में उर्दू और फारसी की मिलीजुली भाषा का इस्तेमाल किया जाता था। उस समय एफआईआर बहुत ही छोटी यानी संक्षिप्त रुप में लिखी जाती थी। जबकि आजकल कई पृष्ठ की होती है।
800 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था-
दिल्ली में पुलिस व्यवस्था की शुरूआत करीब आठ सौ साल पुरानी मानी जाती है। तब दिल्ली की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी शहर कोतवाल पर हुआ करती थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा गंगाधर दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे। उस समय के शहर कोतवाल से आज देश की सबसे ज्यादा साधन सम्पन्न दिल्ली पुलिस ने लंबी दूरी तय की है।
पहला कोतवाल ईमानदारी की मिसाल - 
दिल्ली का पहला कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे। वह सन् 1237 ईसवी में 40 की उम्र  में कोतवाल बने । कोतवाल के साथ उन्हें नायब ए गिब्त(रीजेंट की गैरहाजिरी में )भी नियुक्त किया गया था। अपनी ईमानदारी के कारण ही वह तीन सुलतानों के राज-काल में लंबे अर्से तक इस पद पर रहे।
आज भले ही दिल्ली पुलिस की छवि दागदार है, लेकिन पहले के कोतवालों की ईमानदारी के अनेक किस्से इतिहास में दर्ज है।
एक बार तुर्की के कुछ अमीर उमराओं की संपत्ति सुलतान बलवन के आदेश से जब्त कर ली गई। इन लोगों ने सुलतान के आदेश को फेरने के लिए कोतवाल फखरूद्दीन को रिश्वत की पेशकश की।
कोतवाल ने कहा "यदि मैं रिश्वत ले लूंगा तो मेरी बात का कोई वजन नहीं रह जाएगा"
 कोतवाल का पुलिस मुख्यालय उन दिनों किला राय पिथौरा यानी आज की महरौली में था। इतिहास में इसके बाद कोतवाल मलिक अलाउल मल्क का नाम दर्ज है। जिसे सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में कोतवाल तैनात किया था। सुलतान खिलजी ने एक बार मलिक के बारे में कहा था कि इनको कोतवाल नियुक्त कर रहा हूं जबकि यह है वजीर (प्रधानमंत्री ) पद के योग्य है। इतिहास में जिक्र है कि एक बार जंग को जाते समय सुलतान खिलजी कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे। सुलतान ने कोतवाल से कहा था कि जंग में जीतने वाले विजेता को वह यह चाबी सौंप दें और इसी तरह वफादारी से उसके साथ भी काम करें।
मुगल बादशाह शाहजहां ने 1648 में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के साथ ही गजनफर खान  को नए शहर  शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल बनाया था। गजनफर खान को बाद में कोतवाल के साथ ही  मीर-ए-आतिश (चीफ ऑफ आर्टिलरी) भी बना दिया गया।
 कोतवाल व्यवस्था खत्म-
1857 की क्रांति के बाद फिंरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसी के साथ दिल्ली में कोतवाल व्यवस्था भी खत्म हो गई। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के राज काल में उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा और मोती लाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे। 1857 की क्रांति के बाद फिरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर कत्लेआम शुरु किया तो गंगाधर अपनी पत्नी जियो देवी और चार संतानों के साथ आगरा चले गए। फ़रवरी 1861 में आगरा में ही उनकी मृत्यु हो गई। गंगाधर नेहरू की मृत्यु के तीन महीने बाद मोती लाल नेहरू का जन्म हुआ था।
आइने अकबरी के अनुसार जब शाही दरबार लगा होता था तब कोतवाल को भी दरबार में मौजूद रहना पड़ता था। वह रोजाना शहर की गतिविधियों की सूचनाएं चौकीदारों और अपने मुखबिरों के जरिए प्राप्त करता था।
 अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया-
1857 में अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया। उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा हुआ करती थी। साल 1912 में राजधानी बनने के बाद तक भी दिल्ली में पुलिस व्यवस्था पंजाब पुलिस की देखरेख में चलती रही। उसी समय दिल्ली का पहला मुख्य आयुक्त नियुक्त किया गया था। जिसे पुलिस महानिरीक्षक यानी आईजी के अधिकार  दिए गए थे उसका मुख्यालय अंबाला में था। 1912 के गजट के अनुसार उस समय दिल्ली की पुलिस का नियत्रंण एक डीआईजी रैंक के अधिकारी के हाथ में होता था। दिल्ली में पुलिस की कमान एक सुपरिटेंडेंट(एसपी)और डिप्टी एसपी के हाथों में थी। उस समय दिल्ली शहर की सुरक्षा के लिए दो इंस्पेक्टर, 27 सब-इंस्पेक्टर,110 हवलदार, 985  सिपाही और 28 घुडसवार थे। देहात के इलाके के लिए दो इंस्पेक्टर थे। उनका मुख्यालय सोनीपत और बल्लभगढ़ में था । उस समय तीन तहसील-सोनीपत, दिल्ली और बल्लभगढ़ के अंतर्गत 10 थाने आते थे ।
ऐतिहासिक 5 थाने-
अंग्रेजों ने 1861 में दिल्ली शहर और देहात में पांच थाने सब्जी मंडी, कोतवाली, सदर बाजार, महरौली और मुंडका(अब नांगलोई) बनाए थे। सिविल लाइन में पुलिस बैरक थी। 
कोतवाली थाने की ऐतिहासिक इमारत को बाद में गुरूद्वारा शीश गंज को दे दिया गया। देहात इलाके के लिए 1861 में बना नांगलोई थाना 1872 तक  मुंडका थाने के नाम से जाना जाता था। 
1946 में पुनर्गठन -
दिल्ली पुलिस का 1946 में पुनर्गठन किया और पुलिसवालों की संख्या दोगुनी कर दी गई। 1948 में दिल्ली में पहला पुलिस महानिरीक्षक डी डब्लू मेहरा को नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति 16 फरवरी को की गई थी इसलिए16 फरवरी को दिल्ली पुलिस का स्थापना दिवस मनाया जाता है। 1 जुलाई 1978 से दिल्ली में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी गई। 
पुलिस का इतिहास इतना गौरवशाली  रहा है। पुलिस में मौजूद ईमानदार अफसरों को इससे प्रेरणा लेकर पुलिस के गौरव को दोबारा स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी आने वाले समय में पुलिस की छवि फिर से चमकेगी। 
पुलिस मुख्यालय- 
31 अक्टूबर 2019 को दिल्ली पुलिस का मुख्यालय नई दिल्ली में संसद भवन के पास जयसिंह मार्ग स्थित अपनी नई बनी 17 मंजिला इमारत में चला गया। इसके पहले पुलिस मुख्यालय आईटीओ और कश्मीरी गेट में था। दिल्ली में इस समय 225 थाने हैं और पुलिस बल की संख्या लगभग 90 हजार  है। 
( लेखक इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।)



Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित लेख

Saturday, 20 December 2025

लेफ्टिनेंट कर्नल रिश्वतखोरी में गिरफ्तार, 2 करोड़ 36 लाख रुपये बरामद


लेफ्टिनेंट कर्नल रिश्वतखोरी में गिरफ्तार, 2 करोड़ 36 लाख रुपये बरामद


इंद्र वशिष्ठ, 
सीबीआई ने लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा और दुबई की कंपनी के विनोद कुमार को रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार किया है। लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा के घरों से दो करोड़ 36 लाख रुपये बरामद हुए हैं। सीबीआई प्रवक्ता के अनुसार 19.12.2025 को एक भरोसेमंद सूत्र से मिली जानकारी के आधार पर  लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा, डिप्टी प्लानिंग ऑफिसर, इंटरनेशनल कोऑपरेशन एंड एक्सपोर्ट्स, रक्षा उत्पादन विभाग, रक्षा मंत्रालय, उनकी पत्नी कर्नल काजल बाली, सीओ, 16 इन्फैंट्री डिवीजन ऑर्डनेंस यूनिट , श्रीगंगानगर, राजस्थान और अन्य, जिसमें दुबई की एक कंपनी भी शामिल है, के खिलाफ आपराधिक साजिश और रिश्वतखोरी आदि के आरोपों पर मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा, रक्षा उत्पादों के निर्माण, निर्यात आदि का काम करने वाली विभिन्न प्राइवेट कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ आपराधिक साजिश रचकर, उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाने के बदले उनसे अनुचित फायदा/रिश्वत लेकर आदतन भ्रष्ट और अवैध गतिविधियों में शामिल रहते हैं। यह भी आरोप है कि राजीव यादव और रवजीत सिंह आरोपी कंपनी के भारत में कामकाज को देखते हैं और बेंगलुरु में रहते हैं। वे लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा के साथ नियमित संपर्क में थे और उनके साथ मिलकर अपनी कंपनी के लिए विभिन्न सरकारी विभागों और मंत्रालयों से अवैध तरीकों से अनुचित फायदे हासिल करने की कोशिश कर रहे थे। विनोद कुमार ने उक्त कंपनी के कहने पर 18.12.2025 को लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा को 3 लाख रुपये की रिश्वत दी थी.श्रीगंगानगर, बेंगलुरु, जम्मू और अन्य जगहों पर तलाशी ली जा रही है।दिल्ली में लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा के घर की तलाशी के दौरान 3 लाख रुपये की रिश्वत की रकम के साथ-साथ 2,23,000,00/- रुपये नकद और श्री गंगानगर में आरोपी के घर से 10,00,000/- रुपये नकद, अन्य आपत्तिजनक सामग्री के अलावा जब्त किए गए हैं।

 नई दिल्ली में लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा के ऑफिस में भी तलाशी जारी है। दोनों आरोपी, लेफ्टिनेंट कर्नल दीपक कुमार शर्मा और विनोद कुमार, को कोर्ट में पेश किया गया। फिलहाल, वे 23.12.2025 तक पुलिस हिरासत रिमांड पर हैं।

दिल्ली पुलिस में सिपाही से डीसीपी तक 9248 पद खाली

दिल्ली पुलिस में सिपाही से लेकर डीसीपी तक के 9248 पद खाली 


इंद्र वशिष्ठ, 
दिल्ली पुलिस अफसरों/कर्मियों  की भारी कमी का सामना कर रही है। 
 सिपाही से लेकर डीसीपी तक रैंक-वार कुल 9248 पद खाली/ रिक्त हैं। इनमें सबसे ज्यादा पद सिपाही, हवलदार, एएसआई और सब-इंस्पेक्टर के खाली है। 
दिल्ली पुलिस के रैंक-वार कुल स्वीकृत पद 92044 है। इस समय दस फीसदी से ज्यादा पद रिक्त हैं। 
राज्य सभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने तृणमूल कांग्रेस के सांसद प्रकाश चिक बाराईक द्वारा पूछे सवाल के जवाब में यह जानकारी दी।30.11.2025 तक की स्थिति के अनुसार, दिल्ली पुलिस में रैंक-वार कुल स्वीकृत पदों और रिक्तियों का ब्योरा। 
स्वीकृत पद-  पुलिस कमिश्नर एक, स्पेशल कमिश्नर 11, ज्वाइंट कमिश्नर 22, एडिशनल कमिश्नर 20 डीसीपी/ एडिशनल डीसीपी 60, एडिशनल डीसीपी (जेएजी) 54, एसीपी 346, इंस्पेक्टर 1453, सब-इंस्पेक्टर 8087, एएसआई 7320, हवलदार 23724, सिपाही 50946 समेत कुल स्वीकृत पद 92044  है।
खाली पद-  डीसीपी/ एडिशनल डीसीपी 13, एडिशनल डीसीपी (जेएजी) जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड 15 , एसीपी 125, इंस्पेक्टर 108, सब-इंस्पेक्टर 1039, एएसआई 300, हवलदार 3057,सिपाही 4591 समेत कुल रिक्तियां 9248 है।
प्रक्रिया- गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बताया कि पदों का रिक्त होना एक गतिशील प्रक्रिया है, जो अन्य बातों के साथ-साथ सेवानिवृत्ति, पदोन्नति और त्यागपत्र आदि पर निर्भर करती है, और इन्हें भरना एक सतत प्रक्रिया है। रिक्तियों की सूचना, भर्ती करने वाली एजेंसियों को नियमित रूप से दी जाती है और भर्ती प्रक्रिया, जिसमें लिखित परीक्षा, शारीरिक परीक्षण और चिकित्सा परीक्षण शामिल हैं, के पूरा होने के बाद नियुक्तियों की जाती हैं।















Thursday, 18 December 2025

फिदायीन बनने की ठान चुका आतंकी गिरफ्तार, लाल किला बम धमाका मामले में नौंवी गिरफ्तारी


इंद्र वशिष्ठ, 
लालकिले के सामने हुए फिदायीन कार बम धमाके के मामले में यासिर अहमद डार को एनआईए ने गिरफ्तार किया है। यासिर अहमद फिदायीन बनने की ठान चुका था। आत्मघाती हमले को अंजाम देने की वह कसम भी खा चुका था।
 श्रीनगर(कश्मीर) के शोपियां का रहने वाला  यासिर अहमद डार इस मामले में गिरफ्तार होने वाला नौवां व्यक्ति है। उसे एनआईए ने  नई दिल्ली से पकड़ा। एनआईए की जांच में यासिर की उस  साजिश में सक्रिय भूमिका का पता चला है, जिसके तहत 10 नवंबर को लालकिले के सामने कार बम धमाका हुआ था।
 इस साजिश मे सक्रिय रूप से शामिल यासिर ने  निष्ठा की शपथ ली थी और आत्मबलिदान वाले अभियानों को अंजाम देने की कसम खाई थी।एनआईए की जांच में यह भी पता चला है कि यासिर इस मामले में अन्य आरोपियों के साथ करीबी संपर्क में था, जिसमें फिदायीन डाक्टर उमर उन नबी ( बम धमाके को अंजाम देने वाला ) और मुफ्ती इरफान शामिल हैं। विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम करते हुए, एनआईए आतंकी हमले के पीछे की पूरी साजिश का पता लगा रही है। 
इस महीने की शुरुआत में, एनआईए  ने जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश में कई आरोपियों और संदिग्धों के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर तलाशी ली थी और विभिन्न डिजिटल डिवाइस और अन्य आपत्तिजनक सामग्री जब्त की थी। इससे पहले, मुख्य आरोपी डॉ. मुजम्मिल शकील गनी और महिला डॉ. शाहीन सईद के फरीदाबाद (हरियाणा) में अल फलाह यूनिवर्सिटी कॉम्प्लेक्स और अन्य जगहों पर भी इसी तरह की तलाशी ली गई थी।
इस मामले में फिदायीन उमर के आठ अन्य प्रमुख सहयोगियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
आतंकी हमले की साज़िश में शामिल फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े बारामूला (जम्मू-कश्मीर) निवासी डॉ. बिलाल नसीर मल्ला को एनआईए ने 9 दिसंबर को गिरफ्तार किया। दिल्ली स्थित एनआईए के मुख्यालय में पूछताछ के बाद डॉ. बिलाल नसीर मल्ला को गिरफ्तार किया गया। 
एनआईए की जांच के अनुसार, बिलाल ने जानबूझकर फिदायीन हमलावर डाक्टर उमर उन नबी को पनाह दी और सामान आदि से भी उसकी सहायता की। डॉ. बिलाल नसीर मल्ला पर आतंकवादी हमले से संबंधित सबूतों को नष्ट करने का भी आरोप है। 
फिदायीन हमले से ठीक पहले आतंकवादी डाक्टर उमर उन नबी को शरण देने के आरोप में फरीदाबाद निवासी शोएब को एनआईए ने 26 नवंबर को गिरफ्तार किया था। एनआईए की जांच से पता चला है कि उसने 10 नवंबर को राजधानी में लाल किले के बाहर हुए कार बम विस्फोट से पहले आतंकवादी उमर को रसद/ सामान आदि सहायता भी प्रदान की थी। 
बताया जाता है कि जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने डॉ. मुजम्मिल को दबोचा तो उमर गायब हो गया। उमर नबी के छिपने की व्यवस्था शोएब ने ही की। उसने डॉक्टर उमर को अपनी रिश्तेदार के घर कमरा दिलवाया। यहां उमर दिल्ली धमाके से पहले (10 नवंबर) तक किराए पर रहा था। यहीं से उसने  दिल्ली जाकर धमाका किया था।




Tuesday, 9 December 2025

फिदायीन हमलावर को पनाह देने वाला डाक्टर गिरफ्तार , लाल किला बम धमाके में आठवीं गिरफ्तारी


फिदायीन हमलावर को पनाह देने वाला डाक्टर गिरफ्तार



इंद्र वशिष्ठ, 

लालकिले के सामने हुए फिदायीन बम विस्फोट मामले में मंगलवार को एनआईए ने एक और अहम आरोपी डॉ. बिलाल नसीर मल्ला को गिरफ्तार किया। 
फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़ा बारामूला (जम्मू-कश्मीर) निवासी डॉ. बिलाल नसीर मल्ला इस मामले में गिरफ्तार होने वाला आठवां आरोपी है। दिल्ली स्थित एनआईए के मुख्यालय में पूछताछ के बाद डॉ. बिलाल नसीर मल्ला को गिरफ्तार किया गया।
एनआईए ने उसे लाल किला के सामने हुए  हुए आतंकवादी हमले की साजिश में शामिल पाया। 
एनआईए की जांच के अनुसार, बिलाल ने जानबूझकर फिदायीन हमलावर डाक्टर उमर उन नबी को पनाह दी और सामान आदि से भी उसकी सहायता की। डॉ. बिलाल नसीर मल्ला पर आतंकवादी हमले से संबंधित सबूतों को नष्ट करने का भी आरोप है।
एनआईए ने इससे पहले इस मामले में फिदायीन उमर के सात अन्य प्रमुख सहयोगियों को गिरफ्तार किया था।
फिदायीन हमले से ठीक पहले आतंकवादी डाक्टर उमर उन नबी को शरण देने के आरोप में फरीदाबाद निवासी शोएब को एनआईए ने 26 नवंबर को गिरफ्तार किया था। एनआईए की जांच से पता चला है कि उसने 10 नवंबर को राजधानी में लाल किले के बाहर हुए कार बम विस्फोट से पहले आतंकवादी उमर को रसद/ सामान आदि सहायता भी प्रदान की थी। 
बताया जाता है कि जब जम्मू-कश्मीर पुलिस ने डॉ. मुजम्मिल को दबोचा तो उमर गायब हो गया। उमर नबी के छिपने की व्यवस्था शोएब ने ही की। उसने डॉक्टर उमर को अपनी रिश्तेदार के घर कमरा दिलवाया। यहां उमर दिल्ली धमाके से पहले (10 नवंबर) तक किराए पर रहा था। यहीं से उसने  दिल्ली जाकर धमाका किया था।
एनआईए इस घातक आतंकवादी कृत्य के पीछे की साजिश की जाँच जारी रखे हुए है। आतंकवाद निरोधी एजेंसी साजिश के सभी पहलुओं को उजागर करने के लिए विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रही है।