Tuesday, 9 March 2021

CBI ने "दिल की पुलिस" के "काले दिल" वाले ASI को गिरफ्तार किया। जमानत पर छोड़ने के लिए रिश्वत ली थी।

"दिल की पुलिस" के "काले दिल" वाले ASI को CBI ने गिरफ्तार किया। जमानत पर छोड़ने के लिए रिश्वत ली।

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस जो खुद को अब "दिल की पुलिस" कहने लगी है उसके एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर (एएसआई) को सीबीआई ने रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है। एएसआई ने एक व्यक्ति को जमानत पर छोड़ने के लिए 25 हजार रुपए रिश्वत मांगी थी।
सीबीआई प्रवक्ता आर सी जोशी ने बताया कि एएसआई नरेश नांदल को 12 हजार रुपए रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया है। एएसआई नरेश नांदल पश्चिम जिले के जनक पुरी थाने में तैनात है।
सीबीआई द्वारा दर्ज एफआईआर के अनुसार
संत नगर (तिलक नगर)निवासी रुद्र प्रकाश शर्मा ने पांच मार्च को सीबीआई को एएसआई नरेश के खिलाफ शिकायत दी थी। सीबीआई ने स्वतंत्र गवाह की मौजूदगी में रिश्वत मांगने के आरोपों की पुष्टि की। जिसके बाद एएसआई के खिलाफ सीबीआई ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज किया। 
शिकायतकर्ता रुद्र प्रकाश का गोल्डन ईगल इंवेस्टिगेशन सर्विसेज के नाम से दफ्तर है। 
सीबीआई को दी शिकायत में रुद्र प्रकाश ने बताया कि 25 फरवरी की रात को उसके दफ्तर में श्रीमती गंगा रावल और उसके साथी आए।इन लोगों ने उसके साथ मारपीट की और दफ्तर में तोड़फोड़ की।
जमानत के लिए रिश्वत-
उसने सौ नंबर पर पुलिस को फोन किया। पुलिस उसे और गंगा रावल को जनक पुरी थाने ले गई। पुलिस ने उसकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की। श्रीमती गंगा रावल की शिकायत पर पुलिस ने उसके खिलाफ मामला दर्ज कर दिया। 
इस मामले के जांच अफसर एएसआई नरेश नांदल ने जमानत पर छोड़ने के लिए उस पर पच्चीस हजार रुपए रिश्वत देने का दबाव डाला। दबाव में आकर उसने तेरह हजार रुपए रिश्वत एएसआई को दे दी। एएसआई नरेश अब बाकी 12 हजार रुपए देने के लिए उस पर दबाव डाल रहा है।
एएसआई बोला, जो कहा वहीं होगा- 
एएसआई नरेश और शिकायतकर्ता रुद्र के बीच रिश्वत की रकम को लेकर हुई बातचीत को सीबीआई ने रिकॉर्ड किया। बातचीत के अंश यह हैं ।
एएसआई- क्या बताया था उस दिन आपको।
रुद्र- 20 में बात हुई थी,आपने 25 कहे थे, मैंने 20 कहे थे।
एएसआई- आप तो दस भी कह दो,पांच भी कह दो। 
मैंने जो कहा था वहीं होगा पच्चीस.. अरेंज कर लेना, कर लेना।
रुद्र- तो कितने बजे दूं आपको।
एएसआई- मैं आऊंगा।
रुद्र- एक टाइम बता दो सर फिर उस टाइम मिल जाऊंगा मैं। 
एएसआई- मैं अपने आप फोन कर लूंगा।
 



Monday, 8 March 2021

दिल्ली दंगों की तफ्तीश की पोल अदालतों में खुलने लगी।सौ खरगोशों से आप घोड़ा नही बना सकते,सौ संदेहों को सबूत नहीं बना सकते।


पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव

दंगों की तफ्तीश की पोल अदालतों में खुलने लगी।
सौ खरगोशों से आप घोड़ा नही बना सकते,
सौ संदेहों को सबूत नहीं बना सकते।

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस का दावा है कि दंगों के मामले में पुख्ता सबूत/साक्ष्यों के आधार पर ही आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। 
पुलिस कहती है कि दंगों के मामले की जांच में यह नहीं देखा जाता कि आरोपी किस धर्म/मजहब, जाति, पहचान या रंग का है। जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत पाए गए उन्हें जेल की सलाखों के पीछे बंद किया गया है।
लेकिन पुलिस के दावों और तफ्तीश की पोल अब आए दिन अदालतों में खुल रही है। 
कमिश्नर की भूमिका पर सवालिया निशान-
ऐसे मामलों से पुलिस कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव और आईपीएस अफसरों की पेशेवर काबिलियत/ भूमिका पर सवालिया निशान लग जाता है।
उल्लेखनीय है कि दंगों की जांच में पुलिस की भूमिका पर देश के मशहूर रिटायर्ड आईपीएस अफसर जूलियो रिबैरो तक सवाल उठा चुके हैं। 

पुलिस के बारे में कहा जाता है कि वह रस्सी का सांप बना देती है। लेकिन लगता है अब पुलिस  खरगोशोंं को घोड़ा बनाने की कोशिश में लगी  है। लेकिन पुलिस की यह कोशिश अदालत में फेल हो रही है।
अदालत चकित -
पुलिस हत्या और हत्या की कोशिश तक के मामले में किस तरह की तफ्तीश करती है और कितने अजीबोगरीब आधार पर गिरफ्तार करती है। इस पर अदालत भी चकित हो जाती है।

पुलिस ने पिछले साल उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान हत्या के प्रयास के मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया था। लेकिन अदालत में पुलिस की तफ्तीश की पोल खुल गई। अदालत यह देख कर चकित रह गई कि पुलिस ने एक व्यक्ति की हत्या के प्रयास के आरोप में दो लोगों पर आरोप लगाने की पूरी कोशिश की जबकि कथित पीड़ित खुद पुलिस की जांच से गायब है। 
अदालत ने कहा कि अनुमान को खींच कर  साक्ष्य/सबूत का आकार/रुप नहीं  दिया जा सकता।
सौ खरगोशों से आप घोड़ा नही बना सकते-
कड़कड़डूमा अदालत के एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत ने रुसी लेखक फ्योदोर दोस्तोवस्की की किताब ‘अपराध और सजा’ के हवाले से कहा कि ‘सौ खरगोशों से आप एक घोड़ा नहीं बना सकते हैं और सौ संदेहों को एक साक्ष्य/प्रमाण नहीं बना सकते। इसलिए दोनों आरोपियों को हत्या की कोशिश (धारा 307) और शस्त्र अधिनियम के आरोप से मुक्त (डिस्चार्ज) किया जाता है।’’ 

मान लो हत्या की कोशिश की है-
पुलिस ने इमरान उर्फ तेली और बाबू पर दंगों के दौरान मौजपुर रेड लाइट के पास एक भीड़ का हिस्सा होने का आरोप लगाया था, जिसमें कथित राहुल पर गोली चलाई गई थी।
पुलिस ने दावा किया था कि आरोपी व्यक्ति दंगाई भीड़ का हिस्सा थे और इस लिए "यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने हत्या के प्रयास का अपराध किया था"। 
जिसे गोली लगी वह कहां है ?
अदालत ने कहा कि जिस कथित पीड़ित राहुल को गोली मारी गई वह कहां है ? उसका बयान भी रिकॉर्ड पर नहीं है।
पुलिस ने बताया कि राहुल, जिसे कथित रूप से दंगाइयों द्वारा गोली मार दी गई है, ने अपने मेडिको लीगल केस (एमएलसी) में गलत पता और गलत मोबाइल फोन नंबर दिया था।
पुलिस ने पीड़ित को देखा तक नहीं- 
अदालत ने कहा, 'जब तक पुलिस अस्पताल पहुंचती, कथित पीड़ित राहुल गायब हो चुका था। ऐसा नहीं है कि राहुल ने कोई शुरुआती बयान दिया और फिर गायब हो गया।
इससे स्पष्ट है कि पुलिस ने राहुल को कभी नहीं देखा। 
किसने, किसे गोली मारी मालूम नहीं- 
एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत ने पुलिस से सवाल किया, कि "यह मामला ऐसा है, जहां कौन कहेगा कि किसने किस पर गोली चलाई और किसके द्वारा और कहांं पर ।’’ “कथित पीड़ित को पुलिस ने कभी देखा तक नहीं है। उसने कभी किसी गोली की चोट या किसी भीड़ / दंगाइयों के बारे में कोई बयान नहीं दिया। ऐसे में पुलिस की जांच से भी पीड़ित के अनुपस्थित रहने पर आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 307 कैसे बनाई जा सकती है,"?
हत्या की कोशिश का कोई सबूत नहीं-
अदालत ने एक मार्च 2021 को दिए फैसले में कहा, ‘‘फौजदारी न्याय प्रणाली" कहती है कि आरोपी व्यक्ति पर आरोप तय करने (चार्ज फ्रेम)  के लिए उसके खिलाफ कुछ सबूत/सामग्री होनी चाहिए। अनुमान/पूर्वधारणा सबूत का स्थान नहीं ले सकता। आरोप पत्र में धारा 307 या शस्त्र कानून के तहत मामला चलाने के लिए कोई सबूत नहीं है।’’
उनके पास से किसी भी हथियार की बरामदगी भी नहीं हुई थी।
अदालत ने कहा हालांकि दोनों आरोपियों के खिलाफ गैर कानूनी तरीके से जमा होने और दंगा करने के आधार पर मामला चलाया जा सकता है। इस लिए मामले को मैजिस्ट्रेट की अदालत में ट्रांसफर कर दिया गया।
हत्या के आरोपियों के खिलाफ किसी तरह के सबूत नहीं, हाईकोर्ट ने जमानत दी-
दिल्ली हाइकोर्ट ने पिछले साल हुए दंगों के दौरान हुई हत्या के तीन आरोपियों को 21 फरवरी 2021 को जमानत दे दी।  
हाइकोर्ट के जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने कहा कि जुनैद, चांद मोहम्मद और इरशाद के खिलाफ प्रत्यक्ष, परिस्थितिजन्य या फॉरेंसिक/वैज्ञानिक किसी भी तरह के सबूत नहीं हैंं। 
इन तीनों पर फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के दौरान शाहिद नाम के शख्स की हत्या का आरोप है। ये 1 अप्रैल 2020 से जेल में थे। 
पुलिस के मुताबिक ये तीनों उन लोगों में शामिल थे जो सप्तर्षि बिल्डिंग की छत पर थे और दूसरे छत पर मौजूद लोगों को निशाना बना रहे थे। पुलिस का आरोप है कि इसी दौरान गोली लगने से सप्तर्षि बिल्डिंग की ही छत पर मौजूद शाहिद की मौत हो गई थी। 
पुलिस ने गोलीबारी की अनदेखी की-
बचाव पक्ष के वकील सलीम मलिक ने अदालत में एनडीटीवी का एक वीडियो भी पेश किया था।
जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने कहा कि वीडियो में स्पष्ट रूप से दिखाया गया है कि हेलमेट पहने एक व्यक्ति मोहन नर्सिंग होम के ऊपर से फायरिंग कर रहा था। उस वीडियो में, फायरिंग केवल मोहन नर्सिंग होम बिल्डिंग से दिखाई दी है, ना कि सप्तऋषि बिल्डिंग से होती हुई दिखाई दी है। पुलिस ने जांच में केवल एक तरफ की इमारतों पर ध्यान केंद्रित किया, मोहन नर्सिंग होम की तरफ से की गई गोलीबारी की अनदेखी की है।
नर्सिंग होम से गोलीबारी-
मोहन नर्सिंग होम की छत पर हेलमेट पहने एक व्यक्ति राइफल निकाल रहा है और एक अन्य व्यक्ति है जो हथियार को रूमाल के साथ कवर कर रहा है। उन्हें वीडियो में भी देखा जा सकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि जांच एजेंसी ने इमारत के एक तरफ ही ध्यान केंद्रित किया है। हालांकि अभियोजन पक्ष ने स्वीकार किया कि दोनों पक्षों के उपद्रवी एक-दूसरे पर पथराव कर रहे थे और गोलीबारी कर रहे थे।  

अपने समुदाय के व्यक्ति को मार देंगे ?अदालत ने यह भी कहा कि यह विश्वास करना कठिन है कि याचिकाकर्ता दंगे के दौरान अपने ही समुदाय के व्यक्ति को मार देंगे।

अदालत ने कहा, "न तो आरोपियों का कोई मकसद था और न ही अभियोजन पक्ष ने पूरे मामले में किसी भी मकसद का आरोप लगाया है। इस लिए यह मानना ​​मुश्किल है कि याचिकाकर्ता सांप्रदायिक दंगे का इस्तेमाल अपने समुदाय के व्यक्ति को मारने के लिए कर सकते हैं।

दूसरे समुदाय के लोगों को जाने देते ?-अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष का खुद मानना है कि याचिकाकर्ताओं ने सप्तऋषि बिल्डिंग में मौजूद  मुकेश, नारायण, अरविंद कुमार और उनके परिवार के सदस्यों को उनकी जान बचाने के लिए वहां से जाने दिया। ऐसे में अगर वे (आरोपी) सांप्रदायिक दंगे में शामिल थे और दूसरे समुदाय के लोगों को नुकसान पहुंचाना चाहते थे तो फिर उन्होंने उक्त लोगों को जाने क्यों दिया? 

मुख्य हमलावर नहीं पकड़ा गया-

अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस अभी तक मुख्य हमलावर को गिरफ्तार नहीं कर सकी है, जिसने गोली चलाई थी, जिससे शाहिद मारा गया था और याचिकाकर्ताओं से हथियार की किसी भी तरह की कोई बरामदगी नहीं हुई है।





Sunday, 7 March 2021

जामिया के छात्र की चार्जशीट किसने लीक की ? कमिश्नर पता लगाएं/जवाबदेही तय करें,चार्जशीट लीक करना अपराध है- हाईकोर्ट। मीडिया ने की है तो यह चोरी है। हर सूरत में अपराध बनता है।’

हाईकोर्ट जस्टिस मुक्ता गुप्ता

जामिया छात्र आसिफ इकबाल

चार्जशीट लीक करना अपराध है।
लीक किसने की पता लगा कर जवाबदेही तय करे पुलिस कमिश्नर- हाईकोर्ट

मीडिया ने की है तो यह चोरी है। 
हर सूरत में अपराध बनता है।’

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में पिछले साल हुए दंगों के मामले में दायर चार्जशीट/आरोप पत्र पर अदालत के संज्ञान लेने से पहले ही उसका मीडिया में लीक होना अपराध है।
अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान 5 मार्च 2021 को पुलिस की आलोचना करते हुए कहा कि यह घटना अपराध है।
कमिश्नर जवाबदेही तय करे-
जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने दिल्ली पुलिस आयुक्त  सच्चिदानंद श्रीवास्तव को हलफनामा दायर कर जानकारी को मीडिया में लीक करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय करने को कहा है। 
आरोप साबित-
अदालत ने कहा कि एक बार मीडिया में आने पर यह आरोप (लीक होने का) साबित हो चुका है। यह अब सिर्फ आरोप नहीं पुलिस को तय करना होगा कि यह किसने किया।
जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने पुलिस के वकील से कहा,"यदि आप बहस करना चाहते हैं तो, मैं सुनने के लिए तैयार हूं। लेकिन यह समझें कि यह आरोपों के चरण से परे है।"
पुलिस के वकील अमित महाजन ने अदालत में कहा कि पूरक आरोप-पत्र के दस्तावेज/ सामग्री पुलिस द्वारा मीडिया में लीक नहीं की गई।
इसलिए पुलिस पर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती, क्योंकि उन्होंने इसे लीक नहीं किया है। 
मीडिया ने किया तो चोरी है, हर हाल में अपराध है-
इस पर अदालत ने कहा, ‘यह संपत्ति/ दस्तावेज (आरोप पत्र)एक पुलिस अधिकारी के हाथ में थे और अगर आपके अधिकारी ने ऐसा किया है तो यह अधिकारों का दुरुपयोग है, अगर इसकी मंजूरी किसी और को दी गई तो विश्वास का आपराधिक उल्लंघन है और अगर इसे मीडिया ने कहीं से लिया है तो यह चोरी है। इसलिए हर सूरत में अपराध बनता है।’

पुलिस ने बयान लीक किया-
अदालत जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने पूछताछ के दौरान जांच एजेंसी के समक्ष दर्ज कराए गए बयान को मीडिया में लीक करने पर पुलिस पर कदाचार का आरोप लगाया है।
चार्जशीट आरोपी से पहले मीडिया में लीक-
अदालत में तन्हा के वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि पुलिस ने हाल ही में निचली अदालत के समक्ष पूरक आरोप पत्र दायर किया था और आरोपियों को इसकी प्रति उपलब्ध कराए जाने से पहले ही इसके कुछ अंश अगले ही दिन मीडिया के पास थे।
निचली अदालत ने तब तक पूरक आरोप-पत्र पर संज्ञान भी नहीं लिया था और तब निचली अदालत ने एक आदेश पारित कर मीडिया की आलोचना की थी। उन्होंने इस संदर्भ में अतिरिक्त हलफनामा दायर करने के लिए अदालत से समय की मांग की।
अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की है। 

पुलिस की जांच रिपोर्ट रद्दी का टुकड़ा-
उल्लेखनीय है कि एक मार्च को हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस की सतर्कता जांच रिपोर्ट पर असंतोष जताया था। पुलिस की विजिलेंस रिपोर्ट को 'अधपका' और ' रद्दी कागज का बेकार टुकड़ा' बताया था। 
हाईकोर्ट ने मीडिया में सूचनाएं लीक होने को लेकर दिल्ली पुलिस को जबरदस्त फटकार लगाई। 
अदालत को पुलिस और मीडिया हाउस, जी न्यूज मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड के वकील विजय अग्रवाल के माध्यम से जवाबदेही के लिए सुनवाई करना बाकी है।
तन्हा के वकील ने पहले कहा था कि दस्तावेजों के लीक होने के संबंध में पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों को लेकर सवाल की जांच के अलावा, एक संज्ञेय अपराध भी किया गया है और उचित कार्रवाई करना आवश्यक है.उन्होंने कहा था कि मीडिया घरानों- जी न्यूज मीडिया कॉरपोरेशन लिमिटेड और ऑप इंडिया के कदम ने मीडिया में इस तरह के दस्तावेज रखने के लिए नियमों (प्रोग्राम कोड) का उल्लंघन किया।

जी न्यूज सूत्र बताए-
हाईकोर्ट ने इससे पहले दंगा मामले में तन्हा के कथित कबूलनामे के प्रसारण पर जी न्यूज से सवाल किया था और कहा था कि इस तरह के दस्तावेजों को बाहर लाकर प्रकाशित नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने मीडिया हाउस को निर्देश दिया था कि वह एक हलफनामा दाखिल करे, जिससे उस सूत्र का नाम पता चले जिससे संबंधित पत्रकार को दस्तावेज मिले थे।

चोरी के मामले से भी बदतर जांच की -
जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने एक मार्च को दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में सुनवाई करते हुए आसिफ इकबाल तनहा की रिट याचिका पर उनके मीडिया ट्रायल के खिलाफ दिल्ली पुलिस के सतर्कता विभाग को जमकर तलाड़ लगाई थी। अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि यह जांच छोटी-मोटी चोरी के मामले से भी बदतर है।

सतर्कता पूछताछ के लीक होने के सूत्र को स्थापित करने में विफल होने के कारण पुलिस अधिकारियों को कठोर आदेशों की चेतावनी देते हुए अदालत ने यह भी कहा था कि सुनवाई की अगली तारीख पर विशेष पुलिस आयुक्त (विजिलेंस) को उपस्थित होना होगा।
अदालत ने जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष को खारिज करते हुए कहा कि केस फाइल की सूचना लीक केवल इसलिए असुरक्षित नहीं हो गई, क्योंकि दिल्ली पुलिस लीक के स्रोत की पहचान करने में विफल रही है।

बयान सड़क पर पड़ा कागज नहीं-
अदालत ने देखा कि जो इकबालिया बयान लीक हो गया है, वह मीडिया के लिए "सड़क पर पड़ा हुआ" कोई दस्तावेज नहीं है, जिसे आसानी से हासिल किया जा सके। अदालत ने आगे कहा कि यह मामला वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों द्वारा हैंडल किया गया है।
दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व करते हुए केंद्र सरकार के स्थायी वकील अमित महाजन ने यह स्वीकार किया कि लीकेज अवांछनीय है, 

जांच की निष्पक्षता के प्रति पूर्वाग्रह-
जिसके लिए अदालत ने कहा कि यह सिर्फ "अवांछनीय ही नहीं है। बल्कि यह अभियुक्त और जाँच की निष्पक्षता के प्रति पूर्वाग्रह है।"
अदालत ने यह भी कहा कि यह अवमानना भी है।
अदालत ने कहा,"आप ध्यान दें, ये वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं। आपने कहां पूछताछ की, आपने किससे पूछताछ की? फाइलें कहां भेजी गईं? कौन उन्हें  दिल्ली सरकार  और गृह मंत्रालय  के पास ले गया? और उन्हें वहां से वापस कौन लाया?"

मीडिया ट्रायल-
ज़ी न्यूज़ सहित कई मीडिया चैनलों ने अपनी रिपोर्ट में तन्हा के 'कथित इकबालिया बयान' के तथ्यों का हवाला दिया था, जो आधिकारिक केस रिकॉर्ड का एक हिस्सा था और चैनलों ने स्वतंत्रता और निष्पक्ष जांच के अधिकार के प्रति पूर्वाग्रह पैदा किया और उसे मीडिया ट्रायल के लिए इस्तेमाल किया।
वहीं तन्हा के वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने 18 अगस्त, 2020 को प्रसारित ज़ी रिपोर्ट का हवाला दिया और कहा कि यह रिपोर्ट उस खुलासे पर आधारित है जिसमें आरोप लगाया गया था कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ ने दिल्ली में बसों में आग लगा दी थी और उसने दंगों में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
हालांकि इकबालिया बयान  पर किसी भी अदालत में भरोसा नहीं किया जाएगा, लेकिन उनकी समस्या यह है कि कोर्ट में  आने से पहले यह लीक हो गया। तन्हा ने कथित रूप से हिंसक समाचार रिपोर्टों को हटाने और इस पर एक निष्पक्ष जांच के लिए प्रार्थना की है कि आखिर किस तरह यह जानकारी लीक हो गई।
उनके वकील ने कहा कि 15 अक्टूबर, 2020 को दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को स्रोत का खुलासा करने का निर्देश दिया था। हालांकि, इस आदेश के अनुपालन में उन्होंने (पुलिस) इस साल 16 जनवरी को केवल एक हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि लीकेज के आरोप "असंबद्ध" थे।
पुलिस को केवल अपने लोगों को बचाने की चिंता- 
तन्हा के वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि समाचार चैनल द्वारा प्रसारण का उद्देश्य तन्हा की छवि धूमिल करना था। उन्होंने
पुलिस के आचरण पर भी सवालिया निशान खड़ा किया कि यदि दिल्ली पुलिस ईमानदार, पारदर्शी होती और अपना इरादा दिखाया होता, तो यह एक ऐसी एजेंसी हो सकती है जिस पर भरोसा किया जा सकता है, लेकिन उसे केवल अपने लोगों को बचाने की चिंता है। इसलिए उसी एजेंसी द्वारा एक और जांच का कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने मामले की स्वतंत्र जांच की प्रार्थना की।
दिल्ली पुलिस ने अपने हलफनामे में कहा कि उसने पूरी केस फाइल दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय को भेज दी थी। अदालत ने जिस तरह से पूछताछ की गई उस पर भी असंतोष जाहिर किया।

लीक किसने की पता लगाना होगा-
अदालत ने पुलिस को आरोपी के इकबालिया बयान के लीक होने की सतर्कता जांच रिपोर्ट दायर करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सतर्कता जांच यह पता लगाने में असमर्थ है कि क्या हुआ, तो कठोर आदेश पारित किए जाएंगे और पुलिस को यह पता लगाना होगा कि लीक कहां से हुआ था।
जज ने कहा, 'सतर्कता जांच रिपोर्ट कहती है कि आरोप के संबंध में सबूत नही हैं। नहीं, आरोप पुष्ट हैं। आपको पता लगाना था कि यह किसने किया है'।
दंगों की साजिश का आरोप-
जामिया के छात्र आसिफ इकबाल तनहा को पिछले साल उत्तर पूर्व दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित एक मामले में मई 2020 में गिरफ्तार किया गया था।
 तन्हा फिलहाल जेल में हैं। पुलिस ने कहा था कि शाहीन बाग में अबुल फजल एन्क्लेव के रहने वाले तन्हा स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के सदस्य थे और जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी का हिस्सा थे, जिसने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।
पिछले साल 24 फरवरी, 2020 को उत्तर पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और प्रदर्शनकारियों के बीच सांप्रदायिक हिंसा हुई थी। दंगों/हिंसा में करीब 53 लोग मारे गए थे और लगभग 200 लोग घायल हो गए थे।

यूएपीए में बंद-
24 साल के आसिफ इकबाल तन्हा की दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के षड्यंत्र वाली एफआईआर नंबर 59 में यूएपीए की धाराओं के तहत मई 2020 में गिरफ़्तारी की थी। उसे फरवरी 2020 में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के सिलसिले में ''गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था।


Monday, 1 March 2021

NIA ने आतंकवादियों के मददगार नशे के 4 सौदगरों को गिरफ्तार किया। लश्कर ए तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन को धन मुहैया कराया ।

NIA ने आतंकवादियों के मददगार नशे के 4 सौदगरों को गिरफ्तार किया। लश्कर ए तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन को धन से मदद।

इंद्र वशिष्ठ
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कश्मीर में नशे (हेरोइन) के चार सौदागरों/तस्करों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह पाकिस्तान से हेरोइन लाकर कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में सप्लाई करता था। नशा बेच कर मिला पैसा आतंकवादियों को देते थे।

एनआईए की प्रवक्ता जया रॉय ने बताया कि आज कश्मीर में गांदरबल के अल्ताफ अहमद शाह,बांदीपोरा के शौकत अहमद पारे,शोपियां के मुदासिर अहमद डार और अनंतनाग जिले के अमीन अलाई उर्फ हिलाल मीर को गिरफ्तार किया गया है । 

21 किलो हेरोइन बरामद-
पिछले साल हेरोइन तस्करों के गिरोह से  21 किलो हेरोइन और करीब एक करोड़ 36 लाख रुपए बरामदगी के मामले मेंं इन चारों अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया है।
पिछले साल 11 जून को हंदवाड़ा थाने की पुलिस ने नाके पर जांच के लिए अब्दुल मोमिन पीर की हुंदई क्रेटा कार को रोका। कार की तलाशी में दो किलो हेरोइन और बीस लाख रुपए बरामद हुए। 
इस मामले की जांच 23 जून को एनआईए को सौंप दी गई। एनआईए द्वारा इस मामले में 5 दिसबंर 2020 को 6 अभियुक्तों के खिलाफ जम्मू में एनआईए की विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिला किया जा चुका है।

पाकिस्तान से हेरोइन की तस्करी- 
एनआईए को जांच के दौरान पता चला कि हेरोइन तस्करों का यह गिरोह पाकिस्तान से भारी मात्रा में हेरोइन लाकर कश्मीर और देश के दूसरे हिस्सों में सप्लाई करता है।

नशे के पैसे से आतंकवाद-
तफ्तीश के दौरान यह भी पता चला कि हेरोइन तस्कर पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी गिरोह हिजबुल मुजाहिदीन और लश्कर ए तैयबा से चैट प्लेटफार्म के माध्यम से नियमित रुप से  संवाद करता है। 
हेरोइन की बिक्री से मिली रकम को ये तस्कर लश्कर ए तैयबा को कश्मीर घाटी में आतंकवादी गतिविधियों के लिए देते थे।
अभियुक्तों को श्रीनगर की अदालत में पेश कर तीन दिन का ट्रांजिट रिमांड लिया गया।
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