Friday, 12 February 2021

स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह समेत तीन IPS कोरोना की चपेट में। 26 जनवरी को दंगाइयों पर स्पेशल कमिश्नर ने आंसू गैस चलवाई।संयुक्त पुलिस आयुक्त ने जान बचाने के लिए नारे लगवाए।


       स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह (लाल घेरे में)

दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह समेत तीन IPS कोरोना की चपेट में।
ट्रैक्टर रैली में दंगाइयों पर स्पेशल कमिश्नर ने आंसू गैस चलवाई।
संयुक्त पुलिस आयुक्त ने जान बचाने के लिए नारे लगवाए।

इंद्र वशिष्ठ
किसान आंंदोलन के प्रमुख धरना स्थल सिंघु बार्डर टीकरी बार्डर इलाके की सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह समेत तीन आईपीएस अफसर कोरोना संक्रमित हो गए हैं। 
कोरोना की चपेट में-
 बुखार होने पर संजय सिंह ने दो दिन पहले कोरोना जांच कराई तो कोरोना संक्रमित होने का पता चला। संजय सिंह घर में ही एकांतवास में रह कर इलाज करा रहे हैंं।
संजय सिंह पश्चिम जोन के स्पेशल कमिश्नर कानून एवं व्यवस्था के पद पर तैनात हैं।
सिंघु, टीकरी बार्डर और ट्रैक्टर रैली के दौरान  कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने के दौरान भीड़ के संपर्क में आने के कारण उनके कोरोना के चपेट में आ जाने की संभावना है।

आंसू गैस के गोले दागने वाला आईपीएस-    
26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा के दौरान संजय सिंह ने अपनी पेशेवर काबिलियत  का परिचय दिया। मुकरबा चौक पर पुलिस पर हमला करने वालों पर आंसू गैस के गोले दागने का आदेश संजय सिंह द्वारा दिया गया। पुलिस बल के साथ कंधे से कंधा मिला कर  पुलिस बल का मनोबल बढ़ा कर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय संजय सिंह ने दिया। संजय सिंह के इस एक्शन का पता एक विदेशी न्यूज चैनल के वीडियो से भी चलता है। उग्र/हिंसक भीड़ को पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो उसने पुलिस पर हमला कर दिया गया। यह देखते ही संजय सिंह ने तुरंत पुलिस को उग्र भीड़ पर आंसू गैस के गोले दागने के आदेश दिए।

          संयुक्त पुलिस आयुक्त सुरेंद्र सिंह यादव 
नारे लगाने वाला आईपीएस-
आईपीएस का नारे लगाना कायराना हरकत-
दूसरी ओर संजय सिंह के मातहत उत्तरी रेंज के   संयुक्त पुलिस आयुक्त सुरेंद्र सिंह यादव का भी एक वीडियो सामने आया जिसमें परेशान/घबराए हुए लग रहे सुरेंद्र सिंह पुलिस वालों से कह रहे हैं कि इनको (किसानों) शांति से समझाओ वरना "ये हम लोगों के ऊपर से जाएंगे"। सुरेन्द्र सिंह ने जय जवान,जय किसान के नारे खुद लगाए और मातहतों से भी लगवाए। सुरेंद्र सिंह के इस तरह के व्यवहार को अनेक वरिष्ठ आईपीएस अफसरों द्वारा कायराना हरकत और पुलिस बल का मनोबल गिराने वाला माना जा रहा है। अफसरों का कहना है कि इस तरह जंग के मैदान में पीठ दिखाने वाले जवान या अफसर को पुलिस/ फौज में नौकरी से  निकाल दिया जाता है।
इस बारे में सुरेंद्र यादव का कहना है कि उन्होंने दंगाइयों पर काबू पाने के लिए अपनी ओर से हर संभव की कोशिश की। आंसू गैस का भी इस्तेमाल किया।
आईपीएस ने छिप कर जान बचाई-
हालांकि आंसू गैस और लाठीचार्ज के बावजूद किसानों को रोक पाने में पुलिस विफल हो गई। हालात इतने बेकाबू हो गए थे कि आईपीएस अफसरों तक ने मुकरबा चौक पुल के नीचे अंडरपास, झाड़-झाडियों वाले स्थान पर छिप कर अपने आप को उग्र भीड़ से बचाया।

संयुक्त आयुक्त और डीसीपी कोरोना संक्रमित-
संजय सिंह के मातहत पश्चिम रेंज की संयुक्त पुलिस आयुक्त शालिनी सिंह और बाहरी जिले के डीसीपी  ए कोन भी  कोरोना संक्रमित हो गए थे।
लगता है कि सिंघु, टीकरी बार्डर और ट्रैक्टर रैली के दौरान  कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाने के दौरान भीड़ के संपर्क में आने के कारण ही यह तीनों अफसर के कोरोना के चपेट में आए है।

बलि का बकरा बनाया-
साल 2019 में तीस हजारी अदालत में वकीलों ने पुलिस पर हमला कर एडिशनल डीसीपी हरेंद्र सिंह को भी जमीन पर गिरा कर पीटा। मौके पर बिना पर्याप्त पुलिस बल को लिए उत्तरी जिले की डीसीपी मोनिका भारद्वाज गई। मोनिका भारद्वाज को  वकीलों के सामने हाथ जोड़ कर वहां से भागना पड़ा। मोनिका भारद्वाज के साथ वकीलों ने बदसलूकी भी की लेकिन मोनिका भारद्वाज ने तुरंत उनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कराने की हिम्मत नहीं दिखाई। स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह यह सब पता लगने पर खुद तीस हजारी गए थे। 
पुलिस वालों का प्रदर्शन-
वकीलों के खिलाफ कार्रवाई न करने और घायल पुलिस वालों की सुध तक न लेने पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के खिलाफ पुलिस वालों ने पुलिस मुख्यालय पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था। इसके बावजूद अमूल्य पटनायक और डीसीपी मोनिका भारद्वाज को पद से हटाने की बजाए स्पेशल कमिश्नर संजय सिंह और घायल एडिशनल डीसीपी हरेंद्र सिंह को पद से हटा/ तबादला कर बलि का बकरा बना दिया गया था।


 




Thursday, 11 February 2021

सावधान- सिविल डिफेंस के वालंटियरों को चालान करने का अधिकार नहीं है। कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव के लिए क्या मास्क नहीं है जरुरी?

 सिविल डिफेंस के वालंटियरों को चालान करने का अधिकार नहीं है।
कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव के लिए क्या मास्क नहीं है जरुरी?

इंद्र वशिष्ठ
मास्क और दो गज दूरी का पालन न करने वालों
के चालान काट रहे सिविल डिफेंस के वालंटियर के पास अभियोजन का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। दिल्ली पुलिस ने लोगों को सतर्क करने के लिए आज सुबह यह जानकारी ट्विटर पर दी है।
चालान का अधिकार नहीं-
पुलिस के अनुसार उसे ज्ञात हुआ है कि दिल्ली सिविल डिफेंस वालंटियर्स कोविड नियमों की अवहेलना के चालान कर रहे हैं। इनके पास अभियोजन का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अक्सर इन्हें दिल्ली पुलिस कर्मी समझ लिया जाता है और इनके कुछ कुकृत्य दिल्ली पुलिस के समझ लिए जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन वालंटियर्स को पुलिस से मिलती जुलती वर्दी मिलती है। ऐसे मामलों का संज्ञान लेते हुए कुछ एफआईआर की जा चुकी है और अभियुक्तों की गिरफ्तारी हुई है।

दिल्ली की जनता से अपील है कि ऐसे किसी भी चालान को स्वीकार करने से पहले चालान कर्ता की सही पहचान अवश्य कर लें।

पुलिस अफसरों के ज्ञान चक्षु अब खुले--
दिल्ली पुलिस द्वारा आज यह जानकारी देने से पुलिस की भूमिका पर ही सवालिया निशान लग गया है। सबसे बड़ा सवाल यह  कि सिविल डिफेंस के वालंटियर्स को चालान काटने / अभियोजन का कानूनी अधिकार नहीं है यह जानकारी पुलिस ने लोगों को सतर्क करने के लिए पहले क्यों नहीं दी? 
सिविल डिफेंस के वालंटियर्स को गैरकानूनी तरीके से चालान काटने से पुलिस ने अब तक ने रोका क्यों नहीं। शुरुआत में ही उनके खिलाफ आपराधिक मामले क्यों नहीं दर्ज किए।

अफसर अनाड़ी/नाकाबिल ? -
क्या पुलिस अफसर इतने अनाडी/ नादान/नाकाबिल हैं कि अब जाकर उनके ज्ञान चक्षु खुले कि सिविल डिफेंस वालंटियर्स को चालान काटने का कानूनी अधिकार नहीं है।
सरकार, एसडीएम को भी क्या कानून की जानकारी नहीं ? -
दिल्ली सरकार ने सिविल डिफेंस के वालंटियर्स को चालान काटने के कार्य में लगाने की सार्वजनिक घोषणा की थी। वालंटियर्स अकेले और  एसडीएम के साथ टीम के रुप में भी वालंटियर्स चालान काटते  हैंं।
क्या एसडीएम को भी यह नहीं मालूम कि सिविल डिफेंस को चालान काटने का कानूनी अधिकार नहीं है।
दिल्ली पुलिस ने आज जो कहा है उससे तो यहीं लगता है दिल्ली सरकार और एसडीएम को भी कानून की जानकारी नहीं है। 
क्या दिल्ली पुलिस को शुरुआत में ही यह नहीं बताना चाहिए था कि सिविल डिफेंस वालंटियर्स को चालान काटने का कानूनी अधिकार नहीं है।

पुलिस से मारपीट-
सिविल डिफेंस वालंटियर्स द्वारा चालान काटने को लेकर आम आदमी ही नहीं पुलिस कर्मी के साथ भी मारपीट किए जाने के मामले सामने आए हैं।
नारायण थाना इलाके में पिछले साल अक्टूबर में मास्क ठीक से न लगाने पर कनाट प्लेस थाने के हवलदार नरेश के साथ मारपीट करने का मामला सामने आया था। पुलिस ने वालंटियर्स के खिलाफ उस समय सिर्फ मारपीट का मामला दर्ज किया था। चालान काटने का अधिकार अगर नहीं है तो पुलिस ने उस समय वालंटियर्स के खिलाफ इस सिलसिले में मामला क्यों नहीं दर्ज किया।

पुलिस की नाक के नीचे चालान-
दिल्ली के चौराहों पर भी झुंड के रुप में मौजूद वालंटियर्स जमकर लोगों के चालान करते हैंं। चौराहे पर ही ट्रैफिक पुलिस के जवान भी होते है। क्या इन पुलिस वालों को नहीं पता कि उनकी नाक के नीचे लोगों के चालान काट रहे वालंटियर्स को चालान काटने का कानूनी अधिकार नहीं है।
फर्जी चालान-
सिविल डिफेंस के तीन वालंटियर को नई दिल्ली जिला पुलिस ने फर्जी चालान काटने के आरोप में पिछले महीने गिरफ्तार किया था।

कमिश्नर के लिए मास्क नहीं जरूरी?-
दूसरी ओर जमकर साढे पांच लाख से ज्यादा लोगों के चालान करने वाली दिल्ली पुलिस के मुखिया  कमिश्नर सच्चिदानंद श्रीवास्तव द्वारा नियमों की धज्जियां उड़ाने का सिलसिला जारी है। कोरोना का टीका लगवाते समय भी फोटो खिंचवाने/ प्रचार के चक्कर में उन्होंने मास्क ही नहीं पहना।

स्पेशल कमिश्नर रोबिन हिबू नियम तोड़ने के आदी-
स्पेशल कमिश्नर रोबिन हिबू और अन्य अफसरों ने  नियमों की धज्जियां उड़़ाई।

       

Wednesday, 10 February 2021

दिल्ली में 1861 में दर्ज हुई थी पहली FIR, अंग्रेजों के जमाने में 'दो आने' की चोरी की भी FIR दर्ज। अपराधियों पर अंकुश लगाने का एकमात्र रास्ता अपराध की सही FIR दर्ज हो।

(Press Club of India की पत्रिका 
The Scribes World)

 






अंग्रेजों के जमाने में 'दो आने' की चोरी की भी एफआईआर दर्ज।
पंडित जवाहर लाल नेहरु के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल। 
मुगल काल के कोतवाल ईमानदारी की मिसाल।

इंद्र वशिष्ठ
पुलिस आज भले ही अपराध कम दिखाने के लिए अपराध के मामलों को सही दर्ज नहीं करती हैं। लेकिन अंग्रेजों के समय में तो दो आने कीमत के संतरे और पैंतालीस आने मूल्य का सामान चोरी होने तक के मामलों की भी रिपोर्ट यानी मुकदमा /एफआईआर दर्ज की जाती थी।
पहली एफआईआर-
दिल्ली में पुलिस ने पहली एफआईआर पैंतालीस आने का सामान चोरी होने की शिकायत पर दर्ज की थी। वर्ष 1861 में यानी आज से करीब 160 वर्ष पहले यह पहली एफआईआर सब्जी मंडी थाने में दर्ज की गई थी।
 हुक्का,बर्तन चोरी-
उत्तरी दिल्ली के सब्जी मंडी थाने में 18 अक्टूबर 1861 को यह पहली एफआईआर उर्दू/फारसी भाषा में दर्ज हुई थी। कटरा शीश महल निवासी मोइनुद्दीन वल्द मोहम्मद यार खान की शिकायत पर यह एफआईआर दर्ज की गई।आठ बर्तन (देगची,देगचा,कटोरा,लोटा), हुक्का, कुल्फी और महिलाओं के वस्त्र चोरी के मामले में यह एफआईआर दर्ज की गई थी। चोरी हुए सामान का मूल्य पैंतालीस आने (2.81 रुपए)था।

ऐतिहासिक 5 थाने-
अंग्रेजों ने 1861 में दिल्ली शहर और देहात में पांच थाने सब्जी मंडी, कोतवाली, सदर बाजार, महरौली और मुंडका(अब नांगलोई) बनाए थे। उस समय एफआईआर/ प्राथमिकी बहुत ही छोटी यानी संक्षिप्त रुप में लिखी जाती थी।जबकि आजकल कई-कई पृष्ठ की होती है। 

"रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात"- 
उर्दू-फारसी में एफआईआर-
एफआईआर/ प्राथमिकी को उस समय "रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात" के नाम से जाना जाता था। एफआईआर में उर्दू और फारसी की मिलीजुली भाषा का इस्तेमाल किया जाता था।


कोतवाली थाने की पहली एफआईआर-
कोतवाली थाने में पहली एफआईआर 4 नवंबर 1861 को दर्ज की गई। उर्दू और फारसी भाषा में लिखी गई इस एफआईआर के अनुवादित कुछ अंश निम्न पंक्तियों में प्रस्तुत हैंं।
 घर में सेंधमारी-
कोतवाली थाना में पहला मुकदमा 4 नवंबर 1861 की सुबह करीब 7 बजे दर्ज किया गया। मोहम्मद अली वल्द शगीर अली बेग ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई कि आज सुबह जब वह सो कर उठा तो उसने अपने घर में सेंध लगी देखी। उसने 24 रुपए नगद और कुछ सामान गायब पाया। पुलिस ने इस संबंध में नकबजनी यानी सेंधमारी का मामला दर्ज किया था।

दुकान में सेंध-
कोतवाली थाना में  दूसरी एफआईआर 8 नवंबर 1861 को दर्ज की गई। दरीबा खुर्द के एक दुकानदार मोतीमल सुपुत्र दौलत राम ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि आज सुबह मैंने देखा कि मेरी दुकान में पड़ोसी अमजद अली की दुकान की तरह से सेंध लगाई गई है। लेकिन दुकान से कोई सामान चोरी नहीं हुआ। मोती मल ने इस मामले में अमजद अली के नौकर पर संदेह प्रकट किया।
सब्जी मंडी थाने में दर्ज कई दिलचस्प एफआईआर। 
दो आने के संतरे चोरी की एफआईआर -
सब्जी मंडी थाने में दो आने कीमत के 11 संतरे चोरी का मामला 16 फरवरी 1891 को दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता राम प्रसाद ने संतरे चोरी करने वाले राम बक्श सुपुत्र अल्लाह बक्श को रंगे हाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था। अदालत ने 23 दिसंबर 1891 को राम बक्श को एक महीना कैद की सजा सुनाई।
खच्चर/ टट्टू चोरी-
30 अप्रैल 1895 को एक खच्चर/ टट्टू चोरी का मामला दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता ने अपने पुराने नौकर पर संदेह जताया था। इस मामले को पुलिस सुलझा नहीं पाई। 
जेबतराशी -
एक जेबकतरे को चार आने की चोरी करते हुए पकडे़ जाने की एफआईआर 13 दिसंबर 1894 को दर्ज की गई। तुलसी की जेब से चार आने की चोरी करते हुए हरविंदर रंगे हाथों पकड़ा गया। आदी अपराधी हरविंदर को अदालत ने दो साल कैद की सजा सुनाई।
पायजामा चोर को कोडे़ की सजा-
ज्योति का पायजामा चोरी करने के मामले में 10 मार्च 1897 को राम दयाल को सब्जी मंडी पुलिस ने गिरफ्तार किया। अदालत ने उसे 5 कोड़े लगाने की सजा सुनाई।


कुरान शरीफ चोरी-
महरौली थाने में अल्लादिया ने 23 जून 1899 को गुट्टू के खिलाफ कुरान शरीफ चोरी करने की रिपोर्ट दर्ज कराई। अल्लादिया ने पुलिस को बताया कि गुट्टू मस्जिद में आया और अजमेर शरीफ जाने के लिए उससे मदद मांगी। उसने चंदा एकत्र करके उसे दिया, खाना खिलाया और रात को मस्जिद में ठहराया। गुट्टू सुबह कुरान शरीफ चोरी करके ले गया। सिपाही अब्दुल करीम ने एक दुकान पर गुट्टू को पकड़ लिया। अदालत ने उसे एक सप्ताह कैद की सजा दी। 
इन मामलों से पता चलता है कि अंग्रेजों के जमाने में अपराध के मामले कितनी आसानी से दर्ज किए जाते थे।

अपराध कम दिखाने के लिएआंकड़ों की बाजीगरी बंद हो -
दूसरी ओर दिल्ली पुलिस द्वारा अपराध के आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम दिखाने की  परंपरा आज भी  कायम है। अपराध कम दिखाने के लिए ही  पुलिस लूट, मोबाइल फोन/पर्स की झपटमारी और जेबकटने/चोरी के सभी मामलों को सही दर्ज नहीं करती या हल्की धारा में दर्ज करती है। पुलिस द्वारा हत्या तक के मामले को भी दर्ज न किए जाने के मामले भी समय समय पर सामने आते रहे हैं। पुलिस द्वारा अपराध को सही दर्ज न करने के कारण ही अपराध और अपराधी बढ़ रहे हैं। जब तक पुलिस अपराध के सभी मामलों को सही तरह से दर्ज करना शुरु नहीं करेगी  अपराध और अपराधियों पर अंकुश नहीं लग पाएगा। अपराध को दर्ज न करके तो पुलिस एक तरह से ही खुद अपराधी की मदद करने का गुनाह करती है।
सदर बाजार थाना-
सदर बाजार थाने में पहली एफआईआर दल्लू माली नामक शख्स ने 31 दिसंबर 1861 को कराई थी। थाना आज भी उसी समय की पुरानी ऐतिहासिक और संरक्षित इमारत में चल रहा है। 

सीटी, वायरलैस सेट- 
दिल्ली पुलिस ने अंग्रेजों के समय में दर्ज एफआईआर के अलावा पुलिस से जुड़ी अनेक ऐतिहासिक वस्तुएं अपने संग्रहालय में संभाल कर रखी हुई है। इनमें पुलिस द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली साल 1926 में ब्रिटेन में बनी सीटी यानी व्हिसल और 1944 में इस्तेमाल किया गया पहला वायरलैस सेट भी शामिल है।


पंडित जवाहर लाल नेहरु के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल।

दिल्ली का पहला कोतवाल ईमानदारी की मिसाल।

दिल्ली पुलिस की छवि आज़ भले ही अच्छी नहीं है। लेकिन  पुलिस का इतिहास सुनहरा रहा है। एक समय ऐसा था कि कोतवाल की ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। कोतवाल की ईमानदारी के क़िस्सों का दिल्ली पुलिस ने अपने इतिहास में प्रमुखता से उल्लेख किया है लेकिन आज़ के दौर में ऐसा कोई  नज़र नहीं आता जिसकी तुलना उस समय के कोतवाल से की जा सके। आज़ तो आलम यह है कि पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त है। पुलिसवाले ही जबरन वसूली और लूट तक की वारदात में शामिल पाए जाते हैं। 

दिल्ली में पुलिस व्यवस्था की शुरूआत करीब आठ सौ साल पुरानी मानी जाती है। तब दिल्ली की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी शहर कोतवाल पर हुआ करती थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा गंगाधर दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे। उस समय के शहर कोतवाल से आज देश की सबसे ज्यादा साधन सम्पन्न  दिल्ली पुलिस ने लंबी दूरी तय की है।

            मलिक उल उमरा फखरूद्दीन

पहला कोतवाल--

 दिल्ली का पहला कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे । वह सन् 1237 ईसवी में 40 की उम्र  में कोतवाल बने । कोतवाल के साथ उन्हें नायब ए गिब्त(रीजेंट की गैरहाजिरी में )भी नियुक्त किया गया था। अपनी ईमानदारी के कारण ही वह तीन सुलतानों के राज-काल में लंबे अर्से तक इस पद पर रहे। 

आज भले ही दिल्ली पुलिस की छवि दागदार है,पहले के कोतवालों की ईमानदारी के अनेक किस्से इतिहास में दर्ज है।

एक बार तुर्की के कुछ अमीर उमराओं की संपत्ति सुलतान बलवन के आदेश से जब्त कर ली गई। इन लोगों ने सुलतान के आदेश को फेरने के लिए कोतवाल फखरूद्दीन को रिश्वत की पेशकश की।

कोतवाल ने कहा ‘यदि मैं रिश्वत ले लूंगा तो मेरी बात का कोई वजन नहीं रह जाएगा"

 कोतवाल का पुलिस मुख्यालय उन दिनों किला राय पिथौरा यानी आज की महरौली में था। इतिहास में इसके बाद कोतवाल मलिक अलाउल मल्क का नाम दर्ज है। जिसे सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में कोतवाल तैनात किया था। सुलतान खिलजी ने एक बार मलिक के बारे में कहा था कि इनको कोतवाल नियुक्त कर रहा हूं जबकि यह है वजीर (प्रधानमंत्री ) पद के योग्य है। इतिहास में जिक्र है कि  एक बार जंग को जाते समय सुलतान खिलजी कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे। सुलतान ने कोतवाल से कहा था कि जंग में जीतने वाले विजेता को वह यह चाबी सौंप दें और इसी तरह वफादारी से उसके साथ भी काम करें।

मुगल बादशाह शाहजहां ने 1648 में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के साथ ही गजनफर खान  को नए शहर  शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल बनाया था। गजनफर खान को बाद में कोतवाल के साथ ही  मीर-ए-आतिश (चीफ ऑफ आर्टिलरी) भी बना दिया गया ।

                  पंडित गंगाधर नेहरू 

कोतवाल व्यवस्था खत्म- 

1857 की क्रांति के बाद फिंरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसी के साथ दिल्ली में कोतवाल व्यवस्था भी खत्म हो गई। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के राज काल में उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा और पंडित मोती लाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे। 1857 की क्रांति के बाद फिरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर कत्लेआम शुरु किया तो गंगाधर अपनी पत्नी जियो देवी और चार संतानों के साथ आगरा चले गए। फ़रवरी 1861 में आगरा में ही उनकी मृत्यु हो गई। गंगाधर नेहरू की मृत्यु के तीन महीने बाद मोती लाल नेहरू का जन्म हुआ था।

आइने अकबरी के अनुसार जब शाही दरबार लगा होता था तब कोतवाल को भी दरबार में मौजूद रहना पड़ता था। वह रोजाना शहर की गतिविधियों की सूचनाएं चौकीदारों और अपने मुखबिरों के जरिए प्राप्त करता था।

अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया-

1857 में अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया।  उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा हुआ करती थी ।  1912 में राजधानी बनने के बाद तक भी दिल्ली में पुलिस व्यवस्था पंजाब पुलिस की देखरेख में चलती रही । उसी समय दिल्ली का पहला मुख्य आयुक्त नियुक्त किया गया था। जिसे पुलिस महानिरीक्षक यानी आईजी के अधिकार  दिए गए थे उसका मुख्यालय अंबाला में था। 1912 के गजट के अनुसार उस समय दिल्ली की पुलिस का नियत्रंण एक डीआईजी रैंक के अधिकारी के हाथ में होता था। दिल्ली में पुलिस की कमान एक सुपरिटेंडेंट(एसपी)और डिप्टीएसपी के हाथों में थी। उस समय दिल्ली शहर की सुरक्षा के लिए दो इंस्पेक्टर,27सब-इंस्पेक्टर,110 हवलदार,985  सिपाही और 28 घुडसवार थे । देहात के इलाके के लिए दो इंस्पेक्टर थे । उनका मुख्यालय सोनीपत और बल्लभगढ़ में था । उस समय तीन तहसील-सोनीपत,दिल्ली और बल्लभगढ़ के अंतर्गत 10 थाने आते थे । दिल्ली शहर में सिर्फ तीन थाने कोतवाली,सब्जी मंडी और पहाड़ गंज थे। सिविल लाइन में पुलिस बैरक थी । कोतवाली थाने की ऐतिहासिक इमारत को बाद में गुरूद्वारा शीश गंज को दे दिया गया ।  देहात इलाके के लिए 1861 में बना नांगलोई थाना 1872 तक  मुंडका थाने के नाम से जाना जाता था ।

1946 में पुनर्गठन -

 दिल्ली पुलिस का 1946 में पुनर्गठन किया और पुलिसवालों की संख्या दोगुनी कर दी गई। 1948 में दिल्ली में पहला पुलिस महानिरीक्षक डी डब्लू मेहरा को नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति 16 फरवरी को की गई थी इसलिए 16 फरवरी को दिल्ली पुलिस का स्थापना दिवस मनाया जाता है। 1जुलाई 1978 से दिल्ली में  पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी गई । इस समय यानी  दिल्ली पुलिस बल की संख्या लगभग 81 हजार है और थानों की संख्या 209 हैं।

पुलिस मुख्यालय- 

आजादी के बाद 70 साल बाद दिल्ली पुलिस को अपना मुख्यालय मिला है।

31-10- 2019 को दिल्ली पुलिस का मुख्यालय नई दिल्ली में संसद भवन के पास जयसिंह मार्ग स्थित अपनी नई बनी इमारत में चला गया।

इसके पहले पुलिस मुख्यालय आईटीओ और कश्मीरी गेट में था।

पुलिस का इतिहास इतना गौरवशाली  रहा है। पुलिस में मौजूद ईमानदार अफसरों को इससे प्रेरणा लेकर पुलिस के गौरव को दोबारा स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी आने वाले समय में पुलिस की छवि फिर से चमकेगी। मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दारोगा' को भी याद रखना चाहिए ।

   (Press Club of India की पत्रिका 

 The Scribes World में प्रकाशित) 


         (Press Club of India की पत्रिका The Scribes World)