Tuesday, 3 November 2026

कमिश्नर- IPS जीरो, ACP बन गया हीरो, आईपीएस खाकी को खाक में मत मिलाओ

           एसीपी मनस्वी वशिष्ठ 

कमिश्नर- आईपीएस खाकी को खाक में मत मिलाओ


उसूलों पर जहाँ आँच आए तो टकराना ज़रूरी है, 
जो ज़िंदा हों तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है।    वसीम बरेलवी



इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की भूमिका पुलिस - वकील मामले में बिल्कुल भी पद के अनुरूप नहीं है। पुलिस बल के मुखिया के रुप में वह कमज़ोर कमिश्नर साबित हुए है। कमिश्नर ने शायद कुर्सी के मोह में मातहतों को एक तरह से अनाथ छोड़ दिया है। जिससे पुलिस बल का मनोबल गिरा है। इस मामले में सैकड़ों पुलिसकर्मी (सिपाही - इंस्पेक्टर) और एसीपी मनस्वी वशिष्ठ हीरो बन गए है जबकि पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी जीरो साबित हो गए। वकीलों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के कारण बेशक एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन पुलिसकर्मियों के दिलोदिमाग़ और पुलिस के इतिहास में उसका नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया। 
कमिश्नर काबिल हो-
पुलिस कमिश्नर अगर पेशेवर रूप से काबिल न हो, तभी मातहतों को अपने हक़, सम्मान और सुरक्षा के लिए धरना- प्रदर्शन करना पड़ता है। साल 2019 में भी तीस हजारी कांड के बाद तत्कालीन कायर, नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मियों ने पुलिस मुख्यालय पर जबरदस्त प्रदर्शन किया था। अब अनुराग कुमार भी अब अमूल्य पटनायक की तरह याद किए जाएंगे। 
वीडियो में साफ़-
शाहदरा थाना में हुए बवाल/झगड़े के जो वीडियो वायरल हैं उनमें साफ़ साफ़ पता चलता है कि वकील आदि ने एक व्यक्ति के साथ मारपीट की, आत्मरक्षा में उस व्यक्ति ने हमला
करने वाले के सिर पर मेज पर रखी जाने वाली नेम प्लेट से वार किया। 
एक वीडियो में एक वकील एसएचओ अरुण को धमकाता और बदतमीजी करने हुए साफ दिखाई दे रहा है। एक वीडियो में एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के सामने ही वकील एसएचओ से बदतमीज़ी, हाथापाई/खींचतान और  धमकी देते हुए दिखाई दे रहे हैं। 
एसीपी ने वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर दी। जिस पर वकीलों ने हड़ताल कर दी। 
जबकि वीडियो में पुलिस किसी के साथ बदसलूकी करते हुए तो नज़र नहीं आ रही। 
एसीपी- एसएचओ का तबादला-
इसके बावजूद गांधीनगर एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और एसएचओ अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया। जिससे पुलिस में रोष व्याप्त हो गया। 
पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन-
दो नवंबर को एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के नेतृत्व में  सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन किया। महिला पुलिसकर्मियों ने भी वकीलों द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार के बारे में मीडिया को भी बताया।
दगाबाज एस एच ओ-
एस एच ओ अरुण प्रदर्शन में शामिल नहीं हुआ। जबकि एस एच ओ के साथ हुई बदसलूकी के लिए ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने अपना करियर दांव पर लगा दिया। 
दुखड़ा सुनाया-
पुलिस मुख्यालय के सभागार में पुलिसकर्मियों ने कमिश्नर अनुराग कुमार और अन्य आईपीएस अधिकारियों के सामने अपना दुखड़ा सुनाया। लेकिन पुलिस कमिश्नर अनुराग पीड़ित पुलिसकर्मियों को संतुष्ट नहीं कर पाए। जिसकी वजह से पुलिसकर्मियों ने मुख्यालय के गेट पर धरना दिया। 
कमिश्नर- आईपीएस की भूमिका पर सवाल-
इस मामले ने पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार, स्पेशल पुलिस कमिश्नर (कानून एवं व्यवस्था) देवेश श्रीवास्तव, पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त आयुक्त मिलिंद महादेव डुंबरे और शाहदरा के डीसीपी आर पी मीणा की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। 
इन अफसरों ने इस मामले में आधिकारिक रूप से मीडिया के सामने पूरे घटना क्रम की  जानकारी क्यों नहीं दी ? आधिकारिक रूप से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की ? 
कमिश्नर के पास तो भारी भरकम पीआरओ ब्रांच / मीडिया सेल भी है। मीडिया सेल की प्रमुख स्पेशल पुलिस कमिश्नर सिंधु पिल्लै, पीआरओ एडिशनल कमिश्नर राजीव रंजन, डीसीपी नेहा यादव और एडिशनल पीआरओ एसीपी रंजय अत्रिष्य हैं। इतना बड़ा लाव लश्कर किस काम का, अगर वह अपने मातहतों के साथ हुई बदसलूकी के मामले में भी पुलिस का पक्ष तथ्यों, साक्ष्यों, वीडियो सहित मीडिया के सामने आधिकारिक तौर पर नहीं रख सकता।  क्या आईपीएस अधिकारी सिर्फ चोर, लुटेरे आदि पकड़े जाने का मीडिया में प्रचार करने के ही लायक हैं।
सच्चाई सामने क्यों नहीं लाते -
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को शाहदरा थाने के सीसीटीवी कैमरे के सभी फुटेज मीडिया के सामने पेश करने चाहिए। जिससे बिल्कुल साफ हो जाएगा कि थाने में पुलिस ने गुंडागर्दी की थी या वकीलों ने। यहीं नहीं सीसीटीवी कैमरे की फुटेज वकीलों की एसोसिएशन और हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट को भी भेजी जानी चाहिए। ताकि इस तरह की समस्या का कोई स्थायी हल निकाला जा सके।  
बलि का बकरा-
कमिश्नर ने तो बस तुरंत दो पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया। इससे तो यह ही संदेश गया कि वकीलों के दबाव के कारण एसीपी, एसएचओ को बलि का बकरा बना दिया गया।  
क्या कमिश्नर अनुराग कुमार ने कोई जांच पड़ताल की थी, जिसमें दोनों अफसर कसूरवार पाए गए ?
पीड़ितों से मिलते-
पुलिस कमिश्नर ने वकीलों की एसोसिएशन के साथ तो 30 अक्टूबर को बैठक कर ली, लेकिन उसके पहले पीड़ित अफसरों से मिलना भी जरूरी नहीं समझा। 
इसीलिए मजबूर होकर पीड़ित पुलिसकर्मियों ने ख़ुद पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार से मिलने की गुहार लगाई। 
कमिश्नर- आईपीएस जिम्मेदार-
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने दो नवंबर को पुलिस मुख्यालय जाने और कमिश्नर अनुराग कुमार से मिलने की घोषणा दो दिन पहले ही वीडियो जारी करके और पत्र लिखकर कर दी थी। 
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और आईपीएस अधिकारी अगर मामले को गंभीरता से लेते तो सैंकड़ों पुलिसकर्मियों को प्रदर्शन नही करना पड़ता। जैसे ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने पुलिस मुख्यालय जाने की बात की थी, तभी कमिश्नर अनुराग कुमार और आईपीएस अधिकारियों को पुलिसकर्मियों को बुला कर उनकी समस्या का समाधान करना चाहिए था। 
गृह मंत्री कमिश्नर को हटाएं-
गृह मंत्री अमित शाह को  हटाना  तो कमिश्नर अनुराग कुमार और संबंधित आईपीएस अधिकारियों को चाहिए। जो शायद अपने  अहंकार / अति आत्मविश्वास में  इस मामले की गंभीरता का सही आकलन नहीं कर पाए। कमिश्नर के गैर पेशेवर रवैये के कारण ही सैकड़ों पुलिसकर्मियों को प्रदर्शन जैसा कदम उठाना पड़ा। 
पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शन करना अनुशासनहीनता माना जाता है लेकिन
पीड़ित पुलिसकर्मियों द्वारा अपना दुखड़ा अपने मुखिया को बताने के लिए मुख्यालय पर एकत्र होना अनुशासनहीनता नहीं मानी जा सकती। 
कमिश्नर जागो-
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार या तो इस मामले की गंभीरता नहीं समझ रहे या उनका मकसद सिर्फ किसी तरह अपना कार्यकाल कथित शांति से निकाल देना ही है। 
वकीलों का पुलिस के साथ टकराव दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। अगर इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। 
इसके लिए जिम्मेदार पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी ही होंगे। पुलिस कमिश्नर अगर दमदार होते तो वह एसीपी को सस्पेंड नहीं होने देते। 
वकीलों की भूमिका-
वैसे कानून हाथ में लेने का अधिकार तो किसी को भी नहीं है। वकील तो कानून के बेहतर जानकर माने जाते है। उन्हें भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे उनके पेशे पर कलंक लगे। वकीलों के आरोप अगर सही हैं तो उन्हें भी अपने आरोप साबित करने के लिए यह मांग करनी चाहिए कि शाहदरा थाना के सीसीटीवी कैमरे के फुटेज आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए जाए। इससे स्पष्ट पता चल जाएगा कि कसूरवार कौन है। 
आईपीएस को सस्पेंड क्यों नहीं किया-
जंतर मंतर मामले में प्रदर्शनकारियों पर  पैलेट गन चलाने का आदेश देने वाले आईपीएस राजा बांठिया, लाठी चार्ज, आंसू गैस चलाने की अनुमति देने वाले डीसीपी सचिन शर्मा को तो सस्पेंड नहीं किया गया। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। लेकिन उपरोक्त अफसरों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। 
शंकर चौधरी को गिरफ्तार करके दिखाएं-
आईपीएस शंकर चौधरी के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने विदेशी नागरिक को बंधक बनाकर 35 लाख रुपये वसूलने के आरोप में फरवरी 2026 में मामला दर्ज किया था।  शंकर चौधरी को गिरफ्तार करके कमिश्नर अपना दम और काबलियत दिखाएं। पीड़ित एसीपी/ मातहतों पर कार्रवाई करना कोई बहादुरी नहीं होती। 
मनोबल गिरा-
वकीलों के अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज उठाने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना पुलिस का मनोबल गिराने वाला काम है।
पुलिस ने निभाया भाईचारा-
नई दिल्ली जिला पुलिस ने भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का उल्लघंन करने वाले प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों को डिटेन न करके अपना भाईचारा/ समर्थन तो जाहिर कर ही दिया। हालांकि इसी पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रदर्शन की खबर कवर वाले पत्रकारों तक को डिटेन किया था। 
साल 2019 में पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने वाले हजारों पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ तो कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी। 
गिरेबान में झांक लो -
वकीलों के अत्याचार की शिकायत करने वाली पुलिस , यह भूल जाती है वह आम आदमी से खुद कितनी बदतमीजी से बात करते हैं। इसीलिए पुलिसकर्मियों की जब पिटाई होती है तो आम आदमी खुश होता है। हालांकि पुलिस हो या वकील किसी को भी किसी के साथ बदतमीजी या मारपीट करने का अधिकार नहीं है। दोनों को ही अपने पेशे की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। 
पुलिसकर्मियों सुधर जाओ-
पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। पुलिस आम आदमी से सीधे मुंह बात तक नहीं करती। आम आदमी आज भी अकेले थाने में जाने से डरता है।  इसलिए पुलिस को जब वकील या बदमाश पीटते हैं तो लोगों की रत्ती भर भी हमदर्दी पुलिस के साथ नहीं होती। 

 काले कोट के काले कारनामे-

लॉरेंस का वकील अपराध में शामिल -
कुख्यात लॉरेंस बिश्नोई के वकील दीपक नंदा उर्फ दीपक खत्री को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने अगस्त 2026 में गिरफ्तार किया था।
दीपक नंदा को अंतरराष्ट्रीय हथियार तस्करी सिंडिकेट और जबरन वसूली से जुड़े यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) मामले में गिरफ्तार किया गया था। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि दीपक नंदा ने साल 2019 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा स्थित श्री वेंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी से जो बीए एल एल बी में दाखिला लिया था, उसकी 12वीं कक्षा की मार्कशीट और दस्तावेज फर्जी थे।
अमरोहा के रजबपुर थाने में उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का अलग से मामला दर्ज किया गया है।

वकीलों की गैंगवार, 5 वकील गिरफ्तार, 
देसी तमंचे, कारतूस बरामद 
5 जुलाई 2023 को तीस हजारी कोर्ट परिसर में दिल्ली बार एसोसिएशन के दो पदाधिकारियों के गिरोहों के बीच गोलीबारी/ गैंगवार के  मामले में पुलिस ने मनीष शर्मा (वरिष्ठ उपाध्यक्ष डीबीए) और दूसरी तरफ से ललित शर्मा (अतुल शर्मा  सचिव डीबीए का भाई ) समेत 5-6 वकीलों को गिरफ्तार किया गया। उनसे तीन देसी तमंचे और कारतूस बरामद हुए। अपराधियों की तरह गोलीबारी करके वकालत के पेशे को शर्मसार करने वाले वकीलों से इतने अवैध हथियारों के बरामद होने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये वकीलों के वेश में छुपे हुए गुंडे हैं।

खाकी की छाती पर काले कोट का तांडव
2 नवंबर 2019 को तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे/दंगाई जैसे वकीलों ने  पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया और आगज़नी की। तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह दुम दबा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने तो बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज कराने की भी हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार सिंह को भी वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। मोनिका भारद्वाज तो अपने घायल आपरेटर सिपाही संदीप का हाल जानने तक नहीं गई। 5 नवंबर को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था। 7 नवंबर को पुलिस कमिश्नरऔर डीसीपी मोनिका भारद्वाज पुलिस वालों का हाल जानने गए।
 


आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो

जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर उत्तर जिले के तत्कालीन डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली गोली) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।  
वर्दी वाले गुंडे-
दूसरी ओर एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया गया। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। 
कमिश्नर की भूमिका-
खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा द्वारा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
सत्ता के लठैत- 
सच्चाई यह है कि आईपीएस अधिकारी सिर्फ बातें ही ईमानदारी/ निष्पक्षता/ कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं , बल्कि राजनेताओं के लठैत की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी साल 2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में आंसू गैस छोड़ी गई, लाठीचार्ज किया गया था। तब पुलिस से बचने के लिए महिलाओं वाला सूट- सलवार पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 
आत्मरक्षा का अधिकार-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी बेकसूर व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर अधिकार होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। कानून का खुद पालन न करने वाले पुलिसकर्मी को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।

आईपीएस अफसरों जागो, खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ। आईपीएस अगर ईमानदार हो, तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है। अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता के लठैत मत बनो। 

(इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।)




Monday, 5 October 2026

प्रशांत विहार थाने का रिश्वतखोर सब-इंस्पेक्टर गिरफ्तार

इंद्र वशिष्ठ, 
सीबीआई ने दिल्ली पुलिस के रोहिणी जिले के प्रशांत विहार थाने में तैनातसब-इंस्पेक्टर लेखराज को एक लाख रुपये की रिश्वतखोरी में गिरफ्तार किया है। 
सीबीआई ने एक शिकायत के आधार पर सब-इंस्पेक्टर लेखराज के खिलाफ़ 04.10.2026 को यह मामला दर्ज किया। 
आरोप है कि सब-इंस्पेक्टर (जांच अधिकारी)  लेखराज ने शिकायतकर्ता से प्रशांत विहार थाने में उसके खिलाफ़ दर्ज एक आपराधिक मामले में राहत देने के बदले एक लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी। शिकायतकर्ता की तलाशी के दौरान, सब-इंस्पेक्टर ने ज़बरदस्ती उसकी जेब से 20,000 रुपये निकाल लिए।
सब-इंस्पेक्टर लेखराज ने शिकायतकर्ता से बाकी के 80,000 रुपये अगले दिन लाने को कहा। 
सब-इंस्पेक्टर लेखराज ठगी के मामले में अग्रिम जमानत मिलने के बाद भी शिकायतकर्ता को परेशान कर रहा था और मामले में राहत देने के एवज में 1 लाख रुपये की रिश्वत मांग रहा था।सीबीआई ने 04.10.2026 को जाल बिछाया और सब-इंस्पेक्टर लेखराज को शिकायतकर्ता से 80,000 रुपये मांगते और लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। 







Wednesday, 16 September 2026

शहज़ाद भट्टी नेटवर्क आतंकवादी संगठन घोषित



शहज़ाद भट्टी नेटवर्क आतंकवादी संगठन घोषित 



इंद्र वशिष्ठ, 
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी (आईएसआई) के पाले हुए शहज़ाद भट्टी के नेटवर्क को गैरकानूनी गतिविधियां निरोधक अधिनियम (यूएपीए) के तहत आतंकवादी संगठन घोषित किया है
यह सिंडिकेट/ नेटवर्क हथियारों, विस्फोटकों और नशीले पदार्थों की सीमा-पार तस्करी में शामिल है, साथ ही युवाओं और छोटे-मोटे अपराधियों को आतंकवाद के लिए उकसाता है। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे और सांप्रदायिक सद्भाव को निशाना बनाते हुए, यह सिंडिकेट नफ़रत फैलाने वाला डिजिटल कंटेंट भी प्रकाशित करता था।
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री  की आतंकवाद के ख़िलाफ़ जीरो टॉलरेंस की सोच को आगे बढ़ाते हुए, गृह मंत्रालय ने शहज़ाद भट्टी नेटवर्क को आतंकवादी संगठन घोषित किया है।
एसबीएन एक ऐसा संगठन है जिसका उद्देश्य देश के भोले-भाले युवाओं और स्थानीय अपराधियों को शामिल करके सीमा पार से हथियारों, विस्फोटकों व नशीले पदाथों की तस्करी तथा आतंकवादी क्रियाकलापों के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, सांप्रदायिक सौहार्द और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करना है।
सिंडिकेट पर प्रहार-
पिछले महीने स्वतंत्रता दिवस से पहले शहजाद भट्टी नेटवर्क के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने 14 राज्यों में अभियान चला कर इस आतंकी सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान नेटवर्क के खिलाफ 80 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई और 200 से ज्यादा सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था।
आईएसआई से फंड- 
आईएसआई से फंड पाने वाले इस समूह के पास से भारी मात्रा में सामग्री बरामद की गई थी, जिसमें आईईडी/बम , पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री के निशान वाले हथगोले/ ग्रेनेड, पिस्तौल, कारतूस और जासूसी के लिए इस्तेमाल होने वाले सीसीटीवी कैमरे शामिल थे। यह नेटवर्क कई आतंकी गतिविधियों में शामिल था। शहजाद भट्टी का आतंकी सिंडिकेट भारत में ग्रेनेड, आईईडी और पेट्रोल बम हमलों तथा टारगेटेड किलिंग में शामिल है। ये स्थानीय सहयोगियों को पैसे देकर पुलिस, रक्षा और धार्मिक स्थलों की रेकी करवाता था और जासूसी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगवाता था।
लॉरेंस बिश्नोई का यार-
पहले सोशल मीडिया पर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के साथ शहजाद भट्टी के दोस्ताना रिश्तों और उनके वीडियो कॉल वायरल हो चुके हैं। अब दोनों एक दूसरे के दुश्मन हो गए बताते हैं। बिश्नोई जैसे गद्दारों के कारण ही पाकिस्तानी भारत में अपना आतंकी सिंडिकेट बना पाते हैं।



Friday, 28 August 2026

40 लाख रुपये लेते सीजीएसटी के एडिशनल कमिश्नर और सुपरिटेंडेंट गिरफ्तार, 43 लाख रुपये नकद और 90 लाख के गहने बरामद


इंद्र वशिष्ठ,
सीबीआई ने 40 लाख रुपये रिश्वत लेने के मामले में महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले में सीजीएसटी के एडिशनल कमिश्नर विनय कुमार कंठेती (आईआरएस -2009) , सुपरिटेंडेंट राकेश कुमार सिन्हा और नरेंद्र राजपूत (निजी व्यक्ति) को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के ठिकानों पर तलाशी के दौरान 43 लाख रुपये नकद और लगभग 90 लाख रुपये की कीमत के गहने बरामद किए गए।
सीबीआई ने 26 अगस्त 2026 को सीजीएसटी के आरोपी सुपरिटेंडेंट के ख़िलाफ़ यह मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने शिकायतकर्ता की पत्थर की खदान वाली फ़र्म से जुड़े जीएसटी /रॉयल्टी के मामले को निपटाने के लिए 1.50 करोड़ रुपये की रिश्वत की मांग की थी। बातचीत के बाद, यह मांग घटाकर 40 लाख रुपये कर दी गई। आरोपी सरकारी अधिकारियों ने एक प्राइवेट व्यक्ति के ज़रिए रिश्वत की रक़म लेने का इंतज़ाम किया था और शिकायतकर्ता को उसी के अनुसार निर्देश दिए थे। सीबीआई ने जाल बिछाया और प्राइवेट व्यक्ति नरेंद्र राजपूत को 40 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया। बाद में,  आरोपी सुपरिटेंडेंट राकेश सिन्हा और  एडिशनल कमिश्नर विनय कुमार कंठेती, दोनों ने रिश्वत की रक़म लेने की बात स्वीकार की। तीनों आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया। आरोपियों के ठिकानों पर तलाशी के दौरान 43 लाख रुपये नकद और लगभग 90 लाख रुपये की कीमत के गहने बरामद किए गए।


Monday, 17 August 2026

आईएसआई के पालतू आतंकी 'शहज़ाद भट्टी के नेटवर्क का भारत ने भट्ठा बिठा दिया , 200 से ज़्यादा गिरफ़्तार, लॉरेंस बिश्नोई का पुराना यार


आईएसआई के पालतू आतंकी 'शहज़ाद भट्टी के नेटवर्क का भारत ने भट्ठा बिठा दिया

200 से ज़्यादा गिरफ़्तार, 

लॉरेंस बिश्नोई का पुराना यार



इंद्र वशिष्ठ, 
स्वतंत्रता दिवस से पहले पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी (आईएसआई) के पालतू शाहजाद भट्टी नेटवर्क (एसबीएन) के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने बहु-राज्यीय अभियान चला कर इस आतंकी सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है।
इस दौरान 14 राज्यों में 253 लोग हिरासत में लिए गए हैं। नेटवर्क के खिलाफ 80 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई और 200 से ज्यादा सदस्यों को गिरफ्तार किया गया हैं।

दिल्ली में 51 पकड़े-
स्वतंत्रता दिवस के आसपास इस नेटवर्क से जुड़ी संभावित गड़बड़ियों को रोकने के लिए 12 अगस्त को राज्य पुलिस बलों के साथ रियल-टाइम खुफिया जानकारी साझा करने वाली प्रणाली के जरिए समन्वित बहु-राज्यीय अभियान चलाया गया। इसमें 14 राज्यों में 253 लोगों को हिरासत में लिया गया। उत्तर प्रदेश (62), हरियाणा (52), दिल्ली (51), पंजाब (44), राजस्थान (15), महाराष्ट्र (8), उत्तराखंड (5), कर्नाटक, गुजरात और बिहार (3-3) तथा तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और केरल(2-2) व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया। दिल्ली और कर्नाटक में नई एफआईआर भी दर्ज की गई हैं।
मंसूबे नाकाम-
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार ने आतंकी समूह 'शहज़ाद भट्टी नेटवर्क' के 200 से ज़्यादा सदस्यों को गिरफ़्तार कर उसके खतरनाक हमलों के मंसूबों को नाकाम कर दिया।
गृहमंत्री ने कहा कि भारतीय सुरक्षा बलों ने 14 राज्यों में अलग-अलग जगह पर एक साथ ऑपरेशन चलाकर इस नेटवर्क को ध्वस्त किया, जो आतंकवाद के प्रति भारत की 'ज़ीरो-टॉलरेंस' नीति का एक बेहतरीन उदाहरण है। 
आईएसआई से फंड-
आईएसआई  से फंड पाने वाले इस समूह के पास से भारी मात्रा में सामग्री बरामद की गई, जिसमें आईईडी/बम , पाकिस्तान ऑर्डनेंस फैक्ट्री के निशान वाले हथगोले/ ग्रेनेड, पिस्तौल, कारतूस और जासूसी के लिए इस्तेमाल होने वाले सीसीटीवी  कैमरे शामिल थे। यह नेटवर्क कई आतंकी गतिविधियों में शामिल था।

शाहजाद भट्टी का आतंकी सिंडिकेट भारत में ग्रेनेड, आईईडी और पेट्रोल बम हमलों तथा टारगेटेड किलिंग में शामिल है। ये स्थानीय सहयोगियों को पैसे देकर पुलिस, रक्षा और धार्मिक स्थलों की रेकी करवाता था और जासूसी के लिए सीसीटीवी कैमरे लगवाता था।
 इनके खिलाफ़ यूएपीए, बीएनएस, आर्म्स एक्ट, नारकोटिक्स एक्ट और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए हैं। 

बिश्नोई का यार-
पहले सोशल मीडिया पर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के साथ शहजाद भट्टी के दोस्ताना रिश्तों और वीडियो कॉल वायरल हो चुके हैं। 
अब दोनों एक दूसरे के दुश्मन हो गए बताते हैं।
बिश्नोई जैसे गद्दारों के कारण ही पाकिस्तानी भारत में अपना आतंकी सिंडिकेट बना पाते हैं। 









Wednesday, 29 July 2026

कमिश्नर-डीसीपी: जंतर मंतर का जनरल डायर कौन ? आईपीएस अफसरों सत्ता के लठैत मत बनो


                कमिश्नर अनुराग कुमार
 ‌     डीसीपी राजा बांठिया, डीसीपी सचिन शर्मा

        ‌‌‌ 


जंतर मंतर के जनरल डायर 





इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलवा कर जनरल डायर को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस की झूठ की पोल खुल गई है।
अब यह सनसनीखेज खुलासा हो गया है कि उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। 
उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया, 
आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट सतीश कुमार सांगवान के साथ ड्यूटी पर थे, उन्होंने  प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आरएएफ को कार्रवाई करने का आदेश दिया। संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी (रोजनामचे) में आरएएफ के अधिकारी ने दर्ज कराया है कि आरएएफ ने इस कार्रवाई में 55 नॉन-इलेक्ट्रिक शेल, 15 इलेक्ट्रिक शेल, 5 टियर स्मोक ग्रेनेड, 1 एंटी-रायट गन तथा प्लास्टिक पैलेट के 2 राउंड का इस्तेमाल किया। 20 जुलाई की इस कार्रवाई के बारे में 22 जुलाई को रोजनामचे में दर्ज किया जाता आश्चर्यजनक है। 
आधिकारिक आदेश चाहे किसी आईपीएस अफसर ने दिया हो। जिम्मेदारी तो पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की बनती है। 
कानून-
दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 की धारा 70(1)( बी ) सरकार को एसीपी और उससे ऊपर के रैंक के पुलिस अधिकारियों को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ प्रदान करने का अधिकार देती है।
डीसीपी ने, कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए, 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ रैपिड एक्शन फोर्स ( आरएएफ ) को आंसू गैस, लाठीचार्ज और बंदूक/आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।
डीसीपी सचिन शर्मा ने, नई दिल्ली जिला, जंतर-मंतर में उपस्थित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के तौर पर, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 149 (दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 130) के तहत, यूनिट D/103 के असिस्टेंट कमांडेंट दिलवार (क्रमांक 104) को निर्देश दिए कि वह गैस/लाठीचार्ज/आग्नेयास्त्रों का प्रयोग कर गैर कानूनी जमावड़े को तितर-बितर करें अथवा उसमें शामिल व्यक्तियों को गिरफ्तार कर हिरासत में लें। यह आदेश 20/07/26 को शाम लगभग 5 बजे नई दिल्ली जिले में जारी किया गया
यह अनुमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएएफ के जवान स्वयं इस प्रकार के बल प्रयोग का निर्णय नहीं लेते 12-बोर पंप-एक्शन बंदूक के इस्तेमाल का निर्णय आरएएफ स्वयं नहीं कर सकती। यदि परिस्थितियाँ इसकी मांग करती हैं, तो यह निर्णय मौके पर मौजूद कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा लिया जाता है।  इस प्रक्रिया में औपचारिक दस्तावेज़ीकरण होता है, जिसमें कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षरित लिखित अनुमति शामिल होती है।
डीसीपी जवाब दें-
डीसीपी राजा बांठिया और डीसीपी सचिन शर्मा बताएं कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन और बंदूक (आग्नेयास्त्रों) के इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी

वर्दी वाले गुंडे, लांबा, राठी 
दूसरी ओर एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी (मंडावली थाना)जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया है। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
कमिश्नर की भूमिका-
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
गृहमंत्री अमित शाह को इन दोनों अफसरों को जेल भेज कर वर्दी वाले गुंडों को सबक सिखाना चाहिए। 
गृहमंत्री की भूमिका-
वैसे तो दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ/आरएएफ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर जो जुल्म किए हैं उसके लिए सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है क्योंकि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ उनके मातहत है। इसलिए पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दायित्व गृहमंत्री का है। 
कमिश्नर जिम्मेदार-
पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के चहेते है इसलिए उन्हें  पद से हटाया नहीं गया। अनुराग कुमार अगर गृह मंत्री के चहेते न होते तो, अगमू कैडर में उनसे सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई को आनन-फानन में कमिश्नर नहीं बनाया जाता। वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों पर जुल्म करने  का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा। 
जवाब दो-
कमिश्नर अनुराग कुमार और तमाम आईपीएस अधिकारी अगर ईमानदार हैं, तो वह सिर्फ एक सवाल का ही जवाब दे दें , कि क्या किसी लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में लाठी घुसाना/मारना और लड़की को थप्पड़ मारना कानून की नज़र में अपराध है या नहीं ? 
आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो-
आईपीएस सिर्फ बातें ही ईमानदारी/कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं, बल्कि राजनेताओं के गुलाम/ दास की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी दल की हो महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी 4-6-2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था। तब सलवार  पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 
धर्म ना देखो अपराधी का -- रामलीला मैदान की बहादुर पुलिस को 21 जुलाई 2012 को सरकारी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की कोशिश करने वाले गुंड़ों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। माहौल बिगाड़ने लिए जिम्मेदार बिल्डर नेता शोएब इकबाल के खिलाफ पुलिस ने पहले ही कोई कार्रवाई नहीं की थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि गुंड़ों ने पुलिस को पीटा, पथराव और आगजनी की। लेकिन अफसरों ने यहां गुंड़ों पर भी  रामलीला मैदान जैसी मर्दानगी दिखाने का आदेश पुलिस को  नहीं दिया। इस तरह आईपीएस अफसर भी नेताओं के इशारे पर पुलिस का इस्तेमाल कहीं बेकसूरों को पीटने के लिए करते है तो कहीं गुंड़ों से भी पिटने देते है। अफसरों की इस तरह की हरकत से निचले स्तर के पुलिसवालों में रोष पैदा हो गया था।

जेल भेजो-
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा और इंसपेक्टर नवीन राठी जैसे पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लड़कियों के साथ बदसलूकी और पिटाई करने वाले संदीप लांबा और नवीन राठी जैसे नामर्दो की जगह जेल है। 
जनता को आत्मरक्षा का अधिकार मिले-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर हक होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। 
कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उसके ख़िलाफ़ अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। कानून का पालन न करने वाले कानून के रखवाले को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।
ऐसे वर्दी वाले गुंडों के कारण ही पुलिस की छवि दिनों दिन खराब हो रही है और इसलिए आम आदमी पुलिस से नफ़रत करते हैं। 
आईपीएस कितने बहादुर-
ऐसे कायर पुलिसकर्मी सिर्फ लड़कियों, बच्चों, छात्रों और असहाय लोगों को पीट कर अपनी बहादुरी दिखा सकते है। जबकि जहां बहादुरी दिखाना चाहिए वहां ये दुम दबाकर कर भाग जाते हैं। 
साल 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे वकीलों ने पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया था। तब इनकी बहादुरी/ मर्दानगी कहां चली गई थी? 
तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह जान बचा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार सिंह को वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। 
तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। पहली बार दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था।
साल 2018 में उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर का गिरेबान सांसद मनोज तिवारी ने पकड़ा था, सारी दुनिया ने ये दृश्य देखा। लेकिन पलटवार करना तो दूर आईपीएस अतुल ठाकुर की मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने की भी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे आईपीएस सिर्फ जनता और अपने मातहतों के सामने ही खुद को बड़ा बहादुर दिखाते है। 
जंतर मंतर पर मध्य रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा को भी तैनात किया गया। ये वही मधुर वर्मा हैं, जिनकी गुंडागर्दी ने 2019 में मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। नई दिल्ली जिले के डीसीपी के पद पर रहते हुए मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने पिटाई करने की बकायदा विजिलेंस में शिकायत की थी। लेकिन तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और गृह मंत्रालय ने मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की।  वैसे मधुर वर्मा के कारनामों की गूंज चंडीगढ़ में भी रही है।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एडिशनल पुलिस कमिश्नर राजीव रंजन से इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए अनेक बार कोशिश की गई।











Tuesday, 28 July 2026

पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की वर्दी पर लगा जंतर मंतर का दाग, गृहमंत्री : दुर्योधन- दुशासन को जेल भेजो





गृहमंत्री  : लांबा को लंबा करो, राठी को लाठी दो

कमिश्नर की वर्दी पर लागा जंतर मंतर का दाग




इंद्र वशिष्ठ, 
दिल्ली पुलिस की छवि उसकी करतूतों के कारण दिनोंदिन खराब हो रही है। लोगों का पुलिस में रत्ती भर भरोसा नहीं है। आम आदमी से पुलिस सीधे मुंह बात तक नहीं करती। इसलिए जब पुलिस की पिटाई होती है तो लोग खुश होते हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। पुलिसकर्मी हत्या, लूट, वसूली जैसे अपराध तक में लिप्त पाए जाते है। 
ऐसे में एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी(मंडावली थाना) जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया है। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
गृहमंत्री अमित शाह को इन दोनों अफसरों को जेल भेज कर वर्दी वाले गुंडों को सबक सिखाना चाहिए। 
गृहमंत्री एक्शन लो -
वैसे तो दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ/आरएएफ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर जो जुल्म किए हैं उसके लिए सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है क्योंकि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ उनके मातहत है। इसलिए पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दायित्व गृहमंत्री का है। 
लड़कियों/ छात्राओं  से बदसलूकी/ मारपीट करने वाले पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने से बेटी बचाओ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
कमिश्नर जिम्मेदार -
पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के चहेते है इसलिए उन्हें  पद से हटाया नहीं गया। अनुराग कुमार अगर गृह मंत्री के चहेते न होते तो, अगमू कैडर में उनसे सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई को आनन-फानन में कमिश्नर नहीं बनाया जाता। वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों की पिटाई का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा। 
कमिश्नर जवाब दें-
कमिश्नर अनुराग कुमार और तमाम आईपीएस अधिकारी अगर ईमानदार हैं, तो वह सिर्फ एक सवाल का ही जवाब दे दें , कि क्या किसी लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में लाठी घुसाना/मारना और लड़की को थप्पड़ मारना कानून की नज़र में अपराध है या नहीं ? 

महिला के ख़िलाफ़ हुए अपराध को दर्ज न करना कानून में दंडनीय अपराध है। अपराध दर्ज न करने वाले पुलिस अफसर के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किए जाने का कानून में प्रावधान है। 
अपराध करने वाले मातहतों को बचाने वाले कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी उनसे भी बड़े गुनहगार हैं। 
आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो-
आईपीएस सिर्फ बातें ही ईमानदारी/कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं, बल्कि राजनेताओं के गुलाम/ दास की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी दल की हो महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी 4-6-2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया  गया था। तब सलवार  पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 
धर्म ना देखो अपराधी का -- रामलीला मैदान की बहादुर पुलिस को 21 जुलाई 2012 को सरकारी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की कोशिश करने वाले गुंड़ों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। माहौल बिगाड़ने लिए जिम्मेदार बिल्डर नेता शोएब इकबाल के खिलाफ पुलिस ने पहले ही कोई कार्रवाई नहीं की थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि गुंड़ों ने पुलिस को पीटा, पथराव और आगजनी की। लेकिन अफसरों ने यहां गुंड़ों पर भी  रामलीला मैदान जैसी मर्दानगी दिखाने का आदेश पुलिस को  नहीं दिया। इस तरह आईपीएस अफसर भी नेताओं के इशारे पर पुलिस का इस्तेमाल कहीं बेकसूरों को पीटने के लिए करते है तो कहीं गुंड़ों से भी पिटने देते है। अफसरों की इस तरह की हरकत से निचले स्तर के पुलिसवालों में रोष पैदा हो गया था।

गृहमंत्री अमित शाह को तो कमिश्नर अनुराग कुमार को तुरंत पद से हटा देना चाहिए था। एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा और इंसपेक्टर नवीन राठी जैसे पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लड़कियों के साथ बदसलूकी और पिटाई करने वाले संदीप लांबा और नवीन राठी जैसे नामर्दो की जगह जेल है। 
संदीप लांबा और नवीन राठी ने अगर अपनी माँ का दूध पिया है तो वर्दी उतार कर/ नौकरी छोड़ कर कर ऐसी हरकत करके दिखाओ। तब छात्र तो दूर छात्राएं ही इनके पिछवाड़े में इनका ही डंडा घुसेड़ देंगी। समाज को भी ऐसे अफसरों का बहिष्कार करना चाहिए। 
जनता को आत्म रक्षा का हक़-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर हक होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। 
कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उसके ख़िलाफ़ अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। कानून का पालन न करने वाले कानून के रखवाले को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।
ऐसे वर्दी वाले गुंडों के कारण ही पुलिस की छवि दिनों दिन खराब हो रही है और इसलिए आम आदमी पुलिस से नफ़रत करते हैं। ऐसे कायर पुलिसकर्मी सिर्फ लड़कियों, बच्चों, छात्रों और असहाय लोगों को पीट कर अपनी बहादुरी दिखा सकते है। जबकि जहां बहादुरी दिखाना चाहिए वहां ये दुम दबाकर कर भाग जाते हैं। 
आईपीएस कितने बहादुर ? -
साल 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे वकीलों ने पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया था। तब इनकी बहादुरी/ मर्दानगी कहां चली गई थी? 
मोनिका भारद्वाज आईपीएस-
तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह जान बचा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार को वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। 
नाकारा कमिश्नर-
तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। पहली बार दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था।
अतुल ठाकुर आईपीएस-
साल 2018 में उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर का गिरेबान सांसद मनोज तिवारी ने पकड़ा था, सारी दुनिया ने ये दृश्य देखा। लेकिन पलटवार करना तो दूर आईपीएस अतुल ठाकुर की मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने की भी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे आईपीएस सिर्फ जनता और अपने मातहतों के सामने ही खुद को बड़ा बहादुर दिखाते है। 
जंतर मंतर पर मधुर वर्मा-
जंतर मंतर पर मध्य रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा को भी तैनात किया गया। ये वही मधुर वर्मा हैं, जिनकी गुंडागर्दी ने 2019 में मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। नई दिल्ली जिले के डीसीपी के पद पर रहते हुए मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने पिटाई करने की बकायदा विजिलेंस में शिकायत की थी। लेकिन तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और गृह मंत्रालय ने मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वैसे मधुर वर्मा के कारनामों की गूंज चंडीगढ़ में भी रही है। जो आईपीएस अपने मातहतों तक ऐसा व्यवहार करता रहा है। ऐसे आईपीएस मधुर वर्मा को जंतर मंतर पर तैनात किया गया था।
दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एडिशनल पुलिस कमिश्नर राजीव रंजन से इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए अनेक बार कोशिश की गई।