Tuesday, 11 September 2018

आशु गुरु जी के IPS अफसर भी चेले। आशु नहीं आसिफ खान हैं ये।


दिल्ली पुलिस के आईपीएस अफसर भी आशु भाई के चेले।
 जे जे कालोनी में रहने वाला आशु बन गया धन्ना सेठ ।
आशु नहीं आसिफ ख़ान हैं ये।

इंद्र वशिष्ठ  
   
दक्षिण दिल्ली में हौज खास थाना पुलिस ने आशु भाई गुरू जी  और उसके बेटे के  खिलाफ   एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार के आरोप में  मामला दर्ज किया है।
  ढोंगी आशु भाई गुरू जी के असली पहचान छिपाने, धन्ना सेठ बनने और उसके ज्योतिषी होने के दावे की असलियत 6 साल पहले ही मैने उजागर कर दी थी। लेकिन अंध विश्वासी लोगों के कारण आशु दिनों-दिन फल फूल रहा है।
विश्वविख्यात ज्योतिषचार्य और हस्तरेखा विशेषज्ञ होने का दावा करने वाला आशु  अपनी असली पहचान छिपाकर  ज्योतिष का कारोबार/ धंधा चला रहा है। दूसरों का भविष्य बताने का दावा करने वाले यह  व्यकित  अपना भविष्य ही नहीं जानता वरना उसके नौकर उसका पचास लाख रुपया चोरी न कर पाते। 1990 के दशक तक वजीर पुर जे जे कालोनी में रहने वाला यह व्यक्ति अब करोड़ों का मालिक है। सराय रोहिल्ला थाना के पदम नगर इलाके में  एक दिन  अचानक रहस्यमय तरीके से  इसने  अपना धंधा बंद कर दिया। इसके पहले इसने त्रि नगर में भी ज्योतिष का धंधा शुरू किया था। 
धन्ना  सेठ बना आशु-- रोहिणी में ज्योतिष का धंधा शुरू करते ही आशु पैसे में खेलने लगा। कोहाट  एंक्लेव में कोठी में रहने लगा। महंगी विदेशी कारें हैं।  बड़े-बड़े क्लाइंट से आशु दिल्ली में पांच सितारा होटल में मिलता है। इसके जानकार बताते है कि आशु ली मेरीडियन होटल में ही ज्यादतर बड़े भक्तों से मुलाकात करता है।  इसके भक्तों / क्लाइंट में  नेताओं के अलावा आईएएस अफसर और  दिल्ली पुलिस के भी कई आईपीएस अफसर और फिल्म जगत के लोग भी है। कुछ समय पहले आशु किसी हीरोइन का " संकट " दूर करने के लिए मुंबई गया था। इस धंधे से कमाई अकूत दौलत से आशु ने काफी संपत्ति बनाई है। इस रकम को रियल एस्टेट समेत दूसरे कारोबारों में भी लगाया  है। आशु के जानकारों के अनुसार 1997-98 तक  जे जे कालोनी में रहने वाला  आशु अब रोजाना सुबह-सुबह ही लाखों रूपए कमा लेता है। रोहिणी में  हाथ देखने के पांच हजार रूपए लेता है। हौज खास में इससे ज्यादा फीस हैं। इसके अलावा भक्त की हैसियत के अनुसार विशेष पूजा / उपाय के लिए तो लाखों की मोटी रकम ली जाती है।  दिलचस्प बात यह है कि आशु की असलियत और उसकी कमाई के बारे में  वज़ीर पुर और आस पास के इलाकों में खूब चर्चा है। लेकिन आयकर विभाग और अन्य  खुफिया एजेंसियों  को शाय़द कुछ दिखाई नहीं देता है।
आईपीएस अफसर भक्त- दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक का एक बैचमेट भी आशु के भक्तों में शामिल है। अब रिटायर हो चुके रंगीन मिजाज इस  पुलिस अफसर को भी उपाय के नाम पर कई साल पहले आशु  गंगाजी में खड़ा कर चुका है। दिल्ली पुलिस और  तिहाड़ जेल में भी तैनात रह चुके एक अन्य रिटायर्ड आईपीएस भी आशु के भक्तों में है। आशु के जानकार बताते है कि  इस  आईपीएस अफसर को नंगा करके झाड़ा लगाने और दूसरे आईपीएस को उपाय/पूजा के नाम पर गंगा में खड़ा करने के किस्से आशु बड़ी शान से सुनाता है। आशु का खासमखास भी  अब एक रिटायर्ड पुलिस वाला है जो उसका राजदार होने के साथ ही आशु की सुरक्षा व्यवस्था भी देखता है। 
भंडारा - अशोक विहार में मेजर ध्यानचंद स्पोर्ट्स कांप्लेक्स के पास नहर के पास एक मजार पर हर वीरवार को भंडारा किया जाता है।आशु के भक्त वहां  जाते हैं।

आशु नहीं आसिफ है ये  -   अनेक  चैनलों पर  रोजाना यह  आशु भाई गुरुजी बन कर लोगों की सभी प्रकार की  समस्याओं का समाधान करने का दावा करता है। इसके कार्यक्रम में दिखाया जाता था  कि एक  ट्रक चालक आशु भाई के दिए रतन के कारण ट्रक का मालिक बनकर मालामाल हो गया। इसी तरह कल तक साइकिल के पंचर लगाने वाले एक  व्यकित की  दरिद्रता  आशु भाई की शरण में आने से दूर हो गई । इस तरीके के कई दावे दिखाए जाते है।  फोन इन लाइव कार्यक्रम में आशु हास्यास्पद बातें करता है। वास्तुदोष सर्व बाधा नाशक धूप आदि भी वह बेचता  है। भूत-प्रेत की छाया से बचाने और काल सर्प दोष आदि का उपाय करने का दावा भी किया जाता है। लेकिन लोग यह नहीं जानते  आशु भाई गुरु जी के नाम से  चैनल पर  दिखाई देने वाले इस व्यकित का असली नाम आसिफ खान  है। अपने असली नाम और पहचान को जाहिर न करना  उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।
आशु भाई के नाम से कई सालों से ज्योतिष के कारोबार में सक्रिय आसिफ खान का प्रीतम पुरा के तरुण एंकलेव में मकान और रोहिणी सेकटर 7 बी 4/77-78 में दफतर है। इस दफतर में सुबह 4 से 8 बजे वह लोगों से मिलता है वैसे हौजखास में भी उसका एक अन्य दफतर है। आशु मुलाकात के लिए मोटी फीस लेता है।  उपाय आदि के नाम पर ली जानी रकम की तो कोई तय सीमा नहीं है।
दूसरों का भविष्य बताने का दावा करने वाला आशु अपना भविष्य नहीं जानता -
50 लाख चोरी  -- 6 फरवरी 2011 की तडके आशु  रोहिणी के दफतर में पहुंचा तो वहां पर ताला लगा हुआ पाया। दफतर के केयरटेकर लक्ष्मण और हंसराज जोशी भी वहां नहीं थें। कुछ देर इंतजार के बाद आशु ताला तोड कर अंदर गया और लोगों की समस्याओं का कथित समाधान करने में जुट गया। उनसे निपटने के बाद आशु ने देखा कि उसकी अलमारी में रखे 50 लाख रुपए  चोरी हो गए है।  आशु उर्फ आसिफ खान की शिकायत पर रोहिणी उत्तरी थाना पुलिस ने चोरी का मामला दर्ज किया। पुलिस ने नेपाल निवासी उपरोक्त दोनों केयरटेकरों की तलाश शुरु कर दी । पुलिस ने एसएसबी की मदद से 7 मार्च को भारत-नेपाल सीमा पर गौरीफैंटा बार्डर पर लक्ष्मण और हंसराज को पकड लिया। उनके पास से 42 लाख रुपए बरामद हो गए। इन दोनों ने पुलिस को बताया कि आशु के दफतर में हमेशा मोटी रकम होने का की बात उन्होंने चांदनी चैक में रहने वाले अपने दो दोस्तों को बताई तो उन्होंने उनको रकम चोरी करने के लिए उकसाया। चोरी के बाद वह उन दोस्तों के पास रहें  और उनको 8 लाख रुपए दे दिए। बाहरी जिले की तत्तकालीन डीसीपी छाया शर्मा ने 8 मार्च को  इस मामले का  खुलासा किया।   पुलिस  केयरटेकर के मोबाइल फोन के सर्विलांस के आधार पर उनको पकड पाई थी। इस रकम के बारे में पुलिस ने बताया कि आशु ने कोई प्रापर्टी बेची थी। आशु के अनेक पुलिस अफसरों से भी संबंध बताए जाते है। शायद यहीं वजह है कि इस रकम  के बारे में इनकम टैक्स विभाग को सूचना देना पुलिस ने जरुरी नहीं समझा। आम आदमी के मामले में तो पुलिस इनकम टैक्स विभाग को सूचना देने की बात करती है ताकि वह एफआईआर में लुटी या चोरी की रकम कम लिख सके।
कालसर्प के नाम ठगते है--करीब तीस साल से भारतीय विद्या भवन में ज्योतिष की शिक्षा दे रहे  पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह एवं ज्योतिष शास्त्र के विद्वान के एन राव के अनुसार  शास़्त्रों में काल सर्प का कहीं भी उल्लेख नहीं है। ज्योतिषी कालसर्प को दूर करने के उपायों का नाम लेकर परेशान लोगों से मोटी रकम ऐंठ लेते है। 





Saturday, 1 September 2018

ऐसी लागी लगन, IPS असलम हो गई मगन, वो तो गोविंद गोविंद गाने लगी





ऐसी लागी लगन, IPS असलम हो गई मगन,
वो तो हरि गुण गाने लगी।



इंद्र वशिष्ठ
जयपुर निवासी एक कॉलेज छात्रा एक दिन गोविंद देव जी के मंदिर गई। लेकिन उस समय मंदिर के कपाट बंद मिले। इसलिए वह गोविंद देव जी के दर्शन नहीं कर पाई।
कुछ साल बाद वह लड़की दोबारा मंदिर गई तो गोविंद देव जी के दर्शन से वह इतनी मंत्र मुग्ध हो गई कि तीन घंटे मंदिर में कब बीत गए उसे पता ही नहीं चला।
ऐसी लागी लगन --
इसका उस पर इतना गहरा असर हुआ कि वह कृष्ण की भक्त बन गई
 भक्ति में लीन हो उसने बकायदा कृष्ण के महामंत्र का जाप,माला फेरना और ध्यान लगाना शुरू कर दिया।आप सोचेंगे कि इसमें कौन सी ख़ास या नई बात है। लेकिन इस लड़की में कई खासियत है जिसमें एक खासियत है उसका नाम जो कि लड़कों का होता है इसके नाम से ही पता चलता है कि कृष्ण की यह  भक्त कुछ ख़ास ही है। इस लड़की का नाम है असलम खान हैं। असलम के पिता को पुत्र के जन्म की उम्मीद थी इसलिए उन्होंने उसका नाम असलम पहले ही सोच लिया था। लेकिन पुत्री यानी असलम हुई ,तो उन्होंने उसका नाम ही असलम रख दिया और उसकी परवरिश बेटों से भी ज्यादा बेहतर तरीके से की। इसका परिणाम भी बहुत बेहतर निकला और असलम खान साल 2007 में आईपीएस अफसर बन गई। 
असलम खान इस समय दिल्ली के उत्तर पश्चिमी जिला में पुलिस उपायुक्त के पद पर आसीन हैं। असलम का अर्थ महफूज़ होता हैं। लोगों को महफूज़ रखने की जिम्मेदारी वह निभा रही हैं। खुद कृष्ण की शरण में महफूज़ है।
 बात साल 2014 की है असलम खान का एक बैचमेट जयपुर आया था। असलम उसे लेकर गोविंद देव जी मंदिर गई। असलम खान के बैचमेट को ट्रेन पकड़नी थी इसलिए वह तो गोविंद देव जी के दर्शन करने के बाद चला गया। लेकिन असलम खान मंत्र मुग्ध सी हो कर तीन घंटे तक मंदिर में ही बैठी रही। इसके बाद से असलम खान ने गोविंद देव जी को अपना इष्ट मान लिया और कृष्ण की अनन्य भक्त हो गई। गले में तुलसी माला, महामंत्र का जाप , माला फेरना और ध्यान दिनचर्या में शामिल कर लिया।  लेकिन जिला पुलिस उपायुक्त बनने के बाद अब इसके लिए समय नहीं मिलता। असलम के दफ्तर में मेज पर  गोविंद देव जी की तस्वीर रहती हैं।
तुलसी माला-
 पुलिस मुख्यालय में एक समारोह मे  मैंने पहली बार असलम खान को देखा तो उनके गले में तुलसी माला ने ही मेरा ध्यान खींचा। मैंने सोचा कि शायद फैशन के लिए तुलसी माला पहन ली होगी। कुछ समय पहले हुई मुलाकात में असलम खान के कृष्ण भक्त होने का पता चला।
असलम के पति पंकज कुमार सिंह (IPS 2008बैच) भी दिल्ली में ही पूर्वी जिले के डीसीपी है।
असलम का कहना हैं कि भगवान में इतना अटूट विश्वास है कि मैं किसी भी ग़लत चीज़ का विरोध  करने के लिए किसी से नहीं डरती।भगवान ही है...बाक़ी सब मिथ्या है...मैं तो बस उसके विश्वास पे ही टिकी हुई हूं। 
 असलम खान ने शादी के बाद  अपने नाम के साथ कोई बदलाव नहीं किया जैसा कि अमूमन लड़कियां करती है। ज्यादातर लड़कियां शादी के बाद या तो अपने पति का सरनेम जोड़ लेती या अपने सरनेम के साथ पति का सरनेम भी जोड़ लेती हैं। 
इंसानियत का जज्बा--
 उत्तर पश्चिमी जिला में इस साल जनवरी में ट्रक ड्राइवर मान सिंह की लुटेरों ने  हत्या कर दी । जम्मू कश्मीर के फ्लोरा गांव में रहने वाले मान सिंह के बेसहारा हो गए परिवार को असलम खान ने सहारा दिया।असलम अपने वेतन में से पांच हज़ार रुपए हर महीने उस परिवार को देती हैं। असलम के कारण ही अब अन्य लोग भी उस परिवार की मदद कर रहे हैं।
 बागी/स्वाभिमानी -- 
आईपीएस की ट्रेनिंग के दौरान पुलिस अकादमी में एक समारोह था जिसके लिए महिला अफसरों को साड़ी पहन कर गुलदस्ता देकर मुख्य अतिथि का स्वागत करना था लेकिन असलम ने कहा कि महिला कोई सजावट की वस्तु नहीं है और उसने ऐसा करने से इंकार कर दिया था।
धर्म आचरण में होना चाहिए--यह तो बात हुई असलम की आस्था और विश्वास की। लेकिन धर्म का असली मर्म और मकसद है कि धर्म हरेक के आचरण यानी कर्म में होना चाहिए।

 धर्म अर्थात कर्तव्य---
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि   व्यक्ति को कर्म अपने धर्म के लिए करना चाहिए। धर्म के लिए रिश्तों के मोह या भावना की नहीं बल्कि  कर्तव्य के ज्ञान की आवश्यकता होती है। प्राणी कर्म इस प्रकार करें जैसे कोई यज्ञ किया जाता है। अपने सारे कर्म लोक कल्याण के लिए या भगवान के निमित्त करना चाहिए। कर्म को यज्ञ समझ कर करने वाला तो कर्म बंधन से मुक्त रहेगा।

धर्म का दिखावा बढ़ा-- 
समाज में इस समय सभी  धर्मों का प्रचार प्रसार तो बहुत ज्यादा हो रहा है। बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन भी होते हैं। जिनमें लाखों लोग शामिल होते हैं।  लेकिन इसके बावजूद समाज में धर्म का असर नहीं दिख रहा है। इसकी मुख्य वजह है कि ज्यादातर लोग धर्म की चर्चा/दिखावा तो खूब करते लेकिन धर्म उनके आचरण में कहीं नजर नहीं आता हैं। व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म  से जुड़ा हो अगर वह अपने उस धर्म के मर्म को ही अच्छी तरह समझ लें तो वह कभी भी कोई  ग़लत कार्य नहीं करेगा। धर्म ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करना सिखाता है।




दिल्ली पुलिस, साइबर क्राइम के 75 % मामले अनसुलझे, साइबर क्राइम सेल में पुलिस भी कम


 साइबर क्राइम से चींटी की चाल से निपट रही दिल्ली पुलिस।

 दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम सेल में 75 फीसदी  मामले अनसुलझे।

इंद्र वशिष्ठ

एक ओर साइबर क्राइम के मामले दिनों-दिन  बढ़ रहें हैं। दूसरी ओर साइबर क्राइम के मामलों को  सुलझाने में दिल्ली पुलिस का  साइबर क्राइम सेल चींटी की चाल चल रहा है। पिछले डेढ़ साल में साइबर क्राइम सेल में 167 मामले दर्ज हुए हैं। जिनमें से सिर्फ 42 मामलों को ही साइबर क्राइम सेल सुलझा पाया हैं। पुलिस साइबर क्राइम के सिर्फ 25 फीसदी मामले ही सुलझा पाईं हैं। यानी साइबर क्राइम के 75 फीसदी  मामले अनसुलझे है।
    
साइबर क्राइम से निपटने और मामलों की तफ्तीश के लिए साइबर क्राइम सेल में पर्याप्त पुलिस कर्मी भी नहीं है। साइबर क्राइम के मामलों को  सुलझाने की  दर बहुत कम होने से भी इसका पता चलता है।  
 दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम सेल में सिर्फ 205 पुलिस कर्मी ही है। पर्याप्त पुलिस कर्मियों के न होने से भी तफ्तीश में अधिक समय लगता है।
 गृह राज्यमंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने राज्यसभा में बताया कि दिल्ली पुलिस के साइबर क्राइम सेल में 30 जून 2018 तक साइबर क्राइम के 61 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें से बीस मामलों को पुलिस ने सुलझा लिया है।  33 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है।
साल 2017 में साइबर क्राइम के 106 मामले दर्ज हुए थे। इनमें से 22 मामलों को सुलझा लिया गया। 43 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया । साइबर क्राइम सेल में सभी रैंक के 205 पुलिस कर्मी तैनात हैं। 
 राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में गृह राज्यमंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने  बताया कि जांच लंबित होने संबंधी कारणों में अन्य बातों के साथ साथ मध्यस्थ लोगों विशेषकर विदेशी सेवा प्रदाताओं से सूचना का लंबित होना,  पत्रों के उत्तर लंबित होना,विधि विज्ञान संबंधी परिणामों का लंबित होना और आईपी लॉग, सोर्स पोर्ट आदि जैसे मध्यस्थों द्वारा अधूरी सूचना दिया जाना शामिल हैं।
पुलिस की जनशक्ति संबंधी आवश्यकता का आकलन करना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।जिसे गृह मंत्रालय द्वारा पुलिस और अन्य दावेदारों के परामर्श से पूरा किया जाता है। जनवरी 2016 में अपराध की जांच को कानून व्यवस्था और अन्य कार्यों से अलग करने के लिए दिल्ली पुलिस में 4227 पदों का सृजन किया गया था। 
गृह राज्यमंत्री के बताया कि दिल्ली पुलिस का कहना है कि ज्यादातर अधिकारी साइबर क्राइम की जांच कार्य में प्रशिक्षित हैं। हाल में जुलाई 2018 में दिल्ली पुलिस में 3139 अतिरिक्त पद सृजित करने का अनुमोदन प्रदान किया गया है।
साइबर क्राइम सेल में पुलिस कर्मियों की कमी  के बारे में राज्यसभा में सांसद अमर सिंह ने सरकार से सवाल पूछा था।

Saturday, 11 August 2018

दिल्ली पुलिस ने 17 हजार झपटमार/लुटेरे पकड़े, सज़ा 202 को ही दिला पाई


दिल्ली पुलिस ने 17 हजार  झपटमार/ स्नैचर पकड़े,
  सज़ा सिर्फ 202 को ही दिला पाई।

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली में रोजाना दिनदहाड़े अपराधी बेखौफ होकर   चेन ,पर्स और मोबाइल फोन आदि छीन /झपट यानी लूट रहे हैं।  महिलाएं ही नहीं पुरुष भी सड़कों पर सुरक्षित नहीं है। पुलिस इस अपराध पर नियंत्रण करने के लिए गंभीरता से  कदम उठाने की बजाए आंकड़ों के द्वारा यह साबित कर रही है कि झपटमारी के अपराध कम हो रहे हैं। जमीनी हकीकत चाहे कुछ भी हो और लोगों में चाहे झपटमारों का खौफ हो लेकिन पुलिस को इसकी कोई परवाह नहीं है।
पुलिस ने हमेशा की तरह आंकड़ों से दिखा दिया कि झपटमारी यानी स्नैचिंग के अपराध में कमी आई है।
चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिस झपटमारी की वारदात करने वाले अपराधियों को सज़ा दिलाने में भी बुरी तरह नाकाम साबित हुई है। पुलिस ने पिछले साढ़े तीन साल में झपटमारी के आरोप में  17 हज़ार से ज़्यादा अभियुक्तों को गिरफ्तार किया। लेकिन इस दौरान  पुलिस सिर्फ 202 झपटमारों को ही अदालत में अपराधी साबित कर सज़ा दिला पाई। यह खुलासा पुलिस की पेशेवर काबिलियत और तफ्तीश के स्तर पर सवालिया निशान लगाता है।
राज्यसभा में सांसद राम कुमार वर्मा ने दिल्ली में झपटमारी की बढ़ती वारदात पर सरकार से सवाल पूछा था।
गृह राज्यमंत्री हंस राज गंगा राम अहीर ने राज्यसभा में  बताया कि इस साल 30 जून 2018 तक दर्ज हुई झपटमारी की वारदात में साल 2017  की इस अवधि की तुलना में 28.90 प्रतिशत की कमी आई  है।
इसके अलावा पहले के वर्षों की तुलना में साल 2016 में  3.28  फीसदी और साल 2017 में झपटमारी की वारदात 14 फीसदी कम हुई थी।
दिल्ली पुलिस की झपटमारों को सज़ा दिलाने की दर बहुत ही शर्मनाक है। इसका पता इन आंकड़ों से चलता है। इससे यह भी पता चलता है कि  तफ्तीश और अपराधी को सज़ा दिलाने लायक सबूत जुटाने में पुलिस में पेशेवर काबिलियत की कमी है या पुलिस तफ्तीश में लापरवाही बरतती है।
 दिल्ली पुलिस ने झपटमारी के मामलों में पिछले साढ़े तीन साल में 17403 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया लेकिन इस दौरान सिर्फ 202 अपराधियों को सज़ा  हुई। वर्षवार ब्योरा--साल 2015 में 3675 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया और 105 झपटमारों को सज़ा हुई। साल 2016 में 5092 झपटमारों को गिरफ्तार किया गया और 46 को  सज़ा हुई। साल 2017 मे 6454 को गिरफ्तार किया 44 को सज़ा हुई। साल 2018 में तीस जून तक 2182 को गिरफ्तार किया गया और 7झपटमारों  को अदालत द्वारा सज़ा सुनाई गई।
विदेशी पर्यटक--पिछले साढ़े तीन साल में 46  विदेशी पर्यटक भी झपटमारों के शिकार बने हैं।
अपराध को आंकडों के द्वारा कम दिखाने के लिए पुलिस में अपराध के सभी मामलों को दर्ज़ न करने या डकैती को लूट और लूट को चोरी में दर्ज़ करने की परंपरा कायम है। जेबकटने या मोबाइल झपटमारी के ज्यादातर मामलों में खोने की रिपोर्ट दर्ज की जाती है। शिकायतकर्ता को पुलिस यह कह कर बहका देती है कि मोबाइल रिकवरी के तो चांस नहीं है और ऐसे में फोन खो जाने कि लॉस्ट रिपोर्ट से ही तुम्हारा काम चल जाएगा।
सच्चाई यह है कि ऐसा करके पुलिस अपराधियों की ही मदद करती हैं अपराधी को भी मालूम है कि अगर   वह पकड़ा भी गया तो उसके द्वारा की गई वारदात  कम ही दर्ज  मिलेंगी। इस लिए अपराधी बेखौफ होकर वारदात करते  हैं। जब तक अपराध के सभी मामले दर्ज नहीं किए जाएंगे। अपराध और अपराधियों पर अंकुश नहीं लग पाएगा।



Tuesday, 31 July 2018

दिल्ली में हजारों करोड़ के 32 लाख मोबाइल ‘खोए ’/ चोरी/लूटे गए ।

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दिल्ली में  32 लाख मोबाइल  खोए ’/ चोरी/लूटे गए ।
 हजारों करोड़ के मोबाइल  फोन बरामद करने में पुलिस बुरी तरह फेल। 
 इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली में हर महीने करीब दो लाख मोबाइल फोन चोरी/गुम ,लूट/झपट लिए जाते है। यानी रोजाना लगभग सात हजार  लोग अपना मोबाइल फोन गंवा देते है। मोबाइल फोन चोरी/ खोने  के मामलों में दिनों-दिन जबरदस्त वृद्धि होती जा रही है। दूसरी ओर  पुलिस की मोबाइल फोन बरामद करने की दर शर्मनाक है।
इस साल 30जून 2018 तक ही मोबाइल चोरी/ खोने/ लूट  के करीब बारह लाख  (1158637)मामले दर्ज  हुए है । इनमें 1129820 मामले मोबाइल गुम/खोने ,  26440 चोरी,  1715 झपटमारी  और  662 लूट  के तहत दर्ज हुए है । 
साल 2017 में  मोबाइल चोरी/ खो जाने / लूट के कुल 1481147 मामले दर्ज  हुए  थे  इनमें से 1418541 मोबाइल गुम होने,56898  चोरी, 4266 झपटमारी और 1442 लूट के तहत दर्ज हुए है । 
साल 2016 में  मोबाइल चोरी/ खो जाने / लूट के कुल 382116 मामले दर्ज  हुए  थे  इनमें से 356667  मोबाइल गुम होने,18687 चोरी, 5121 झपटमारी और 1641 लूट के तहत दर्ज हुए है ।  
यह खुलासा चौंकाने वाला है क्योंकि साल 2015 में मोबाइल चोरी या खोने के 62373 और साल 2014 में 66724 मामले ही दर्ज हुए थे । इसके बाद से मोबाइल फोन चोरी/गुम ,लूट/झपटने के मामले बेतहाशा  बढ़ रहे है । 
2014 से 30 जून 2018 तक  मोबाइल चोरी / खोने / लूट के करीब 32 लाख मामले दर्ज हुए है  इनमें से तीस लाख से ज्यादा (3021900) मामले तो पिछले ढाई साल यानी वर्ष 2016,2017 और 30 जून  2018 तक के ही है। करीब 32 लाख फोन की कीमत हज़ारों करोड़ रुपए है। 
गृहमंत्री को भी परवाह नहीं --साल 2017 में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी सालाना प्रेस कॉफ्रेंस में  पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक की मौजूदगी में ही मोबाइल फोन की बिल्कुल ही कम बरामदगी पर पूछे गए सवाल को हंसी में उड़ा दिया था । इसके पहले गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने तो राज्यसभा में यह तक कह दिया था कि छोटे मामले सुलझाने में पुलिस को तकलीफ होती है। कुल अपराध के 75 फीसदी मामलों को सुलझाने में विफल दिल्ली पुलिस को फटकार की बजाए संसद में गृह मंत्री राजनाथ शाबशी देंगे तो पुलिस भला मेहनत वाली तफ्तीश क्यों करेगी । यही नेता विपक्ष में हो तो ऐसे मामलों पर खूब हल्ला मचाते है । सचाई यह है मोबाइल फोन खोने( लॉस्ट रिपोर्ट)  में दर्ज हुए अधिकांश मामले चोरी और झपटमारी के ही होते है। झपटमारी ,चोरी में एफआईआर दर्ज करनी पड़ेगी और अपराध के आंकड़े से अपराध की वृद्धि उजागर हो जाएगी। इस लिए पुलिस में यह परंपरा है कि झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी के अधिकांश मामलों में एफआईआर दर्ज न की जाए। झपटमारी, जेबकटने या मोबाइल चोरी की रिपोर्ट कराने पहुंचे व्यकित को पुलिस कह देती है रिकवरी के चांस तो है नहीं और तुम्हारा काम तो खोने की पुलिस रिपोर्ट से भी चल जाएगा । पहले ऐसे मामलों में पुलिस एनसीआर दर्ज करके या कागज पर लिखी शिकायत पर थाने की मोहर लगा देती थी । अब यह काम ऑन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट से हो जाता है ।  पुलिस अगर ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करे तो उस पर झपटमारों, चोरों को पकड़ने का दवाब बनेगा  है । पुलिस को तफ्तीश में मेहनत करनी पड़ेगी। जो वह करना नहीं चाहती । इसलिए अपराध  को दर्ज न करना एसएचओ,डीसीपी और पुलिस कमिश्नर से लेकर गृह मंत्री तक के अनुकूल है । लेकिन ऐसा करके ये अपराधियों की मदद कर रहे है । अपराधी को मालूम है कि अगर पकड़ा भी गया तो उसके खिलाफ दर्ज मामले तो बहुत ही कम मिलेंगे । पुलिस लुटेरों को गिरफ्तार करके कई बार सैकड़ों केस सुलझाने के दावे करती है लेकिन कभी भी उन सैकड़ों केसों की सूची नहीं देती । सचाई यह है अपराधी द्बारा की गई सभी वारदात पुलिस ने दर्ज ही नहीं कर रखी होती । इसलिए पुलिस प्रचार पाने के लिए तो दावा कर देती है लेकिन सूची नहीं दे सकती । क्राइम रिपोर्टर भी पुलिस के दावे पर ही निर्भर रहते है और खुद पड़ताल कर य़ह सचाई मालूम करने कोशिश ही नहीं करते कि पुलिस ने जितने केस सुलझाने का दावा किया है असल में उसमें से कितने केस दर्ज है । 
 पुलिस की फोन बरामद करने में बिल्कुल रूचि नहीं होती है। इसकी पुष्टि नीचे दिए आंकड़ों से भी होती है। पुलिस की रिकवरी दर शर्मनाक है । 
साल 2015 में मोबाइल चोरी या खोने के 62373 और साल 2014 में 66724 मामले दर्ज हुए थे ।  पुलिस साल 2015 में 3415  और साल 2014 में 2237  मोबाइल फोन ही बरामद कर पाई है।  साल 2014,2015 और 30 जून 2016 तक  मोबाइल चोरी या खो जाने के 153579 मामलों में पुलिस सिर्फ 6720 मोबाइल फोन ही बरामद कर पाई है ।   राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने यह जानकारी दी ।  दिल्ली में मोबाइल फोन चोरी के बारे में सांसद राम कुमार कश्यप और हिशे लाचुंगपा ने सरकार से सवाल पूछे थे।
  उल्लेखनीय है कि मोबाइल फोन का आई.एम.ई.आई. नंबर  पुलिस को दिए जाने और सर्विलांस पर रखे जाने के बावजूद मोबाइल मालिक को न तो  कोई सूचना दी जाती है और न  ही मोबाइल खोजा जाता है।  पुलिस द्वारा मोबाइल फोन की  बरामदगी  के आंकड़ों से ही यह बात साबित होती है कि पुलिस की  फोन खोजने में  कोई रूचि  नहीं होती । 
आम आदमी का फोन बरामद करने में तो पुलिस की बिल्कुल रूचि नहीं होती । लेकिन  मंत्री, राजदूत ,बडे नौकरशाह या पुलिस अफसर का फोन तलाश करने में पुलिस इतनी फुर्ती दिखाती है कि 24 घंटे में अपराधी को पकड़ कर फोन भी बरामद कर लेती है। 

Tuesday, 10 July 2018

दिल्ली पुलिस की 10 गोलियों से भी जिंदा बच गया था गुंडा मुन्ना बजरंगी


इंद्र वशिष्ठ 
पूर्वांचल का कुख्यात गुंडा  प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी दिल्ली पुलिस के कथित एनकाउंटर में 10 गोलियां लगने के बाद भी जिंदा बच गया था 
बीस साल पहले 1998 में दिल्ली में मुकरबा चौक के पास जीटी रोड पर उत्तरी जिला पुलिस के एक कथित एनकाउंटर में मुन्ना बजरंगी को 10 गोलियां लगी थीं। मुन्ना का एक साथी मारा गया था। मुन्ना को भी मरा हुआ समझ कर पुलिस अस्पताल ले गई। लेकिन वहां पहुंचने पर डाक्टरों ने  पाया कि मुन्ना की सांस चल रही हैं। तुरंत उसका इलाज किया गया। इस तरह मुन्ना बच गया। यह देख पुलिस के होश उड़ गए थे कि कहीं मुन्ना एनकाउंटर की पोल न खोल दे। उस पुलिस टीम में उत्तर जिले के डीसीपी एस एन श्रीवास्तव और एसीपी राजबीर सिंह थे। लेकिन जैसे ही मुन्ना के बचने का पता चला इन‌ सब अफसरों की हालत ख़राब हो गई थी। 
सूत्रों के अनुसार मुन्ना बजरंगी ने एसडीएम को बयान दिया जिसके आधार पर एसडीएम ने पुलिस अफसरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच कराने  की तैयारी कर ली। ।यह पता चलते ही वीरता पदक की उम्मीद लगाए बैठे अफसरों के पैरों तले जमीन खिसक गई। तब उत्तर पश्चिमी जिला के एक  पुलिस अफसर ने एसडीएम को "समझाया "। जिसके बाद एसडीएम  ने मुन्ना बजरंगी के बयान के आधार पर सिर्फ  उचित कार्रवाई करने का ही आदेश दिया। तब जाकर पुलिस अफसरों ने राहत की सांस ली।
पुलिस सूत्रों के अनुसार मुन्ना बजरंगी  की दोनों हथेलियों/अंगुलियों में गोलियों लगी थीं जिससे जाहिर था कि पुलिस की गोलियों से खुद को बचाने के लिए उसने हथेलियों आगे की थी। इससे ही यह भी लगता है कि उसने गोली नहीं चलाई थी। मुन्ना अपने साथी के साथ हरियाणा से कार में आया था।समय पुर बादली थाना इलाके में जीटी रोड पर यह कथित एनकाउंटर हुआ। मुन्ना के सिर में भी गोली लगी थी इतनी गोलियां लगने के बाद भी उसके जिंदा बच  जाने पर सभी हैरान हो गए थे।
पहरा बढ़ा दो-- इस मामले से जुड़े एक वरिष्ठ पुलिस अफसर ने बताया कि मुन्ना बजरंगी ने अस्पताल में कहा कि मेरे ऊपर यहां भी दुश्मन हमला कर सकते हैं इसलिए पुलिस का पहरा बढ़ा दो। इससे पता चलता है कि दूसरों की निर्दयता से हत्या करने वाला  मुन्ना बजरंगी अपने दुश्मनों से हमेशा डरा रहता था।
मुन्ना को इंजेक्शन लगा दिया-- मुन्ना को तीस हजारी कोर्ट में पुलिस पेश करने ले गई। कोर्ट परिसर में अचानक मुन्ना गिर गया। पुलिस ने पाया मुन्ना बजरंगी के  किसी ने इंजेक्शन लगा दिया था। पुलिस उसे तुरंत अस्पताल ले गई।
 चालीस से ज्यादा लोगों की हत्या में शामिल  पूर्वांचल  के कुख्यात गुंडे प्रेम प्रकाश उर्फ मुन्ना बजरंगी की 9  जुलाई 2018 को बागपत जेल में गोली मारकर हत्या कर दी गई।

Tuesday, 5 June 2018

हथियार डीलरों पर नकेल कसने से ही रुकेगी ,अपराधियों को कारतूस की सप्लाई।




हथियार डीलरों पर नकेल कसने से ही रुकेगी ,अपराधियों को कारतूस की सप्लाई।
अपराधियों को कारतूस सप्लाई में हथियार डीलर शामिल ,
अपराधियों को कारतूस सप्लाई बंद करने से रुकेगा अवैध पिस्तौल का कारोबार।

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली में रोजाना हत्या, लूट की वारदात के दौरान अपराधियों द्वारा गोली मारने / चलाने के मामले बेतहाशा हो रहे है । हालांकि पुलिस भी पहले के मुकाबले अवैध हथियार  ज्यादा पकड़ रही है । इसके बावजूद अवैध पिस्तौल के कारोबार पर अंकुश नहीं लग पा रहा है । इसकी मुख्य वजह है बदमाशों को होने वाली कारतूस की सप्लाई । जिस दिन बदमाशों को पिस्तौल के लिए कारतूस मिलने बंद हो जाएंगॆ उस दिन बदमाशों के पास मौजूद पिस्तौल सिर्फ एक खिलौना भर बन कर रह जाएगी । इस एक कदम से ही अवैध पिस्तौल/बंदूक के कारोबार को  नेस्तनाबूद तक किया जा सकता है ।  
 देसी यानी अवैध पिस्तौलों मे इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के या विदेशी कारतूस का ही इस्तेमाल किया जाता है। यह खुलासा चौंकाने वाला है। क्योंकि विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस लाइसेंसशुदा हथियार डीलर द्वारा लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही बेचे जाते है। दिल्ली पुलिस का भी मानना है कि अवैध पिस्तौलों के कारोबार पर रोक लगानी है तो कारतूस की सप्लाई पर रोक लगाने का पुख्ता इंतजाम करना चाहिए । इससे ही संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा।
दिल्ली पुलिस द्वारा बरामद अवैध पिस्तौलों के मामलों की स्टडी में यह निष्कर्ष निकला कि ​​हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के एक-एक कारतूस का  पूरा/पुख्ता हिसाब  लिया जाना चाहिए  है। पुलिस का मानना है कि अपराधियों को कारतूस की सप्लाई रोकने के लिए यह कदम उठाना सबसे जरूरी है। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार ने  स्टडी के आधार पर  केंद्र सरकार को इस बारे में कई सुझाव दिए थे ।
 ​​हथियार डीलर शक के घेरे में - पुलिस का मानना है कि अवैध पिस्तौलों के धंधे को बढ़ावा देने में कुछ ​​हथियार डीलर भी शामिल हो सकते है। पुलिस ने तफ्तीश में पाया कि मुंगेर(बिहार) या मध्य प्रदेश की बनी अवैध पिस्तौलों में विदेशी या इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के कारतूस का ही हमेशा इस्तेमाल किया गया है।  प्रयोगशाला  की  जांच  में भी यह स्पष्ट  पाया गया  कि बरामद कारतूस देसी यानी अवैध रुप से बने हुए नहीं है बल्कि इंडियन आर्डिनेंस फैक्टरी के बने हुए या विदेशी है । लाइसेंसशुदा हथियार डीलर ही लाइसेंसशुदा हथियारधारक को कारतूस बेचते है। ऐसे में इन दोनों के माध्यम से ही कारतूस अपराधियों के पास पहुंचने की संभावना अधिक  है। इसलिए अगर अवैध हथियार के धंधे को खत्म करना है तो अपराधियों तक कारतूसों की सप्लाई रोकना सबसे जरूरी है।
 एक-एक गोली का  पुख्ता हिसाब - लाइसेंसशुदा हथियार डीलर और लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूस अपराधियों तक न पहुंचे, इसे रोकने के लिए एक पुख्ता निगरानी और जांच व्यवस्था बनाने की जरुरत है हथियार डीलर ने लाइसेंसशुदा हथियारधारी को ही कारतूस बेचे है इसकी पुष्टि/तस्दीक लाइसेंसशुदा हथियारधारक से करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। पुलिस को स्टडी में पता चला कि  इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी से मिलने  वाले कारतूस के कोटे को कुछ हथियार डीलर  उसी राज्य या दूसरे राज्य के ​​हथियार डीलरों  को बेच देते है।  इससे इस कोटे के दुरूपयोग और कारतूसों के अपराधियों के पास पहुंच जाने की संभावना रहती है। सरकार को इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के  कारतूस के कोटे को आपस में  दूसरे हथियार डीलरों को बेचने पर रोक लगानी चाहिए। इससे कारतूस की कालाबाजारी और कारतूस अपराधियों के पास पहुंचना बंद होगा। लाइसेंसशुदा हथियारधारी के कारतूसों का भी पुख्ता हिसाब होना/देखना चाहिए और इस्तेमाल किए कारतूस के खाली खोखे को जमा कराने पर ही ओर कारतूस दिए जाने  चाहिए ।
 कारतूस  रोकने से अपराध पर असर पड़ेगा-पुलिस ने यह भी पाया कि मेरठ,कानपुर,झारखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों के  कुछ हथियार  डीलर दूसरे राज्यों के हथियार डीलरों से कारतूस की बड़ी खेप/कोटा खरीदते है। पुलिस का मानना है कि इसके बाद कुछ हथियार डीलर अपने बिक्री रजिस्टर में हेराफेरी करके उन कारतूस को मोटा मुनाफा पाने के लिए अपराधियों को बेच देते है। पुलिस का मानना  है कि सरकार यदि उपरोक्त कदम उठाए तो इंडियन आर्डिनेस फैक्टरी के कारतूसों को अपराधियों के पास पहुंचने से रोका जा सकता है। इससे संगीन अपराध को कंट्रोल करने पर जबरदस्त असर पड़ेगा। क्योंकि यह देखा गया है कि उम्दा किस्म के कारतूस अवैध रूप से बनाना असंभव और मुश्किल है।
राज्य पिस्तौलों की पूरी जांच कराए- केंद्र सरकार को सभी राज्यों को खासकर पंजाब,हरियाणा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,राजस्थान और बिहार को यह निर्देश देने चाहिए कि बरामद होने वाले सभी पिस्तौलों(मैगजीन वाली)और रिवाल्वर की प्रयोगशाला में बैलेस्टिक के अलावा फिजिक्स डिवीजन से भी पूरी जांच  जरूर कराई जानी चाहिए। ऐसे पिस्तौल की पूरी जांच कराने से यह पता चल सकता है। कि क्या वह किसी एक फैक्टरी में  मशीनों से बनाया गया है। सीबीआई इन पिस्तौलों की बनावट आदि का मुआयना और स्टडी करे और मुंगेर में वैध हथियार फैक्टरियों में मौजूद मशीनों से उसकी मिलान करके देखे । मुंगेर की बंदूक बनाने वाली वैध फैक्टरियों पर प्रशासन को कड़ी निगरानी औऱ समय-समय पर अचानक छापा मार कर चेकिंग करनी चाहिए। ताकि पता चल सके कि वहां पर  अवैध हथियार तो नहीं बनाए जा रहे।

अपराधियों को 36 हजार कारतूस बेचने वाला गन हाउस मालिक गिरफ्तार-- जून 2018 में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने आगरा में शिवहरे गन हाउस के मालिक आलोक शिवहरे को 1560 कारतूस के साथ गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार आलोक तीन साल में 36 हजार से ज्यादा कारतूस बदमाशों को बेच चुका है।

बदमाशों को 20 हजार से ज्यादा कारतूस सप्लाई-- साल 2018 में  दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने 1310 कारतूस के साथ संदीप यादव को  पकड़ा । संदीप के भाई संजीव की अलीगढ के अकबराबाद में हथियार की दुकान /गन हाऊस है। पुलिस ने बताया कि संदीप तीन साल में दिल्ली एनसीआर में 20 हजार से ज्यादा कारतूस सप्लाई कर चुका है ।
मेडल विजेता शूटर कारतूस बेचता था—मई 2016 में स्पेशल सेल ने मेडल विजेता शूटर मुकर्रम अली को गिरफ्तार किया । उसके पास से अलग-अलग बोर के  5533 कारतूस बरामद हुए । अली ने पूछताछ के दौरान पुलिस को बताया कि वह एक अन्य शूटर अक्षय से कारतूस खरीद कर सोनू और मुजफ्फर नगर के मेहंदी को बेचता था । इन मामलों ने भी पुलिस की स्टडी को सही साबित किया है ।