Friday, 6 April 2018

महिला डीसीपी का अपमान , पुलिस कमिश्नर की भूमिका पर सवालिया निशान


महिला डीसीपी का  अपमान ,
 पुलिस कमिश्नर की भूमिका पर सवालिया निशान 
इंद्र वशिष्ठ

महिला डीसीपी असलम खान के बारे में आपत्तिजनक/ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले हवलदार देवेंद्र सिंह के खिलाफ दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने अब  तक कोई कार्रवाई नहीं की है। देवेंद्र सिंह  पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के दफ्तर में तैनात हैं । निरंकुश हवलदार ने  महिला डीसीपी के बारे में फेसबुक पर जो आपत्तिजनक टिप्पणी की वह पुलिस कमिश्नर को कई दिन पहले ही दी जा  चुकी हैं। इसके बावजूद हवलदार के खिलाफ कार्रवाई नहीं किए जाने से पुलिस कमिश्नर की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया है। महिला डीसीपी की शिकायत पर ही अब तक कार्रवाई नहीं किए जाने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम महिला की शिकायत  की तो  पुलिस कमिश्नर बिल्कुल परवाह ही नहीं करते होंगे। महिला डीसीपी का ही सम्मान ही सुरक्षित  नही है तो आम महिला की   सुरक्षा का अंदाजा ही लगाया जा सकता है।   
माडल टाउन थाना इलाके में 26 मार्च को भूषण  गुप्ता  बोरिंग करा रहा था। पुलिस ने काम बंद करा दिया।  इस सिलसिले में भूषण भतीजे सीए हर्षित गोयल के साथ थाने गया था। सबको मालूम है कि बोरिंग से पुलिस को मोटी कमाई होती है। भूषण पुलिस वालों से थाने के अंदर बात कर रहा था । हर्षित ने बताया कि वह फोन पर बाहर बात कर रहा था तभी पुलिस वालों ने उसके साथ बदतमीजी की.। जिसका विरोध करने पर कई पुलिस वालों ने उसकी पिटाई की। इस बात का पता चलने पर उसके पिता भी पहुंच गए। पुलिस वालों ने उसके पिता के साथ भी मारपीट की। मदद के लिए हर्षित ने 100 नंबर पर भी फोन किया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि इसके बाद   
एस एच ओ  सतीश ने उसको झूठे मामले में फंसाने की कोशिश की।
 उत्तर पश्चिमी  जिला की पुलिस उपायुक्त असलम खान की जानकारी में यह मामला आया। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद उन्होंने मामले की जांच विजिलेंस को करने को कहा है। डीसीपी ने बोरिंग करने वाले के खिलाफ क़लंदरा भी  बनवाया।
डीसीपी के समय रहते सही कार्रवाई के कारण एस एच ओ हर्षित को झूठे मामले में फंसाने में सफल नहीं हो पाया। 
अब देखिए थाने वालों के सीपी दफ्तर में कनेक्शन।
इसके बाद देवेन्द्र सिंह नामक व्यक्ति ने 26 मार्च को ही  फेसबुक पर अपने साथी माडल टाउन थाने के पुलिस वालों को बचाने के लिए डीसीपी के खिलाफ ही आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।अपने  साथियों को बचाने के लिए अनुशासनहीनता की भी हद पार कर दी। उसने फेसबुक पर लिखा कि रईसजादे की शिकायत पर  डीसीपी ने पुलिस वालों के खिलाफ ही जांच के आदेश दे दिए।डीसीपी ने उसे चाय भी पिलाई। अब कोई इस हवलदार से  पूछे कि उसको कैसे पता चला कि शिकायतकर्ता रईस है या उसे चाय पिलाई गई। जाहिर सी बात है कि शिकायतकर्ता के बारे में देवेंद्र को  उन पुलिस वालों ने ही बताया होगा। जिनके ग़लत मंसूबों पर डीसीपी ने पानी फेर दिया।
इस पोस्ट पर अजय कुमार छोकर ने भी देवेंद्र के  कमेंट का समर्थन किया है।
छानबीन में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई कि देवेंद्र सिंह हवलदार है और पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के कार्यालय में तैनात हैं अजय कुमार छोकर अपराध शाखा में तैनात हैं। देवेंद्र ने बाद में पोस्ट हटा दी और फिर फेसबुक खाता ही बंद कर दिया।
डीसीपी को इस कमेंट का पता चल गया है यह जानकारी जाहिर सी बात है हवलदार को उसके साथी थाने  वालों  ने  दी । जिसके बाद उसने वह पोस्ट हटा दी और  फेसबुक पेज बंद कर दिया।
इस सारे मामले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भ्रष्ट पुलिस वालों की आपस में इतनी सांठगांठ है कि डीसीपी ने फेसबुक कमेंट देख लिया इसकी जानकारी भी हवलदार को देकर सबूत मिटाने की कोशिश की गई।
लेकिन  पोस्ट हटाए जाने से पहले ही उस कमेंट का फोटो ले कर सबूत सुरक्षित किया जा चुका था। यह सबूत पुलिस कमिश्नर को कई दिन पहले दे दिया गया। इस कमेंट को देख कर कोई भी  काबिल  कमिश्नर हवलदार के खिलाफ कार्रवाई करने में तनिक भी देर नहीं लगाता। पुलिस कमिश्नर को तो तुरंत ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌हवलदार से पूछताछ  और उसके मोबाइल फोन के रिकार्ड की जांच करा यह पता लगाना चाहिए था किस किस भ्रष्ट पुलिस वाले से हवलदार की सांठगांठ हैं। तभी यह भी पता चलता कि डीसीपी को बदनाम/ अपमानित करने की साज़िश में कौन-कौन पुलिस वाले शामिल हैं। लेकिन पुलिस कमिश्नर ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।  
 कई  दिन बाद भी हवलदार और एस एच ओ के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना  पुलिस कमिश्नर की काबिलियत और भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है। पुलिस मुख्यालय के सूत्रों ने बताया कि  माडल टाउन एसएचओ सतीश के  खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस मुख्यालय को पहले भी लिखा गया था लेकिन उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई ।
आईपीएस अफसरों को इस मामले में एकजुट होकर कमिश्नर से एसएचओ समेत ऐसे पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करनी चाहिए। वर्ना एक दिन ऐसा आएगा कि भ्रष्ट पुलिस वाले इतने निरंकुश हो जाएंगे कि  उनके साथ खुलेआम भी बदतमीजी करेंगे। ऐसे पुलिस वाले ही आम लोगों का भी  जीना हराम करते हैं।

पुलिस कमिश्नर कमजोर, एस एच और हवलदार तक निरंकुश।
पुलिस कमिश्नर के कार्यालय में किस तरह के लोग तैनात हैं इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। कई पुलिसवाले तो कई सालों से वहां तैनात हैं। 
आईपीएस अफसरों ने पुलिस के पीआरओ ब्रांच का भी बंटाधार कर दिया।
पुलिस के पीआरओ ब्रांच में भी सालों से जमे पुलिस वाले निरंकुश हो गए हैं। ऐसा ही एक इंस्पेक्टर संजीव है जो पुलिस की प्रेस रिलीज के साथ ब्रह्मा कुमारी नामक निजी संस्था की बेवसाइट का लिंक भेज कर संस्था का सालों से प्रचार कर रहा था इस पत्रकार द्वारा पिछले साल यह मामला उजागर किया गया था। इस तरह से पुलिस कमिश्नर की नाक के नीचे निजी संस्था के प्रचार के लिए पद और पुलिस के संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। निरंकुशता का आलम यह है कि किसी भी पत्रकार का नाम बिना वजह पुलिस के व्हाटस ऐप ग्रुप या ईमेल लिस्ट से हटा दिया जाता है। हाल ही में पत्रकार फरहान के भी साथ ऐसा किया गया है। पीआरओ विभाग द्वारा
पुलिस और मीडिया के रिश्तों को बेहतर बनाने की बजाय बिगाड़ने का काम किया जा रहा है।
पुलिस में पेशेवर पीआरओ के न होने के कारण ही दीपेंद्र पाठक और मधुर वर्मा ने अपने चहेते पत्रकारों के लिए अलग व्हाटस ऐप ग्रुप बना कर मीडिया से भेदभाव किया है। कोई भी  काबिल और पेशेवर अफ़सर इस तरह  मीडिया को बांटने की हरकत नहीं करता है। ऐसे अफसरों के कारण ही पीआरओ ब्रांच में तैनात पुलिस वाले निरंकुश हो गए। 
इंस्पेक्टर संजीव हो या हवलदार देवेंद्र  यह सब ऐसा दुस्साहस तभी कर पाते हैं जब अमूल्य पटनायक जैसे कमजोर पुलिस कमिश्नर होते हैं। पुलिस कमिश्नर  दमदार होता तो दीपेंद्र पाठक और मधुर वर्मा भी मीडिया से इस तरह भेदभाव की हिम्मत नहीं कर सकते थे

Wednesday, 4 April 2018

महिला डीसीपी पर हवलदार ने की आपत्तिजनक टिप्पणी





पुलिस कमिश्नर कमजोर , एसएचओ,  हवलदार तक निरंकुश, 

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के दफ्तर में तैनात निरंकुश हवलदार ने  महिला डीसीपी के बारे में फेसबुक पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है।
हवलदार ने अपने भ्रष्ट साथियों को बचाने के लिए अनुशासनहीनता की भी हद पार कर दी।
पुलिस मुख्यालय से जुड़े वरिष्ठ आईपीएस अफसर ने बताया कि माडल टाउन थाना इलाके में एक व्यक्ति बोरिंग करा रहा था। उसे थाने में बुला कर पुलिस ने पैसे मांगे। एस एच ओ के रीडर ने उसे फोन पर बात करने से भी  रोका।इस पर कहा सुनी /झगड़ा हो गया। उस व्यक्ति ने पुलिस वालों पर मारपीट करने का भी आरोप लगाया है। आरोप है कि पैसे मिलते नहीं देख एस एच ओ  सतीश ने उस  व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाने की कोशिश की।
 उत्तर पश्चिमी  जिला की पुलिस उपायुक्त असलम खान की जानकारी में यह मामला आया। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद उन्होंने मामले की जांच विजिलेंस को करने को कहा है।
डीसीपी के समय रहते सही कार्रवाई के कारण एस एच ओ उस व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाने में सफल नहीं हो पाया। 

अब देखिए थाने वालों के सीपी दफ्तर में कनेक्शन।
इसके बाद देवेन्द्र सिंह नामक व्यक्ति ने फेसबुक पर अपने साथी माडल टाउन थाने के पुलिस वालों को बचाने के लिए डीसीपी के खिलाफ ही आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी । इस पोस्ट पर अजय कुमार छोकर ने भी देवेंद्र के  कमेंट का समर्थन किया है।
छानबीन में चौंकाने वाली जानकारी सामने आई कि देवेंद्र सिंह हवलदार है और पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के कार्यालय में तैनात हैं अजय कुमार छोकर अपराध शाखा में तैनात हैं।
सबको मालूम है कि दिल्ली में बोरिंग से पुलिस को मोटी कमाई होती है।
पुलिस मुख्यालय से जुड़े  वरिष्ठ अफसर ने बताया कि माडल टाउन एसएचओ सतीश के  खिलाफ कार्रवाई के लिए डीसीपी असलम खान ने पुलिस मुख्यालय को पहले भी लिखा था लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई ।

पुलिस कमिश्नर कमजोर ,  हवलदार तक निरंकुश ।


 आईपीएस अफसरों को इस मामले में एकजुट होकर कमिश्नर से एसएचओ समेत ऐसे पुलिस कर्मियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करनी चाहिए। वर्ना एक दिन ऐसा आएगा कि भ्रष्ट पुलिस वाले इतने निरंकुश हो जाएंगे कि  उनके साथ खुलेआम भी बदतमीजी करेंगे। 
अगर ऐसे पुलिस वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो कोई भी अच्छा अफसर काम नहीं कर पाएगा। ऐसे पुलिस वाले ही आम लोगों का भी  जीना हराम करते हैं।
पुलिस कमिश्नर के कार्यालय में किस तरह के लोग तैनात हैं इससे अंदाजा लगाया जा सकता है। कई पुलिसवाले तो कई सालों से वहां तैनात हैं। 
इस हवलदार की हरकत ने तो साबित कर दिया कि पुलिस मुख्यालय में तैनात अफसरों के चहेते ऐसे पुलिस वाले कितने निरंकुश और दुस्साहसी हो गए हैं। पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में तैनात होने के दम पर ऐसे पुलिस वालों की थानों  में सांठगांठ रहतीं हैं।
इसके लिए वह वरिष्ठ अफसर जिम्मेदार हैं जो इनको अपने निजी फायदे के लिए संरक्षण देते हैं इनका  तबादला भी नहीं होने देते।
आईपीएस अफसरों ने पुलिस के पीआरओ ब्रांच का भी बंटाधार कर दिया।
पुलिस के पीआरओ ब्रांच में भी सालों से जमे पुलिस वाले निरंकुश हो गए हैं। ऐसा ही एक इंस्पेक्टर संजीव है जो पुलिस की प्रेस रिलीज के साथ ब्रह्मा कुमारी नामक निजी संस्था की बेवसाइट का लिंक भेज कर संस्था का सालों से प्रचार कर रहा था इस पत्रकार द्वारा पिछले साल यह मामला उजागर किया गया था। इस तरह से पुलिस कमिश्नर की नाक के नीचे निजी संस्था के प्रचार के लिए पद और पुलिस के संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। निरंकुशता का आलम यह है कि किसी भी पत्रकार का नाम बिना वजह पुलिस के व्हाटस ऐप ग्रुप या ईमेल लिस्ट से हटा दिया जाता है। हाल ही में पत्रकार फरहान के भी साथ ऐसा किया गया है। पीआरओ विभाग द्वारा पुलिस और मीडिया के रिश्तों को बेहतर बनाने की बजाय बिगाड़ने का काम किया जा रहा है।
पुलिस में पेशेवर पीआरओ के न होने के कारण ही दीपेंद्र पाठक और मधुर वर्मा ने अपने चहेते पत्रकारों के लिए अलग व्हाटस ऐप ग्रुप बना कर मीडिया से भेदभाव किया है। कोई भी  काबिल और पेशेवर अफ़सर इस तरह  मीडिया को बांटने की हरकत नहीं करता है। ऐसे अफसरों के कारण ही पीआरओ ब्रांच में तैनात पुलिस वाले निरंकुश हो गए। 
इंस्पेक्टर संजीव हो या हवलदार देवेंद्र  यह सब ऐसा दुस्साहस तभी कर पाते हैं जब अमूल्य पटनायक जैसे कमजोर पुलिस कमिश्नर होते हैं। पुलिस कमिश्नर  दमदार होता तो दीपेंद्र पाठक और मधुर वर्मा भी मीडिया से इस तरह भेदभाव करने की हिम्मत नहीं कर सकते थे।

Wednesday, 28 March 2018

महिलाओं पर हमला,दिल्ली पुलिस के रक्षक बने भक्षक



महिला पत्रकारों के लिए रक्षक बने भक्षक।
आपके लिए, आपके साथ, हमेशा नहीं, दिल्ली पुलिस।
शांति ,सेवा, न्याय, सिर्फ ढोंग।
इंद्र वशिष्ठ
देश की राजधानी में एक एसएचओ द्वारा महिला का सरेआम यौन उत्पीडन किया गया और एक महिला पर पुलिस वालों ने हमला कर उसका कैमरा लूट लिया गया।
इन मामलों ने गृहमंत्री राज नाथ सिंह और पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है।
 महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होने का ढिंढोरा पीटने वाली दिल्ली पुलिस ने तुरंत केस तक दर्ज नहीं किए। क्योंकि आरोपों  के घेरे में खुद दिल्ली पुलिस थी।
कोई आम महिलाएं होती तो मामला दब जाता। इस मामले में शिकायतकर्ता महिलाएं पत्रकार थी इसलिए मामले ने तूल पकड़ा। पत्रकारों ने पुलिस मुख्यालय पर धरना तक दिया लेकिन फिर भी केस दर्ज नहीं किया गया।
इसके बाद पत्रकार देश के गृहमंत्री राज नाथ सिंह से मिले तब भी केस दर्ज नहीं किया गया। संसद तक प्रदर्शन किया गया।
तब जाकर वारदात के चौथे दिन 26 मार्च को पुलिस ने महिला पत्रकार की शिकायत पर दिल्ली कैंट थाने के एसएचओ विद्या धर के खिलाफ यौन उत्पीडन का मामला आईपीसी की धारा 354 ए के तहत दर्ज किया। इस मामले में एक वीडियो में यह खुलासा भी हुआ कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कुमार ज्ञानेश ने एसएचओ की  हिमायत में महिला पत्रकार को ''समझाने ' की 'जी तोड 'कोशिश की, ताकि वह शिकायत ही दर्ज न कराए। लेकिन महिला अपनी बात पर अडिग रही ।
पुलिस की भूमिका पर सवाल-- दिल्ली पुलिस ने महिला की शिकायत पर विजिलेंस विभाग द्वारा जांच कराई और उसके आधार पर ही केस दर्ज किया गया है। इसके बावजूद एस एच ओ को गिरफ्तार नहीं किया गया। उसे सिर्फ लाइन हाजिर किया गया है।
क्या दिल्ली पुलिस यौन उत्पीडन और लूट  के हर मामले में पहले भी विजिलेंस जांच कराती रही है या अब आगे से कराएगी ?
सीआरपीसी की धारा 154 में स्पष्ट है कि किसी भी संज्ञेय अपराध की शिकायत/सूचना पर पुलिस तुरंत एफआईआर दर्ज करें। फिर तफ्तीश करें। लेकिन इस मामले में पुलिस ने नियम-कानून को ताक पर रख दिया।
 मान लीजिए पुलिस को अगर महिला के आरोप पर भरोसा नहीं था तब भी उसका काम पहले एफआईआर दर्ज करने का था जांच में अगर आरोप झूठे निकलते तो वह झूठी शिकायत देने के आरोप में महिला  के खिलाफ आईपीसी की धारा  182 के तहत केस दर्ज कर सकती थी, लेकिन हर हालत में कानूनन  केस तो सबसे पहले दर्ज करना अनिवार्य है। 
संज्ञेय अपराध के मामले में  पहले एफआईआर दर्ज करने की बजाए विजिलेंस जांच/छानबीन कराना यह दिल्ली पुलिस कमिश्नर का  शायद अपना निजी नियम कानून हैं।
एक ही दिन (23 मार्च) में एक ही प्रदर्शन के दौरान हुई दूसरी वारदात एक महिला फोटो पत्रकार के साथ हुई, जो प्रदर्शन की कवरेज कर रही थी।उस पर पुलिस के झुंड ने  न केवल हमला किया बल्कि उसका कैमरा भी लूट लिया।
इस मामले में भी पुलिस ने तुरंत एफआईआर दर्ज नही की। वारदात के दो दिन बाद 25 मार्च को पुलिस ने इस मामले में महिला सिपाही और एक पुरुष हवलदार समेत दो पुलिस वालों को निलंबित करने की खानापूर्ति कर दी। पुलिस ने कैमरा एक अन्य पुलिस कर्मी से बरामद करने का दावा किया। वारदात के चार दिन बाद तक भी कैमरा पुलिस ने वापस नहीं किया।
इस मामले में भी किसी पुलिस वाले को गिरफ्तार नहीं किया गया है।
जिस पुलिस वाले से कैमरा बरामद हुआ उसे भी गिरफ्तार नहीं किया गया। महिला ने कैमरा लूटने की शिकायत पुलिस को दी हुई थी लूट का माल जिससे बरामद होता है उसे भी गिरफ्तार किया जाता है। लेकिन उपरोक्त दोनों मामलों में आरोपी पुलिस वाले हैं इसलिए पुलिस अफसरों ने सारे नियम कायदे की धज्जियां उड़ाई।
 ं आईपीसी में संशोधन कर धारा 166 ए ( सी) जोड़ी गई हैं
जिसमे साफ़ है कि संज्ञेय अपराध  खासकर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को दर्ज न करना दंडनीय अपराध है। ऐसा करने वाले पुलिस वाले को क़ैद और जुर्माने की सज़ा होगी।
 उपरोक्त दोनों मामलों में पुलिस ने नियम कानून का उल्लंघन  कर पुलिस अफसरों ने अपनी मनमर्जी की।
मामला पत्रकारों से जुड़ा था तब भी पत्रकारों को केस दर्ज कराने के लिए प्रदर्शन और गृहमंत्री तक जाना पड़ा। इससे पता चलता है कि देश की राजधानी में दिल्ली पुलिस आम आदमी की तो बिल्कुल भी परवाह नहीं करती ।
कुछ दिन पहले भी सीलिंग की कवरेज करने वाले एक फोटोग्राफर से उसका कैमरा छीन लिया गया और उसे पुलिस वाले इस तरह दबोच कर ले गए जैसे वह कोई बदमाश हो।


Saturday, 17 March 2018

दिल्ली क्राइम में नंबर वन


इंद्र वशिष्ठ
देश की राजधानी दिल्ली अपराध के मामले में नंबर वन पर है। दिल्ली में कानून एवं व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के अंतर्गत होने के बावजूद अपराध के मामले में दिल्ली का पहले नंबर पर होना दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय की भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।
दिल्ली में सबसे ज्यादा अपराध दस थानों के इलाकों में होते हैं।
राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगा राम अहीर ने यह जानकारी दी  कि  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो  के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016 में देश में अपराध की दर के आधार पर दिल्ली का प्रथम स्थान है।
मोबाइल और वेबसाइट के माध्यम से लोगों द्वारा
आन लाइन ई -एफआईआर दर्ज किए जाने सहित अपराध की सूचना और पंजीकरण को सुगम बनाने के लिए  उपाय किए गए हैं।
सबसे ज्यादा अपराध वाले दस  थाने ( टाॅप टेन थाने ) - दिल्ली में अपराध के सबसे ज्यादा मामले जिन दस थानों में दर्ज हुए  उनके नाम हैं मुखर्जी नगर, प्रशांत विहार,शकर पुर,उत्तम नगर, जामिया नगर, सीमा पुरी,बिंदा पुर, अंबेडकर नगर, गोविंद पुरी, और विजय विहार।
गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगा राम अहीर ने सांसद कहकशां परवीन द्वारा पूछे गए सवाल पर यह भी  बताया कि अपराध पर नियंत्रण के लिए दिल्ली पुलिस ने अनेक ठोस उपाय किए हैं। जिनमें अन्य बातों के साथ साथ अपराध संभावित इलाकों की पहचान, पुलिस की मौजूदगी को बढ़ाना, अपराध की रोकथाम के लिए पिकेट,पैदल गश्त, पहचान, निगरानी और सक्रिय अपराधियों की गिरफ्तारी करना आदि भी शामिल हैं।


Thursday, 15 February 2018

पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा गंगाधर थे दिल्ली के आख़िरी कोतवाल। पहला कोतवाल ईमानदारी की मिसाल

                                  (पहला कोतवाल फखरुद्दीन)
                                 

 ‌(Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित) 
                  
                    (प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की पत्रिका में प्रकाशित)

दिल्ली का पहला कोतवाल ईमानदारी की मिसाल।
पंडित नेहरु के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल।
(16 फरवरी दिल्ली पुलिस स्थापना दिवस)

इंद्र वशिष्ठ,

 दिल्ली पुलिस की छवि आज़ भले ही अच्छी नहीं है। लेकिन  पुलिस का इतिहास सुनहरा रहा है। एक समय ऐसा था कि कोतवाल की ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। कोतवाल की ईमानदारी के क़िस्से का दिल्ली पुलिस ने अपने इतिहास में प्रमुखता से उल्लेख किया है लेकिन आज़ के दौर में ऐसा कोई  नज़र नहीं आता जिसकी तुलना उस समय के कोतवाल से की जा सके। आज़ तो आलम यह है कि पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त है। पुलिसवाले ही जबरन वसूली और लूट तक की वारदात में शामिल पाए जाते हैं। 

दिल्ली में पुलिस व्यवस्था की शुरूआत करीब आठ सौ साल पुरानी मानी जाती है। तब दिल्ली की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी शहर कोतवाल पर हुआ करती थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा गंगाधर दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे। उस समय के शहर कोतवाल से आज देश की सबसे ज्यादा साधन सम्पन्न  दिल्ली पुलिस ने लंबी दूरी तय की है।
पहला कोतवाल--
 दिल्ली का पहला कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे । वह सन् 1237 ईसवी में 40 की उम्र  में कोतवाल बने । कोतवाल के साथ उन्हें नायब ए गिब्त(रीजेंट की गैरहाजिरी में )भी नियुक्त किया गया था। अपनी ईमानदारी के कारण ही वह तीन सुलतानों के राज-काल में लंबे अर्से तक इस पद पर रहे। 
आज भले ही दिल्ली पुलिस की छवि दागदार है,पहले के कोतवालों की ईमानदारी के अनेक किस्से इतिहास में दर्ज है।
एक बार तुर्की के कुछ अमीर उमराओं की संपत्ति सुलतान बलवन के आदेश से जब्त कर ली गई। इन लोगों ने सुलतान के आदेश को फेरने के लिए कोतवाल फखरूद्दीन को रिश्वत की पेशकश की।

कोतवाल ने कहा ‘यदि मैं रिश्वत ले लूंगा तो मेरी बात का कोई वजन नहीं रह जाएगा"।
 कोतवाल का पुलिस मुख्यालय उन दिनों किला राय पिथौरा यानी आज की महरौली में था। इतिहास में इसके बाद कोतवाल मलिक अलाउल मल्क का नाम दर्ज है। जिसे सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में कोतवाल तैनात किया था। सुलतान खिलजी ने एक बार मलिक के बारे में कहा था कि इनको कोतवाल नियुक्त कर रहा हूं जबकि यह है वजीर (प्रधानमंत्री ) पद के योग्य है। इतिहास में जिक्र है कि  एक बार जंग को जाते समय सुलतान खिलजी कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे। सुलतान ने कोतवाल से कहा था कि जंग में जीतने वाले विजेता को वह यह चाबी सौंप दें और इसी तरह वफादारी से उसके साथ भी काम करें।

मुगल बादशाह शाहजहां ने 1648 में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के साथ ही गजनफर खान  को नए शहर  शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल बनाया था। गजनफर खान को बाद में कोतवाल के साथ ही  मीर-ए-आतिश (चीफ ऑफ आर्टिलरी) भी बना दिया गया ।

कोतवाल व्यवस्था खत्म
1857 की क्रांति के बाद फिंरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसी के साथ दिल्ली में कोतवाल व्यवस्था भी खत्म हो गई। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के राज काल में उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा और पंडित मोती लाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे। 1857 की क्रांति के बाद फिरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर कत्लेआम शुरु किया तो गंगाधर अपनी पत्नी जियो देवी और चार संतानों के साथ आगरा चले गए। फ़रवरी 1861 में आगरा में ही उनकी मृत्यु हो गई। गंगाधर नेहरू की मृत्यु के तीन महीने बाद मोती लाल नेहरू का जन्म हुआ था।

आइने अकबरी के अनुसार जब शाही दरबार लगा होता था तब कोतवाल को भी दरबार में मौजूद रहना पड़ता था। वह रोजाना शहर की गतिविधियों की सूचनाएं चौकीदारों और अपने मुखबिरों के जरिए प्राप्त करता था।

अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया-
1857 में अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया।  उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा हुआ करती थी ।  1912 में राजधानी बनने के बाद तक भी दिल्ली में पुलिस व्यवस्था पंजाब पुलिस की देखरेख में चलती रही । उसी समय दिल्ली का पहला मुख्य आयुक्त नियुक्त किया गया था। जिसे पुलिस महानिरीक्षक यानी आईजी के अधिकार  दिए गए थे उसका मुख्यालय अंबाला में था। 1912 के गजट के अनुसार उस समय दिल्ली की पुलिस का नियत्रंण एक डीआईजी रैंक के अधिकारी के हाथ में होता था। दिल्ली में पुलिस की कमान एक सुपरिटेंडेंट(एसपी)और डिप्टीएसपी के हाथों में थी। उस समय दिल्ली शहर की सुरक्षा के लिए दो इंस्पेक्टर,27सब-इंस्पेक्टर,110 हवलदार,985  सिपाही और 28 घुडसवार थे । देहात के इलाके के लिए दो इंस्पेक्टर थे । उनका मुख्यालय सोनीपत और बल्लभगढ़ में था । उस समय तीन तहसील-सोनीपत,दिल्ली और बल्लभगढ़ के अंतर्गत 10 थाने आते थे । दिल्ली शहर में सिर्फ तीन थाने कोतवाली,सब्जी मंडी और पहाड़ गंज थे। सिविल लाइन में पुलिस बैरक थी । कोतवाली थाने की ऐतिहासिक इमारत को बाद में गुरूद्वारा शीश गंज को दे दिया गया ।  देहात इलाके के लिए 1861 में बना नांगलोई थाना 1872 तक  मुंडका थाने के नाम से जाना जाता था । दिल्ली में 1861 में सब्जी मंडी, मुंडका ( नांगलोई ), महरौली, कोतवाली और सदर बाजार थाना बनाए गए थे।
 1946 में पुनर्गठन -
 दिल्ली पुलिस का 1946 में पुनर्गठन किया और पुलिसवालों की संख्या दोगुनी कर दी गई। 1948 में दिल्ली में पहला पुलिस महानिरीक्षक डी डब्लू मेहरा को नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति 16 फरवरी को की गई थी इसलिए16 फरवरी को दिल्ली पुलिस का स्थापना दिवस मनाया जाता है। 1जुलाई 1978 से दिल्ली में  पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी गई । इस समय यानी साल 2019 में दिल्ली पुलिस बल की संख्या  80000 है और थानों की 209 हैं।
पुलिस का इतिहास इतना गौरवशाली  रहा है। पुलिस में मौजूद ईमानदार अफसरों को इससे प्रेरणा लेकर पुलिस के गौरव को दोबारा स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी आने वाले समय में पुलिस की छवि फिर से चमकेगी। मुंशी प्रेमचंद की कहानी नमक का दारोगा को भी याद रखना चाहिए ।
दिल्ली में महिला पुलिस कम-
दिल्ली पुलिस में इस समय पुलिसकर्मियों की कुल संख्या 80709 है जिसमें महिला पुलिसकर्मियों की संख्या 9938 है जो कि कुल पुलिस बल का 12.31 फीसदी ही है।

पुलिस मुख्यालय- 
आजादी के बाद 70 साल बाद दिल्ली पुलिस को अपना मुख्यालय  मिला है।
31-10- 2019 को दिल्ली पुलिस का मुख्यालय नई दिल्ली में संसद भवन के पास जयसिंह मार्ग स्थित अपनी नई बनी इमारत में चला गया।
इसके पहले पुलिस मुख्यालय आईटीओ और कश्मीरी गेट  में था।



(Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित) 
(आखिरी कोतवाल पंडित गंगाधर नेहरू)





(प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की पत्रिका में प्रकाशित)



(कौमी आवाज 16-2-2019 )










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