पंडित नेहरू के दादा थे दिल्ली के आखिरी कोतवाल
इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस की छवि आज़ भले ही उतनी अच्छी नहीं है। लेकिन पुलिस का इतिहास सुनहरा रहा है। एक समय ऐसा था कि दिल्ली के कोतवाल की ईमानदारी की मिसाल दी जाती थी। कोतवाल की ईमानदारी के क़िस्सों का दिल्ली पुलिस ने अपने इतिहास में प्रमुखता से उल्लेख किया है लेकिन आज़ के दौर में ऐसा कोई पुलिस अफसर नज़र नहीं आता, जिसकी तुलना उस समय के कोतवाल से की जा सके। आज़ तो आलम यह है कि पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त है। पुलिसवाले ही जबरन वसूली, लूट, अपराधियों से सांठगांठ जैसे संगीन अपराध तक में शामिल पाए जाते हैं।
पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है और पुलिसकर्मी निरंकुश है। अपराध को आंकड़ों के माध्यम से कम दिखाने के लिए पुलिस अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर तक दर्ज नही करती।
सच्चाई यह है कि पुलिस सभी अपराध के मामलों की सही और उचित धारा में एफआईआर दर्ज करे, तो ही अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाया जा सकता है।
अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है कि पुलिस अपराध के सभी मामलों की सही और उचित धारा में एफआईआर दर्ज करे।
ईमानदारी की कसौटी-
सिर्फ रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार नहीं होता। पुलिस अफसर ने अगर अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से नहीं किया, जिस व्यक्ति का जो अधिकार/हक है वह उसे नहीं दिया, अपराध के मामले को दर्ज ही नहीं किया, किसी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करना, किसी बेकसूर को फंसाना/ गिरफ्तार करना, अपराधियों से सांठगांठ करने वाले मातहत पुलिसकर्मी को बचाना आदि तो भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि संगीन अपराध भी है। आईपीएस अफसरों द्वारा घरेलू/ निजी काम के लिए पुलिसकर्मियों को रखना/फटीक कराना। सरकारी खजाने से फिजूल खर्ची करना। सरकारी कारों का जमकर परिवार के लिए इस्तेमाल करना भी भ्रष्टाचार ही होता है। रिटायर्ड आईपीएस अफसर भी अवैध रूप से पुलिसकर्मियों, सरकारी कार/ ड्राइवर/ रसोईया रखते हैं।
ईमानदारी नजर आना ज़रूरी-
दरअसल जो वाकई ईमानदार होता है उसे ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं होती। उसके कार्य और आचरण से यह स्पष्ट रूप से जग जाहिर हो जाता है। वैसे भी जो ईमानदार हो तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है।
एफआईआर दर्ज नहीं करती-
पुलिस आज भले ही अपराध कम दिखाने के लिए अपराध के सभी मामलों को सही दर्ज तक नहीं करती हैं। लेकिन अंग्रेजों के समय में तो दो आने कीमत के संतरों और पैंतालीस आने मूल्य का सामान चोरी होने तक के मामलों की भी रिपोर्ट यानी मुकदमा /एफआईआर दर्ज की जाती थी।
पहली एफआईआर-
उत्तरी दिल्ली के सब्जी मंडी थाने में 18 अक्टूबर 1861 को पहली एफआईआर उर्दू/फारसी भाषा में दर्ज हुई थी। कटरा शीश महल निवासी मोइनुद्दीन वल्द मोहम्मद यार खान की शिकायत पर यह एफआईआर दर्ज की गई। आठ बर्तन (देगची, देगचा, कटोरा, लोटा), हुक्का, कुल्फी और महिलाओं के वस्त्र चोरी के मामले में यह एफआईआर दर्ज की गई थी। चोरी हुए सामान का मूल्य पैंतालीस आने (2.81 रुपए)था।
सब्जी मंडी थाने में ही दो आने कीमत के 11 संतरे चोरी का मामला 16 फरवरी 1891 को दर्ज किया गया। शिकायतकर्ता राम प्रसाद ने संतरे चोरी करने वाले राम बक्श सुपुत्र अल्लाह बक्श को रंगे हाथों पकड़ कर पुलिस के हवाले किया था। अदालत ने 23 दिसंबर 1891 को राम बक्श को एक महीना कैद की सजा सुनाई।
"रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात"-
एफआईआर/ प्राथमिकी को उस समय "रजिस्टर रूजू-ए-मुकदमात" के नाम से जाना जाता था। एफआईआर में उर्दू और फारसी की मिलीजुली भाषा का इस्तेमाल किया जाता था। उस समय एफआईआर बहुत ही छोटी यानी संक्षिप्त रुप में लिखी जाती थी। जबकि आजकल कई पृष्ठ की होती है।
800 साल पुरानी पुलिस व्यवस्था-
दिल्ली में पुलिस व्यवस्था की शुरूआत करीब आठ सौ साल पुरानी मानी जाती है। तब दिल्ली की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी शहर कोतवाल पर हुआ करती थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा गंगाधर दिल्ली के आखिरी कोतवाल थे। उस समय के शहर कोतवाल से आज देश की सबसे ज्यादा साधन सम्पन्न दिल्ली पुलिस ने लंबी दूरी तय की है।
पहला कोतवाल ईमानदारी की मिसाल -
दिल्ली का पहला कोतवाल मलिक उल उमरा फखरूद्दीन थे। वह सन् 1237 ईसवी में 40 की उम्र में कोतवाल बने । कोतवाल के साथ उन्हें नायब ए गिब्त(रीजेंट की गैरहाजिरी में )भी नियुक्त किया गया था। अपनी ईमानदारी के कारण ही वह तीन सुलतानों के राज-काल में लंबे अर्से तक इस पद पर रहे।
आज भले ही दिल्ली पुलिस की छवि दागदार है, लेकिन पहले के कोतवालों की ईमानदारी के अनेक किस्से इतिहास में दर्ज है।
एक बार तुर्की के कुछ अमीर उमराओं की संपत्ति सुलतान बलवन के आदेश से जब्त कर ली गई। इन लोगों ने सुलतान के आदेश को फेरने के लिए कोतवाल फखरूद्दीन को रिश्वत की पेशकश की।
कोतवाल ने कहा "यदि मैं रिश्वत ले लूंगा तो मेरी बात का कोई वजन नहीं रह जाएगा"।
कोतवाल का पुलिस मुख्यालय उन दिनों किला राय पिथौरा यानी आज की महरौली में था। इतिहास में इसके बाद कोतवाल मलिक अलाउल मल्क का नाम दर्ज है। जिसे सुलतान अलाउद्दीन खिलजी ने 1297 में कोतवाल तैनात किया था। सुलतान खिलजी ने एक बार मलिक के बारे में कहा था कि इनको कोतवाल नियुक्त कर रहा हूं जबकि यह है वजीर (प्रधानमंत्री ) पद के योग्य है। इतिहास में जिक्र है कि एक बार जंग को जाते समय सुलतान खिलजी कोतवाल मलिक को शहर की चाबी सौंप गए थे। सुलतान ने कोतवाल से कहा था कि जंग में जीतने वाले विजेता को वह यह चाबी सौंप दें और इसी तरह वफादारी से उसके साथ भी काम करें।
मुगल बादशाह शाहजहां ने 1648 में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के साथ ही गजनफर खान को नए शहर शाहजहांनाबाद का पहला कोतवाल बनाया था। गजनफर खान को बाद में कोतवाल के साथ ही मीर-ए-आतिश (चीफ ऑफ आर्टिलरी) भी बना दिया गया।
कोतवाल व्यवस्था खत्म-
1857 की क्रांति के बाद फिंरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया और उसी के साथ दिल्ली में कोतवाल व्यवस्था भी खत्म हो गई। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के राज काल में उस समय पंडित जवाहर लाल नेहरू के दादा और मोती लाल नेहरू के पिता पंडित गंगाधर नेहरू दिल्ली के कोतवाल थे। 1857 की क्रांति के बाद फिरंगियों ने दिल्ली पर कब्जा कर कत्लेआम शुरु किया तो गंगाधर अपनी पत्नी जियो देवी और चार संतानों के साथ आगरा चले गए। फ़रवरी 1861 में आगरा में ही उनकी मृत्यु हो गई। गंगाधर नेहरू की मृत्यु के तीन महीने बाद मोती लाल नेहरू का जन्म हुआ था।
आइने अकबरी के अनुसार जब शाही दरबार लगा होता था तब कोतवाल को भी दरबार में मौजूद रहना पड़ता था। वह रोजाना शहर की गतिविधियों की सूचनाएं चौकीदारों और अपने मुखबिरों के जरिए प्राप्त करता था।
अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया-
1857 में अंग्रेजों ने पुलिस को संगठित रूप दिया। उस समय दिल्ली पंजाब का हिस्सा हुआ करती थी। साल 1912 में राजधानी बनने के बाद तक भी दिल्ली में पुलिस व्यवस्था पंजाब पुलिस की देखरेख में चलती रही। उसी समय दिल्ली का पहला मुख्य आयुक्त नियुक्त किया गया था। जिसे पुलिस महानिरीक्षक यानी आईजी के अधिकार दिए गए थे उसका मुख्यालय अंबाला में था। 1912 के गजट के अनुसार उस समय दिल्ली की पुलिस का नियत्रंण एक डीआईजी रैंक के अधिकारी के हाथ में होता था। दिल्ली में पुलिस की कमान एक सुपरिटेंडेंट(एसपी)और डिप्टी एसपी के हाथों में थी। उस समय दिल्ली शहर की सुरक्षा के लिए दो इंस्पेक्टर, 27 सब-इंस्पेक्टर,110 हवलदार, 985 सिपाही और 28 घुडसवार थे। देहात के इलाके के लिए दो इंस्पेक्टर थे। उनका मुख्यालय सोनीपत और बल्लभगढ़ में था । उस समय तीन तहसील-सोनीपत, दिल्ली और बल्लभगढ़ के अंतर्गत 10 थाने आते थे ।
ऐतिहासिक 5 थाने-
अंग्रेजों ने 1861 में दिल्ली शहर और देहात में पांच थाने सब्जी मंडी, कोतवाली, सदर बाजार, महरौली और मुंडका(अब नांगलोई) बनाए थे। सिविल लाइन में पुलिस बैरक थी।
कोतवाली थाने की ऐतिहासिक इमारत को बाद में गुरूद्वारा शीश गंज को दे दिया गया। देहात इलाके के लिए 1861 में बना नांगलोई थाना 1872 तक मुंडका थाने के नाम से जाना जाता था।
1946 में पुनर्गठन -
दिल्ली पुलिस का 1946 में पुनर्गठन किया और पुलिसवालों की संख्या दोगुनी कर दी गई। 1948 में दिल्ली में पहला पुलिस महानिरीक्षक डी डब्लू मेहरा को नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति 16 फरवरी को की गई थी इसलिए16 फरवरी को दिल्ली पुलिस का स्थापना दिवस मनाया जाता है। 1 जुलाई 1978 से दिल्ली में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू कर दी गई।
पुलिस का इतिहास इतना गौरवशाली रहा है। पुलिस में मौजूद ईमानदार अफसरों को इससे प्रेरणा लेकर पुलिस के गौरव को दोबारा स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी आने वाले समय में पुलिस की छवि फिर से चमकेगी।
पुलिस मुख्यालय-
31 अक्टूबर 2019 को दिल्ली पुलिस का मुख्यालय नई दिल्ली में संसद भवन के पास जयसिंह मार्ग स्थित अपनी नई बनी 17 मंजिला इमारत में चला गया। इसके पहले पुलिस मुख्यालय आईटीओ और कश्मीरी गेट में था। दिल्ली में इस समय 225 थाने हैं और पुलिस बल की संख्या लगभग 90 हजार है।
( लेखक इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।)
Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित लेख
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