एसीपी वफ़ा करके तन्हा रह गया,
एसएचओ दगा दे गया
वकीलों के अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले सैकड़ों पुलिसकर्मी(खासकर महिला पुलिसकर्मी)और एसीपी मनस्वी वशिष्ठ पुलिस में हीरो बन गए हैं। वहीं इस मामले में शाहदरा एसएचओ अरुण कुमार नाकाबिल/ कायर/गद्दार के रुप में उभर कर सामने आया हैं।
महिला की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की?-
एसएचओ अरुण कुमार ने उस गर्भवती शीतल ठाकुर की शिकायत पर भी वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज नहीं की, जिसकी दुकान के बाहर 23 अक्टूबर को बाइक खड़ी करने को लेकर वकीलों ने शीतल और उसके पति राहुल ठाकुर के साथ मारपीट की थी। वीडियो में साफ़ है कि थाने में भी वकीलों ने शीतल और उसके पति राहुल ठाकुर को पीटा, आत्मरक्षा में राहुल ने नेम प्लेट से वकील ललित बंसल के सिर पर वार किया। पुलिस ने दबाव में वकीलों की शिकायत पर राहुल के ख़िलाफ़ तो एफआईआर दर्ज कर ली। लेकिन शीतल और उसकी बहन श्वेता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज नहीं की।
कमिश्नर-आईपीएस बताएं-
कमिश्नर अनुराग कुमार, स्पेशल पुलिस कमिश्नर (कानून एवं व्यवस्था) देवेश श्रीवास्तव, पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त पुलिस आयुक्त मिलिंद डुंबरे , शाहदरा डीसीपी आर पी मीणा और
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ बताएं कि गर्भवती शीतल की शिकायत पर हमलावर वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई? वैसे तो कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी महिलाओं की सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होने का ढिंढोरा पीटते रहते है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावों की पोल खोल दी।
एस एच ओ से बदसलूकी पर तो एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने ख़ुद शिकायतकर्ता बन कर एफआईआर दर्ज करा दी। लेकिन महिला की शिकायत पर एसीपी ने अपने कर्तव्य का पालन क्यों नहीं किया ?
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ पुलिस की नज़र में बेशक हीरो बन गए। लेकिन शिकायतकर्ता महिला/जनता की नज़र में जीरो रहेंगे। आम आदमी की शिकायत पर आसानी से एफआईआर दर्ज न करने से पुलिस की छवि खराब होती है।
कमिश्नर की भूमिका-
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार पुलिस - वकील मामले में कमज़ोर कमिश्नर साबित हुए है। कमिश्नर ने शायद कुर्सी के मोह में मातहतों को एक तरह से अनाथ छोड़ दिया है। जिससे पुलिस बल का मनोबल गिरा है।
एसएचओ ने एफआईआर नहीं की -
वायरल वीडियो में साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा हैं कि वकील अमूल्य रत्न शर्मा (एफआईआर में नामजद) थाने में एस एच ओ अरुण कुमार को धमकाते हुए जमकर बदसलूकी कर रहा है। एक अन्य वीडियो में एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के सामने वकील विशाल शर्मा (नामजद) एस एच ओ अरुण को बाजू से पकड़ कर खींचता है और पीटने की धमकी देता है। इन दोनों वीडियो से साफ है कि वकीलों ने एस एच ओ अरुण के साथ बदसलूकी की और धमकी दी।
अब ये पता चला है कि एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने पीड़ित एसएचओ अरुण से वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने के लिए कहा, लेकिन एस एच ओ ने एफआईआर दर्ज करने से साफ़ मना कर दिया। तब 26 अक्टूबर को एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने ख़ुद शिकायतकर्ता बन कर वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई।
एसएचओ ने खाकी को खाक में मिलाया-
मातहत पुलिसकर्मी अक्सर कहते हैं कि वरिष्ठ अफसर ऐसे मामलों में उनका साथ नहीं देते। लेकिन इस घटना में तो साफ़ पता चलता है कि पीड़ित एस एच ओ ने तो एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के निर्देश के बावजूद वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने से ही साफ इंकार कर दिया। जबकि सच्चाई यह है कि अगर कोई आम आदमी ऐसे बदसलूकी करता तो यही एस एच ओ उसे पीटता/पिटवाता और ना जाने कितनी धाराओं में एफआईआर दर्ज कर उसे गिरफ्तार भी करता।
ईमानदार हो तो ईमानदार नज़र आना ज़रूरी है-
असल में जो ईमानदार, स्वभिमानी और काबिल अफसर होगा वह किसी की धमकी और गालियों से डरता नहीं है। उसमें हाथापाई, बदसलूकी और धमकी देने वाले के ख़िलाफ़ तुरंत एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत होती है। नाकाबिल, नाकारा, कायर और भ्रष्ट अफसर ही धमकी/बदसलूकी चुपचाप सुन सकता है
एसीपी ने मिसाल बनाई-
एसएचओ ने तो पद/वर्दी की गरिमा/सम्मान को खाक में मिला दिया। लेकिन एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने अपने कर्तव्य का पालन किया और एस एच ओ के साथ बदसलूकी करने वाले वकीलों के ख़िलाफ़ खुद शिकायतकर्ता बन कर एफआईआर दर्ज करा कर एक मिसाल कायम कर दी। और इसी वजह से एसीपी मनस्वी वशिष्ठ वकीलों के निशाने पर आ गए। एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने अपने करियर को नाकारा और कायर एसएचओ अरुण के लिए दांव पर लगा दिया। जो एस एच ओ वर्दी पर हाथ डालने, धमकाने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत नहीं रखता, वह ईमानदारी से अपने कर्तव्य पालन करने वाला हो ही नहीं सकता। महिला की एफआईआर दर्ज न करने से भी ये बात साबित हो गई है।
लेकिन ऐसे इंस्पेक्टर बस लगातार एस एच ओ जरूर बने रहना चाहते है। ये क्यों एस एच ओ के पद पर ही बने रहने चाहते है ये बात जग जाहिर है।
एस एच ओ डरपोक-
मान लो एसएचओ डरपोक है। वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज करने से डर गया। लेकिन उसमें अगर जरा भी खत्म सम्मान/ स्वाभिमान, शर्म होती तो खुद ही एसएचओ का पद छोड़ देता। कहता कि मैं इस पद के लायक नहीं हूं। लेकिन उसने ऐसा भी नहीं किया। इससे साफ़ है कि ऐसे पुलिसकर्मियों के न तो स्वाभिमान होता और न ही उनकी नज़र में वर्दी की इज़्ज़त है। ऐसे निकम्मे/नाकाबिल पुलिसकर्मियों के कारण ही अपराधियों में पुलिस का डर नहीं होता।
दग़ाबाज़- मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त
यहीं नहीं तत्कालीन एस एच ओ अरुण तो एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के साथ पुलिस मुख्यालय में कमिश्नर अनुराग कुमार की संपर्क सभा तक में भी नहीं गया।
जबकि सैकड़ों पुलिसकर्मी एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और एस एच ओ अरुण के तबादले का विरोध करने और वकीलों के अत्याचार के ख़िलाफ़ कमिश्नर से मिलने के लिए ही एकत्र हुए थे।
महिला पुलिसकर्मी समेत सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने तो वकीलों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर बहादुरी दिखाई। लेकिन इंस्पेक्टर अरुण फिर दगा दे गया।
असली चेहरा उजागर
एसएचओ अरुण के आचरण ने एस एच ओ प्रजाति का एक तरह से असली चेहरा और चरित्र उजागर किया है।
सिपाही से लेकर एस एच ओ तक सीधे जनता के संपर्क में आते हैं। भ्रष्टाचार की शुरुआत भी सिपाही-एसएचओ से ही होती है। किसी भी इलाके में गैर कानूनी/ गलत कार्य बीट, चौकी और थाना पुलिस की मिलीभगत के बिना हो ही नहीं सकते।
छवि खराब क्यों-
आम आदमी से पुलिसकर्मी बदतमीजी करते हैं। भ्रष्टाचार और बदतमीजी के कारण पुलिस की छवि खराब है। वकील की जगह अगर कोई आम आदमी एसएचओ से जायज सवाल ही पूछ लेता, तो वह उसके साथ कैसा व्यवहार करता। ये जग जाहिर है।
वकीलों के सामने भीगी बिल्ली-
अगर कहीं आम आदमी पुलिसकर्मी से बदसलूकी कर देता तो पुलिस उसे तुरंत गिरफ्तार कर हवालात में बंद कर देती।
मतलब साफ है कि आम आदमी पर अत्याचार करने वाली पुलिस बदतमीजी/गुंडागर्दी करने वाले वकीलों के सामने तो भीगी बिल्ली बन जाती है।
वैसे यह भी सच्चाई है कि सिर्फ नाकाबिल/ भ्रष्ट और कायर पुलिसकर्मी ही भीगी बिल्ली बन सकता है। पुलिस अफसर अगर ईमानदार/काबिल हो तो कोई भी उसके साथ बदतमीजी नहीं कर सकता। और अगर कोई करेगा तो वह अफसर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से डरेगा नहीं।
वर्दी वालों की गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार चरम पर है। वकील भी इसीलिए पुलिसकर्मियों के साथ बदतमीजी करने का दुस्साहस करते हैं।
एसीपी की नादानी
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ कर्तव्य पालन के जोश में शायद ये भूल बैठे कि पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। नाकाबिल/कायर/भ्रष्ट मातहत कभी भरोसे के लायक नहीं हो सकता। वह तो कभी भी मीर जाफर/जयचंद बन कर फंसवा/मरवा सकता है।
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ नादानी कर बैठे। जो एस एच ओ बदसलूकी करने वाले वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज नहीं कर रहा, ऐसे एस एच ओ के लिए उन्हें आवाज़ नहीं उठानी चाहिए थी। ऐसे एस एच ओ इसी तरह वकीलों/अफसरों/ नेताओं से गालियाँ भी खाते रहेंगे और कुर्सी पर चिपके भी रहेंगे। इनकी सारी बहादुरी और कानून सिर्फ कमज़ोर लोगों के लिए ही होता है। एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को ये नादानी महंगी पड़ गई। न जाने अभी कितने दिन सस्पेंड रहना पड़ेगा। एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने एफआईआर तो दर्ज करा दी। लेकिन तफ्तीश में क्या एस एच ओ अरुण अपना बयान दर्ज कराएगा ? क्या वह गवाही देगा ? दूसरी ओर वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों ने तो एफआईआर पर कोई कार्रवाई ना करने का वकीलों को आश्वासन भी दे दिया।
प्रधानमंत्री, गृह मंत्री साथ हैं ?-
पता चला है कि पुलिस मुख्यालय में दो नवंबर को कमिश्नर अनुराग कुमार ने पुलिसकर्मियों से कहा कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आपके साथ है। दूसरी ओर गृह मंत्रालय ने 2 नवंबर की शाम को ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड कर दिया । अगर कमिश्नर अनुराग कुमार अपनी कुर्सी का मोह छोड़ कर गृहमंत्री से बात करते, तो एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड नहीं किया जाता।
ऐतिहासिक प्रदर्शन-
साल 2019 में 5 नवंबर को तीस हजारी में वकीलों की गुंडागर्दी के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मियों ने तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक के ख़िलाफ़ पुलिस मुख्यालय पर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था। तब तो किसी अफसर के ख़िलाफ़ अनुशासनहीनता की कार्रवाई नहीं की गई थी।
एसीपी को सबक- एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के लिए ये प्रकरण एक जबरदस्त सबक हो सकता है।
असली/नकली चेहरे बेनकाब-
कमिश्नर, आईपीएस अधिकारियों और मातहतों के असली चेहरे/चरित्र और भूमिका उजागर हुई।
दूसरी ओर पुलिसकर्मियों की भलाई की बातें करके अपनी दुकान चलाने वाले रिटायर्ड अफसरों और उनकी संस्थाओं के भी असली चेहरे उजागर हो गए।
सावधान- पुलिसकर्मियों को ऐसे अफसरों / संस्थाओं से सावधान रहना चाहिए, ये गद्दार तो वकीलों से भी ज्यादा बुरे निकले।
आवाज़ बुलंद रहे-
वैसे एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि वकीलों के अत्याचार के बारे में सैकड़ों पुलिसकर्मियों, खासकर महिला पुलिसकर्मियों द्वारा अपने कमिश्नर अनुराग कुमार को अवगत कराना बिल्कुल सही कदम है। अनुशासन के दायरे में रह कर अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते रहना जरुरी है।
खुद को सुधारों-
लेकिन पहले पुलिसकर्मियों के लिए अपना आचरण/व्यवहार सुधारना सबसे जरुरी है। अपने कर्तव्य का पालन बिना भेदभाव के निष्पक्षता, पारदर्शिता और ईमानदारी से करना चाहिए। पुलिस लोगों के साथ गुंडागर्दी/ बदतमीजी से पेश आती है इसलिए पुलिसकर्मियों की जब कोई पिटाई करता है तो लोग खुश होते हैं। पुलिसकर्मियों का अगर व्यवहार ही अच्छा हो जाए, तो ऐसे मामलों में उन्हें लोगों का जबरदस्त समर्थन मिल सकता है।
गैंगवार-
कमिश्नर, आईपीएस अधिकारियों और वकीलों की एसोसिएशन को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए वरना पुलिस- वकीलों के बीच दिनों दिन बढ़ता टकराव कभी भी भयंकर रूप ले सकता है। अभी तो पुलिस और वकीलों में वर्चस्व के लिए गैंगवार जैसे हालात बने हुए हैं।
आईपीएस की पसंद-
वैसे ऐसे नाकाबिल/कायर एसएचओ ही आईपीएस अधिकारियों को पसंद आते हैं। इसलिए उन्हें ही बार बार एस एच ओ लगा दिया जाता है। इंस्पेक्टर अरुण को भी कुछ दिनों बाद फिर से एस एच ओ लगाया जा सकता है ।
वकीलों के बवाल के बाद 28 अक्टूबर को शाहदरा एस एच ओ अरुण का तबादला सिक्योरिटी विभाग में किया गया। लेकिन आईपीएस अधिकारियों का चहेता होने के कारण उसे 4 नवंबर को महत्वपूर्ण/मलाई दार माने जाने वाले आईएफएसओ /साइबर सेल जैसे विभाग में तैनात कर दिया गया।
आईपीएस अधिकारी अगर ईमानदार हैं तो शीतल ठाकुर की शिकायत पर एफआईआर दर्ज न करने वाले इंस्पेक्टर अरुण के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई करके दिखाएं।
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