Saturday, 7 October 2017

पत्रकार पर हमला, दिल्ली पुलिस कमिश्नर मूकदर्शक



पत्रकार पर हमला, पुलिस कमिश्नर , पीआरओ जिम्मेदार।
 पत्रकार  पर मीडिया के गुंडों का हमला, पुलिस कमिश्नर मूकदर्शक 
इंद्र वशिष्ठ
 दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक जी क्या मेरी खबरों ने आपको इतना परेशान कर दिया कि मेरी मानहानि और जान तक को खतरे में डालने के स्तर तक चले गए। पिछले करीब तीन दशक से मैंने बेबाकी से खबरें लिखी। आईपीएस दीपक मिश्रा द्वारा बम धमाके के झूठे दावे की पोल खोलने, आईपीएस सत्येंद्र गर्ग द्वारा महंगी विदेशी पिस्तौल उपहार में लेने का भ्रष्टाचार का मामला, मैक्सवेल परेरा द्वारा वाइन बना कर बेचने का मामला, मुक्तेश चंद्र द्वारा बलात्कार पीड़िता विदेशियों की पहचान उजागर करने , नीरज ठाकुर द्वारा लूट के मामले चोरी में दर्ज करने के मामलों को उजागर करने जैसी अनेक खबरें भी की है। किरण बेदी ,अमोद कंठ के समाज कल्याण के दावे की आड़ में निजी कल्याण को भी उजागर किया। इसके अलावा ऩ जाने कितने एसएचओ के खिलाफ आईपीएस अफसरों ने मेरी खबरों के आधार पर कार्रवाई भी की। लेकिन सत्येंद्र गर्ग को छोड़ कर सभी से  संबंध अच्छे रहे  हैं इन अफसरों ने नाराजगी जताना तो दूर कभी मज़ाक में भी नहीं कहा कि तुम्हारी ख़बर ने मेरा नुकसान कर दिया। इसी तरह पुलिस के अच्छे कार्य की भी असंख्य खबरें भी सबसे पहले और प्रमुखता से छापी है।
आईपीएस सत्येंद्र गर्ग और मुक्तेश चंद्र को तो मेरे कारण ज़िला पुलिस उपायुक्त का पद तक गंवाना पड़ा। लेकिन इसके बावजूद किसी पुलिस कमिश्नर या किसी भी आईपीएस ने ऐसा नहीं किया जैसा आपने मेरे साथ किया है। 
मेरी मानहानि और जान तक ख़तरे में डालने के लिए आपको जिम्मेदार मानने के पुख्ता कारण है।
(1)--6 सितंबर को मैंने ईमल द्वारा भी आपसे अनुरोध किया था कि कृपया आप यह सुनिश्चित करें कि आपके पुलिस व्हाटस ऐप ग्रुप पर कोई भी किसी दूसरे पत्रकार के बारे में टिप्पणी नहीं करें। किसी को भी किसी पर टिप्पणी करने का हक नहीं है सब अपना अपना काम कर रहे हैं। पुलिस को भी बिना किसी भेदभाव के सबको एक समान मानना चाहिए। लेकिन आपने कुछ नहीं किया जिसके परिणामस्वरूप तीन अक्टूबर और चार अक्टूबर की घटनाएं हुई । जिनसे ना केवल मेरी मानहानि हुईं बल्कि मेरी जान तक को खतरा पैदा हो गया। सब कुछ पुलिस के व्हाटस ऐप ग्रुप पर हुआ।इस ग्रुप पर मुख्य प्रवक्ता दीपेंद्र पाठक, आईपीएस पीआरओ मधुर वर्मा , आईपीएस रवीन्द्र यादव के अलावा पीआरओ ब्रांच के सभी इंस्पेक्टर भी मौजूद है। ऐसे में इस ग्रुप में मेरे साथ जो हुआ वह आपकी जानकारी में होना स्वाभाविक ही है। फिर भी मैंने आपके नाम से भी मैसेज पोस्ट किया था उसकी जानकारी तो आपके प्रवक्ताओं ने आपको दी ही होगी।
(2)--  इसके बावजूद 3 अक्तूबर को इस ग्रुप पर मेरे बारे में सुमित कुमार सिंह ने दोबारा अभ्रद टिप्पणी की। आपके प्रवक्ताओं ने उसके खिलाफ कोई  कार्रवाई नहीं की तब मुझे ही  जवाब देना पड़ा। वरिष्ठ पत्रकार आमिर अहमद राजा, फरहान और सूफ़ी आदि ने भी सुमित को समझना चाहा तो वह उनसे भी उलझ गया। चार अक्टूबर की सुबह तक यह सिलसिला चलता रहा। आपके प्रवक्ता तमाशा देखते रहे। 
चार अक्टूबर की दोपहर में मैंने आईपीएस पीआरओ मधुर वर्मा के दफ्तर की साज सज्जा पर सरकारी खजाने से लाखों रुपए लुटाने और पीआरओ द्वारा अशुद्ध हिंदी वाला संदेश टि्वट करने की एक खबर इस ग्रुप पर पोस्ट की। पीआरओ मधुर वर्मा ने इस ग्रुप पर इस ख़बर के बारे में अपना पक्ष रखा। उससे भी यह स्पष्ट हो गया कि मेरी खबर सही है। हालांकि पीआरओ ने साज सज्जा पर हुए ख़र्च का खुलासा नहीं किया। मैं इस पर भी अपनी प्रतिक्रिया दे सकता था या  मैं पूछ सकता था कि आप यह कैसे कह सकते हो कि यह आपकी व्यक्तिगत गलती नहीं है या आप खर्च की गई रकम बताएं। लेकिन मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लेकिन इसके तुरंत बाद सुमित सिंह और उसके दोस्तों ने मुझ पर अभ्रद टिप्पणी तक  करनी शुरू कर दी। मैं काफी देर तक यह इंतजार करता रहा कि सभ्य‌ और कानून के जानकार माने जाने वाले आईपीएस  प्रवक्ता या मुख्य प्रवक्ता इन लोगों को ना केवल रोकेंगे बल्कि कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देकर इनको ग्रुप से बाहर करेंगे।  लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और मेरे खिलाफ टिप्पणी करना जारी रहा । तब जाकर लगभग दो घंटे बाद मैंने जवाब दिया। लेकिन ये लोग फिर भी नहीं माने  टिप्पणी करते रहे और मुझे उकसा कर  पुलिस मुख्यालय में बुलाने की भी कोशिश की।  इसके बाद मैंने आपको भी लिखित में ग्रुप पर और  एमएमएस के माध्यम से भी कहा कि अगर आप इन लोगों को नहीं रोकते तो आप भी इसके लिए जिम्मेदार माने जाएंगे। लेकिन फिर भी मेरे खिलाफ टिप्पणी का सिलसिला रूका नहीं। इसके बाद शिकायतकर्ता यानी मुझे ही ग्रुप से हटा दिया गया।  दैनिक जागरण के राकेश सिंह ने  मेरे को हटाए जाने पर खुशी जताते हुए ग्रुप पर मुझे " बड़ा पागल था"  तक लिखा है। मेरे बारे में कितनी गिरी हुई अभ्रद टिप्पणियां की गई है यह आप पुलिस के ग्रुप पर देख सकते हैं।
अमूल्य पटनायक जी बदतमीजी करने वालों के उकसाने पर अगर  मैं पुलिस मुख्यालय पहुंच जाता और वहां मेरे साथ मारपीट हो जाती तो उसके  जिम्मेदार आप ही माने जाते।  यह खतरा  बरकरार है।  अपनी आजादी और सम्मान की रक्षा करने ,गुंडागर्दी या बदतमीजी करने वालों को जबाव देने के लिए  मैं  अपनी जान की बाजी भी लगाने से पीछे नहीं हटूंगा। लेकिन मुझे ही ऐसा करना पड़ेगा तो फिर पुलिस किस लिए बनाई गई है। पुलिस  क्या सिर्फ  ऐसे गुंडों को वारदात करने  का मौक़ा देने या अपराध होते देखने के लिए है। 
  पुलिस का तो काम ही तफ्तीश करना है।क्या आपने यह नहीं देखा कि मेरे बारे में  अभ्रद  टिप्पणी/बदतमीजी करने की पहल किसने की। जिन 10-12लोगों ने मेरे ऊपर अभ्रद टिप्पणी की अगर आप उनको ग्रुप से हटाते और उनको चेतावनी के साथ अपने कानून के ज्ञान का परिचय देते  कि  बदतमीजी करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है तो आपकी ईमानदारी और निष्पक्षता के सभी ईमानदार पत्रकार भी कायल हो जाते। लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया। आपने तो न्याय के इस सामान्य से सिद्धांत का भी पालन नहीं किया कि मेरा नाम हटाने से पहले कारण बताते और मेरा पक्ष भी सुनते । माना कि आप बहुत व्यस्त रहते हैं तो जिन आईपीएस अफसरों को आपने मीडिया की जिम्मेदारी दी  हुई है क्या उनका कार्य सिर्फ पुलिस ग्रुप पर बदतमीजी करने वालों का तमाशा देखना और उनको बढ़ावा देना है
पुलिस के बारे में आम धारणा है कि अपराध को होने से रोकने की बजाय अपराध होने का इंतजार करती है । पुलिस कहती है कि लोगों को पुलिस के आंख कान बन कर अपराध से निपटने में पुलिस की मदद करनी चाहिए। मैं खुद भी लोगों से कहता रहा हूं कि अगर थाना स्तर पर आपकी सुनवाई नहीं हो रही तो आईपीएस अफसर से जा कर मिलो वह आपकी मदद करेंगे हालांकि कई ऐसे भी मिलते हैं जो बताते हैं कि आईपीएस भी मदद नहीं करते। लेकिन मैं फिर भी इस बात पर डटा रहता हूं कि सभी आईपीएस एक जैसे नहीं होते। बिना किसी सिफारिश के भी किसी  कमजोर व्यक्ति की  शिकायत पर भी कार्रवाई करने वाले संवेदनशील आईपीएस भी है। लेकिन अब मेरे साथ पुलिस के ग्रुप पर आईपीएस अफसरों की मौजूदगी में जो मानहनि  हुई तो अब मैं कैसे किसी को कह सकता हूं कि आईपीएस और थाना स्तर के अफसर में बहुत फर्क होता है।  करीब तीन दशक से क्राइम रिपोर्टिंग में सक्रिय मुझ जैसे व्यक्ति के साथ ऐसा हो सकता है तो आम आदमी का तो सही में भगवान ही मालिक है।
यह पत्रकार की आजादी ही नहीं एक आम आदमी के भी  सम्मान और सुरक्षा  से जुड़ा हुआ मामला है।हर नागरिक को सम्मान से सुरक्षित रहने का हक है। उसकी  सुरक्षा  की जिम्मेदारी पुलिस की है। बदतमीजी करने वालों को आप यह सोच कर छूट नहीं दे सकते कि वह सब पत्रकार हैं । पेशा नहीं देखा जाना चाहिए अपराधी का।अपराधी को अपराधी ही मान कर कार्रवाई करनी चाहिए। 
इस पूरे घटनाक्रम से इस बात की ही पुष्टि होती है जो अक्सर शिकायतकर्ता  कहते हैं कि पुलिस में शिकायत करो तो कोई सुनवाई नहीं होती उल्टा शिकायतकर्ता को ही पुलिस परेशान करती है।
टिप्पणी करने वाले पत्रकारों के नाम--- सुमित सिंह डीएनए अखबार, मुकेश सेंगर एनडीटीवी, अतुल भाटिया इंडिया टीवी, मोहित ओम, वरुण जैन इंडिया न्यूज़, रुमान उल्ला खान न्यूज़ नेशन,प्रियांक त्रिपाठी टाइम्स नाउ, प्रमोद शर्मा जी न्यूज़,विनय सिंह न्यूज़ 24,  रवि जलहोत्रा ,राहुल शुक्ला  , राकेश कुमार सिंह दैनिक जागरण।
पुलिस अफसर अपेक्षा करते हैं  सरेआम होने वाले अपराध में लोग पीड़ित की मदद करें मूकदर्शक नहीं रहना चाहिए। जब इतने सारे  लोग मेरी मानहानि कर रहे थे मैं अकेला उनसे जूझ रहा था तो आपके आईपीएस अफसर भी तो मूकदर्शक बने तमाशा देख रहे थे।  अमूल्य पटनायक जी आपको तो  किसी आम आदमी के साथ भी ऐसा नहीं होने देना चाहिए था। मेरे साथ तो जो हुआ असल में इसे ही मीडिया की आज़ादी पर हमला कहा जाता है।
आपकी  चुप्पी या सहमति उन  मीडिया हाउस के पत्रकारों को शह दे रही थी जिनके मालिक ,संपादक के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने जबरन वसूली जैसे संगीन अपराध का मामला भी दर्ज किया हुआ है। बदतमीजी करने वाले गिरोह का  सरगना सुमित सिंह उसी जी न्यूज़ समूह का है  जिसके मालिक सुभाष चन्द्र गोयल और संपादक सुधीर चौधरी के खिलाफ नवीन जिंदल से सौ करोड़ की जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया हुआ है ।सुधीर चौधरी तो इस मामले में जेल भी जा चुका है।
यह वहीं सुधीर चौधरी हैं  जिसने लाइव इंडिया चैनल में झूठी खबर दिखा कर  टीचर उमा खुराना पर वेश्यावृत्ति का आरोप लगाया और पुलिस ने भी बिना तफ्तीश के जेल भेज कर उसे बदनाम कर दिया। जबकि तफ्तीश में वह बिल्कुल बेककसूर निकलीं। पुलिस ने अगर ईमानदारी से कार्य किया होता तो सुधीर चौधरी भी तभी जेल में होता  और 100 करोड़ की वसूली जैसे अपराध करने की हिम्मत नहीं करता।  कृपया‌ पत्रकारों के वेश में मौजूद गुंडों को बचा कर उनको बड़ा अपराधी  बनने  का  मौका देने की गलती आप ना  करें। 
 एनडीटीवी के मुकेश सेंगर के मालिक प्रणय रॉय के खिलाफ भी सीबीआई ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया हुआ है। वरुण जैन ,मोहित ओम उस इंडिया न्यूज़ के हैं जिसका मनु शर्मा जेसिका लाल की हत्या में तिहाड़ जेल में बंद हैं।  जिसके संपादक दीपक चौरसिया के  खिलाफ दिल्ली पुलिस ने  फौजियों से मारपीट का भी केस दर्ज किया। इंडिया टीवी के अतुल भाटिया के बारे में भी  आप मालूम करना चाहेंगे तो असलियत सामने आ ही जाएगी। मुझे बड़ा पागल  कहने वाला राकेश कुमार सिंह उस दैनिक जागरण से है जिसको  पैसे लेकर ख़बर छापने का दोषी ठहराया गया हैं ।
आपको  शायद मालूम ना हो इसलिए बताना चाहता हूं कि एनडीटीवी ने जब अपने आपराधिक मामले को मीडिया की  आज़ादी पर हमले का रुप देकर प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाया तब मैंने प्रणय रॉय समेत  मीडिया के सभी मठाधीशों के खिलाफ कई लेख लिखे थे। इसके बाद आईआरएस अफसर की लंदन में पोस्टिंग  कराने का ठेका लेने वाले  टाइम्स आफ इंडिया के संपादक दिवाकर और अरुण जेटली के नापाक गठजोड़ को उजागर करने वाला लेख भी लिखा। पत्रकारिता की आड़ में सत्ता सुख भोगने वाले एचके दुआ, कुलदीप नैयर, अरुण शौरी , चंदन मित्रा, मदारी की तरह चीख कर पत्रकारिता का तमाशा बनाने वाले अर्णब गोस्वामी, राजदीप सरदेसाई सुब्रत राय सहारा, तरुण तेजपाल, दीपक चौरसिया , रजत शर्मा, सुभाष चंद्र गोयल, सुधीर चौधरी  के बारे में भी लेख लिखे हैं। कुछ दिन पहले भी मैंने चैनलों में होने वाली क्राइम  रिपोर्टिंग को उजागर करने वाला लेख लिखा था। जुलाई में पहाड़ गंज में अंतर  राष्ट्रीय विकलांग खिलाड़ी अनिल शर्मा पर जानलेवा हमले में इंडिया न्यूज़ के मोहित ओम की भूमिका पर भी लेख में सवाल उठाए थे। इंडिया टीवी के जितेंद्र शर्मा के बारे में लिखा था। ऐसे में  जाहिर सी बात है यह लोग मुझसे बदला  लेने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अभ्रद टिप्पणी करने वाला सुमित सिंह, मुकेश सेंगर, मोहित ओम , वरुण जैन , अतुल भाटिया आदि उन मीडिया हाउस के ही  हैं जिनको मैंने अपने लेखों में बेनकाब किया है। इसलिए  मेरे खिलाफ यह एक साज़िश के तहत किया गया लगता है।  
अमूल्य जी आप  और आपके मुख्य प्रवक्ता दीपेंद्र पाठक मुझे अच्छी तरह से जानते हैं इसके बावजूद आपने या किसी अफसर ने यह जानने की कोशिश तक नहीं की इन‌ सब बातों से मुझे कितनी मानसिक पीड़ा और दुःख पहुंचा है।यह दिखाता है कि एक वरिष्ठ पत्रकार की भी आपकी नजर में कोई अहमियत नहीं है। आपने ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन भी नहीं किया।
इन सब बातों से तो यहीं लगता है कि आईपीएस प्रवक्ता और आप भी इसमें शामिल हैं।




Thursday, 5 October 2017

दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक मीडिया के दलालों के चंगुल में



दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक मीडिया मठाधीशों के दलालों के चंगुल में।
इंद्र वशिष्ठ
आईपीएस पीआरओ मधुर वर्मा के दफ्तर की साज सज्जा पर लोगों के टैक्स के लाखों रुपए बर्बाद करने को उजागर करना दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को बर्दाश्त नहीं हुआ। इसके अलावा आईपीएस पीआरओ द्वारा अशुद्ध हिंदी वाला संदेश टि्वट करने को उजागर करने से भी वह बौखला गए। इसलिए उन्होंने दिल्ली पुलिस के व्हाटस ऐप ग्रुप से मेरा नाम हटाने की बहादुरी दिखाई। चलो अच्छा हुआ असली चेहरा तो उजागर हुआ भोली सूरत दिल के खोटों का। मैं किस तरह की क्राइम रिपोर्टिंग करता हूं यह मेरी खबरें पढ़ने वाले आईपीएस अफसर समेत सभी जानते हैं।  पूर्व कमिश्नर एम बी कौशल निखिल कुमार, से लेकर आज तक मैंने बेबाकी से लिखा है। आईपीएस दीपक मिश्रा के बम धमाकों के मामले सुलझाने के झूठे दावे की पोल खोलने, सत्येंद्र गर्ग द्वारा महंगी विदेशी पिस्तौल उपहार में लेने  , मुक्तेश चंद्र द्वारा बलात्कार पीड़िता विदेशियों की पहचान उजागर करने का मामला, मैक्सवेल परेरा द्वारा वाइन बना कर बेचने का मामला हो या नीरज ठाकुर द्वारा लूट के मामलों को चोरी में दर्ज करने के मामले हो।

मेरे द्वारा मामला उजागर करने पर सत्येंद्र गर्ग और मुक्तेश चंद्र को तो जिला डीसीपी के पद से भी हटाया गया। इनमें से सत्येंद्र गर्ग को छोड़ कर सबसे अच्छे संबंध रहे। इनमें से किसी ने  भी कभी  उलाहना देना तो दूर मजाक में भी नाराजगी नहीं जताई । इतना ही नहीं इस अवधि में अनेक आईपीएस अफसरों ने तो मेरी खबरों के आधार पर अनेक एसएचओ पर भी कार्रवाई की।
बम धमाके सुलझाने के झूठे दावे को उजागर करने पर निखिल कुमार ने भी सिर्फ इतना ही कहा था कि ये आपने क्या कर दिया। मैंने भी उनको सिर्फ इतना ही कहा कि जब आपने बम धमाके सुलझाने का दावा किया था तो उसे भी प्रमुखता से छापा था और उस दावे की पड़ताल कर सच उजागर करना भी मेरा काम है। सत्येंद्र गर्ग ने अपनी करतूत के लिए मुझे दोष देने की कोशिश की तो उससे भी मैंने इतना ही कहा कि मुझे क्यों  दोष देते हो अगर तुम लाखों कीमत की पिस्तौल उपहार में लेने का भ्रष्टाचार नहीं करते तो मैं कहां से लिखता। तुमने भ्रष्टाचार कर अपना कर्म किया मैंने ख़बर लिखने का अपना कर्म किया है।
इसके अलावा केस दर्ज न करने और पुलिस की पोल खोलने की अनगिनत ख़बरे मैंने पिछले करीब तीन दशक में की है ।पुलिस के अच्छे कार्य की  भी अनगिनत ख़बरें सबसे पहले और प्रमुखता से छापी है। बीएस बस्सी द्वारा अपराध की सही एफआईआर दर्ज कराने की ईमानदार कोशिश , नीरज कुमार द्वारा अवैध हथियार पर रोक के लिए कराई  गई स्टडी पर तो मैंने हाल में भी लेख लिखा है।  किसी पुलिस कमिश्नर या डीसीपी ने ऐसी हरकत नहीं की जैसी भोली सूरत वाले अमूल्य पटनायक ने की है। अफसोसनाक यह है मीडिया के मठाधीशो दलालों के साथ मिलकर यह किया गया है। 6 सितंबर को मैंने पुलिस के व्हाटस ऐप ग्रुप पर एक खबर पोस्ट की ताकि जिनको न मालूम हो उनको भी पता लग जाए। जिस पर पत्रकार अंजुम जाफरी ने कहा कि यह आपने अच्छा किया जिससे हमें यह खबर पता चल गई। लेकिन किसी सुमित सिंह ने बिना वजह एतराज जताया। मैंने उसे कहा कि किसी पत्रकार को यह हक़ नहीं की वह दूसरे को बताएं कि क्या करना चाहिए। इसके बाद सुमित ने अभ्रद टिप्पणी की और मुझे ग्रुप से हटने को कहा। मैंने उसे जवाब दिया और साथ ही पुलिस के मुख्य प्रवक्ता दीपेंद्र पाठक से भी अनुरोध किया कि पुलिस के ग्रुप में किसी को भी किसी पर टिप्पणी करने से रोकें। अमूल्य पटनायक को ईमल भी भेजा।  तीन अक्टूबर को सुमित ने मेरा नाम हटाने की पोस्ट डाली। मैंने उसे समझाने के लिए जवाब दिया हालांकि उसको समझाने की कोशिश गोबर में घी डालने जैसी साबित हुई। उसने अभ्रद टिप्पणी जारी रखी। आमिर अहमद राजा, फरहान और सूफ़ी  ने भी सुमित को बदतमीजी करने से रोकने की कोशिश की। लेकिन सुमित अपनी हरकत से बाज नहीं आया और उनके साथ भी उलझ कर बदतमीजी की। पुलिस का दलाल बन कर ग्रुप से हटने को कहता रहा। चार अक्टूबर की सुबह तक यह चला। यह सब पुलिस ग्रुप पर हुआ तो जाहिर सी बात है पुलिस प्रवक्ताओ की जानकारी में था लेकिन उन्होंने बदतमीजी करने वाले को रोकने की कोशिश ही नहीं। शायद ये अफसर भी उस मानसिकता के हैं जो पीड़ित की आवाज न सुन कर , अपराधी को अपराध करने का मौक़ा देते हैं  वारदात को होने से रोकने की बजाय वारदात होने का इंतजार करते हैं। 
सुमित के बारे में मालूम किया तो कड़ियां जुड़ने लगीं यह सब एक साज़िश के तहत किया गया लगता है। सुमित डीएनए अखबार में है जिसके मालिक सुभाष चंद्र गोयल और जी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी पर नवीन जिंदल से 100 करोड़ की जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया हुआ है सुधीर चौधरी इस मामले में जेल भी जा चुका है।
यह वही सुधीर चौधरी हैं जिसने लाइव इंडिया चैनल में टीचर उमा खुराना पर वेश्यावृत्ति का धंधा कराने की झूठी खबर दिखाई थी।
चार अक्टूबर को दोपहर 3.19 बजे मैंने आईपीएस पीआरओ वाली खबर ग्रुप पर पोस्ट की। के के शर्मा परवेज़ सिद्दकी और सूफ़ी ने ख़बर की तारीफ कर दी।
5.25 इंडिया टीवी के अतुल भाटिया ने मेरे बारे में टिप्पणी की लेकिन मैंने जवाब नहीं दिया। आईपीएस पीआरओ मधुर वर्मा ने ग्रुप में अपना पक्ष रखा। जिसमें मधुर वर्मा ने माना कि उनके द्वारा टि्वट किए गए संदेश में गलती हुई। लेकिन अजीब तर्क दिया कि यह कोई व्यक्तिगत गलती नहीं है। आईपीएस के इस तर्क के मायने तो यह भी निकलते हैं कि यह व्यक्तिगत नहीं तो फिर सामूहिक गलती है इससे मेरी इस बात की भी पुष्टि होती है जो मैंने लिखा कि अफसर  आंखें बंद कर काम करते हैं। मधुर वर्मा ने अपने कमरे में साज सज्जा पर हुए ख़र्च के बारे में कुछ नहीं कहा।
इसके बाद पत्रकारों के वेश में मौजूद दलालों
ने जो किया उससे पता लगता है कि ऐसे घटिया लोगों के कारण ही इस पवित्र पेशे का पतन हो गया है। इनके नाम है सुमित सिंह,  अतुल भाटिया इंडिया टीवी , मुकेश सेंगर एनडीटीवी, रुमान उल्ला खान न्यूज़ नेशन, वरुण जैन, मोहित ओम इंडिया न्यूज़,प्रियांक त्रिपाठी टाइम्स नाउ, प्रमोद शर्मा, राहुल शुक्ला,विनय सिंह आदि।
इन सबने ना केवल अभद्र भाषा में टिप्पणी की बल्कि आईपीएस पीआरओ की चापलूसी में बेशर्मी की हद पार कर कुतर्क दिए। जुबां पर सच दिल में इंडिया का दावा करने वाले  एनडीटीवी के मुकेश सेंगर ने तो यह तक कहा कि आईपीएस अफसर का कमरा कैसा हो यह तय करना पत्रकार का काम नहीं है। मुकेश की बात से जाहिर होता है कि आईपीएस अगर जनता के टैक्स के लाखों रुपए अपने दफ्तर की साज सज्जा पर लुटा दें तो वह कुछ ग़लत नहीं है। यहीं दोगला मीडिया केजरीवाल के भोजन कराने के बिल को लेकर खूब हल्ला मचाता है। एक ने कहा कि ख़बर लिखने की बजाय पीआरओ से मिल कर गलती सही करानी चाहिए थी। पुलिस के तलुए चाटने में इन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।
जब मैंने इन सब पर गौर किया तो कड़ियां जुड़ती गई और पूरी साजिश समझ में आ गई। यह वही मुकेश सेंगर है जिसके मालिक प्रणय रॉय के खिलाफ बैंक से 48 करोड़ की धोखाधड़ी के आरोप में सीबीआई ने मामला दर्ज किया हुआ है।प्रणय रॉय ने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को मीडिया की आज़ादी पर हमला बता कर मोदी पर आरोप लगाने की असफल कोशिश की थी। उस समय मैंने मीडिया मठाधीशों प्रणय रॉय , सुभाष चंद्र गोयल, सुधीर चौधरी, सुब्रत राय सहारा,रजत शर्मा, चंदन मित्रा, अश्विनी कुमार मिन्ना, तरुण तेजपाल, दीपक चौरसिया, राज़दीप सरदेसाई , शेखर गुप्ता,अर्णब गोस्वामी के अलावा एच के दुआ, अरुण शौरी और कुलदीप नैयर जैसे राजसुख भोगने वालों को आईना दिखाना वाले कई लेख लिखें थे। इसके बाद टाइम्स आफ इंडिया के दलाल संपादक दिवाकर और अरुण जेटली के नापाक गठजोड़ पर भी लिखा था। एनडीटीवी के बारे में तो जगजाहिर है कि वह तो ब्यूरोक्रेट और कांग्रेस की गोदी में पला-बढ़ा है। इनमें से जिन मीडिया मठाधीशों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। उनके रिपोर्टर तो आईपीएस के तलुए चाटेंगे ही और ऐसे ही जो भ्रष्ट अफसर होगा वह ऐसे मीडिया वालों से सांठगांठ रखेगा ही। मीडिया के स्वयंभू मठाधीशों के दलालों ने जैसा मेरे साथ किया है असल में मीडिया की आज़ादी पर हमला इसे कहते है। मैंने यह सब  इसलिए लिखा है कि कल को अगर मुझे कुछ हो जाए तो सबको मालूम होना चाहिए कि ईमानदारी से पत्रकारिता करने वाले के खिलाफ बेईमान पुलिस अफसर और मीडिया मठाधीश किस स्तर तक गिर सकते हैं।
मेरे खिलाफ उपरोक्त क्राइम रिपोर्टर ने अभ्रद टिप्पणी की । लेकिन पुलिस कमिश्नर की ओर से रोकने का प्रयास नहीं किया गया। तब मैंने जवाब दिया। मुकेश सेंगर से भी मैंने यही कहा कि जब मेरे ऊपर जब अभ्रद टिप्पणी की जा रही थी तब तुम चुप क्यों थे।दूसरा किसी को यह बताने का हक नहीं है किसी को क्या लिखना चाहिए।तीसरा तुम पीआरओ की ओर से बोल़ रहे हो तो बता दो कि पीआरओ ने सरकारी खजाने का कितने लाख अपने कमरे की साज सज्जा में खर्च किया। इसके बाद मैंने पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को भी लिखा कि क्या पुलिस ग्रुप का इस्तेमाल आपने किसी की भी बेइज्जती करने के लिए बनाया है आपके प्रवक्ता क्या तमाशा देखने के लिए है अगर आप मेरे साथ की जाने वाली बदतमीजी को नहीं रोकते तो इसके जिम्मेदार आप माने जाएंगें। इसके बाद व्हाटस ऐप ग्रुप से मुझे ही हटा दिया गया। अमूल्य पटनायक ईमानदार होते तो जब मैंने 6सितंबर को ही उनको ईमल भी कर दिया तो यह सब रोकते। फिर तीन अक्टूबर की रात से लेकर चार अक्टूबर को मुझे ग्रुप से हटाने तक उन्होंने बदतमीजी करने वालों के खिलाफ कुछ नहीं किया। 

दिल्ली पुलिस के IPS मधुर वर्मा ने दफ्तर की साज सज्जा पर लाखों लगाएं। PRO का कमाल हिंदी बेहाल

IPS,PRO मधुर वर्मा का कमाल हिंदी बेहाल।
आईपीएस अफसरों ने तोड़ दिया "पीआरओ" पुल
इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस के पीआरओ आईपीएस  मधुर वर्मा ने एक टि्वट किया है जिसे पढ़ कर आप समझ सकते हैं कि राष्ट्र भाषा का उनको कितना ज्ञान और सम्मान है  कितनी लापरवाही से वह काम करते हैं। टि्वट के साथ जो फोटो/ विज्ञापन पोस्ट किया गया है। उसमें यह लिखा हुआ है "कोई भी संदेहजनक व्यक्ती  के ओर मैं अपनी आंख और कान खुली रखूंगा।" इसमें ना तो वाक्य सही है और ना ही शब्द।
यह अफसर हिंदी भाषी प्रदेश के ही हैं। इस टि्वट को दिल्ली पुलिस ने भी रिट्वीट कर दिया है। इससे पता चलता है कि पुलिस में किस तरह अफ़सर आंख मूंद कर काम कर रहे हैं।

जिस का काम उसी को साजे---दिल्ली पुलिस के  पीआरओ रवि पवार 2006 में रिटायर हो गए।वह भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी थे लेकिन बाद में पुलिस में ही स्थायी हो गए थे। पवार के रिटायर होने के बाद से आज़ तक इस पद पर सूचना सेवा के अधिकारी को नियुक्त नहीं किया गया है। अपराध शाखा के राजन भगत को पीआरओ का ही अतिरिक्त कार्य सौप दिया गया था। साल 2016 दिसंबर में उनसे यह कार्य वापस ले लिया गया।
इसके बाद अपराध शाखा के डीसीपी मधुर वर्मा को यह कार्य सौप दिया गया। कुछ दिन पहले उनसे अपराध शाखा का काम वापस लेकर पूर्णकालिक पीआरओ बना दिया गया। जिस कमरे में पीआरओ डीसीपी राजन भगत बैठते थे वह कमरा आईपीएस मधुर वर्मा को अपनी शान के मुताबिक नहीं लगा । इसलिए उन्होंने सबसे पहला काम उस कमरे की अपनी शान और शौक के  मुताबिक साज सज्जा कराने के लिए किया। इस पर सरकारी खजाने से जनता के टैक्स के लाखों रुपए लुटा दिए। शायद इसी व्यस्तता में वह अपना पीआरओ का काम सही तरह नहीं कर पाए।
 दूसरा यह है कि आईपीएस को पुलिसिंग के काम से हटा कर पीआरओ का काम कराने का भी यह नतीजा हो सकता हैं। पिछले करीब तीन दशक में जो नहीं हुआ वह अब हो गया।  पहले पत्रकार पीआरओ के कमरे में बेधड़क जाते थे और जाना भी चाहिए क्योंकि पीआरओ का काम तो पत्रकारों और पुलिस के बीच पुल की तरह संबंध अच्छे बनाने का  होता है। लेकिन अब चूंकि आईपीएस पीआरओ है तो वह अपनी अफसरी दिखाने से कैसे बाज आएगा।‌‌‌‌सो अब पत्रकारों का बेधड़क प्रवेश बंद कर दिया गया और साहब के रहमो-करम पर है कि वह किससे मिलेंगे।कमरे के बाहर बकायदा इसके लिए सिपाही तैनात कर दिया गया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जो अफ़सर पत्रकारों के साथ भी ऐसा कर रहा है जिले में तैनाती के दौरान आम आदमी से कैसा व्यवहार करता रहा होगा। 
पीआरओ ब्रांच के ही सूत्रों ने बताया कि अब पुलिस के बुलावे  पर पुलिस के कार्यक्रम में अगर जो रिपोर्टर
नहीं पहुंचे और उस कार्यक्रम के प्रचार की खबर नहीं दी या पुलिस मुख्यालय में पीआरओ ब्रांच में  नियमित नहीं पहुंचते तो  पुलिस के व्हाइट ऐप ग्रुप से भी‌‌ उसको  हटाया जा रहा है। ऐसा मैने देखा भी है कि रिपोर्टर के नियमित ना होने के कारण हटाने की बात बकायदा पुलिस लिख‌ कर बता रही  है।
लेकिन अगर आप किसी कथित बड़े मीडिया ग्रुप से हैं फिर चाहे  उसका मालिक बानिया सुभाष चंद्र गोयल और संपादक सुधीर चौधरी जैसे ही हो जो कि  नवीन जिंदल से 100  सौ करोड़ की जबरन वसूली के मामले में दिल्ली पुलिस के आरोपी  भी हो तो भी  पुलिस अफसर आपको पूरा सम्मान देंगे। आपको पुलिस के व्हाटस ग्रुप पर किसी दूसरे पत्रकार के बारे में भी बकवास करने की सुविधा उपलब्ध रहेगी।जो दिल्ली पुलिस मीडिया को भी बड़े-छोटे ग्रुप के रिपोर्टर के नजरिए से देखने लगे वह आम आदमी के प्रति संवेदनशील नहीं हो सकती।
रवि पवार के समय में प्रेस और अफसरों के बीच तालमेल और संबंध काफी हद तक अच्छे थे।राजन भगत ने भी इन संबंधों को बनाए रखा और अपनी व्यवहार कुशलता से मीडिया के साथ सही तरीके से काम किया।
पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को यह समझना चाहिए कि कि पेशेवर प्रवक्ता न होने का खामियाजा पुलिस को भुगतना पड़ता है। 
पेशेवर पीआरओ तो बिना हिचक के पेशेवर राय पुलिस कमिश्नर को दे सकता है दूसरी ओर अस्थायी पीआरओ बना आईपीएस अफसर  तो पुलिस कमिश्नर की सिर्फ हां में हां ही मिलाएगा। पुलिस के पीआरओ का काम तो मीडिया से अच्छे संबंध बनाने का ही होता है। पीआरओ ही अगर भेदभाव और मीडिया से ही अफसरी दिखाने लगेगा तो संबंध अच्छे कहां से होंगे। मूल बात यह है कि स्थायी पेशेवर पीआरओ के होने से ही संबंध अच्छे रहते क्योकि वहीं रिपोर्टर की पेशेवर काम में आने वाली दिक्कतों को समझ सकता है और अफसरों को उससे अवगत करा कर समाधान की कोशिश भी कर सकता है। 

टाइम्स पास पीआरओ--आईपीएस अफसर पीआरओ बनने के लिए पुलिस में नहीं आए हैं वह तो मजबूरी में अच्छी पोस्टिंग  के इंतजार में अपना समय बिताने के लिए अस्थायी रुप से और कुछ शौकिया ही काम करेंगे। ऐसे पीआरओ के लिए एक कहावत है कि रोते-रोते जाओगे तो मरे की खबर ही  लाओगे।मतलब पीआरओ ऐसा होगा तो मीडिया में पुलिस की छवि ख़राब ही पेश करेगा। पुलिस और प्रेस के बीच पुल का काम करने वाले पेशेवर पीआरओ की जरूरत है। आईपीएस ने तो बने हुए पीआरओ नामक पुल को ही तोड़ दिया । पीआरओ का काम प्रेस के माध्यम से पुलिस की छवि को सुधारने जैसा जिम्मेदारी का काम होता है। यह काम पेशेवर पीआरओ ही कर सकता है। अगर पेशेवर पीआरओ की कोई अहमियत नहीं होती तो सरकार को भारतीय सूचना सेवा बनाने की जरूरत ही नहीं होती। वैसे कुछ आईपीएस को यह गलतफहमी भी होती है कि वह आईपीएस बन गए तो सर्वज्ञानी और सर्व गुण संपन्न हैं और सभी काम वह कर सकते हैं।

Monday, 2 October 2017

तलाक देते हैं पर हक नहीं देते, मासूम बच्चों का भी


तलाक देंगे पर हक नहीं देंगे, मासूम बच्चों का भी 
-- इंद्र वशिष्ठ
बेटियां तो बेटियां ही होती है और वह सबकी सांझी होती है। बेटी किसी की भी दुखी नहीं रहनी चाहिए। 
 पर उपदेश कुशल बहुतेरे। तीन तलाक़ की ग़लत परंपरा को खत्म करने के लिए मुसलमानों को उपदेश देने और हल्ला मचाने वाले हिंदुओं पर यह बात खरी उतरती है। हिंदुओं अपने गिरेबान में भी झांक लो।  हिंदू  लड़कियों की जो दुर्गति हो रही है। उसकी ओर इनका ध्यान नहीं जा रहा। हिंदू लड़कियों और उनके बच्चों पर जो बीत रही है उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पत्नी को तलाक दे कर पति तो तुरंत दूसरी शादी करना चाहता है लेकिन पत्नी और बच्चों को उनका हक ( गुज़ारे के लिए खर्चा आदि) भी नहीं देना चाहता है। इसमें लड़के के मां बाप भी पूरी तरह  शामिल ही नहीं होते बल्कि वह ऐसे रास्ते निकालते हैं कि बहू और पोते-पोती को कुछ भी नहीं देना पड़े। 
कोई भी अपनी लड़की के लिए लड़के का घर परिवार देख कर ही रिश्ता करता है। उस समय लड़के वाले अपनी और लड़के की आर्थिक स्थिति और लड़के के बारे में ऐसा ब्यौरा देते हैं कि जिससे लड़की वाले संतुष्ट हो जाए कि उनकी बेटी को ससुराल में आर्थिक रूप से भी कोई परेशानी नहीं होगी। 
पति-पत्नी में अगर नहीं बनती या पति मार-पीट तक भी करता है तो भी लड़की के माता-पिता की कोशिश तो अंत तक यही होती है कि शादी बनी रहे। लेकिन कई मामले ऐसे भी देखें हैं कि पति और ससुराल वाले मिल कर साजिश करते हैं ताकि उनको पत्नी और बच्चों को कुछ भी‌‌ न देना पड़े और आराम से तलाक ले कर लड़का दूसरी शादी कर ले। ऐसे में पत्नी और बच्चों का चाहे जो हो उससे उनको कोई मतलब नहीं। हालांकि ऐसी भी बहुएं होती है जो पति का ही नहीं सास-ससुर का भी जीना हराम कर देती है।
 साजिश--  साजिश के पहले क़दम के रूप में ससुराल वाले बेटे बहू को अपने पैतृक घर से किराए के मकान में रहने भेज देते हैं यह कह कर कि अलग रहने से संबंध ठीक हो जाएगें। इसके बाद जब पत्नी मायके गई होती है तो पति किराए के मकान को खाली कर गायब हो जाता है। मायके से वापस आने पर यह सब देख लड़की ससुराल जाती है तो वह ससुराल वाले जो दुनिया के सामने बहू को बेटी मानने का दावा करते है उसे घर में भी नहीं घुसने देते हैं। अब लड़की पुलिस में शिकायत करती है तो वहां से मामला महिला अपराध शाखा में भेज दिया जाता है जिसका गठन इसलिए किया गया था कि पति पत्नी को बुला कर समझाया जा सके ताकि रिश्ता बना रहे। हालांकि ज्यादातर मामलों में वहां समय की बरबादी ही होती है। यहां आकर ससुराल वाले साज़िश का दूसरा पत्ता फेंकते हैं। ससुराल वाले कहते हैं कि उन्होंने तो अपने बेटे को संपत्ति से बेदखल कर दिया है उनका बेटे से कोई संबंध नहीं है। इन्हीं ससुराल वालों ने रिश्ता करने के लिए लड़की के परिवार वालों के सामने इस तरह भरोसा दिलाया था कि उनकी बेटी को कोई दिक्कत नहीं होगी। और अब यह कहते हैं कि उनका अपने बेटे से ही कोई वास्ता नहीं है।
पुलिस की भूमिका-- महिला अपराध शाखा में कई महीने धक्के खाने के बाद‌ भी कोई समाधान नहीं निकलने पर वहां से संबंधित थाने में मामला दर्ज करने के लिए रिपोर्ट भेज दी जाती है। एफआईआऱ दर्ज हो जाने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी तो दूर जांच  के नाम पर पुलिस कई महीने निकाल देती है। ऐसे में आरोपी को अग्रिम जमानत तक का मौका मिल जाता है। पुलिस अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने में भी सालों लगा देती है। दूसरी ओर लड़की थाने के चक्कर काटती रहती है। अदालत में अपने और बच्चों के गुज़ारा खर्चा के लिए मुकदमे में उलझ कर परेशान रहती है। आर्थिक और मानसिक रूप से वह टूट जाती हैं दूसरी ओर समाज ही नहीं रिश्तेदार भी लड़की को ऐसे नजरिए से देखता है जैसे कि सारा कसूर लड़की का ही है। लड़की मायके में भी बेचारी सी बन कर रह जाती है।
तलाक देते पर हक नहीं देते-- मान लो कि पति तो बिल्कुल दूध का धुला है और सारी कमी पत्नी में ही है और तलाक  ही एकमात्र  रास्ता बचा है। तो भी पत्नी और बच्चों का कानूनन जो हक़ बनता है ईमानदारी से वह तो देना चाहिए। हक़ नहीं देना पड़े इसलिए अपने बेटे को बेदखल करना तो ससुराल वालों की ही नीयत में खोट दिखाता है। सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए जिससे तलाक देने वाला पत्नी और बच्चों का हक़ ना मार पाए। हक़ देने से बचने के लिए बेटे को बेदखल करने की कार्रवाई को अवैध माना जाए। लड़की की शादी में मां-बाप अपनी हैसियत से ज्यादा पैसा लगाते है। लालची, नालायक,शराबी और लड़की से मारपीट तक करने वाले लड़के को भी लड़की और लड़की के मां-बाप सिर्फ इस उम्मीद से झेलते रहते है कि रिश्ता बना रहे। ज्यादतर मामलों में  लड़की अपनी ओर से तलाक के लिए पहल भी नहीं करती है। लड़की वाले इतने बेबस हो जाते है कि वह चाह कर भी कोई सख्त कदम मार पीट तक करने वाले दामाद के खिलाफ नहीं उठाते। वे यह सोचते है कि रिश्ता बना रहे। समाज की भी सोच ऐसी है कि एक बार जिसके साथ शादी हो गई उसके साथ ही लड़की को जीवन बिताना चाहिए चाहे पति  में लाख बुराई क्यों न हो। पति/ ससुराल  से परेशान लड़की पीहर में रहने की सोचे तो 'समाज बात बनाएगा ' यह सोच कर लड़की के मां बाप भी उसे अपने साथ रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते है। ऐसे में ही लड़की को जब कहीं से कोई सहारा नहीं मिलता तो आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाती है। तब मां-बाप पछताते है कि अगर समाज की परवाह न करते तो बेटी तो जिंदा रहती। इसलिए मां बाप को संवेदनहीन समाज या किसी की भी परवाह किए बगैर अपनी परेशान बेटी को अपने साथ रखना चाहिए। किसी की जान से बढ़ कर कुछ नहीं होना चाहिए।
 धोखा—शराबी, जुआरी, बेरोजगार ही नहीं नपुंसक और समलैंगिक लड़के की भी शादी ल़ड़की वालों को धोखा दे कर लड़के के मां-बाप कर देते है।कई मामले तो ऐसे भी होते है कि ल़ड़के के किसी लड़की से संबंध होते है यह जानते हुए भी मां-बाप लड़के की शादी किसी दूसरी लड़की के साथ कर देते है। उनकी सोच होती है कि शादी के बाद लड़का ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा करके वह  बहू  का जीवन तो बरबाद करते ही है। लड़के के ना सुधरने पर बहू को ही दोष देते है। हाल ही में एक रिटायर्ड आईएएस अफसर के बेटे का मामला सामने आया। शारीरिक संबंध बनाने में अक्षम युवक ने बेशर्मी के साथ पत्नी से कहा कि उसने तो शादी दोस्ती करने के लिए की है संबंध बनाने के लिए नहीं। इस तरह से पत्नी की गरिमा/ जीवन से खिलवाड़ किया जाता है।
पुख्ता इंतजाम--शादी के समय लड़की वालों की ओर से दिए जाने वाले सामान की सूची सबके सामने पढ़ कर सुनाई और लड़के वालों को दी जाती है। इस तरह से लड़के और उसके परिवार की संपत्ति/ आर्थिक स्थिति की सूची भी लड़के वालों द्वारा लड़की वालों को दी जानी चाहिए। लिखित में यह पुख्ता इंतजाम किया जाना चाहिए कि अगर पति तलाक देना चाहे तो पत्नी और बच्चों को उनका कानूनन हक देने में पति और ससुराल वाले कोई आनाकानी या साजिश न कर सके।
पत्नी भी नाक में दम करने में कम नहीं—शादीशुदा जीवन को स्वर्ग या नरक बनाने में पत्नी की भी अहम भूमिका होती है। जरूरी नहीं कि सिर्फ पति और ससुराल वाले ही दुष्ट, लालची और घटिया सोच के हो।  पत्नी और उसके मां-बाप भी बहुत दुष्ट और घटिया होते है।  असल में कुछ लोगों की सोच ऐसी भी होती है कि लड़का संपत्ति में से अपना हिस्सा लेकर अलग रहे। इसके लिए अगर आसानी से बात नहीं बनती तो मां बाप की शह पर लड़की अपने ससुराल वालों पर आरोप लगाने में किसी भी स्तर तक चली जाती है।  दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के शिकार हमेशा शरीफ ही होते है और पीड़ित लड़का –लड़की दोनों में से कोई भी हो सकता है। ऐसी दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के कारण विवाह जैसा पवित्र संबंध टूट रहे है और इन सबका खामियाजा उनके मासूम बच्चों को भुगतना पड़ता है।
दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड एसीपी जयपाल सिंह के अनुसार इन मामलों में पुलिस यदि सही तफ़तीश करे तो बहुत केस कोर्ट में जाने से पहले या तो घर बस जायेंगे या बेगुनाह माँ बाप और दूसरे रिश्तेदार बिना ग़लती किये अदालत के चक्करों से बच जायेंगे।अधिकतर केसों में पुलिस जांच किए बिना ही लड़की की बात को ही सही मान लेती हैं। शादी के समय जो सामान की लिस्ट पढ़ कर सुनाई जाती है उस पर साईन करने का क़ानून बनना चाहिये । शादी का रजिस्ट्रेशन सरल व ज़रूरी होना चाहिए उसी में सामान की लिस्ट संलग्न करने का प्रावधान होना चाहिये। स्त्री धन का भी सही विवरण उसमें होना चाहिये। निकाहनामा की तरह तलाक़ के समय दी जाने वाली रक़म/जायदाद का भी लिखा जाना आवश्यक होना चाहिये। शादी का रजिस्ट्रेशन थाने या लोकल मन्दिर में होना चाहिये और इलाक़े का एसडीएम हर महीने एसएचओ / मन्दिर के पुजारी के कार्यालय में जाये या वे उसके कार्यालय जायें और महीने भर में जो शादियां दर्ज हुई उनको एसडीएम अटैस्ट करें यह सब निःशुल्क होना चाहिए। इन सबका क़ानून में ऐसा प्रावधान हो कि इसमें कोई भी  लड़की / लड़के वाला या अफ़सर कोताही / ग़लती करे तो सख़्त सजा का प्रावधान हो।
वकील की भूमिका- दिल्ली पुलिस की महिला अपराध शाखा मेें रह चुके एक वरिष्ठ पुलिस अफसर ने बताया कि कई बार वकीलों के कहने में आकर भी दोनों पक्ष ऐसे आरोप-प्रत्यारोप लगा देते है कि मामला सुलझने की बजाए बिगड़ जाता है।

                                                   

Tuesday, 19 September 2017

भेड़ चाल में मीडिया मदारी घनचक्कर, खबर रफूचक्कर, पत्रकारिता का तमाशा


नंबर वन का चक्कर, कौवे के पीछे घनचक्कर, खबर रफूचक्कर ।
लाश में तीर मार बनते मीडिया के मदारी ' शिकारी 



'
इंद्र वशिष्ठ
मीडिया खासकर न्यूज चैनलों में पत्रकारिता का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह खुद समाज में होने वाले ग़लत काम और ग़लत व्यक्ति /ढोंगी की करतूतों का पर्दाफाश करेगा। जैसे सिरसा में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति ने  बलात्कारी राम रहीम का पर्दाफाश किया था। लेकिन आजकल मीडिया पोस्टमार्टम की पत्रकारिता कर पत्रकार होने का ढोंग करता है। पहले शेर का शिकार करने के बाद शिकारी उसके साथ फोटो खिंचवाता था इसी तरह तरह मीडिया को भी किसी का पर्दाफाश करने पर श्रेय मिलता था। आज़ हालत यह कि अपराधी जब खुद अपने कुकर्मों के कारण कोर्ट के चंगुल में फंस कर जेल पहुंच जाता है तो मीडिया के मदारी “ बहादुरों ” की टीम मरे मराए शिकार में तीर मार- मार कर अपनी बहादुरी का बेशर्मी से बखान करने की होड शुरू करती है। जैसे राम रहीम के जेल जाने के बाद मीडिया कर रहा है। राम रहीम के बारे में पहले चुप रहने वाला मीडिया अब भी इस तरह खबर दिखा रहा है जैसे वह बहुत जोखिम का काम का कर रहा है। 
सबसे पहले के चक्कर में घनचक्कर, ख़बर रफूचक्कर ---राम रहीम को जिस दिन सजा सुनाई गई उस दिन दोपहर से ही सभी चैनल दस साल सजा की खबर सबसे पहले दिखाने का दावा करते रहे। मैं उस शाम सीबीआई मुख्यालय में था सीबीआई प्रवक्ता ने शाम को इस मामले से संबंधित अपने अफसर से सूचना लेने  के बाद ही वहां मौजूद 8-10 पत्रकारों को बताया कि बलात्कार के दो मामलों में दस-दस साल यानी कुल बीस साल की सजा हुई है और एक सज़ा पूरी होने पर दूसरी सज़ा शुरू होगी। तब वहां मौजूद पत्रकारों (एबीपी समेत) ने अपने चैनलों में खबर सही करवाई। अब दोपहर से ही गलत खबर दिखाने वाले चैनल वालों से कोई पूछे कि जब कोर्ट से काफी दूर ही पत्रकारों को रोक दिया गया था। कोर्ट की कार्यवाही शाम तक चली। कोर्ट की कार्यवाही खत्म होने से पहले कोई  भी बता ही नहीं सकता कि सजा क्या दी गई। तो ये दोपहर से ही ग़लत ख़बर दिखा कर लोगों को गुमराह क्यों कर रहे थे। रोहतक में मौजूद पत्रकरों को राम रहीम के वकील ने भी शाम को कोर्ट से बाहर निकलने के बाद अधूरी जानकारी दी। ऐसे में कोर्ट या सीबीआई से आधिकारिक सूचना मिलने पर ही सही खबर देनी चाहिए थी या अंतर्यामी बन कर कोर्ट के अंदर की गतिविधियों की झूठी खबर देना पत्रकारिता है। बेशर्मी की हद है कि कई चैनल अब भी यह श्रेय ले रहे है कि उन्होंने सबसे पहले दोपहर में साढे तीन बजे ही यह खबर दी कि राम रहीम को दस साल की सजा हो गई।
कौवे के पीछे भागते मदारी---न्यूज चैनल की हालत ऐसी हो गई कि अगर कोई इनको कह दे कि कौवा तुम्हारा कान ले गया तो ये पहले अपना कान देखने की बजाय कौवे के पीछे शोर मचाते हुए भागना शुरू कर देंगे।
न्यूज चैनल माध्यम अच्छा, मदारी गड़बड़-- अफसोस होता है कि न्यूज़ चैनल बहुत अच्छा कार्य कर सकते हैं लेकिन सबसे पहले दिखाने के चक्कर में घनचक्कर बन गलत और आधी अधूरी ख़बर दिखा देते हैं। इसलिए लिए मीडिया पर आम लोगों का भरोसा खत्म हो जा रहा है। न्यूज़ चैनलों की मिट्टी पलीद इनके एंकरों ने भी कराई हैं। एंकर मदारी और पटरी बाजार के दुकानदारों की तरह चीख चीख कर ख़बर बेचते लगते हैं। ऐसे भी एंकर हैं जो बम धमाका होते ही तुरंत बेचारे रिपोर्टर से यह भी पूछने लगते हैं कि बताईए धमाके में कौन सा विस्फोटक इस्तेमाल किया गया है। अब इन एंकर से कोई पूछे कि घटनास्थल पर जांच के लिए विस्फोटक विशेषज्ञ भी अभी पहुंचे नहीं। ऐसे में रिपोर्टर क्या उन विशेषज्ञ से भी ज़्यादा ज्ञानी या अंतर्यामी है जो तुरंत बता देगा कि कौन सा विस्फोटक इस्तेमाल किया गया। ऐसे एंकर अपना दिमागी दिवालियापन दिखाते है।

एंकर डाकिया या स्वयंभू जज --अपराध की जो खबर क्राइम रिपोर्टर बेहतर कवर कर सकता है उसमें भी संपादक स्तर के एंकर कूद जाते हैं। बम धमाका या कोई बड़ी वारदात हो उस समय ज्यादा लोग समाचार देखते हैं इसलिए लगता है संपादक स्तर के लोग अपनी सूरत दुनिया को दिखाने के लिए घटना स्थल पर पहुंच जाते हैं। ऐसे एंकर संपादकों की भूमिका ज्यादातर डाकिया या स्वयंभू जज की ही नजर आती है। क्राइम के मामले में बेतुका ज्ञान बांटते हुए यह तक भूल जाते हैं कि पुलिस किसी को भी सबूतों के आधार पर गिरफ्तार करेगी तुम्हारे कुतर्क पर नहीं और कोर्ट भी सबूतों और गवाहों के आधार पर सज़ा देगा तुम्हारे चीखने चिल्लाने पर नहीं। चैनल में एक चीज और हास्यास्पद होती है ज्यादातर रिपोर्टर एक साथ मिलकर कोई खबर करते हैं लेकिन सब अपने चैनलों पर श्रेय इस तरह लेते हैं जैसे यह उनकी ही एक्सक्लूसिव है। ताज़ा उदाहरण बलात्कारी राम रहीम के बारे में  चैनलों पर दिखाई जा रही ख़बरें है।

क्राइम रिपोर्टिंग गंभीर और जिम्मेदारी वाला कार्य है -- लेकिन न्यूज चैनलों के आने के बाद से इसमें काफी गिरावट आ गई है। सबसे पहले दिखाने की अंधी दौड़ में गलत खबरें तक दे दी जाती है। बिना यह समझे कि गलत खबर से किसी पर क्या बीतेगी। कुछ साल पहले लाइव इंडिया चैनल के सुधीर चौधरी ने वेश्यावृत्ति का फर्जी स्टिंग दिखा कर स्कूल टीचर उमा खुराना को बदनाम कर दिया था। पुलिस ने भी दंगा भड़कने की आशंका में बिना तफतीश किए तुरन्त उमा को जेल में डाल दिया। बाद में तहकीकात में पुलिस ने पाया कि उमा बेकसूर है और उसके बारे में दिखाई खबर फर्जी है।
कुछ साल पहले की बात है एक सुबह न्यूज चैनलों ने खबर दी कि नोएडा में स्कूल बस दुर्घटना में पांच बच्चों की मौत हो गई। जबकि उस दुर्घटना में किसी की मौत नहीं हुई थी। ऐसी खबर से उस बस में सवार बच्चों के मां-बाप पर क्या बीती होगी अंदाजा लगाया जा सकता है। एक अन्य मामले में तो सनसनीखेज खबर दिखाने के चक्कर ने दिल्ली में एक युवक की जान ले ली। खबरों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने वाले एक चैनल ने खबर चला दी कि इस युवक ने अपनी रिश्तेदार लड़की से बलात्कार किया है। इस खबर के कारण शादीशुदा इस युवक ने आत्महत्या कर ली। गैर जिम्मेदाराना और संवेदनहीन क्राइम रिपोर्टिंग के ये तो कुछ उदाहरण है। इसके अलावा भी यह देखा गया है कि सबसे पहले दिखाने की होड़ में गलत या एकतरफा खबर दिखा दी जाती हैं। पुलिस के दावे को ही प्रमुखता दी जाती है चाहे बाद में वह दावा कोर्ट में खोखला कयों न निकलें।  
दागी संपादक--आपराधिक मामलों के आरोपी ही जब न्यूज़ चैनल के संपादक बन बैठे है तो क्राइम रिपोर्टिंग का स्तर तो गिरेगा ही। जी न्यूज़ के सुधीर चौधरी और उसके मालिक लाला सुभाष चन्द्र गोयल के खिलाफ तो 100 करोड़ की जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज किया हुआ है। सुधीर इस मामले में जेल भी जा चुका है।यह वहीं सुधीर चौधरी हैं जिसने लाइव इंडिया चैनल में वेश्यावृत्ति का फर्जी स्टिंग दिखा कर स्कूल टीचर उमा खुराना को बदनाम कर दिया था। सुभाष चन्द्र गोयल की किताब का विमोचन प्रधानमंत्री निवास में मोदी द्वारा करने और सुधीर चौधरी को पुलिस सुरक्षा देने से मोदी की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग जाता है। एनडीटीवी के प्रणय रॉय के खिलाफ तो सीबीआई ने धोखाधड़ी और साजिश का मामला दर्ज किया है। दीपक चौरसिया के खिलाफ तो दिल्ली छावनी थाने में फौजियों से भी मारपीट का मामला दर्ज हो चुका है। मदारी की तरह चीख चीख कर पत्रकारिता का तमाशा सिर्फ भारत में हो रहा है। विदेशों में बम धमाकों / आतंकवादी हमलों के समय क्या कभी बीबीसी ,सीएनएन आदि न्यूज चैनलों पर पत्रकारों को मदारी की तरह चीखते हुए देखा है।
गुरूग्राम के रायन पब्लिक स्कूल में बच्चे की हत्या के बाद लोगों ने शराब के ठेके को आग लगा दी। क्या किसी की दुकान , संपत्ति को नुकसान पहुंचाना गुंड़ागर्दी नहीं है ? आगजनी करने पर उतारू भीड़ पर लाठीचार्ज करना क्या गलत है? लेकिन न्यूज चैनलों ने आगजनी करने वालों की आलोचना करने की बजाय लाठीचार्ज को प्रमुखता से दिखाया।
अंध विश्वास और डर फैलाते हैं—साल 2001 में काला बंदर के मामले में आजतक चैनल ने तो हद ही कर दी थी अपनी कल्पना से मंकी मैन का चित्र ही बना कर दिखा दिया। 




Tuesday, 12 September 2017

कश्मीरी युवाओं को उकसाने वाले अपने बच्चों को क्यों नहीं जन्नत भेजते ।

कश्मीरी युवाओं को उकसाने वाले अपने बच्चों को क्यों नहीं जन्नत भेजते ।
कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ने की एनआईए की कोशिश तेज,


इंद्र वशिष्ठ
कश्मीर में युवाओं को आतंकवाद में धकेलने वाले नेताओं की असलियत उजागर होने  लगी है। कश्मीरियों को ऐसे नेताओ से सावधान रहना चाहिए। ऐसे नेता ही कश्मीरियों के असली दुश्मन है। कश्मीरियों को ऐसे नेताओं से पूछना चाहिए कि  अगर जेहाद इतना महान और पवित्र है कि वह सीधा जन्नत पहुंचाता है तो फिर दूसरों को उकसाने वाले पहले अपने बच्चों को जन्नत जाने का मौका क्यों नहीं देते है। जो जेहाद के नाम पर उकसाते है वह अपने बच्चों को तो बड़े शहरों या विदेश में हिफाजत से रखते है। गरीब के बच्चों को उकसा कर मरवा देते है। कश्मीर की समस्या के लिए इन नेताओं से ज्यादा कसूरवार दिल्ली दरबार के वह नेता है जिन्होंने सालों से दामाद की तरह इन अलगावादियों को  पाल कर रखा। इनकी सुरक्षा आदि पर जनता के टैक्स का करोड़ों रूपया सालाना लुटाया।

 एनआईए का एक्शन वीक -- कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ने की एनआईए की कोशिश तेज हो गई है। आतंकवदियों,पत्थरबाजों को धन मुहैया कराने वाले व्यापारी/ हवाला कारोबारी और अलगावादी नेताओं के गठजोड़ पर अगर जबरदस्त चोट जारी रही तो आतंकवाद पर अंकुश लग सकता है। लेकिन एनआईए या किसी भी जांच एजेंसी के लिए आतंकवादियों को पैसा मुहैया कराने वालों के खिलाफ अदालत में आरोपों को साबित करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के आईजी आलोक मित्तल के अनुसार  6-7 सितंबर को आतंकवादियों को धन मुहैया कराने के मामलें में व्यापारियों और हवाला का धंधा करने वालों के 38  ठिकानों पर छापे मारे गए । इनमें से 29 ठिकाने कश्मीर, 7 ठिकाने दिल्ली और जम्मू और गुड़गांव का एक-एक ठिकाना है। दो करोड़ 20 लाख रूपए नगद, एक करोड़ की एफडी बरामद हुई है । इसके अलावा देश विरोधी काम में धन के  लेन देन के कागजात, लैपटॉप,मोबाइल फोन और हवाला कारोबारियों की डायरी आदि बरामद हुए। जिनके यहां छापे मारे गए है उनमें हुरियत नेता गुलाम नबी शमझी, सैयद आगा हसन बडगामी,शब्बीर शाह के साथी जमीर शेख, रज्जाक चौधरी और हवाला कारोबारी जहूर वताली के सीए भी शामिल है। शब्बीर शाह को हाल ही में ईडी ने गिरफ्तार किया है।
इसके पहले 5 सितंबर को एनआईए ने कश्मीर में पत्थरबाजी में शामिल जावेद अहमद भट और कामरान युसूफ को गिरफ्तार किया। जावेद कुलगाम और कामरान पुलवामा का रहने वाला है। आतंकवादियों को धन मुहैया कराने के मामले में कश्मीर बार एसोसिशन के अध्यक्ष मिंया अब्दुल कय्यूम को भी एनआईए ने पूछताछ के लिए समन किया है।



Friday, 8 September 2017

सत्ता की लठैत बनी हुई पुलिस फुफकारी नहीं तो मर जाएगी--

सत्ता की लठैत बनी हुई पुलिस फुफकारी नहीं तो मर जाएगी--
इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में सड़क पर पुलिस को सामने देख कर अपराधी तक आम तौर पर वारदात करने की हिम्मत नहीं करता है। लेकिन दूसरी ओर आम जनता और बच्चे तक पुलिस पर हमला, पथराव और आगजनी का दुस्साहस करने लगे है। जैसा हाल ही में हरियाणा में राम रहीम के गुंड़ों ने किया। हरियाणा में हुई गुंड़ागर्दी के लिए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और राम बिलास शर्मा जैसे मंत्री जिम्मेदार है राम रहीम के चरणों में लोटने वाले राम बिलास शर्मा ने तो सीआरपीसी की धारा 144 की अपने हिसाब से व्याख्या कर बेशर्मी की हद ही पार कर दी। इनके साथ ही वह आईपीएस अफसर भी कसूरवार है जिन्होंने अपनी पेशेवर काबलियत को मनचाही/मलाईदार पोस्टिंग के लिए नेताओं के चरणों  में गिरवी रख दिया। हरियाणा में हुए जान-माल के नुकसान के लिए ये सब कसूरवार है। ऐसे नेता और अफसरों का पुलिस व्यवस्था को इस तरह बर्बाद करना समाज के लिए खतरनाक होता जा रहा है। अगर सरकार और आईपीएस अफसर अभी नहीं चेते तो पुलिस और कानून के राज की जगह गुंड़ाराज कायम हो जाएगा। अफसोस होता है यह देखकर कि अपनी काबलियत के दम पर आईपीएस अफसर बनने वाले भी मनचाहे/मलाईदार पद या अन्य लालच के कारण नेताओं के तलुए चाटते हुए नेता/जमींदार के लठैत की तरह काम करते है। सत्ता के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचने वाली पुलिस में ईमानदारी और निष्पक्षता की जबरदस्त कमी के कारण ही आम आदमी को उस पर भरोसा नहीं है।
पुलिस फुफकारी नहीं तो मर जाएगी-- दिल्ली दरबार और कश्मीर सरकार की अगर नीयत ठीक हो और पुलिसबलों के भी हाथ ना बंधे हो तो भला किसी की मजाल कि कोई पुलिस पर पत्थर फेंकना तो दूर पत्थर फेंकने की सोचेगा भी नहीं। पुलिस का तो सिर्फ नाम ही काफी होता है गुंड़ों की कंपकंपी छुड़ाने के लिए। अफसोस नेताओं ने अपने स्वार्थ में पुलिस की ऐसी मिट्टी पलीत करा दी की बच्चे भी पुलिस पर पत्थर फेंकने लगे। कहावत है कि  पुलिस की मार के आगे तो भूत भी नाचता है । पुलिस को किसी की भी पिटाई करने का हक देने का बिलकुल भी पक्षधर नहीं हूं। पुलिस निरंकुश नहीं होनी चाहिए । लेकिन पुलिस को नेता ऐसा भी तो न बनाए कि कोई भी उस पर पत्थर मारने लगे। सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और  पुलिस पर पत्थर मारने वाले के साथ तो वैसे ही निपटना चाहिए जैसे पुलिस गुंड़ों से निपटती है। पुलिस की हालत अगर ऐसी ही  रही तो गुंड़े बेखौफ घूमेगें और शरीफों का जीना मुश्किल हो जाएगा। कहानी है  कि एक बार एक साधु के कहने पर सांप ने लोंगो को डसना /काटना छोड़ दिया । कुछ समय बाद साधु सांप के पास आया तो सांप को लहूलुहान मरणासन्न हालत में पाया। साधु के पूछने पर सांप ने बताया कि आपका कहना मान कर लोगों को डसना छोड़ दिया, जिससे लोगों में उसका डर खत्म हो गया और पत्थर मार-मार कर उसका यह हाल कर दिया। इस पर साधु ने कहा कि मैंने डसने से मना किया था फुफकारने से नहीं। इसी तरह पुलिस के फुफकारने मात्र से भी कोई पत्थर मारने की हिम्मत नहीं करेगा। पुलिस के पिटने के लिए वह आईपीएस अफसर भी जिम्मेदार होते है जो मलाईदार पोस्टिंग के लिए अपने आका नेता के इशारे पर नाचते है। आईपीएस नेता की मंजूरी की बाट देखने की बजाए अगर हालात की मांग के अनुसार खुद बल प्रयोग का फैसला करे तो स्थिति को बेकाबू होने से रोका जा सकता है और पुलिस को पीटने की भी कोई हिम्मत नहीं करेगा।
आईपीएस अफसर भी गुलाम की तरह पुलिस का इस्तेमाल करते है।-- देश की राजधानी दिल्ली में ही पुलिस जब नेता के लठैत की तरह काम करती है तो बाकी देश के हाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। 4-6-2011 को रामलीला मैदान में रामदेव को पकड़ने के लिए सोते हुए औरतों और बच्चों पर तत्कालीन पुलिस आयुक्त बृजेश कुमार गुप्ता और धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल कर फिरंगी राज को भी पीछे छोड़ दिया। उस समय ये अफसर भूल गए कि पेशेवर निष्ठा,काबलियत को ताक पर रख कर लठैत की तरह लोगों पर अत्याचार करने का खामियाजा भुगतना भी पड़ सकता है। इसी लिए प्रमुख दावेदार होने के बावजूद अन्य कारणों के साथ इस लठैती के कारण भी धर्मेंद्र कुमार का दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनने का सपना चूर चूर हो गया। रेलवे पुलिस के डीजी का पद भी मुश्किल से मिल पाया।
धर्म ना देखो अपराधी का -- रामलीला मैदान की बहादुर पुलिस को 21 जुलाई 2012 को सरकारी जमीन पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की कोशिश करने वाले गुंड़ों ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। माहौल बिगाड़ने लिए जिम्मेदार बिल्डर नेता शोएब इकबाल के खिलाफ पुलिस ने पहले ही कोई कार्रवाई नहीं की थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि गुंड़ों ने पुलिस को पीटा, पथराव और आगजनी की। लेकिन अफसरों ने यहां गुंड़ों पर भी  रामलीला मैदान जैसी मर्दानगी दिखाने का आदेश पुलिस को  नहीं दिया। इस तरह आईपीएस अफसर भी नेताओं के इशारे पर पुलिस का इस्तेमाल कहीं बेकसूरों को पीटने के लिए करते है तो कहीं गुंड़ों से भी पिटने देते है। अफसरों की इस तरह की हरकत से निचले स्तर के पुलिसवालों में रोष पैदा हो गया था।
 बुखारी का भी बुखार क्यों नहीं उतारती सरकार ---दिल्ली पुलिस ने जामा मस्जिद के इमाम को  सिर पर बिठाया हुआ है। कोर्ट गैर जमानती वारंट तक भी जारी करती रही हैं लेकिन दिल्ली पुलिस कोर्ट में झूठ बोल कह देती है कि इमाम मिला नहीं। जबकि इमाम पुलिस सुरक्षा में रहता है। मध्य जिले में तैनात रहे कई डीसीपी  तक इमाम अहमद बुखारी को सलाम  ठोकने जाते रहे हैं। दिल्ली पुलिस में कर्नल सिंह ( वर्तमान ईडी डायरेक्टर ) ने ही इमाम की सुरक्षा कम करने की हिम्मत दिखाई थी। शंकराचार्य जैसा व्यक्ति जेल जा सकता है तो इमाम क्यों नहीं? एक मस्जिद के अदना से इमाम को सरकार द्वारा सिर पर बिठाना समाज के लिए खतरनाक है। इमाम को भला पुलिस सुरक्षा देने की भी क्या जरूरत है।  कानून सबके लिए बराबर हो होना चाहिए।अहमद बुखारी के खिलाफ कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं इसका भी खुलासा सरकार को करना चाहिए। 

                                                 (दैनिक बन्दे मातरम 9-9-2017)