Wednesday, 29 July 2026

कमिश्नर-डीसीपी: जंतर मंतर का जनरल डायर कौन ?


 ‌     डीसीपी राजा बांठिया, डीसीपी सचिन शर्मा
        ‌‌‌ कमिश्नर अनुराग कुमार


जंतर मंतर के जनरल डायर 





इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस ने जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलवा कर जनरल डायर को भी पीछे छोड़ दिया है। पुलिस की झूठ की पोल खुल गई है।
अब यह सनसनीखेज खुलासा हो गया है कि उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। 
उत्तर जिले के डीसीपी राजा बांठिया, 
आरएएफ के डिप्टी कमांडेंट सतीश कुमार सांगवान के साथ ड्यूटी पर थे, उन्होंने  प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए आरएएफ को कार्रवाई करने का आदेश दिया। संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी (रोजनामचे) में आरएएफ के अधिकारी ने दर्ज कराया है कि आरएएफ ने इस कार्रवाई में 55 नॉन-इलेक्ट्रिक शेल, 15 इलेक्ट्रिक शेल, 5 टियर स्मोक ग्रेनेड, 1 एंटी-रायट गन तथा प्लास्टिक पैलेट के 2 राउंड का इस्तेमाल किया। 20 जुलाई की इस कार्रवाई के बारे में 22 जुलाई को रोजनामचे में दर्ज किया जाता आश्चर्यजनक है। 
आधिकारिक आदेश चाहे किसी आईपीएस अफसर ने दिया हो। जिम्मेदारी तो पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की बनती है। 
कानून-
दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 की धारा 70(1)( बी ) सरकार को एसीपी और उससे ऊपर के रैंक के पुलिस अधिकारियों को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ प्रदान करने का अधिकार देती है।
डीसीपी ने, कार्यपालक मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए, 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ रैपिड एक्शन फोर्स ( आरएएफ ) को आंसू गैस, लाठीचार्ज और बंदूक/आग्नेयास्त्रों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।
डीसीपी सचिन शर्मा ने, नई दिल्ली जिला, जंतर-मंतर में उपस्थित एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के तौर पर, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 149 (दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 130) के तहत, यूनिट D/103 के असिस्टेंट कमांडेंट दिलवार (क्रमांक 104) को निर्देश दिए कि वह गैस/लाठीचार्ज/आग्नेयास्त्रों का प्रयोग कर गैर कानूनी जमावड़े को तितर-बितर करें अथवा उसमें शामिल व्यक्तियों को गिरफ्तार कर हिरासत में लें। यह आदेश 20/07/26 को शाम लगभग 5 बजे नई दिल्ली जिले में जारी किया गया
यह अनुमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएएफ के जवान स्वयं इस प्रकार के बल प्रयोग का निर्णय नहीं लेते 12-बोर पंप-एक्शन बंदूक के इस्तेमाल का निर्णय आरएएफ स्वयं नहीं कर सकती। यदि परिस्थितियाँ इसकी मांग करती हैं, तो यह निर्णय मौके पर मौजूद कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा लिया जाता है।  इस प्रक्रिया में औपचारिक दस्तावेज़ीकरण होता है, जिसमें कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षरित लिखित अनुमति शामिल होती है।
डीसीपी जवाब दें-
डीसीपी राजा बांठिया और डीसीपी सचिन शर्मा बताएं कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन और बंदूक (आग्नेयास्त्रों) के इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी

वर्दी वाले गुंडे, लांबा, राठी 
दूसरी ओर एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी (मंडावली थाना)जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया है। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
कमिश्नर की भूमिका-
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
गृहमंत्री अमित शाह को इन दोनों अफसरों को जेल भेज कर वर्दी वाले गुंडों को सबक सिखाना चाहिए। 
गृहमंत्री की भूमिका-
वैसे तो दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ/आरएएफ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर जो जुल्म किए हैं उसके लिए सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है क्योंकि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ उनके मातहत है। इसलिए पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दायित्व गृहमंत्री का है। 
कमिश्नर जिम्मेदार-
पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के चहेते है इसलिए उन्हें  पद से हटाया नहीं गया। अनुराग कुमार अगर गृह मंत्री के चहेते न होते तो, अगमू कैडर में उनसे सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई को आनन-फानन में कमिश्नर नहीं बनाया जाता। वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों पर जुल्म करने  का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा। 
जवाब दो-
कमिश्नर अनुराग कुमार और तमाम आईपीएस अधिकारी अगर ईमानदार हैं, तो वह सिर्फ एक सवाल का ही जवाब दे दें , कि क्या किसी लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में लाठी घुसाना/मारना और लड़की को थप्पड़ मारना कानून की नज़र में अपराध है या नहीं ? 
आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो-
आईपीएस सिर्फ बातें ही ईमानदारी/कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं, बल्कि राजनेताओं के गुलाम/ दास की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी दल की हो महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी साल 2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में लाठीचार्ज किया गया था। तब सलवार  पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 
जेल भेजो-
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा और इंसपेक्टर नवीन राठी जैसे पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लड़कियों के साथ बदसलूकी और पिटाई करने वाले संदीप लांबा और नवीन राठी जैसे नामर्दो की जगह जेल है। 
जनता को आत्मरक्षा का अधिकार मिले-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर हक होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। 
कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उसके ख़िलाफ़ अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। कानून का पालन न करने वाले कानून के रखवाले को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।
ऐसे वर्दी वाले गुंडों के कारण ही पुलिस की छवि दिनों दिन खराब हो रही है और इसलिए आम आदमी पुलिस से नफ़रत करते हैं। 
आईपीएस कितने बहादुर-
ऐसे कायर पुलिसकर्मी सिर्फ लड़कियों, बच्चों, छात्रों और असहाय लोगों को पीट कर अपनी बहादुरी दिखा सकते है। जबकि जहां बहादुरी दिखाना चाहिए वहां ये दुम दबाकर कर भाग जाते हैं। 
साल 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे वकीलों ने पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया था। तब इनकी बहादुरी/ मर्दानगी कहां चली गई थी? 
तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह जान बचा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार सिंह को वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। 
तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। पहली बार दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था।
साल 2018 में उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर का गिरेबान सांसद मनोज तिवारी ने पकड़ा था, सारी दुनिया ने ये दृश्य देखा। लेकिन पलटवार करना तो दूर आईपीएस अतुल ठाकुर की मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने की भी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे आईपीएस सिर्फ जनता और अपने मातहतों के सामने ही खुद को बड़ा बहादुर दिखाते है। 
जंतर मंतर पर मध्य रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा को भी तैनात किया गया। ये वही मधुर वर्मा हैं, जिनकी गुंडागर्दी ने 2019 में मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। नई दिल्ली जिले के डीसीपी के पद पर रहते हुए मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने पिटाई करने की बकायदा विजिलेंस में शिकायत की थी। लेकिन तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और गृह मंत्रालय ने मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की।  वैसे मधुर वर्मा के कारनामों की गूंज चंडीगढ़ में भी रही है।

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एडिशनल पुलिस कमिश्नर राजीव रंजन से इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए अनेक बार कोशिश की गई।










Tuesday, 28 July 2026

पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की वर्दी पर लगा जंतर मंतर का दाग, गृहमंत्री : दुर्योधन- दुशासन को जेल भेजो , लांबा को लंबा करो, राठी को लाठी दो,





गृहमंत्री  : लांबा को लंबा करो, राठी को लाठी दो

कमिश्नर की वर्दी पर लागा जंतर मंतर का दाग




इंद्र वशिष्ठ, 
दिल्ली पुलिस की छवि उसकी करतूतों के कारण दिनोंदिन खराब हो रही है। लोगों का पुलिस में रत्ती भर भरोसा नहीं है। आम आदमी से पुलिस सीधे मुंह बात तक नहीं करती। इसलिए जब पुलिस की पिटाई होती है तो लोग खुश होते हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। पुलिसकर्मी हत्या, लूट, वसूली जैसे अपराध तक में लिप्त पाए जाते है। 
ऐसे में एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी(मंडावली थाना) जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया है। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
गृहमंत्री अमित शाह को इन दोनों अफसरों को जेल भेज कर वर्दी वाले गुंडों को सबक सिखाना चाहिए। 
गृहमंत्री एक्शन लो -
वैसे तो दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ/आरएएफ ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर जो जुल्म किए हैं उसके लिए सीधे तौर पर गृहमंत्री अमित शाह की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है क्योंकि दिल्ली पुलिस और सीआरपीएफ उनके मातहत है। इसलिए पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का दायित्व गृहमंत्री का है। 
लड़कियों/ छात्राओं  से बदसलूकी/ मारपीट करने वाले पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करने से बेटी बचाओ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
कमिश्नर जिम्मेदार -
पुलिस द्वारा की गई बर्बरता के लिए सीधे सीधे पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की जिम्मेदारी/जवाबदेही बनती है। लेकिन वह गृहमंत्री अमित शाह के चहेते है इसलिए उन्हें  पद से हटाया नहीं गया। अनुराग कुमार अगर गृह मंत्री के चहेते न होते तो, अगमू कैडर में उनसे सीनियर आईपीएस अधिकारियों को दरकिनार कर उन्हें 17 जुलाई को आनन-फानन में कमिश्नर नहीं बनाया जाता। वैसे कमिश्नर अनुराग कुमार पर छात्रों की पिटाई का दाग तो लग ही गया। पुलिसिया जुल्म की जब भी बात होगी, कमिश्नर अनुराग कुमार का नाम लिया जाएगा। 
कमिश्नर जवाब दें-
कमिश्नर अनुराग कुमार और तमाम आईपीएस अधिकारी अगर ईमानदार हैं, तो वह सिर्फ एक सवाल का ही जवाब दे दें , कि क्या किसी लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में लाठी घुसाना/मारना और लड़की को थप्पड़ मारना कानून की नज़र में अपराध है या नहीं ? 

महिला के ख़िलाफ़ हुए अपराध को दर्ज न करना कानून में दंडनीय अपराध है। अपराध दर्ज न करने वाले पुलिस अफसर के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किए जाने का कानून में प्रावधान है। 
अपराध करने वाले मातहतों को बचाने वाले कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी उनसे भी बड़े गुनहगार हैं। 
आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो-
आईपीएस सिर्फ बातें ही ईमानदारी/कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं, बल्कि राजनेताओं के गुलाम/ दास की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी दल की हो महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी साल 2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में लाठीचार्ज किया गया था। तब सलवार  पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 

गृहमंत्री अमित शाह को तो कमिश्नर अनुराग कुमार को तुरंत पद से हटा देना चाहिए था। एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा और इंसपेक्टर नवीन राठी जैसे पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। लड़कियों के साथ बदसलूकी और पिटाई करने वाले संदीप लांबा और नवीन राठी जैसे नामर्दो की जगह जेल है। 
संदीप लांबा और नवीन राठी ने अगर अपनी माँ का दूध पिया है तो वर्दी उतार कर/ नौकरी छोड़ कर कर ऐसी हरकत करके दिखाओ। तब छात्र तो दूर छात्राएं ही इनके पिछवाड़े में इनका ही डंडा घुसेड़ देंगी। समाज को भी ऐसे अफसरों का बहिष्कार करना चाहिए। 
जनता को आत्म रक्षा का हक़-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर हक होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। 
कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। उसके ख़िलाफ़ अपराधी की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। कानून का पालन न करने वाले कानून के रखवाले को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।
ऐसे वर्दी वाले गुंडों के कारण ही पुलिस की छवि दिनों दिन खराब हो रही है और इसलिए आम आदमी पुलिस से नफ़रत करते हैं। ऐसे कायर पुलिसकर्मी सिर्फ लड़कियों, बच्चों, छात्रों और असहाय लोगों को पीट कर अपनी बहादुरी दिखा सकते है। जबकि जहां बहादुरी दिखाना चाहिए वहां ये दुम दबाकर कर भाग जाते हैं। 
आईपीएस कितने बहादुर ? -
साल 2019 में तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे वकीलों ने पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया था। तब इनकी बहादुरी/ मर्दानगी कहां चली गई थी? 
मोनिका भारद्वाज आईपीएस-
तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह जान बचा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज करने की हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार को वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। 
नाकारा कमिश्नर-
तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। पहली बार दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था।
अतुल ठाकुर आईपीएस-
साल 2018 में उत्तर पूर्वी जिले के तत्कालीन डीसीपी अतुल ठाकुर का गिरेबान सांसद मनोज तिवारी ने पकड़ा था, सारी दुनिया ने ये दृश्य देखा। लेकिन पलटवार करना तो दूर आईपीएस अतुल ठाकुर की मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने की भी हिम्मत नहीं हुई। ऐसे आईपीएस सिर्फ जनता और अपने मातहतों के सामने ही खुद को बड़ा बहादुर दिखाते है। 
जंतर मंतर पर मधुर वर्मा-
जंतर मंतर पर मध्य रेंज के संयुक्त पुलिस आयुक्त मधुर वर्मा को भी तैनात किया गया। ये वही मधुर वर्मा हैं, जिनकी गुंडागर्दी ने 2019 में मीडिया में सुर्खियां बटोरी थी। नई दिल्ली जिले के डीसीपी के पद पर रहते हुए मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ ट्रैफिक पुलिस के इंस्पेक्टर कर्मवीर मलिक ने पिटाई करने की बकायदा विजिलेंस में शिकायत की थी। लेकिन तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और गृह मंत्रालय ने मधुर वर्मा के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। वैसे मधुर वर्मा के कारनामों की गूंज चंडीगढ़ में भी रही है। जो आईपीएस अपने मातहतों तक ऐसा व्यवहार करता रहा है। ऐसे आईपीएस मधुर वर्मा को जंतर मंतर पर तैनात किया गया था।
दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एडिशनल पुलिस कमिश्नर राजीव रंजन से इस मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए अनेक बार कोशिश की गई।


Friday, 10 July 2026

1996 श्रीनगर हिंसा: शब्बीर शाह समेत हुर्रियत के 6 नेताओं के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर


1996 श्रीनगर हिंसा: शब्बीर शाह समेत हुर्रियत के 6 नेताओं के ख़िलाफ़ चार्जशीट



इंद्र वशिष्ठ
एनआईए ने 1996 में श्रीनगर में हुई हिंसा और पुलिसकर्मियों पर अंधाधुंध गोलीबारी के मामले में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के छह वरिष्ठ अलगाववादी नेताओं के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है।
शुक्रवार को जम्मू स्थित एनआईए की विशेष अदालत में दाखिल आरोपपत्र में शब्बीर अहमद शाह, सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वकील उर्फ मोहम्मद याकूब वक़ील, जाविद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी को आरोपी बनाया गया है। 
सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन और मोहम्मद याकूब वकील के विरुद्ध कार्यवाही उनके निधन के कारण समाप्त हो चुकी है। हालांकि, आरोपपत्र में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कथित साजिश और गैरकानूनी जमावड़े में उनकी भूमिका का उल्लेख किया गया है।
एनआईए के अनुसार, 17 जुलाई 1996 को मारे गए उग्रवादी हिलाल अहमद बेग के जनाजे के दौरान नाज़ क्रॉसिंग, श्रीनगर में इन नेताओं ने कथित रूप से एक अवैध जमावड़े का नेतृत्व किया और पुलिस के खिलाफ हिंसा भड़काई। जुलूस में शामिल आतंकियों ने पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हुए और पथराव में सरकारी वाहनों को भी भारी नुकसान पहुंचा।
 आरोपित नेताओं ने भारत-विरोधी, पाकिस्तान समर्थक और अलगाववादी नारे लगाए तथा कथित रूप से भडकाऊ भाषण दिए। यह हिंसा हुर्रियत नेतृत्व की एक पूर्व नियोजित साजिश का हिस्सा थी, जिसका उद्देश्य जनाजे के जुलूस का उपयोग अलगाववादी विचारधारा के प्रचार, जनसमर्थन जुटाने और कानून-व्यवस्था को बाधित करने के लिए करना था।
घटना के दिन श्रीनगर के शेरगढ़ी थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। गृह मंत्रालय के निर्देश पर एनआईए ने अप्रैल 2026 में मामले की जांच अपने हाथ में ली।

Thursday, 9 July 2026

53 संरक्षित पशु-पक्षी बरामद, 6 वन्यजीव तस्कर गिरफ्तार : CBI-DRI का संयुक्त अभियान

53 संरक्षित पशु-पक्षी बरामद, 6 वन्यजीव तस्कर गिरफ्तार : CBI-DRI का संयुक्त अभियान


इंद्र वशिष्ठ, 
सीबीआई और डीआरआई ने वाइल्डलाइफ़ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो, मुंबई/कोलकाता की मदद से एक संयुक्त अभियान में 15 लुप्तप्राय स्लो लोरिस, 2 बिंटुरोंग, 28 स्टार कछुए, 6 मिस्र के लुप्तप्राय गिद्ध और 2 शिकरा पक्षियों को बरामद किया और बचाया। ये पशु/ पक्षी वाइल्डलाइफ़ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1972 के तहत आते हैं, जिन्हें भारत में सबसे ज़्यादा सुरक्षा प्राप्त है। 
इस मामले में मुंबई में नोमान खान, मोहम्मद फारूक, इंशा शकील और कोलकाता में सैकत विश्वास, मिथुन मंडल उर्फ ​​हिमांशु मंडल और अर्जुन मंडल को गिरफ्तार किया गया। 
डीआरआई मुंबई को वाइल्डलाइफ़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत संरक्षित वन्यजीवों के व्यापार में शामिल एक अंतर-राज्यीय अपराध सिंडिकेट के बारे में पता चला था।‌ जिसके आधार पर महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की यह कार्रवाई की गई थी। 
सीबीआई ने 7 और 8 जुलाई, 2026 को दो अलग-अलग मामले दर्ज किए। आरोपियों ने व्यापार के लिए भारत के अलग-अलग हिस्सों से ये पशु और पक्षी हासिल किए थे। शुरुआती कार्रवाई के बाद, बरामद वन्यजीव प्रजातियों को सुरक्षित रखने और उनकी देखभाल के लिए क्रमशः महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के वन विभागों को सौंप दिया गया। 


















Wednesday, 8 July 2026

ऑनलाइन आतंकी कट्टरपंथ फैलाने के मामले में देश भर में छापेमारी : NIA

ऑनलाइन आतंकी कट्टरपंथ फैलाने के  मामले में देश भर में छापेमारी 


इंद्र वशिष्ठ, 
एनआईए ने बुधवार को ऑनलाइन आतंकी कट्टरपंथ फैलाने के एक मामले में देश भर में छापेमारी की। यह मामला आईएसआईएस और एक्यूआईएस जैसे आतंकवादी संगठनों की विचारधारा को बढ़ावा देकर, लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ हिंसक जिहाद के ज़रिए भारत में इस्लामिक स्टेट बनाने की साज़िश से जुड़ा है। 

एनआईए ने दिल्ली, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान और गुजरात में कुल 20 जगहों पर एक साथ छापेमारी की। छापेमारी में कई डिजिटल डिवाइस ज़ब्त किए गए। कट्टरपंथ फैलाने की साज़िश के बारे में और सुराग पाने के लिए इन डिवाइस की फॉरेंसिक जांच की जाएगी। इस मामले में अब तक 11 आरोपियों और एक नाबालिग को गिरफ़्तार किया गया है। एनआईए ने इस मामले की जांच इस साल मई में विजयवाड़ा पुलिस से अपने हाथ में ली थी। विजयवाड़ा (आंध्र प्रदेश) पुलिस ने शुरू में मार्च में यह मामला दर्ज किया था। यह मामला मुख्य आरोपी रहमतुल्लाह शरीफ़ मोहम्मद के घर पर छापेमारी के बाद दर्ज किया गया था, जिसमें प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट(एक्यूआईएस) और इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री मिली थी। आज जिन जगहों पर छापेमारी की गई, उन्हें पहले ज़ब्त किए गए डिजिटल डिवाइस के विस्तृत तकनीकी विश्लेषण, गिरफ़्तार आरोपियों के कनेक्शन और जांच से मिली अन्य जानकारियों के आधार पर चुना गया था।
एनआईए के अनुसार देश को अस्थिर करने और खिलाफत स्थापित करने की साज़िश में शामिल अन्य लोगों की पहचान का काम जारी  है। एनआईए ने पाया है कि गिरफ़्तार आरोपी और उनके साथी ऑनलाइन माध्यमों से हिंसक जिहादी कंटेंट और गलत जानकारी के ज़रिए देश भर के आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहे थे। आरोपी जिहादी विचारधारा को फैलाने और भारत-विरोधी साज़िश को आगे बढ़ाने के लिए विदेशों में बैठे अपने हैंडलर्स के साथ ऑनलाइन संपर्क में भी थे।










Monday, 6 July 2026

पहलगाम आतंकी हमला: हाफिज़ सईद के ख़िलाफ़ चार्जशीट



इंद्र वशिष्ठ, 
एनआईए ने सोमवार को पहलगाम आतंकी हमले के मामले में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी तथा प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और उसके मुखौटा संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) के प्रमुख एवं संस्थापक हाफिज़ सईद को पूरक आरोप पत्र में आरोपी बनाया है।

एनआईए ने जम्मू स्थित विशेष एनआईए अदालत में दायर पूरक आरोपपत्र में हाफिज़ सईद पर व्यक्तिगत हैसियत के साथ-साथ प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और उसके सक्रिय मुखौटा/छद्म संगठन टीआरएफ के प्रमुख के रूप में भी आरोप लगाए हैं।
आरोपपत्र में हाफिज़ सईद पर भारतीय न्याय संहिता  तथा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। एनआईए ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और पाकिस्तान से भारत विरोधी साजिश रचने से संबंधित धाराएं भी लगाई हैं। 
यह पूरक आरोपपत्र पहले दायर किए गए 1,597 पृष्ठों के मूल आरोपपत्र का विस्तार है। इसमें पाकिस्तान की साजिश, हाफिज़ सईद की भूमिका तथा एनआईए द्वारा वैज्ञानिक जांच और घटनास्थल पर की गई विस्तृत पड़ताल से जुटाए गए साक्ष्यों का विवरण दिया गया है।

इससे पहले 15 दिसंबर 2025 को दायर मूल आरोपपत्र में एनआईए ने पाकिस्तानी हैंडलर आतंकी साजिद जट्ट को आरोपी बनाया था। इसके अलावा ऑपरेशन महादेव के दौरान जुलाई 2025 में सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए तीन आतंकियों, दो गिरफ्तार आरोपियों तथा प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा/टीआरएफ को भी आरोपित किया गया था। एनआईए के अनुसार, इन सभी की पहलगाम हमले की योजना बनाने, सुविधा देने और अंजाम देने में भूमिका थी। 

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए इस आतंकी हमले में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों ने धर्म के आधार पर चुनकर लोगों की हत्या की थी। इस हमले में 25 निर्दोष पर्यटकों और एक स्थानीय नागरिक की जान गई थी।





Thursday, 2 July 2026

169 करोड़ के गबन में एचएसपीसीबी का अकाउंटेंट गिरफ्तार

169 करोड़ के गबन में एचएसपीसीबी का अकाउंटेंट गिरफ्तार


इंद्र वशिष्ठ, 
सीबीआई ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी) के तत्कालीन वरिष्ठ लेखा अधिकारी प्रवीन कुमार को आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की सेक्टर-32, चंडीगढ़ शाखा में एचएसपीसीबी के खाते से सरकारी धन के गबन के मामले में गिरफ्तार किया है।
एचएसपीसीबी के तत्कालीन सदस्य सचिव प्रदीप कुमार, आईएएस को 169 करोड़ रुपये के गबन मामले में गिरफ्तार किया जा चुका है। हरियाणा में 504 करोड़ रुपये के पूरे घोटाले में शामिल 8 सरकारी विभागों में यह सबसे बड़ा वित्तीय नुकसान है।
सीबीआई जांच में सामने आया है कि प्रवीन कुमार ने विभाग की मंजूरी और रिकॉर्ड के बिना गुप्त तरीके से बैंक खाता खुलवाया था। इस खाते का संचालन बाद में फर्जी वित्तीय लेन-देन को अंजाम देने के लिए किया गया।
जांच एजेंसी के अनुसार, एचएसपीसीबी के धन का गबन चेक और डेबिट नोट के जरिए किया गया तथा निकाली गई राशि को आरोपियों द्वारा नियंत्रित शेल कंपनियों में भेज दिया गया। हालांकि खाते का अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता प्रवीन कुमार था, लेकिन खाते में एक ऐसे सह-आरोपी का मोबाइल नंबर दर्ज कराया गया था, जो विभाग का कर्मचारी ही नहीं था। ऐसा कथित तौर पर खाते में होने वाले फर्जी लेन-देन को छिपाने और पकड़े जाने से बचने के लिए किया गया।
यह मामला सेक्टर-32 स्थित आईडीएफसी फर्स्ट बैंक शाखा में सामने आए करीब 504 करोड़ रुपये के बहुचर्चित घोटाले का हिस्सा है। हरियाणा सरकार के आठ विभागों के लगभग 504 करोड़ रुपये फर्जी अथवा अस्तित्वहीन फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) और डेबिट नोट के माध्यम से निकालकर शेल कंपनियों में भेज दिए गए।
सीबीआई अब तक इस मामले में 17 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। इनमें आईडीएफसी फर्स्ट बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक के छह बैंक अधिकारी, हरियाणा सरकार के तीन लोक सेवक, दो कंपनियां तथा छह निजी व्यक्ति शामिल हैं। प्रवीन कुमार की गिरफ्तारी के साथ ही इस मामले में गिरफ्तार आरोपियों की संख्या बढ़कर 25 हो गई है।