सीबीआई निभा रही दिल्ली पुलिस से भाईचारा
दिल्ली पुलिस पर करम, चंडीगढ़ पुलिस पर सितम
इंद्र वशिष्ठ,
सीबीआई आजकल दिल्ली पुलिस के भ्रष्ट अफसरों की गिरफ्तारी तक की भी आधिकारिक तौर पर सूचना मीडिया को नहीं दे रही हैं।
ऐसा करके सीबीआई एक तरह से भ्रष्ट अफसरों के दाग/ पाप छिपाने की कोशिश कर रही है।
ये रिश्ता क्या कहलाता है-
भ्रष्टाचार के मामले में आईपीएस के शामिल पाए जाने पर तो सीबीआई को जैसे सांप सूंघ जाता है। सीबीआई ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करने की बजाए आईपीएस का आईपीएस से है, भाईचारा वाला रिश्ता निभाती हुई लग रही है। सीबीआई के चुप्पी साध लेने से उसकी भूमिका पर सवालिया निशान लग जाता है।
आईपीएस के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी ?
पिछले एक महीने में दिल्ली पुलिस के भ्रष्ट अफसरों की गिरफ्तारी के 4 मामले सामने आए हैं। इनमें से इंस्पेक्टर प्रदीप सिंह और इंस्पेक्टर सुभाष यादव के मामलों में आईपीएस अधिकारी भी शामिल बताए जाते है। सीबीआई ने चारों मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी आधिकारिक तौर पर मीडिया को नहीं दी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो सीबीआई भ्रष्ट पुलिस अफसरों की गिरफ्तारी की सूचना तक आधिकारिक तौर पर नहीं दे रही। क्या वह आईपीएस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी ?
पाप छिपता नहीं-
सच्चाई ये है कि भ्रष्ट पुलिसकर्मियों के पकड़े जाते ही सूचना तुरंत दिल्ली पुलिस में फैल जाती है। ऐसे में सीबीआई द्वारा आधिकारिक तौर पर सूचना नहीं देना बड़ी अजीब सी बात है। ऐसा पहली बार हो रहा है। जिस मामले में सीबीआई भ्रष्ट अफसरों को रंगेहाथ पकड़ने में विफल हो जाती थी पहले सिर्फ वही मामले छिपाती थी। सीबीआई ये भूल रही है कि भ्रष्ट अफसरों की गिरफ्तारी का ज्यादा से ज्यादा प्रचार करने से ही लोगों में सीबीआई के प्रति विश्वास बढ़ेगा। तभी ज्यादा से ज्यादा लोग भ्रष्ट अफसरों को पकड़वाने की हिम्मत दिखाएंगे।
आईपीएस ने मांगे 3 करोड़-
सीबीआई ने 8 जून को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर प्रदीप सिंह परमार को एक करोड़ रुपये रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किया। इंस्पेक्टर प्रदीप के गॉडफ़ादर वरिष्ठ आईपीएस अफसर ने सीबीआई में दर्ज मामले के आरोपी एन राजा से तीन करोड़ रुपये रिश्वत मांगी थी। इस वरिष्ठ आईपीएस अफसर ने सीबीआई में अपने संपर्कों/ प्रभाव/ सांठगांठ के दम आरोपी को बचा लेने का दावा किया था।
गॉडफ़ादर का नाम एफआईआर में क्यों नहीं लिखा -
सीबीआई द्वारा इस मामले में चुप्पी साध लेने और इंस्पेक्टर प्रदीप के गॉडफ़ादर
वरिष्ठ आईपीएस अफसर का नाम तक भी एफआईआर में दर्ज नहीं करने से वह सवालों के घेरे में आ गई है।
सीबीआई की एफआईआर में इंस्पेक्टर प्रदीप, सीबीआई के मामले के आरोपी एन राजा, उसके सहयोगी राजकुमार का तो पूरा ब्यौरा दिया गया। इंस्पेक्टर प्रदीप 14-5-2026 को इन दोनों को अपने आका वरिष्ठ सरकारी अफसर के दफ़्तर में ले गया। उस वरिष्ठ अफसर ने एन राजा को सीबीआई के मामले में बचाने का आश्वासन दिया। उसने तीन करोड़ रुपये रिश्वत मांगी। जिसमें डेढ़ करोड़ रुपये एडवांस मांगे। लेकिन इसके बावजूद सीबीआई ने एफआईआर में वरिष्ठ अफसर का नाम न लिख कर अज्ञात वरिष्ठ सरकारी अफसर दर्ज किया।
आईपीएस का नाम मालूम नहीं था ?-
सीबीआई के पास जब इतनी पुख्ता जानकारी थी कि हवाला से रकम मंगा कर आठ जून को दिल्ली में इंस्पेक्टर प्रदीप को दी जाएगी। इस सूचना के आधार पर ही सीबीआई ने इंस्पेक्टर प्रदीप और बिचौलिए राजकुमार को रंगेहाथ गिरफ्तार भी कर लिया।
ऐसे में क्या देश की तेजतर्रार मानी जाने वाली सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने से पहले इंस्पेक्टर के आका आईपीएस का नाम मालूम नहीं होगा। इस बात पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। इससे तो यह लगता है कि सीबीआई ने आईपीएस अधिकारी को बचाने के लिए ही जानबूझकर एफआईआर में उस आईपीएस अधिकारी का नाम नहीं लिखा।
नीयत-
सीबीआई की नीयत अगर बिल्कुल सही और साफ़ है तो उसे बताना चाहिए कि आईपीएस अधिकारी का नाम एफआईआर में क्यों नहीं लिखा गया। इंस्पेक्टर प्रदीप की गिरफ्तारी की आधिकारिक तौर पर सूचना क्यों नहीं दी गई।
100 करोड़ी इंस्पेक्टर -
द्वारका जिले के एंटी नारकोटिक्स सेल में तैनात हवलदार अजय को सीबीआई ने 21 अप्रैल 2026 को 2 लाख रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। सेल के दफ़्तर से 48 लाख रुपये से ज्यादा की रकम बरामद हुई।
हवलदार की गिरफ्तारी की सूचना सीबीआई ने दी थी।
लेकिन उस समय सीबीआई ने नारकोटिक्स सेल के इंस्पेक्टर सुभाष यादव को गिरफ्तार नहीं किया। पुलिस में चर्चा है कि इंस्पेक्टर सुभाष को उसके गॉडफ़ादर आईपीएस ने उस समय गिरफ्तारी से बचा लिया था।
इससे सीबीआई की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया। मामले ने तूल पकड़ा तो सीबीआई ने 11 मई को इंस्पेक्टर सुभाष यादव को गिरफ्तार किया।
इंस्पेक्टर सुभाष की 100 करोड़ रुपये की संपत्ति/लेन देन और कई आईपीएस से साठगांठ की खबरें आई। सीबीआई ने इंस्पेक्टर सुभाष की गिरफ्तारी की खबर भी मीडिया को आधिकारिक तौर पर नहीं दी।
सीबीआई को बताना चाहिए कि
इंस्पेक्टर सुभाष यादव को 21 अप्रैल को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया। इस मामले में कोई आईपीएस अधिकारी शामिल हैं या नहीं।
दाग छिपाए-
सीबीआई ने 10 जून को पश्चिम जिले के हरिनगर साइबर थाना में तैनात एएसआई शिव प्रकाश और सब- इंस्पेक्टर अरविंद सिंह के ख़िलाफ़ राजस्थान के एक व्यक्ति को गिरफ्तार करने की धमकी दे कर 20 लाख रुपये रिश्वत मांगने का मामला दर्ज किया।
सीबीआई ने 5 जून को अमर कॉलोनी थाने में तैनात सब- इंस्पेक्टर सचिन और हवलदार प्रवीण कुतेल को रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। इन दोनों मामलों में भी पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की सूचना सीबीआई ने आधिकारिक तौर पर नहीं दी।
दाग दिखाए -
दूसरी ओर सीबीआई ने 6 जून को चंडीगढ़ में सेक्टर 39 थाने के एएसआई हितेश कुमार को 40 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार करने की सूचना आधिकारिक तौर पर दी। एएसआई ने सड़क दुर्घटना के मामले में एफआईआर दर्ज न करने और वाहन छोड़ देने के लिए 50 हजार रुपये रिश्वत मांगी थी।
इससे सीबीआई द्वारा पुलिस-पुलिस में किए जा रहे भेदभाव का पता चलता है।
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