Tuesday, 3 November 2026

कमिश्नर- IPS जीरो, ACP बन गया हीरो, आईपीएस खाकी को खाक में मत मिलाओ

           एसीपी मनस्वी वशिष्ठ 

कमिश्नर- आईपीएस खाकी को खाक में मत मिलाओ


उसूलों पर जहाँ आँच आए तो टकराना ज़रूरी है, 
जो ज़िंदा हों तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है।    वसीम बरेलवी



इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की भूमिका पुलिस - वकील मामले में बिल्कुल भी पद के अनुरूप नहीं है। पुलिस बल के मुखिया के रुप में वह कमज़ोर कमिश्नर साबित हुए है। कमिश्नर ने शायद कुर्सी के मोह में मातहतों को एक तरह से अनाथ छोड़ दिया है। जिससे पुलिस बल का मनोबल गिरा है। इस मामले में सैकड़ों पुलिसकर्मी (सिपाही - इंस्पेक्टर) और एसीपी मनस्वी वशिष्ठ हीरो बन गए है जबकि पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी जीरो साबित हो गए। वकीलों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने के कारण बेशक एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड कर दिया गया। लेकिन पुलिसकर्मियों के दिलोदिमाग़ और पुलिस के इतिहास में उसका नाम हमेशा के लिए दर्ज हो गया। 
कमिश्नर काबिल हो-
पुलिस कमिश्नर अगर पेशेवर रूप से काबिल न हो, तभी मातहतों को अपने हक़, सम्मान और सुरक्षा के लिए धरना- प्रदर्शन करना पड़ता है। साल 2019 में भी तीस हजारी कांड के बाद तत्कालीन कायर, नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक के ख़िलाफ़ पुलिसकर्मियों ने पुलिस मुख्यालय पर जबरदस्त प्रदर्शन किया था। अब अनुराग कुमार भी अब अमूल्य पटनायक की तरह याद किए जाएंगे। 
वीडियो में साफ़-
शाहदरा थाना में हुए बवाल/झगड़े के जो वीडियो वायरल हैं उनमें साफ़ साफ़ पता चलता है कि वकील आदि ने एक व्यक्ति के साथ मारपीट की, आत्मरक्षा में उस व्यक्ति ने हमला
करने वाले के सिर पर मेज पर रखी जाने वाली नेम प्लेट से वार किया। 
एक वीडियो में एक वकील एसएचओ अरुण को धमकाता और बदतमीजी करने हुए साफ दिखाई दे रहा है। एक वीडियो में एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के सामने ही वकील एसएचओ से बदतमीज़ी, हाथापाई/खींचतान और  धमकी देते हुए दिखाई दे रहे हैं। 
एसीपी ने वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कर दी। जिस पर वकीलों ने हड़ताल कर दी। 
जबकि वीडियो में पुलिस किसी के साथ बदसलूकी करते हुए तो नज़र नहीं आ रही। 
एसीपी- एसएचओ का तबादला-
इसके बावजूद गांधीनगर एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और एसएचओ अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया। जिससे पुलिस में रोष व्याप्त हो गया। 
पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन-
दो नवंबर को एसीपी मनस्वी वशिष्ठ के नेतृत्व में  सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन किया। महिला पुलिसकर्मियों ने भी वकीलों द्वारा किए जाने वाले दुर्व्यवहार के बारे में मीडिया को भी बताया।
दगाबाज एस एच ओ-
एस एच ओ अरुण प्रदर्शन में शामिल नहीं हुआ। जबकि एस एच ओ के साथ हुई बदसलूकी के लिए ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने अपना करियर दांव पर लगा दिया। 
दुखड़ा सुनाया-
पुलिस मुख्यालय के सभागार में पुलिसकर्मियों ने कमिश्नर अनुराग कुमार और अन्य आईपीएस अधिकारियों के सामने अपना दुखड़ा सुनाया। लेकिन पुलिस कमिश्नर अनुराग पीड़ित पुलिसकर्मियों को संतुष्ट नहीं कर पाए। जिसकी वजह से पुलिसकर्मियों ने मुख्यालय के गेट पर धरना दिया। 
कमिश्नर- आईपीएस की भूमिका पर सवाल-
इस मामले ने पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार, स्पेशल पुलिस कमिश्नर (कानून एवं व्यवस्था) देवेश श्रीवास्तव, पूर्वी क्षेत्र के संयुक्त आयुक्त मिलिंद महादेव डुंबरे और शाहदरा के डीसीपी आर पी मीणा की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। 
इन अफसरों ने इस मामले में आधिकारिक रूप से मीडिया के सामने पूरे घटना क्रम की  जानकारी क्यों नहीं दी ? आधिकारिक रूप से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की ? 
कमिश्नर के पास तो भारी भरकम पीआरओ ब्रांच / मीडिया सेल भी है। मीडिया सेल की प्रमुख स्पेशल पुलिस कमिश्नर सिंधु पिल्लै, पीआरओ एडिशनल कमिश्नर राजीव रंजन, डीसीपी नेहा यादव और एडिशनल पीआरओ एसीपी रंजय अत्रिष्य हैं। इतना बड़ा लाव लश्कर किस काम का, अगर वह अपने मातहतों के साथ हुई बदसलूकी के मामले में भी पुलिस का पक्ष तथ्यों, साक्ष्यों, वीडियो सहित मीडिया के सामने आधिकारिक तौर पर नहीं रख सकता।  क्या आईपीएस अधिकारी सिर्फ चोर, लुटेरे आदि पकड़े जाने का मीडिया में प्रचार करने के ही लायक हैं।
सच्चाई सामने क्यों नहीं लाते -
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार को शाहदरा थाने के सीसीटीवी कैमरे के सभी फुटेज मीडिया के सामने पेश करने चाहिए। जिससे बिल्कुल साफ हो जाएगा कि थाने में पुलिस ने गुंडागर्दी की थी या वकीलों ने। यहीं नहीं सीसीटीवी कैमरे की फुटेज वकीलों की एसोसिएशन और हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट को भी भेजी जानी चाहिए। ताकि इस तरह की समस्या का कोई स्थायी हल निकाला जा सके।  
बलि का बकरा-
कमिश्नर ने तो बस तुरंत दो पुलिस अधिकारियों का तबादला कर दिया। इससे तो यह ही संदेश गया कि वकीलों के दबाव के कारण एसीपी, एसएचओ को बलि का बकरा बना दिया गया।  
क्या कमिश्नर अनुराग कुमार ने कोई जांच पड़ताल की थी, जिसमें दोनों अफसर कसूरवार पाए गए ?
पीड़ितों से मिलते-
पुलिस कमिश्नर ने वकीलों की एसोसिएशन के साथ तो 30 अक्टूबर को बैठक कर ली, लेकिन उसके पहले पीड़ित अफसरों से मिलना भी जरूरी नहीं समझा। 
इसीलिए मजबूर होकर पीड़ित पुलिसकर्मियों ने ख़ुद पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार से मिलने की गुहार लगाई। 
कमिश्नर- आईपीएस जिम्मेदार-
एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने दो नवंबर को पुलिस मुख्यालय जाने और कमिश्नर अनुराग कुमार से मिलने की घोषणा दो दिन पहले ही वीडियो जारी करके और पत्र लिखकर कर दी थी। 
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और आईपीएस अधिकारी अगर मामले को गंभीरता से लेते तो सैंकड़ों पुलिसकर्मियों को प्रदर्शन नही करना पड़ता। जैसे ही एसीपी मनस्वी वशिष्ठ ने पुलिस मुख्यालय जाने की बात की थी, तभी कमिश्नर अनुराग कुमार और आईपीएस अधिकारियों को पुलिसकर्मियों को बुला कर उनकी समस्या का समाधान करना चाहिए था। 
गृह मंत्री कमिश्नर को हटाएं-
गृह मंत्री अमित शाह को  हटाना  तो कमिश्नर अनुराग कुमार और संबंधित आईपीएस अधिकारियों को चाहिए। जो शायद अपने  अहंकार / अति आत्मविश्वास में  इस मामले की गंभीरता का सही आकलन नहीं कर पाए। कमिश्नर के गैर पेशेवर रवैये के कारण ही सैकड़ों पुलिसकर्मियों को प्रदर्शन जैसा कदम उठाना पड़ा। 
पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शन करना अनुशासनहीनता माना जाता है लेकिन
पीड़ित पुलिसकर्मियों द्वारा अपना दुखड़ा अपने मुखिया को बताने के लिए मुख्यालय पर एकत्र होना अनुशासनहीनता नहीं मानी जा सकती। 
कमिश्नर जागो-
पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार या तो इस मामले की गंभीरता नहीं समझ रहे या उनका मकसद सिर्फ किसी तरह अपना कार्यकाल कथित शांति से निकाल देना ही है। 
वकीलों का पुलिस के साथ टकराव दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। अगर इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला गया तो स्थिति खतरनाक हो सकती है। 
इसके लिए जिम्मेदार पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारी ही होंगे। पुलिस कमिश्नर अगर दमदार होते तो वह एसीपी को सस्पेंड नहीं होने देते। 
वकीलों की भूमिका-
वैसे कानून हाथ में लेने का अधिकार तो किसी को भी नहीं है। वकील तो कानून के बेहतर जानकर माने जाते है। उन्हें भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिससे उनके पेशे पर कलंक लगे। वकीलों के आरोप अगर सही हैं तो उन्हें भी अपने आरोप साबित करने के लिए यह मांग करनी चाहिए कि शाहदरा थाना के सीसीटीवी कैमरे के फुटेज आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किए जाए। इससे स्पष्ट पता चल जाएगा कि कसूरवार कौन है। 
आईपीएस को सस्पेंड क्यों नहीं किया-
जंतर मंतर मामले में प्रदर्शनकारियों पर  पैलेट गन चलाने का आदेश देने वाले आईपीएस राजा बांठिया, लाठी चार्ज, आंसू गैस चलाने की अनुमति देने वाले डीसीपी सचिन शर्मा को तो सस्पेंड नहीं किया गया। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। लेकिन उपरोक्त अफसरों के ख़िलाफ़ भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। 
शंकर चौधरी को गिरफ्तार करके दिखाएं-
आईपीएस शंकर चौधरी के ख़िलाफ़ दिल्ली पुलिस ने विदेशी नागरिक को बंधक बनाकर 35 लाख रुपये वसूलने के आरोप में फरवरी 2026 में मामला दर्ज किया था।  शंकर चौधरी को गिरफ्तार करके कमिश्नर अपना दम और काबलियत दिखाएं। पीड़ित एसीपी/ मातहतों पर कार्रवाई करना कोई बहादुरी नहीं होती। 
मनोबल गिरा-
वकीलों के अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज उठाने वाले पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना पुलिस का मनोबल गिराने वाला काम है।
पुलिस ने निभाया भाईचारा-
नई दिल्ली जिला पुलिस ने भी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का उल्लघंन करने वाले प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों को डिटेन न करके अपना भाईचारा/ समर्थन तो जाहिर कर ही दिया। हालांकि इसी पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रदर्शन की खबर कवर वाले पत्रकारों तक को डिटेन किया था। 
साल 2019 में पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन करने वाले हजारों पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ तो कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी। 
गिरेबान में झांक लो -
वकीलों के अत्याचार की शिकायत करने वाली पुलिस , यह भूल जाती है वह आम आदमी से खुद कितनी बदतमीजी से बात करते हैं। इसीलिए पुलिसकर्मियों की जब पिटाई होती है तो आम आदमी खुश होता है। हालांकि पुलिस हो या वकील किसी को भी किसी के साथ बदतमीजी या मारपीट करने का अधिकार नहीं है। दोनों को ही अपने पेशे की गरिमा बनाए रखनी चाहिए। 
पुलिसकर्मियों सुधर जाओ-
पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर है। पुलिस आम आदमी से सीधे मुंह बात तक नहीं करती। आम आदमी आज भी अकेले थाने में जाने से डरता है।  इसलिए पुलिस को जब वकील या बदमाश पीटते हैं तो लोगों की रत्ती भर भी हमदर्दी पुलिस के साथ नहीं होती। 

 काले कोट के काले कारनामे-

लॉरेंस का वकील अपराध में शामिल -
कुख्यात लॉरेंस बिश्नोई के वकील दीपक नंदा उर्फ दीपक खत्री को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने अगस्त 2026 में गिरफ्तार किया था।
दीपक नंदा को अंतरराष्ट्रीय हथियार तस्करी सिंडिकेट और जबरन वसूली से जुड़े यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) मामले में गिरफ्तार किया गया था। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि दीपक नंदा ने साल 2019 में उत्तर प्रदेश के अमरोहा स्थित श्री वेंकटेश्वरा यूनिवर्सिटी से जो बीए एल एल बी में दाखिला लिया था, उसकी 12वीं कक्षा की मार्कशीट और दस्तावेज फर्जी थे।
अमरोहा के रजबपुर थाने में उनके खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का अलग से मामला दर्ज किया गया है।

वकीलों की गैंगवार, 5 वकील गिरफ्तार, 
देसी तमंचे, कारतूस बरामद 
5 जुलाई 2023 को तीस हजारी कोर्ट परिसर में दिल्ली बार एसोसिएशन के दो पदाधिकारियों के गिरोहों के बीच गोलीबारी/ गैंगवार के  मामले में पुलिस ने मनीष शर्मा (वरिष्ठ उपाध्यक्ष डीबीए) और दूसरी तरफ से ललित शर्मा (अतुल शर्मा  सचिव डीबीए का भाई ) समेत 5-6 वकीलों को गिरफ्तार किया गया। उनसे तीन देसी तमंचे और कारतूस बरामद हुए। अपराधियों की तरह गोलीबारी करके वकालत के पेशे को शर्मसार करने वाले वकीलों से इतने अवैध हथियारों के बरामद होने से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये वकीलों के वेश में छुपे हुए गुंडे हैं।

खाकी की छाती पर काले कोट का तांडव
2 नवंबर 2019 को तीस हजारी अदालत परिसर में कुछ गुंडे/दंगाई जैसे वकीलों ने  पुलिसकर्मियों की छाती पर जमकर तांडव किया और आगज़नी की। तब उत्तर जिले की तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज हाथ जोड़कर कायरों की तरह दुम दबा कर भागी थी। मोनिका भारद्वाज ने तो बदसलूकी करने वाले गुड़े वकीलों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज कराने की भी हिम्मत नहीं दिखाई। 
तत्कालीन एडिशनल डीसीपी हरेन्द्र कुमार सिंह को भी वकीलों ने जमीन पर गिरा-गिरा कर पीटा था। तब पुलिसकर्मियों के हाथों में शायद लकवा लग गया होगा, इसलिए पलटवार नहीं किया। इनके हाथ सिर्फ बेकसूरों पर ही उठते हैं। तत्कालीन नाकारा कमिश्नर अमूल्य पटनायक और तत्कालीन डीसीपी मोनिका भारद्वाज घायल पुलिसकर्मियों का हाल चाल पूछने तक नहीं गए थे। मोनिका भारद्वाज तो अपने घायल आपरेटर सिपाही संदीप का हाल जानने तक नहीं गई। 5 नवंबर को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर पुलिसकर्मियों ने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया था। 7 नवंबर को पुलिस कमिश्नरऔर डीसीपी मोनिका भारद्वाज पुलिस वालों का हाल जानने गए।
 


आईपीएस सत्ता के लठैत मत बनो

जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारी छात्रों पर उत्तर जिले के तत्कालीन डीसीपी राजा बांठिया ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन (छर्रे वाली गोली) चलाने के आदेश दिए थे। जबकि नई दिल्ली जिले के डीसीपी सचिन शर्मा ने आंसू गैस, लाठी चार्ज और आग्नेयास्त्रों (हथियार, बंदूक)के इस्तेमाल की अनुमति दी थी।  
वर्दी वाले गुंडे-
दूसरी ओर एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा, इंस्पेक्टर नवीन राठी जैसे वर्दी वाले गुंडों द्वारा जंतर मंतर पर छात्राओं/ लड़कियों के साथ बदसलूकी, छात्रों की पिटाई और घिनौनी हरकतों ने पुलिस की बची खुची इज़्ज़त/साख पर भी कलंक लगा दिया गया। इन वर्दी वाले गुंडों ने दुनिया भर में दिल्ली पुलिस और भारत की छवि को दाग़दार कर दिया। 
दिल्ली पुलिस महिलाओं और बच्चों के प्रति संवेदनशील होने का दावा करते थकती नहीं है। लेकिन इस मामले ने पुलिस के दावे की धज्जियां उड़ा दी। 
कमिश्नर की भूमिका-
खाकी को खाक में मिलाने, पुलिस को शर्मसार करने वाले इन पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई न करने से पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार की पेशेवर काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गया है। 
एडिशनल डीसीपी संदीप लांबा द्वारा लड़की को थप्पड़ मारने और इंस्पेक्टर नवीन राठी द्वारा लड़की के शरीर के पिछले हिस्से में डंडा घुसाने जैसा दृश्य पूरी दुनिया देख रही है।
सत्ता के लठैत- 
सच्चाई यह है कि आईपीएस अधिकारी सिर्फ बातें ही ईमानदारी/ निष्पक्षता/ कर्तव्य/कानून/संविधान पालन की करते हैं और बकायदा शपथ भी लेते है। लेकिन उनका आचरण बिल्कुल इसके विपरीत होता हैं। ये जनता के सेवक नहीं , बल्कि राजनेताओं के लठैत की तरह व्यवहार और काम करते हैं। चाहे सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, महत्वपूर्ण पद पाने के लिए आईपीएस सत्ता के लठैत बन कर खाकी को खाक में मिलाने से भी बिल्कुल नहीं हिचकते। कांग्रेस के शासन में भी साल 2011 में रामलीला मैदान में रात में सो रहे लोगों पर तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में आंसू गैस छोड़ी गई, लाठीचार्ज किया गया था। तब पुलिस से बचने के लिए महिलाओं वाला सूट- सलवार पहन कर भाग रहे रामदेव को पुलिस ने पकड़ा था। 
आत्मरक्षा का अधिकार-
वैसे एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए, जिसमें यह प्रावधान किया जाए कि अगर कोई पुलिसकर्मी किसी बेकसूर व्यक्ति की पिटाई करता है तो उस व्यक्ति या लोगों को भी अपनी आत्मरक्षा/ बचाव में उस पुलिसकर्मी को पीटने का कानूनी तौर पर अधिकार होना चाहिए। आत्मरक्षा में ऐसा कदम उठाने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होना चाहिए। कोई निरंकुश, भ्रष्ट पुलिसकर्मी अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसे विभाग की ओर से बिल्कुल भी सुरक्षा या संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। कानून का खुद पालन न करने वाले पुलिसकर्मी को तो आम अपराधी से भी ज्यादा सज़ा मिलनी चाहिए।

आईपीएस अफसरों जागो, खाकी को ख़ाक में मत मिलाओ। आईपीएस अगर ईमानदार हो, तो ईमानदार नजर आना ज़रूरी है। अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता के लठैत मत बनो। 

(इंद्र वशिष्ठ दिल्ली में 1989 से पत्रकारिता कर रहे हैं। दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता और सांध्य टाइम्स (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप) में वरिष्ठ संवाददाता रहे हैं।)