Wednesday, 13 June 2012

आइएएस न बन पाए तो आइपीएस बन गए


आइएएस न बन पाए तो आइपीएस बन गए
आइपीएस के लिए अलग से परीक्षा हो

इंद्र वशिष्ठ
भारतीय पुलिस सेवा यानी आइपीएस में ऐसे  बहुत से लोग  भर्ती होते है जो  वास्तव में पुलिस  में शामिल  नहीं होना चाहते थे वे आइएएस अफसर बनना चाहते थे लेकिन उसमें चयन न हो पाने के कारण आइपीएस को चुनते है। जबकि वास्तव में वे पुलिस के कार्य को पसंद नहीं करते।  आइपीएस अफसरों की भर्ती की परीक्षा प्रणाली उचित  नहीं है।  इसलिए सरकार को आइपीएस के लिए अलग से परीक्षा के संचालन की संभावना तलाशनी चाहिए। सरकार से यह सिफारिश संसद की स्थायी समिति ने की है।
समिति ने राज्यसभा में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यूपीएससी ग्रुप ए की विभिन्न सेवाओं के लिए परीक्षाएं संचालित करती है और आइपीएस भी उनमें से एक है। आइपीएस के इच्छुक लोग नहीं जानते कि उन्हें आइपीएस सेवा में प्रवेश मिलेगा या नहीं। इसी प्रकार जो लोग आइपीएस  में जाने के इच्छुक नहीं है वे भी नहीं जानते कि उन्हें आइपीएस सेवा या अन्य सेवा में से किसमें प्रवेश मिलेगा।
समिति का मानना है कि पुलिस सेवा का विकल्प चुनने वाले उम्मीदवारों का रवैया कुछ अलग होता है ,  अलग होना चाहिए। जिसकी गारंटी यह परीक्षा प्रणाली नहीं देती। देखा गया है कि जो लोग पुलिस का कार्य पसंद नहीं करते वे आइपीएस बन जाते है। ऐसी स्थिति मे समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह आइपीएस के लिए अलग से परीक्षा संचालित करने की संभावना तलाशें ताकि उम्मदीवार की मानसिक संरचना और पुलिस कार्य के प्रति झुकाव के साथ.साथ उसकी प्रवृति और रुझान भी  जांचा जा सकें।
समिति ने कहा है कि सरकार यूपीएससी से आइपीएस अफसरों की नियुक्ति के लिए अलग से परीक्षा संचालित करने का आग्रह कर सकती है। इस संबंध में एसवीपी एनपीए से भी परामर्श किया जा सकता है। समिति की बैठक में एक सदस्य ने कहा कि कई लोग जो पुलिस  में भर्ती होते है वे वास्तव में पुलिस  में शामिल  नहीं होना चाहते थे वे आइएएस अफसर बनना चाहते है लेकिन वे आइएएस में चयनित नहीं हो पाते़ एइसलिए वे दूसरी सर्वोत्तम सेवा को चुनते है।
समिति देश में 1300 आइपीएस अफसरों की कमी  को लेकर गंभीर है। यद्दपि इस कमी को पूरा करने के लिए यूपीएससी की सीधे राज्य पुलिस अफसरों और अर्धसैनिक पुलिस अफसरों में से आइपीएस अफसरों की नियुक्ति के लिए एक सीमित प्रतियोगी परीक्षा की योजना है।  लेकिन समिति का मानना है कि यह अंतिम समाधान नहीं है। यूपीएससी परीक्षा में आवश्यकता के अनुसार भर्ती की जानी चाहिए।

Thursday, 10 May 2012

तंत्र-मंत्र, जादू-टोना का हरियाणा में बना ठिकाना


हरियाणा में सबसे ज्यादा अंधविश्वासी,
तंत्र-मंत्र, जादू-टोना का हरियाणा में बना ठिकाना
 जादू- टोने के लिए हत्या में हरियाणा सबसे आगे 
देश में जादू टोने ने ली 528 लोगों की जान

इंद्र वशिष्ठ
इंसान भी कितना अजीब है एक ओर तो वह खुद कों आधुनिक दिखाने की होड में लगा रहता है । इसके लिए वह  नए-नए फैशन के कपडे पहनने से लेकर नए- नए  आई पैड, मोबाइल और अन्य इस तरह की चीजों का सहारा लेकर अपनी जीवन शैली और कार्य शैली से खुद को समाज में हाई टैक , आधुनिक और खुले विचारों वाला दिखाने में लगा रहता है।   दूसरी ओर  अपनी समस्याओं के हल के लिए बाबाओं और तांत्रिकों के दरबार में बडी तादाद में बढ रही उनकी हाजिरी उनके अंधविश्वासी होने की पोल खोल रही है। इंसान का यहीं दोहरा चऱि़त्र असल में उसकी सभी समस्याओं की जड है। 
 तंत्र-मंत्र- जंतर में डूबे ऐसे ही अंधविश्वासियों ने जादू- टोने के चक्कर में तीन साल में  देश में 528 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। चौंकाने  वाली बात यह है कि जादू- टोने या तंत्र-मंत्र  के कारण  हत्या  के मामले में दिल्ली से सटा सम्पन्न राज्य हरियाणा सबसे आगे है। हरियाणा में वर्ष 2008 में 25, वर्ष 2009 में 30 और वर्ष 2010 में 57 लोगों की अंधविश्वासियों ने हत्या कर दी। हरियाणा के बाद उडीसा ऐसा राज्य है जहां पर वर्ष 2010 में 31 लोगों की हत्या कर दी गई । सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी के क्षेत्र में नाम कमाने वाला आंध्र प्रदेश भी इस मामले में पीछे नहीं है वहां पर भी वर्ष 2010 में 26 लोगों की इसी वजह से हत्या कर दी गई।
गृह मंत्रालय के  आंकडों के अनुसार जादू टोने के कारण पूरे देश में वर्ष 2008 से 2010 के दौरान कुल 528 लोगों की हत्या कर दी गई। इन  तीन सालों में अंधविश्वासियों ने हरियाणा में 112, झारखंड में 104, उडीसा में 82, आंध्र प्रदेश में 76,, मध्य प्रदेश में 58, महाराष्ट  में 33, छतीस गढ में 29, गुजरात में 9, मेघालय में 6, बिहार   और  पश्चिम बंगाल   में 4-4  ,कर्नाटक और  , तमिलनाडु में 3-3, राजस्थान में 2, उत्तर प्रदेश ,त्रिपुरा  और दादरा नगर हवेली में 3 लोगों  को जादू टोने के कारण मौत के घाट उतार दिया गया।

Tuesday, 8 May 2012

आशु भाई गुरुजी का असली चेहरा


आशु को पहचानों ये है कौन
इंद्र वशिष्ठ
विश्वविख्यात ज्योतिषचार्य और हस्तरेखा विशेषज्ञ होने का दावा करने वाला एक व्यकित अपनी असली पहचान छिपाकर  ज्योतिष का कारोबार/ धंधा चला रहा है। दूसरों का भविष्य बताने का दावा करने वाले यह  व्यकित  अपना भविष्य ही नहीं जानता वरना उसके नौकर उसका पचास लाख रुपया चोरी न कर पाते। 1990 के दशक तक वजीर पुर जे जे कालोनी में रहने वाला यह व्यक्ति अब करोड़ों का मालिक है। सराय रोहिल्ला थाना के पदम नगर इलाके में इसने अपना धंधा शुरू किया था एक दिन अचानक वहां से अपना धंधा बंद कर दिया। करोड़ों रुपए की तो अब इसके पास कारें हैं।
आशु है कौन-    साधना चैनल और जी जागरण पर रोजाना अनेक बार यह व्यकित आशु भाई गुरुजी बन कर लोगों की सभी प्रकार की  समस्याओं का समाधान करने का दावा करता है। कार्यक्रम में दिखाया जाता है कि एक  ट्रक चालक आशु भाई के दिए रतन के कारण ट्रक का मालिक बनकर मालामाल हो गया। इसी तरह कल तक साइकिल के पंचर लगाने वाले एक  व्यकित की  दरिद्रता  आशु भाई की शरण में आने से दूर हो गई । इस तरीके के कई दावे दिखाए जाते है।  फोन इन लाइव कार्यक्रम में आशु हास्यास्पद बातें करता है। वास्तुदोष सर्व बाधा नाशक धूप आदि भी वह बेचता  है। भूत-प्रेत की छाया से बचाने और काल सर्प दोष आदि का उपाय करने का दावा भी किया जाता है। लेकिन लोग यह नहीं जानते  आशु भाई गुरु जी के नाम से  चैनल पर  दिखाई देने वाले इस व्यकित का असली नाम आसिफ खान  है। अपने असली नाम और पहचान को जाहिर न करना  उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।
आशु भाई के नाम से कई सालों से ज्योतिष के कारोबार में सक्रिय आसिफ खान का प्रीतम पुरा के तरुण एंकलेव में मकान और रोहिणी सेकटर 7 बी 4/77-78 में दफतर है। इस दफतर में सुबह 4 से 8 बजे वह लोगों से मिलता है वैसे हौजखास में भी उसका एक अन्य दफतर है। आशु मुलाकात के लिए मोटी फीस लेता है।  उपाय आदि के नाम पर ली जानी रकम की तो कोई तय सीमा नहीं है।


50 लाख चोरी--पिछले साल 6 फरवरी की तडके आशु  रोहिणी के दफतर में पहुंचा तो वहां पर ताला लगा हुआ पाया। दफतर के केयरटेकर लक्ष्मण और हंसराज जोशी भी वहां नहीं थें। कुछ देर इंतजार के बाद आशु ताला तोड कर अंदर गया और लोगों की समस्याओं का कथित समाधान करने में जुट गया। उनसे निपटने के बाद आशु ने देखा कि उसकी अलमारी में रखे 50 लाख रुपए  चोरी हो गए है।  आशु उर्फ आसिफ खान की शिकायत पर रोहिणी उत्तरी थाना पुलिस ने चोरी का मामला दर्ज किया। पुलिस ने नेपाल निवासी उपरोक्त दोनों केयरटेकरों की तलाश शुरु कर दी । पुलिस ने एसएसबी की मदद से 7 मार्च को भारत-नेपाल सीमा पर गौरीफैंटा बार्डर पर लक्ष्मण और हंसराज को पकड लिया। उनके पास से 42 लाख रुपए बरामद हो गए। इन दोनों ने पुलिस को बताया कि आशु के दफतर में हमेशा मोटी रकम होने का की बात उन्होंने चांदनी चैक में रहने वाले अपने दो दोस्तों को बताई तो उन्होंने उनको रकम चोरी करने के लिए उकसाया। चोरी के बाद वह उन दोस्तों के पास रहें  और उनको 8 लाख रुपए दे दिए। बाहरी जिले की तत्तकालीन डीसीपी छाया शर्मा ने 8 मार्च को  इस मामले का  खुलासा किया।   पुलिस  केयरटेकर के मोबाइल फोन के सर्विलांस के आधार पर उनको पकड पाई थी। इस रकम के बारे में पुलिस ने बताया कि आशु ने कोई प्रापर्टी बेची थी। आशु के अनेक पुलिस अफसरों से भी संबंध बताए जाते है। शायद यहीं वजह है कि इस रकम  के बारे में इनकम टैक्स विभाग को सूचना देना पुलिस ने जरुरी नहीं समझा। आम आदमी के मामले में तो पुलिस इनकम टैक्स विभाग को सूचना देने की बात करती है ताकि वह एफआईआर में लुटी या चोरी की रकम कम लिख सके।
कालसर्प के नाम ठगते है--करीब तीस साल से भारतीय विद्या भवन में ज्योतिष की शिक्षा दे रहे  पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह एवं ज्योतिष शास्त्र के विद्वान के एन राव के अनुसार  शास़्त्रों में काल सर्प का कहीं भी उल्लेख नहीं है। ज्योतिषी कालसर्प को दूर करने के उपायों का नाम लेकर परेशान लोगों से मोटी रकम ऐंठ लेते है।

Wednesday, 18 April 2012

बाउंसर यानी सफेदपोश गुंडे





इंद्र वशिष्ठ

बाउंसर यानी सफेदपोश गुंडे

 होटल, मॉल,पब और बार में बाउंसरों की गुंडागर्दी के अलावा फिल्म स्टारों के कार्यक्रमों में भी बाउंसरों के लोगों के साथ मारपीट के मामले दिनोंदिन बढते जा रहे है।  हाल ही में मुंबई में फिल्म स्टार नेहा धूपिया के कार्यक्रम में भी बाउंसरों द्वारा लोगों के साथ बदसलूकी का मामला सामने आया है। इसके पहले भी अनेक फिल्म स्टारों के फैन उनके बाउंसरों के हाथों पिट चुके है।
बाउंसरों पर अंकुश ..बाउंसरों की गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए जल्द ही पुलिस को सख्त कदम उठाने चाहिए। कया पुलिस किसी बडी वारदात के बाद जागेगी या कोर्ट की फटकार के बाद। गुंडे बाउंसरों  के खिलाफ पुलिस को वैसी ही सख्त कार्रवाई करनी चाहिए जैसी कार जबरन छीन लेने वाले बैंक या फाइनेंस कंपनियों के गुंडों के खिलाफ करने के आदेश कोर्ट ने दिए हुए है।  क्या पुलिस बाउंसरों के मामले में भी कोर्ट  के आदेश या फटकार के बाद कार्रवाई करना शुरु करेगी? जबरन फाइनेंसशुदा कार छीन लेना अपराध है लेकिन पुलिस को यह बात भी कोर्ट को समझानी पडी थी । रिकवरी एजेंट के नाम गुंडागर्दीं करने वाले बैंक के खिलाफ भी आपराधिक मुकदमा दर्ज करने के लिए कोर्ट ने आदेश दिए। बाउंसरों का लोगों को पीटना उनके हाथ-पैर तोडना आइपीसी के तहत अपराध हैं । इसके बावजूद इनके हाथो पीट गए व्यकित की पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती है। बाउंसर से लोगों को पिटवाने वाले होटल.पब.बार  मालिकों के खिलाफ भी जब तक सख्त कार्रवाई नही की जाएगी ये गुंडागर्दी रुकने वाली नहीं है।
तगडे से युवकों को होटल/पब/बार में रखने का चलन इसलिए हुआ था कि शराब के नशे में चूर व्यंकित यदि हंगामा/दंगा करे तो उन्हें काबू किया जा सके और उसे वहां से हटाया जा सके।  लेकिन अब इसकी बजाए बाउंसर  खुद लोगों से बुरा व्यवहार और मारपीट तक करने लगे है। होटल वालों से मुफत की सेवाएं लेने व मिलीभगत  के कारण पुलिस होटल वालों और बाउंसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है। दूसरी और यही पुलिस गली-मुहल्लों में मामूली सी मारपीट या कहा सुनी हो जाने पर ही  तुरन्त शांति भंग करने का मामला तो दर्ज करके आरोपी को तुरन्त हवालात में डाल देती है।
बाउंसरों की वैरीफिकेशन.....पुलिस नौकरों/किराएदारों की वैरीफिकेशन कराती है किराएदार के बारे में सूचना न देने वाले मकान मालिक के खिलाफ मुकदमा तक दर्ज कर देती है। लेकिन बाउंसर रुपी इन गुंडों की पुलिस वैरीफिकेशन कयों नहीं कराती? होटल.पब.बार  वालों के लिए इन बाउंसरों के बारे में पुलिस को पूरी जानकारी देना कयों नहीं अनिवार्य किया जाता, बाउंसर की पृष्टभूमि कया है होटल में उसे किस कार्य/सेवा के लिए रखा गया है।
बाउंसर के नाम पर  गुंडागर्दी करने वाले   होटल मालिक के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

पिछले दिनों बाउंसरों की गुंडागर्दी पर रोक लगाने के लिए गुडगांव पुलिस ने जिस तरह सख्त कदम उठाए है उस तरह की सख्ती पूरे देश में की जानी चाहिए।
दिल्ली में बाउंसरों की गुंडागर्दी ....
14 अप्रैल 2012 की रात को ग्रेटर कैलाश में दो भाइयों आशीष  और सार्थक  सहगल और उनके बाउंसर ने पुनीत टंडन और उसकी मां रजनी पर बेसबाल के बैट से हमला किया।
13 फरवरी 2012 की रात सूर्या क्राउन प्लाजा होटल के गेट के सामने बाउंसरों ने मारपीट  की । इस दौरान पीसीआर में सवार पुलिस वालों ने अनदेखी की और वहां से खिसक गए। वारदात के कई दिनों बाद मीडिया में इस घटना की फुटेज दिखाई गई तब जाकर पुलिस ने मुलजिमों को गिरफतार किया।

इसके कुछ समय पहले  तो सूर्या क्राउन प्लाजा होटल में ही बाउंसरों ने एक तिब्बती युवक को बैसबाल के बैट से इतना पीटा की उसकी  पैर की हडडी और दो दांत टूट गए। घायल युवक ने पीसीआर को कॉल की और खुद किसी तरह न्यू फ्रैंडस कालोनी थाने पहुंचा। पुलिस ने उसे एम्स में भर्ती करा कर अपनी डयूटी पूरी कर दी। उस युवक को रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पुलिस आयुक्त के दफतर जा कर गुहार लगानी पडी तब जाकर रिपोर्ट दर्ज की पुलिस ने। इस मामले से पुलिस को लोगों का दोस्त बनाने के दावे की पोल खोल दी। अरे दोस्त बनना तो दूर तुम पीडित की रिपोर्ट दर्ज करके अपनी डयूटी ही कर लो तो बहुत होगा। दोस्त तो कया बनोगें।

Friday, 27 January 2012

इंडियन मुजाहिदीन का आतंकनामा


कर्नल सिंह IPS

इंडियन मुजाहिदीन का आतंकनामा 
मोस्ट वांटेड आमिर रजा खान

इंद्र वशिष्ठ
पाकिस्तान का पाला हुआ इंडियन मुजाहिदीन का सरगना आमिर रजा खान समय-समय पर आतंकी गिरोह- जैश ए मुहम्मद. हरकत उल जेहादी यानी हूजी और लश्कर ए तोएबा आदि के साथ मिलकर  भारत में अपने गिरोह से आतंकी वारदात कराता रहा है। पाकिस्तान और दुबई में बैठ कर भारत में बम धमाके कराने वाले आमिर की दिल्ली पुलिस को भी काफी समय से तलाश है। आमिर कोलकाता में मुफीद उल इस्लाम लेन का निवासी था । आईएसआई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी से बचने के लिए भारतीयों का इस्तेमाल करना शुरु किया है। आईएम पढ़े लिखे युवकों को भी जेहाद के नाम गुमराह कर अपने गिरोह में शामिल करता है।

कहानी आमिर रजा खान और उसके भाई आसिफ की-  दिल्ली पुलिस के उत्तर पश्चिम जिला के तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह के नेतृत्व में वर्तमान एडिशनल डीसीपी रवि शंकर (तत्कालीन इंस्पेक्टर) की टीम ने 1995 में कथित एनकाउंटर में अपहरणकर्ता  दिनेश ठाकुर को मार गिराया  और उसके साथी आफताब अंसारी को पकड़ा था। आफताब की जेल में बंद आमिर के भाई आसिफ से मुलाकात हुई । आसिफ उस समय आतंकवादी गिरोह हिजबुल मुजाहिदीन में था। उसी समय तिहाड़ जेल में बंद मौलाना मसूद अजहर.उमर शेख और मुश्ताक अहमद जरगर से भी ये दोनों मिले थे। दिसंबर 1999 में अजहर.जरगर और उमर को सरकार ने हवाई जहाज हाई जैक  मामले में कंधार में छोड दिय़ा । वर्ष 1999 में आफताफ और आसिफ भी जेल से बाहर आ गए थे। इसके बाद आमिर.आसिफ और आफताब ने कोलकाता और गुजरात में अपहरण की वारदात कर करोड़ों रुपए कमाए। आफताब और आसिफ फरवरी 2001 में पाकिस्तान गए थे। वहां पर वे जैश ए मुहम्मद के मौलाना मसूद. जरगर.हूजी के उमर शेख. लश्कर के आजम चीमा और पिलखुआ के अब्दुल करीम टुंडा से मिले थे।

42 बम विस्फोट-लश्कर के इशारे पर अहले हदीस के अब्दुल करीम टूंडा ने अपने गिरोह के कामरान आदि से 1996-97 में दिल्ली और आसपास के राज्यों में  लगातार 42 बम विस्फोट करा कर आतंक मचा दिया था। फरवरी 1998 में अपराध शाखा के तत्कालीन डीसीपी कर्नल सिंह.एडिश्नल डीसीपी आलोक कुमार और रवि शंकर की टीम ने कामरान और उसके पूरे गिरोह को पकड़ कर उस समय उनका पूरा नेटवर्क खत्म कर दिया था। इस मामले में 26 आतंकवादी पकड़े गए थे जिनमें 8 पाकिस्तानी.दो बंगलादेशी और एक बर्मा का नागरिक भी था।

सचिन. सौरव का अपहरण और कलाम की हत्या करना चाहता है आईएम-अक्तूबर 2001 में आसिफ को एक पाकिस्तानी आतंकवादी के साथ दिल्ली पुलिस के तत्कालीन एसीपी  रवि शंकर की टीम ने पकड़ा था। इनसे पूछताछ में पता चला कि आमिर ने सचिन तेंदुलकर .सौरव गांगुली के अपहरण और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की हत्या की साजिश भी रची थी। आमिर और आफताब का मानना था कि सौरव के अपहरण के बाद भावुक बंगाली दंगा कर देंगे। अपहरण से सरकार पर दबाव बना कर वह दिल्ली में 1996-97 में सिलसिलेवार बम धमाको के मामले में जेल में बंद कामरान आदि आतंकवादियों को रिहा करा लेंगे। एपीजे अब्दुल कलाम ने मिसाइल और परमाणु बम बनाया था।  इसलिए ये कलाम की हत्या करना चाहते थे। कलाम के पटना दौरे के समय इनका हत्या का इरादा था। इनका इरादा भाभा एटामिक सेंटर में बम विस्फोट करने का भी था। इस साजिश का खुलासा होने के बाद उपरोक्त सभी की सुरक्षा बढ़ा दी गई।

आमिर दुबई भाग गया- उस समय मंुबई में रहने वाला आमिर नवंबर 2001 में दुबई भाग गया था।  दिसंबर 2001 में गुजरात पुलिस अपहरण के एक मामले में उसके भाई आसिफ को गुजरात ले गई वहां कथित एनकाउंटर में आसिफ मारा गया। इसके बाद आमिर और आफताब ने 22 जनवरी 2002 में कोलकाता में अमेरिकन सेंटर पर हमला करा दिया । इस हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकवादियों लश्कर के जाहिद और सलीम को  तत्कालीन एसीपी  रवि शंकर की  टीम ने 29 जरवरी 2002 में हजारी बाग में मार गिराया। इसके बाद 6 पाकिस्तानी समेत 13 आतंकवादी पकड़े गए। ये आतंकवादी सूरत.कोलकाता.सहारनपुर और मुजफफर नगर से पकड़े गए। इससे पता चलता है कि आईएम का नेटवर्क उस समय से पूरे देश में है।  अमेरिका के दबाव के कारण सीबीआई आफताब को दुबई से डिपोट करा कर भारत ले आई। अमेरिकन सेंटर हमला मामले में आफताब को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। आफताब कोलकाता जेल में है।

 आमिर के निशाने पर दिल्ली पुलिस के दो अफसर रवि शंकर और राजबीर  भी रहे है। आमिर और उसके भाई आसिफ के साथी आफताब अंसारी ने कोलकाता जेल से आमिर को एक एसएमएस भेजा था। जिसमें इन दोनों अफसरों को ठिकाने लगाने को कहा था। एसीपी राजबीर की तो मार्च 2008 में उसके दोस्त प्रापर्टी डीलर विजय भारद्वाज ने पैसों के चक्कर में गोली मार कर हत्या कर दी।

आमिर रजा ने पहले रजा कमांड़ो फोर्स बनाई थी फिर इंडियन मुजाहिदीन बनाया। आईएम ने 2005 के बाद  कई श्हरों में बम विस्फोट किए। 2006 में मुबई में.  हैदराबाद में गोकुल चाट भंडार. यूपी में कोर्ट में 2007 में और .बनारस में 2006 में संकटमोचन मंदिर में बम धमाके कराए।  आईएम ने 25-7-2008 को बंगलूरु में. 26-7-2008 को अहमदाबाद में .13-5-2008 को जयपुर और दिल्ली में 13-9- 2008 में सिलसिलेवार धमाके किए।
इंडियन मुजाहिदीन का उत्तरी भारत का सरगना आतिफ 19 सितंबर 2008 को बटला हाउस में स्पेशल सेल के संयुक्त पुलिस आयुक्त कर्नल सिंह, डीसीपी आलोक कुमार की टीम के साथ हुए एनकाउंटर में मारा गया। एनकाउंटर में इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा शहीद हो गए। दिल्ली में सिलसिलेवार 5 बम धमाके आतिफ और उसके साथियों ने किए थे।  इस मामले में 14 आतंकवादी पकड़े गए और 11 की तलाश है। इनमें ज्यादातर आजमगढ़ के है।
आईएम का दक्षिण भारत का सरगना सादिक शेख मुंबई में 24 सितंबर 2008 को पकड़ा गया।
आईएम के फिदायीन कर्नाटक गिरोह का सरगना रियाज भटकल उर्फ रोशन और उसका भाई इकबाल पाकिस्तान में बताए जाते है। अब शाहरुख को इसका सरगना बताया जाता है।
जामा मस्जिद हमला-इंडियन मुजाहिदीन के 7 आतंकवादियों को नवंबर 2011 में दिल्ली पुलिस ने गिरफतार किया है। इनमें एक कराची के मुहम्मद आदिल अजमल ने ही 19 सितंबर 2010 को जामा मस्जिद के बाहर ताइवान के दो नागरिकों पर गोलियां चलाई थी कतील मोटर साइकिल चला रहा था और वही एक कार में शाहरुख ने प्रेशर कुकर में बम रख था। बम फटा नहीं था। इन आतंकवादियों ने ही 13 फरवरी 2010 को पुणे में जर्मन बेकरी और 17-4- 2010 को चिन्नास्वामी स्टेडियम में बम विस्फोट किया था। कतील और गौहर अजीज खुमानी को दिल्ली में .गयूर अहमद जमाली और पाकिस्तानी अजमल को बिहार के मधुबनी से इरशाद खान और अब्दुल रहमान को चेन्नै से और फारुख को र्पूिर्णया से गिरफतार किया गया। आतंकवादियों से ए के 47 राइफलें.पिस्तौल. विस्फोटक सामग्री और जाली नोट आदि बरामद हुए। बाहरी दिल्ली के मदन पुर डबास के मीर विहार इलाके  में इनके एक अन्य ठिकानेे से हथियार बनाने का सामान भी बरामद हुआ।

आईएम का साउथ सरगना शाहरुख- कतील ने पुलिस को बताया कि वह आईएम के साउथ गिरोह के साथ जुड़ा है। जिसका  सरगना अहमद सिददी बापा उर्फ शाहरुख उर्फ इमरान निवासी जेल रोड भटकल कर्नाटक है। इस मामले में फरार शाहरुख  2008 में दिल्ली में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में भी वांटेड है। कर्नाटक के उडीपी में शाहरुख ने ही आईएम के उत्तरी भारत के चीफ आतिफ और सैफ को बारुद दिया था। जिसे 13-9-2008 में दिल्ली में इस्तेमाल किया गया था। आईएम के दक्षिण गिरोह के तत्कालीन सरगना रियाज भटकल और उसके भाई इकबाल के पाकिस्तान भाग जाने के बाद शाहरुख को इसका सरगना बनाया गया। शाहरुख की मदद पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी गिरोह जैश ए मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर का भाई अतहर कर रहा था। वर्ष 1999 में हवाई जहाज हाई जैक करने में भी अतहर शामिल था। शाहरुख युवकों को जेहाद के नाम पर गुमराह कर पाकिस्तान ले जाता है पाकिस्तान में अतहर उन युवकों को हथियार चलाने और बम बनाना सिखवाता है। -दिल्ली पुलिस ने शाहरुख पर 15 लाख का इनाम घोषित किया है।

बटला हाउस आतंक का अडडा-जामा मस्जिद मामले में पकड़ा गया आतंकवादी कतील बटला हाउस इलाके में और अजीज खुमानी जामिया नगर में रह रहे थे। वर्ष 2008 में एनकाउंटर में मारा गया आतिफ और उसका गिरोह भी बटला हाउस और आसपास के इलाके में रहता था। लालकिला में हमला करने वाला पाकिस्तानी आतंकवादी भी इसी इलाके के एक मकान में एनकाउंटर में मारा गया था।
कतील की हत्या-- पुणे की यरवदा जेल में 8-6-2012 को कतील सिद्दीकी की शरद मोहोल और आलोक भालेराव ने हत्या कर दी। जामा मस्जिद के सामने विदेशियों पर हमला मामले में कतील को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने नवंबर 2011 में गिरफतार किया था। फरवरी 2010 में पुणे की जर्मनी बेकरी बम धमाके के समय वहां के गणपति मंदिर में बम रखने की कोशिश के आरोप में महाराष्ट्र पुलिस कतील को दिल्ली से पुणे ले गई थी।
आलोक कुमार IPS

रवि शंकर कौशिक DCP




Friday, 23 December 2011

पुलिस का राजनीतिकरण

पुलिस यानी सत्ता के लठैत, 
 
इंद्र वशिष्ठ
पुलिस किस तरह सत्ताधारियों के राजनीतिक मकसद को पूरा करने के लिए ही कार्य  करती है इसका अंदाजा दिल्ली पुलिस के तीन काले कारनामों से ही लगाया जा सकता है। अमर सिंह को गिरफतार न करना,अन्ना और रामदेव के खिलाफ कार्रवाई करना पूरे देश में पुलिस और सत्ता की असली तस्वीर दिखाने के लिए काफी है। अमर सिंह को कोर्ट ने जेल भेजा, उसे पुलिस ने पहले गिरफतार नहीं किया। अन्ना को पहले गिरफतार किया, फिर कुछ ही घंटों में खुद ही जेल से रिहा कराया और अनशन की इजाजत भी दे दी। रामदेव के मामले में तो पुलिस ने गदर ही कर दिया। सत्ता के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचने वाली पुलिस में ईमानदारी और निष्पक्षता की जबरदस्त कमी के कारण ही आम आदमी को उस पर भरोसा नहीं  है।
पुलिस की बर्बरता-रामलीला मैदान में आधी रात को सोते हुए लोंगों पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्रवाई किसी भी तरह से सही नहीं ठहराई जा सकती है। इस घटना में घायल हुई राजबाला की 26 सितंबर को अस्पताल में मौत हो गई। पुलिस ने कहा कि राजबाला भगदड़ में घायल हुई थी। लेकिन इस बयान से पुलिस का अपराध कम नहीं हो जाता। पुलिस के इस बयान को ही अगर सही मान लिया जाए तो सवाल उठता है कि भगदड किस वजह से हुई थी? इसका बिलकुल स्पष्ट उत्तर जगजाहिर है कि पुलिस के लाठीचार्ज और आंसूगैस के गोले दागने से ही भगदड़  हुई थी।
 स्टन गैस शैल- पुलिस ने स्टन गैस शैल के गोले दागे थे। जबरदस्त धमाके की आवाज के  साथ फटने वाले इस गोले के टुकडे़ चिनगारी  और धुंए के साथ निकलते है। इसी वजह से पंडाल में आग लगी थी, आग लगने की आशंका के कारण ही इन गोलों को बंद स्थान पर चलाने की मनाही  है फिर भी पुलिस ने रामलीला मैदान के सिर्फ एक गेट खुले और बंद पंडाल में ये गोले चलाए। सूत्रों के अनुसार पहले मैदान को रात डेढ़ बजे खाली कराने की योजना बनी थी,लेकिन फिर अचानक न जाने ऐसा क्या हुआ कि पुलिस ने एक बज कर दस मिनट पर ही एक्शन शुरु कर दिया।
 गलत नीयत और राजनीतिक मकसद - पुलिस चाहे जो तर्क दे लेकिन राजबाला की मौत के लिए पुलिस  ही जिम्मेदार है। अपराध के मामले में अपराधी की नीयत (इंटेंशन ) यानी इरादा और उसके मकसद( मोटीव ) आदि के  आधार पर कोर्ट सजा तय करती है। आधी रात को पुलिस की कार्रवाई से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस ने राजनेताओं के मकसद को पूरा करने के लिए ही गलत नीयत से कार्य किया था। इस तरह पुलिस ने  अपराध किया है।
 फिरंगी कानून/पुलिस- इस तरह की अमानवीय कार्रवाई सरकारें करती रहेगी  जब तक फिरंगियों के बनाए कानून और पुलिस व्यवस्था में बदलाव या सुधार  नहीं किया जाएगा। क्योंकि  किसी भी दल की सरकार हो वह पुलिस को अपने लठैतों की तरह रखना चाहती है। ताकि अपने विरोधियों को डंडे के दम पर कुचल सकें। इसीलिए लोगों का दमन करने और उन पर राज करने के लिए बनाए फिरंगियों के कानून आजादी के बाद भी जारी है। सत्ता में चाहे कोई भी दल हो किसी की भी नीयत इन काले कानूनों को बदलने और पुलिस में सुधार करने की नहीं रहीं । इसीलिए धर्मवीर आयोग की पुलिस में सुधार के लिए दी गई रिपोर्ट सालों से धूल खा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट द्धारा पुलिस में सुधार के लिए दिए गए निर्देशों पर भी सरकारें पूरी तरह अमल नहीं कर रही है। किसी भी राजनैतिक दल को पुलिस की ज्यादतियों पर आवाज उठाने की याद सिर्फ उस समय आती है जब वह विपक्ष में होते है। सत्ता में सब उसी कानून और पुलिस के सहारे अपना राज कायम  रखना चाहते है।  इसके लिए जिम्मेदार है नेताओं की फिरंगियों वाली सोच। संविधान के अनुसार तो वे जनप्रतिनिधि है।लेकिन सत्ता मिलते ही वे गिरगिट की तरह रंग बदल कर  मालिक बन बैठते है ये सोच ही सभी समस्याओं की जड़ है।
तलुए चाटते  अफसर -सत्ता के अहंकार  में चूर नेता भ्रष्ट अफसरों के बलबूते ही इस तरह की पुलिसिया कार्रवाई  कराते है।  ऐसे अफसर ही पुलिस कमिश्नर या डीजी बनने के लिए नेताओं के तलुए चाटते है। नेता की सेवा का फल उसे रिटायरमेंट के बाद भी मिलता है।  भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है तो अफसरों की नियुकित  प्रकि्रया पूरी तरह पारदर्शी और काबलियत के आधार पर हीं होनी चाहिए। नौकरशाह और पुलिस अफसरों को रिटायरमेंट के बाद गर्वनर या अन्य किसी पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन ये सब होगा कैसे ये सबसे बडा सवाल है इस समय तो सुप्रीम कोर्ट से ही उम्मीद की थोडी बहुत किरण नजर आती है। जुल्म ढहाने वाले अफसरों के खिलाफ जब तक कड़ी कार्रवार्इ नहीं होगी वे सरकार यानी नेताओं के निजी लठैत बने रहेंगें। पुलिस के बढ़ते राजनीतिकरण पर अगर अभी से अकुंश नहीं लगाया गया तो पुलिस अत्याचार करने में अंग्रेजों की पुलिस को भी पीछे छोड़ देगी।

कांग्रेस के अनेक चेहरे - हरियाणा में कुछ समय पहले हत्या के  आरोपी पूर्व एमएलए ने अपने हथियारबंद साथियों के दम पर पुलिस और कानून का कई दिनों तक खुल कर मखौल उडाया और पुलिस मूक दर्शक बनी रही। बाद में जुलूस के साथ जाकर उसने अपनी मर्जी से समर्पण किया। राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर गुजरों ने 
कई दिन तक रेल पटरी और सडकों पर रास्ता रोके रखा। जिसकी वजह से आम लोगों को परेशानी का सामना करना पडा। मुंबई में राजठाकरे के बदमाशों ने यूपी-बिहार के लोगों को वहां से भगाने के लिए  मारपीट  कर कानून का मजाक उडाया। इन तीनों  राज्यों में कांग्रेस की ही सरकारें हैं इन सभी जगहों पर सरकार ने धारा 144 लगा कर कार्रवार्इ क्यों नहीं की? वहां पर कानून व्यवस्था कायम रखने के लिए पुलिस एक्शन क्यों नहीं लाजिमी हुआ? जबकि रामलीला मैदान की अमानवीय कार्रवाई के बारे में तो मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि कानून व्यवस्था कायम रहनी चाहिए, इसलिए ये एक्शन लाजिमी था। दूसरी ओर महाराष्ट्र में ही पुलिस ने बेकसूर किसानों को  गोली तक मार  दी।  यू पी पुलिस ने भी भटठा परसौल में किसानों पर  अत्याचार किए। इन मामलों से ही स्पष्ट है कि नेता राजनीतिक मकसद से पुलिस का इस्तेमाल लठैतों की तरह करते है।

Thursday, 8 December 2011

हाथ छोड़ते कांग्रेसी, दिग्विजय सिंह, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद के कारनामे।



इंद्र वशिष्ठ
गांधी के वारिस होने का दावा करने वाली कांग्रेस का हाथ अब दिनोंदिन आम आदमी पर उठने  लगा है। कांग्रेस सरकार के मंत्री और महासचिव तक हाथ छोड़ने में अपने चमचों तक को पीछे छोड़ रहे है। कुछ दिन पहले इलाहाबाद में राहुल गांधी को काले झंड़े दिखाने वाले युवक को पीटते हुए  केंद्र सरकार के दो मंत्री जितिन प्रसाद. आरपीएन सिंह और यूपी के नेता प्रमोद तिवारी  दिखाई दिए।  करीब 6महीने पहले कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह को एक युवक की पिटाई करते न्यूज चैनलों पर दुनिया ने देखा था। खुद को गांधीवादी  कहने का ढ़ोंग करने वाले कांग्रेस के मंत्रियों और महासचिव के ये असली चेहरे है।
पीटना नेताओं का विशेषाधिकार?- संसद/विधान सभाओं  तक में नेता मारपीट करें या गालियां दे तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। कश्मीर में विधानसभा में स्पीकर ने गालियां बकी और जबाव में पीडीपी नेता ने स्पीकर की ओर पंखा फेंका। दिल्ली विधानसभा में एमएलए शोएब इकबाल ने सदन में जोरदार गालियां बकी सबने सुनी.लेकिन स्पीकर योगानंद शास्त्री ने कह दिया कि उन्होंने तो सुनी ही नहीं। दोनों मामले मुस्लिम समुदाय के थे इसलिए वोट के खातिर नेताओं ने उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग तक नहीं की।  तीन दिन तक संसद न चलने देने वाले विपक्ष ने भी शरद पवार को थप्पड़ मारने के मामले की निंदा करने  के लिए संसद चलने दी। जनार्दन द्विवेदी को सिर्फ जूता दिखाने वाले युवक को कांग्रेसी नेताओं द्वारा पीटने और गिरफतार कराने के मामले की विपक्ष ने  निंदा तक नहीं की। कल तक गांधीवादी कांग्रेस में रहें शरद पवार ने भी गांधी के क्षमा करने की बात पर अमल करना तो दूर. बल्कि  यह पक्का किया कि उस युवक को जल्दी रिहा न किया जाए। इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मामूली से इस मामले में मुंबई से आए वकील माजिद मेमन ने पवार की ओर से पैरवी की। मेमन ने उस युवक को समाज के लिए खतरा बताया और उसे रिहा न करने की बात कही। महाराष्ट्र में किसानों पर गोली चलाने वाली पुलिस और यूपी- बिहार के लोगों की पिटाई करने वाले राजठाकरे के गुंड़ों के खिलाफ भी क्या मेमन कोर्ट में खड़े होंगे?  दूसरी ओर पवार समर्थक एक युवक ने न्यूज चैनलों के सामने थप्पड मारने वाले युवक हरविंदर की एक महीने में हत्या करने की धमकी दी उसे तो पुलिस ने गिरफतार भी नहीं किया। शरद यादव ने राष्ट्रपति भवन और राजनिवास को बूढ़े बैलों (नेताओं)  का ठिकाना बताया तो किसी दल ने उसकी निंदा तक नहीं की। 1984 के दंगों की दागी कांग्रेस और गुजरात दंगों की दागी भाजपा द्वारा थप्पड़ मामले में संसद में निंदा करना हास्यास्पद है। अपराध तो अपराध है करना वाला चाहे कोई भी क्यों न हों। लेकिन समस्या यह है कि नेता अपने किए को तो अपराध मानते ही नहीं. दूसरी ओर  आम आदमी का तो गुस्से में उठाया हुआ कदम भी उनको अपराध नजर आता है।
सत्ता के साथ पत्रकार-कांग्रेस मुख्यालय में  जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने के मामले में तो पुलिस, नेता और पत्रकारों की असलियत एक बार फिर उजागर हुई। राजस्थान का सुनील कुमार जनार्दन  द्विवेदी के पास गया और जूता निकाल कर उनको दिखाने लगा। द्विवेदी इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यकत करते इसके पहले ही एक पत्रकार आगे बढा उसने सुनील को पकडा और उसकी पिटाई करने लगा यह देख कर कुछ और पत्रकार भी सुनील को पीटने लगे। न्यूज चैनलों में यह दिखाया गया कि सुनील को पीटने वालों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी शामिल थे। किसी को भी किसी की पिटाई करने का कोई हक नही और साथ ही यह अपराध भी है। ऐसे में कुछ पत्रकारों द्वारा की गई यह हरकत शर्मनाक तो है ही अपराध भी है। ऐसे करने वाले पत्रकार कहलाने के हकदार नही है। ये पत्रकार के रुप में नेताओं के चमचे है । पत्रकार होते तो सुनील कुमार से बात कर ये पता लगाने की कोशिश करते कि उसने जूता दिखा कर विरोध प्रकट करने जैसा कदम क्यों और किन हालात में उठाया। बाकी सुनील की हरकत पर कार्रवाई करने का फैसला उस नेता और पुलिस पर छोड देते। लेकिन पत्रकारों ने तो खुद ही कानून अपने हाथों में ले लिया। ऐसा सिर्फ वे कथित पत्रकार करते है जो अपने स्वार्थपूर्ति के लिए नेताओं के तलुए चाटते है। द्विवेदी ने भी सुनील को पीटने वालों को रोका नही। दूसरी और दिग्विजय तो पिटाई करने वालों में शामिल दिखाए गए।
पुलिस की भूमिका; पुलिस का कहना था कि पुलिस नियंत्रण कक्ष को  मिली सूचना के आधार पर सुनील को सीआरपीसी की धारा 107/151 के तहत गिरफतार किया गया। धारा 151 के अनुसार पुलिस संज्ञेय अपराध को होने से रोकने के लिए एहतियातन गिरफतार कर सकती है। शांति भंग करने पर धारा 107 लगाई जाती है। लेकिन सवाल यह है कि सुनील ने कोई संज्ञेय अपराध तो किया नहीं था। ऐसे मामलों  को सामान्यत  पुलिस अंसज्ञेय अपराध की श्रेणी में दर्ज करके उसकी रिपोर्ट  मजिस्टे्ट के मांगने पर पेश करती है। मजिस्ट्रेट  उस पर कार्रवाई करता है। असंज्ञेय अपराध के मामले में पुलिस अपने आप गिरफतार नहीं करती। लेकिन इस मामले में पुलिस ने अपने आका नेताओं को खुश करने के लिए बिना नेता से शिकायत लिए अपने आप ही धारा 107/151 के तहत कार्रवाई का तरीका अपनाया  ताकि  सुनील को गिरफतार कर जेल भेजा जा सके। एक और तो पुलिस आम आदमी की रिपोर्ट तक आसानी से दर्ज नहीं  करती दूसरी और मामला सत्ताधारी  नेता का हो तो 100 नंबर पर मिली सूचना के आधार पर ही कार्रवाई कर देती है। पुलिस अगर स्वतंत्र,निष्पक्ष और ईमानदार होती तो कानून का पालन करती और उन कथित पत्रकारों और नेताओं को भी गिरफतार करती जिन्होंने ने सुनील को पीटने का अपराध किया। न्यूज चैनलों पर देश और पूरी दुनिया ने उनको सुनील की पिटाई करते देखा। पिटाई करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के लिए इससे बडा और स्पष्ट सबूत और क्या हो सकता है। लेकिन पुलिस ने उसे अनदेखा कर  सिर्फ सुनील के खिलाफ एकतरफा कार्रवाई  कर दी। पुलिस को द्विवेदी से शिकायत लेकर आईपीसी की असंज्ञेय अपराध की धारा के तहत मामला दर्ज करना चाहिए था। तब  कोर्ट में शिकायतकर्ता द्विवेदी को भी जाना पडता। सत्ताधारियों के मन मुताबिक  पुलिस कार्रवाई करती है। इसलिए कोई भी दल सत्ता में हो वह पुलिस को स्वतंत्र नहीं रखना चाहता है।
 जैसा राजा वैसी प्रजा - सुखराम,शरद पवार को थप्पड़ मारने और गृह मंत्री चिदम्बरम को जूता मारने वाले संयोग से सिख थे । अगर वह हिंदू होते तो बिना वैरीफाई किए कांग्रेस तुरन्त कह देती कि आरएसएस के है। जैसे  कांग्रेस ने बिना जांच पडताल तुरन्त सुनील को आरएसएस का आदमी बता दिया था। पत्रकार जरनैल सिंह ने गृह मंत्री पर जूता फेंका था।  सिख दंगों के आरोपियों को टिकट देने के विरोध में उसने जूता फेंका था। उस समय सिखों की वोट की खातिर कांग्रेस ने किसी संगठन पर कोई आरोप नहीं लगाया बल्कि दो नेताओं के टिकट काट दिए। भारत में नेताओं पर जूते फेंकने का सिलसिला तब से जारी है ।  किसी संगठन पर आरोप लगा देने या नेताओं द्वारा सिर्फ ऐसी घटना की निन्दा कर देने से समस्या समाप्त नहीं होने वाली।सभी दलों के नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। संसद और विधान सभाओं में  जूतम पैजार, मारपीट और तोडफोड तक की  हरकतें करने वाले नेताओं द्वारा इस तरह के मामलों कि निन्दा करना हास्यास्पद और दिखावा है। भ्रष्ट नेताओं के कारण  लोगों के मन में उनके लिए गुस्सा भर गया है। इस लिए सुनील जैसा आम आदमी ही नही पत्रकार भी अपना गुस्सा प्रकट करने के लिए जूते का सहारा ले रहा है।  इसके लिए नेता जिम्मेदार है।  नेताओं को  इन घटनाओं से सबक लेकर अपना आचरण;व्यवहार और चरित्र सुधार लेना चाहिए। कयोंकि जैसा राजा वैसी प्रजा होती है । नेता ईमानदार होंगे तभी लोग उनकी इज्जत करेंगे।