Sunday, 22 March 2020

"बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है","फांसी की बजाए हमें गोलियों से भून दिया जाए"-भगत सिंह


"पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते, बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है" भगत सिंह


शहीद ए आज़म भगत सिंह

" बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।"
फांसी की बजाए हमें गोलियों से भून दिया जाए -भगत सिंह

इंद्र वशिष्ठ

शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेम्बली (वर्तमान संसद भवन) में बम फेंके जाने की एफआईआर यानी प्राथमिकी संसद मार्ग थाने में दर्ज हुई थी। 
शहीदों से संबंधित यह एफआईआर ऐतिहासिक महत्व की  है। 

आठ अप्रैल 1929 को तत्कालीन न्यू दिल्ली थाने में (वर्तमान संसद मार्ग)  में यह ऐतिहासिक एफआईआर पुलिसकर्मी लाला हंसराज ने दर्ज की थी।इस एफआईआर का नंबर 113 है। उस समय एफआईआर उर्दू भाषा में लिखी जाती थी।
पुलिसकर्मी लाला हंसराज ने इस एफआईआर में लिखा है कि आज मेरी ड्यूटी असेम्बली गैलरी (वर्तमान संसद) में थी।
करीब साढ़े 12 बजे दोपहर में एक के बाद एक दो बम असेम्बली हॉल में फटे और पिस्तौल से फायर किए गए।
जब मैं भाग कर दर्शक दीर्घा में पहुंचा तो देखा कि सार्जेंट टैरी साहब ने दो मुलजिमों को गिरफ्तार किया हुआ था। इनमें से एक ने अपना नाम भगत सिंह और दूसरे ने बटुकेश्वर दत्त बताया।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ धारा 307 हत्या की कोशिश और विस्फोटक अधिनियम 3/4 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
इस मुक़दमे का फैसला दिल्ली के सेशन जज ने 12 जून 1929 को सुनाया जिसमें भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को उम्रकैद की सज़ा दी गई थी।

 बाद में 7 अक्टूबर1930 को लाहौर षड़यंत्र केस के आरोप में जिसे सांडर्स हत्याकांड के नाम से भी जाना जाता है भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सज़ा सुनाई गई।
इन तीनों को 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया गया।
सरदार भगत सिंह संधू का जन्म 28 सितंबर 1907 को गांव बंगा जिला लायलपुर पंजाब (अब पाकिस्तान में) हुआ था।

भगत सिंह ने खोली पुलिस की पोल-
भगत सिंह सिंह ने अपने मुकदमे की पैरवी के दौरान जो बयान दिए, उसमें उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट की और पुलिस की कहानी की पोल भी खोली।

भगत सिंह ने अदालत में कहा कि हम बम फेंकने से इन्कार नहीं कर रहे हैं। लेकिन इस मामले में तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने जो गवाही दी है वह सरासर झूठ है। सार्जेंट टैरी का यह कहना कि उन्होंने हमारे पास से पिस्तौल बरामद की सरासर झूठ है। जब हमने अपने आपको पुलिस के हवाले किया तो हमारे पास कोई पिस्तौल नहीं थी।
जिन गवाहों ने कहा कि उन्होंने हमें बम फेंकते हुए देखा था वो भी झूठ बोलते हैं। न्याय और निष्कपट व्यवहार को सर्वोपरि मानने वाले लोगों को इन झूठी बातों से एक सबक लेना चाहिए।

भगत सिंह ने कहा कि यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ अथवा विद्वेष की भावना से नहीं किया। हमारा उद्देश्य केवल उस शासन व्यवस्था के खिलाफ प्रतिवाद करना था।
दोनों बम ऐसे नहीं थे जिनसे किसी की जान ली जा सके।
इसके अलावा बम बेंचों और डेस्को के बीच की खाली जगहों में ही फेंके थे।
भगत सिंह ने कहा  कि " बहरों को आवाज़ सुनाने के लिए धमाके की जरूरत थी।"

फांसी की बजाए गोलियों से भून दिया जाए -
महान क्रांतिकारी शहीद ए आजम भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उनके साथ राजनीतिक बंदी जैसा ही व्यवहार किया जाए और फांसी देने की बजाए गोलियों से भून दिया जाए।

क्षमा मांगने से इंकार-
अपनी शहादत के वक़्त भगत सिंह महज 23 वर्ष के थे। इस तथ्य के बावजूद कि भगत सिंह के सामने उनकी पूरी ज़िंदगी पड़ी हुई थी, उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने क्षमा-याचना करने से इनकार कर दिया, जैसा कि उनके कुछ शुभ-चिंतक और उनके परिवार के सदस्य चाहते थे। अपनी आख़िरी याचिका और वसीयतनामे में उन्होंने यह मांग की थी कि अंग्रेज़ उन पर लगाए गये इस आरोप से न मुकरें कि उन्होंने उपनिवेशवादी शासन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा। उनकी एक और मांग थी कि उन्हें फायरिंग स्क्वाड द्वारा सज़ा-ए-मौत दी जाए, फांसी के द्वारा नहीं।



सांडर्स हत्याकांड की एफआईआर में भगत सिंह का नाम नहीं था-
भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेज पुलिस अफसर जॉन पी सांडर्स की हत्या के मामले में फांसी दी गई थी।
उर्दू में लिखी एफआईआर लाहौर के अनारकली थाने में 17 दिसंबर 1928 को शाम साढ़े चार बजे दो अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी। अनारकली थाने का एक पुलिसकर्मी इस मामले में शिकायतकर्ता था। शिकायतकर्ता इस मामले में प्रत्यक्षदर्शी भी था। उसने कहा कि जिस व्यक्ति का उसने पीछा किया वह पांच फुट पांच इंच लंबा था। हिंदू चेहरा, छोटी मूंछें, दुबली पतली और मजबूत काया थी। वह सफेद पायजामा,भूरे रंग की कमीज और काले रंग की टोपी पहने हुए था।

भगत सिंह की बेगुनाही साबित हो-
भगतसिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष  इम्तियाज राशिद कुरैशी ने लाहौर में अदालत में याचिका दायर कर इस हत्याकांड के मामले में दर्ज़ एफआईआर की सत्यापित प्रति मांगी थी। 
फांसी दिए जाने के आठ दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद लाहौर पुलिस ने अदालत के आदेश पर अनारकली थाने के रिकॉर्ड की छानबीन की और सांडर्स हत्याकांड की एफआईआर ढूंढने में कामयाब रही।
साल 2014 में अदालत ने कुरैशी को एफआईआर की सत्यापित प्रति दे दी। कुरैशी ने लाहौर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें भगतसिंह मामले को दोबारा खोलने की मांग की । वह सांडर्स हत्याकांड में भगतसिंह की बेगुनाही साबित करना चाहते हैं। 
शहीद ए आजम को भारत रत्न तक नहीं दिया  राज नेताओं ने -
सत्ता सुख भोगने वाले राजनेताओं, कलाकार और  खिलाड़ी तक को भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। लेकिन देश की आजादी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले भगत सिंह और  अन्य देशभक्तों को भारत रत्न सम्मान नहीं दिया गया।
जबकि इन शहीदों को भारत रत्न दिए जाने से भारत रत्न का ही सम्मान बढ़ेगा। भारत के असली रत्न सिर्फ और सिर्फ ऐसे शहीद ही है।

🇮🇳बुराई इसलिए नहीं बढ़ती कि बुरे लोग बढ़ गए हैं बुराई इसलिए बढ़ती है क्योंकि बुराई सहन करने वाले लोग बढ़ गए हैं। 
शहीद ए आज़म भगत सिंह। 🇮🇳🌹🌹🌹


(Press Club of India की पत्रिका The Scribes World में प्रकाशित लेख) 





Tuesday, 17 March 2020

IPS ने CP को धिक्कारा,गृहमंत्री ने पुचकारा, HM माने या न माने IPS ने माना फेल हुई पुलिस।खाकी-खादी मिली ख़ाक में।


अजय राज शर्मा दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त
       प्रकाश सिंह पूर्व पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश,असम, पूर्व डीजी बीएसएफ
नीरज कुमार दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त

IPS ने CP को धिक्कारा, गृहमंत्री ने पुचकारा।

खाकी और खादी पर लागा दंगों का दाग़।
गृहमंत्री माने या न माने, आईपीएस ने माना पुलिस फेल हुई।

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली में हुए दंगों ने अपने को श्रेष्ठ कहलाने वाली दिल्ली पुलिस की पोल खोल दी। दिल्ली पुलिस के नाकारा और नाकाम तत्कालीन कमिश्नर अमूल्य पटनायक दंगों के बदनुमा दाग़ लेकर कमिश्नर पद से रिटायर हुए।
दंगें में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के हवलदार रतन लाल समेत सभी पचास से ज्यादा बेकसूर लोगों की मौत के लिए गृहमंत्री और पुलिस कमिश्नर ही जिम्मेदार हैं।

पुलिस का काम लोगों के जान माल की सुरक्षा और कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने का है। लेकिन पुलिस अपना यह कर्तव्य पालन करने में बुरी तरह फेल हो गई। पुलिस गृहमंत्री के अधीन है। इसलिए गृहमंत्री भी जिम्मेदार है। 

इसके अलावा जिले के डीसीपी,एसएचओ से लेकर बीट में तैनात सिपाही तक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। वसूली के लिए तो गलियों तक की खाक तक छानने वाली पुलिस अगर सतर्क होती तो इतनी बड़ी तादाद में लोगों के एकत्र होने की सूचना पहले ही मिल जाती और उनको जमा होने से रोका जा सकता था।
दंगें कई मायनों में अलग और अहम-
यह दंगे दिल्ली में पहले हुए दंगों से कई मायनों में अलग हैं।  1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दंगे अचानक हुए थे। पुलिस के मूकदर्शक बने रहने से हजारों सिखों का नरसंहार हुआ था। अयोध्या में 1992 में बाबरी ढांचा विध्वंस के बाद भी  अचानक दंगे इसी उत्तर पूर्वी दिल्ली के इन्हीं इलाकों में भी हुए थे। उस समय दंगें होने और उनको रोकने में विफल/ देरी के कारण तत्कालीन डीसीपी दीपक मिश्रा को हटाया गया था।
सीएए के विरोध में लंबे समय से शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन किया जा रहा है। लेकिन कुछ नेताओं द्वारा लगातार भड़काने वाले बयान दिए गए। सरकार ने इन नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। जिसके परिणामस्वरूप यह दंगे हुए।

सरकार और पुलिस कसूरवार-
दिल्ली में हाल में हुए दंगें अचानक नहीं हुए थे। सरकार और पुलिस के नाकारापन के कारण यह दंगे हुए हैं।
गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि दंगे पूर्व नियोजित साजिश के तहत किए गए। गृहमंत्री का सिर्फ यह बयान ही यह साबित करने के लिए काफी है कि सरकार और पुलिस ही दंगों के लिए जिम्मेदार हैं। क्योंकि साजिश थी तो ख़ुफ़िया एजेंसियां साज़िश का पहले ही पता क्यों नहीं लगा पाई।
हालांकि राज्य सभा में कांग्रेस के कपिल सिब्बल ने कहा 25 फरवरी को सरकार की ओर जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि दंगें एकदम यानी स्पान्टेनिअस हुए हैं। लेकिन अब गृहमंत्री कह रहे हैं कि दंगे के पीछे गहरी साज़िश है। 


ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल गई-

इन दंगों ने पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। लगातार तीन दिनों तक हुए दंगों से गृहमंत्री अमित शाह की काबिलियत पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
देश की राजधानी में तीन दिनों तक दंगे होते रहे और उन पर काबू पाने में पुलिस फेल  रही।

पूर्व पुलिस कमिश्नरों ने माना पुलिस बुरी तरह फेल -
दिल्ली में हुए दंगें इस मायने में भी अलग हैं कि पहली बार ऐसे आईपीएस अफसरों ने भी दंगे रोकने में फेल पुलिस की खुल कर मीडिया में आलोचना की जो खुद कभी इसी दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रह चुके हैं।
इन पूर्व पुलिस आयुक्तों के बयान इसलिए भी अहम है कि कोई भी आईपीएस अफसर सामान्यतः इस तरह के बयान नहीं देता है। नेताओं के बयान राजनीति से प्रेरित माने जाते हैं। लेकिन पूर्व पुलिस आयुक्तों के बयान से भी बिल्कुल साफ हो गया है पुलिस दंगाइयों पर काबू पाने में बुरी तरह फेल हो गई।

दिल्ली पुलिस के ही कई पूर्व पुलिस आयुक्तों के आलोचनात्मक बयानों के बावजूद गृहमंत्री द्वारा संसद में पुलिस की तारीफ करना शर्मनाक है।

ख़ुफ़िया तंत्र पर सवालिया निशान-

केंद्र में भाजपा के पहले शासन काल में दिल्ली पुलिस के आयुक्त रहे अजय राज शर्मा ने कहा हैं कि सीएए के विरोध में धरना प्रदर्शन लंबे समय से चल रहा है। इस आंदोलन के कारण ही हिंसा हुई है। ऐसे में पुलिस को पहले से ऐसे लोगों की पहचान करके उन पर नजर रखना चाहिए थी जो इस आंदोलन को उकसा रहे थे। इससे हिंसा शुरू ही नहीं हो पाती। इस हिंसा ने पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र पर भी सवाल खड़े कर दिए। अगर पहले से ख़ुफ़िया जानकारी होती तो अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर स्थिति को बिगड़ने से बचाया जा सकता था। 
अजय राज शर्मा ने कहा, "मैं अगर पुलिस आयुक्त होता तो मैं किसी भी कीमत पर दंगाइयों को कानून हाथ में नहीं लेने देता, चाहे सरकार मेरा ट्रांसफर कर देती या चाहे बर्खास्त कर देती।"

पुलिस की नालायकी -
 पूर्व पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने  कहा कि हिंसा में इस्तेमाल किए गए हर प्रकार के हथियारों को देखकर ऐसा लगता है कि ये दंगे पूर्व नियोजित थे। शक्तिशाली सुरक्षा उपकरण उपलब्ध होने के बावजूद पुलिस दंगाइयों को रोकने के लिए नहीं आई। "ये पुलिस की नालायकी है।"

उपराज्यपाल और कमिश्नर के एक्शन में देरी- 
पूर्व पुलिस आयुक्त टी.आर. कक्कड ने कहा, "मैं हिंसा भड़कने के शुरुआती घंटों में ही सख्त कदम उठाता"। न्यूनतम बल प्रयोग और जवानों की कम संख्या में तैनाती के कारण हिंसा बढ़ गई। बरामद हथियार और पेट्रोल बमों से पता चलता है कि हिंसा पूर्व नियोजित थी। "आयुक्त तथा उप राज्यपाल ने प्रतिक्रिया देर से की।"

दंगों को कंट्रोल करने में ढिलाई बरती- 
पूर्व कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता ने कहा कि सांप्रदायिक दंगों के लिए बकायदा एसओपी है यानी दंगों के हालात में क्या कदम उठाए जाने चाहिए यह तय है। क्योंकि इस तरह के दंगों में से न सिर्फ संपत्ति का नुक़सान होता है बल्कि लोगों की जान जाने का भी खतरा रहता हैं।

दिल्ली में जो कुछ हुआ उससे साफ़ है कि दंगों पर नियंत्रण के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं भेजा गया। ऐसे मामले में तो पुलिस को सीधे फायरिंग करनी चाहिए थी। अगर पुलिस हवा में भी फायरिंग करती तो दंगाई वहां रुकते नहीं। ऐसे में अगर किसी एक-दो दंगाई को गोली लग भी जाती तो उसे ग़लत नहीं कहा जाता, क्योंकि इससे अन्य लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
बी के गुप्ता का कहना है कि दिल्ली में फोर्स की कमी की बात हज्म नहीं होती। इसकी वजह यह है कि दिल्ली  पुलिस ही लगभग 81 हजार है और एक घंटे के भीतर ही पांच हजार पुलिसकर्मी बुलाए जा सकते थे। दिल्ली और आसपास के इलाकों में भी हजारों की संख्या में अर्धसैनिक बल उपलब्ध होते हैं। लेकिन फ़ोर्स नहीं बुलाई गई तो इसका अर्थ है कि "दंगों को कंट्रोल करने में ढिलाई बरती गई"।

दिल्ली पुलिस के इन पूर्व आयुक्तों के अलावा अनेक पूर्व आईपीएस ने भी दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर अमूल्य पटनायक की भूमिका पर सवालिया निशान लगाए।

वर्दी पर लगाया दाग़ क्षमा योग्य नहीं-
दंगा रोकने में  पुलिस की  विफलता पर सीमा सुरक्षा बल के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा, " पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक द्वारा वर्दी पर लगाया गया दाग क्षमा योग्य नहीं है। मुझे वास्तव में उनपर तरस आता है।"

पुलिस इंद्र धनुष बन गई-
दंगा स्थलों पर पुलिस के कथित रूप से समय पर नहीं पहुंचने पर उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने कहा, "दिल्ली पुलिस ने इंद्रधनुष की तरह काम किया और बारिश (दंगा) थमने के बाद नजर आई।"
अमूल्य पटनायक के नेतृत्व पर विक्रम सिंह ने चुटकी लेते हुए कहा, "नेपोलियन जब अपनी सेना के साथ चलता था तो वह सबसे आगे चलता था। यहां पटनायक और उनके प्रमुख अधिकारी (घटनास्थल से) गायब थे।

पुलिस शुरू से ही सतर्कता और सख्ती बरतती तो हालात बेकाबू नहीं होते-


इससे पता चलता है कि दंगों की स्थिति का आकलन और नियंत्रण करने में अफसरों द्वारा लापरवाही बरती गई। इसलिए दंगाइयों पर नियंत्रण पाने में देरी हुई।

ख़ुफ़िया तंत्र अगर सही तरह से काम कर होता तो दंगे होने से रोक सकते थे।
संवेदनशील इलाकों में लोगों के बीच क्या सुगबुगाहट चल रही है। इसकी भनक खुफिया तंत्र लगाने में विफल रहा या उसने गंभीरता से कोई कोशिश ही नहीं की।
 थानों में बीट में तैनात सिपाही भी अगर सतर्क होते तो पहले ही जानकारी मिल जाती। जिसके आधार पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करके स्थिति को बिगाड़ने से बचाया जा सकता था।

हल्का लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले दागना, पुलिस ने जाफराबाद से लेकर भजनपुरा तक हुए उपद्रव के दौरान शुरू में यही रवैया अपनाया।
दंगाई पिस्तौल, लाठी-डंडों से लैस होकर चल रहे थे। पत्थर और पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे। मकान, दुकान और धार्मिक स्थल को आग लगाई गई। खुलेआम हथियार लहराए जा रहे थे। गोलियां चलाई जा रही थी। लेकिन पुलिस बचाव की मुद्रा में दिखाई दी। क्योंकि पुलिस की तादाद कम थी। इसलिए पुलिस दंगाइयों को पकड़ने की कोशिश करने की बजाए उनको खदेड़ने की कोशिश करती रही।
जाफराबाद में खुलेआम फायरिंग करने और पुलिस वाले पर पिस्तौल तानने वाले शाहरुख को भी पुलिस ने तुरंत मौके पर ही नहीं पकड़ा।
25 फरवरी की शाम को यानी दंगों के तीसरे दिन पुलिस को दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए। हिंसाग्रस्त इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया।

आईपीएस की काबिलियत पर सवाल-

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस के पास ही इतने अधिकार है कि उसे दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए किसी से आदेश के लिए इंतजार की जरूरत ही नहीं है। घटनास्थल पर मौजूद पुलिस अफसर खुद ही दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए फैसला ले सकते हैं। इसके बावजूद तीन दिन तक दंगों पर काबू न पाया जाना  आईपीएस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल खड़े करता है।
 लेकिन इसके बावजूद लापरवाही बरतने के आरोप में किसी भी आईपीएस अफसर या एसएचओ के खिलाफ कोई विभागीय कार्रवाई तक नहीं की गई है।
दंगें के कारण डीसीपी दीपक मिश्रा को हटाया गया-
साल 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद  सीलमपुर, जाफराबाद और वेलकम इलाके में दंगे हुए थे।
दंगें होना और उन काबू पाने में देरी होना पुलिस अफसरों की पेशेवर काबिलियत पर सवाल खड़े कर देता है। 
इसलिए उस समय उत्तर पूर्वी जिले के तत्तकालीन डीसीपी दीपक मिश्रा का तबादला कर दिया गया था। 

सत्ता के लठैत आईपीएस-
पुलिस की भूमिका - शांतिपूर्वक धरना, प्रदर्शन और मार्च की इजाजत न देकर पुलिस लोगों के संवैधानिक/ लोकतांत्रिक अधिकार का हनन कर रही है। 
सरकार चाहे किसी भी दल की हो पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अफसर हमेशा सत्ता के लठैत की तरह ही काम करते हैं।
आईपीएस अफसर महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती के लिए नेताओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। 
कांग्रेस के राज में 2011 में  रामलीला मैदान में रात के समय तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता और आईपीएस धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में  पुलिस ने सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस का इस्तेमाल कर फिंरगी राज़ को भी पीछे छोड़ दिया। सलवार पहन कर भाग रहे रामदेव को पकड़ा था।


दुःख जताना ही पर्याप्त नहीं है।-
दंगों के लिए क्या कभी कोई प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और पुलिस कमिश्नर माफ़ी मांगना सीखेंगे ?
 गृहमंत्री ने संसद में दंगों में मारे लोगों की मौत पर सिर्फ दुःख जता कर अपना कर्तव्य पूरा समझ लिया। 
क्या गृहमंत्री के लिए सिर्फ दुःख जताना ही पर्याप्त है ?  गृहमंत्री को माफी मांगनी चाहिए थी। दंगों को रोकने में विफल आईपीएस के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी।

पुलिस और खुफिया तंत्र की पोल खुल गई-

केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और पुलिस की भी पोल इन दंगों ने खोल दी। लेकिन गृहमंत्री को तो पुलिस का काम इतना अच्छा लगा कि उन्होंने संसद में पुलिस की जमकर तारीफ की। 

पुलिस की तारीफ कर खुद को बचाया गृहमंत्री ने-
सच्चाई यह है कि पुलिस की तारीफ गृहमंत्री ने पुलिस के लिए नहीं की, अपितु अपने बचाव के लिए की है। पुलिस गृहमंत्री के अधीन है। दंगों के होने और उनको रोकने में पुलिस अफसरों के फेल होने ने गृहमंत्री को फेल साबित कर दिया।
गृहमंत्री अगर पुलिस के फेल होने की बात स्वीकार करते तो यह सीधे तौर पर गृहमंत्री को फेल साबित कर देता।

36 घंटे दंगे होना शर्मनाक -
दंगें तीन दिन तक चले लेकिन गृहमंत्री घंटों के हिसाब से यह तर्क दे रहे हैं कि दंगें 36 घंटे तक ही चले।
गृहमंत्री की नजर में शायद देश की राजधानी में 36 घंटे तक दंगे होना सरकार और पुलिस के लिए शर्मनाक नहीं है।  36 घंटों तक भी दंगे होना क्या यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पुलिस बुरी तरह फेल हो गई।
हालांकि राज्य सभा में  कपिल सिब्बल ने कहा कि गृहमंत्री का यह दावा सही नहीं है क्योंकि 26 फरवरी को भी एक युवक की दंगाइयों ने धर्म पूछने के बाद हत्या की थी।

दंगों की साज़िश होती रही ख़ुफ़िया एजेंसी सोती रही--
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि दंगों के पीछे गहरी साज़िश की संभावना है। 
गृहमंत्री का यह कहना ही उनकी काबिलियत पर सवालिया निशान लगाते है। 
गृहमंत्री जी क्या सिर्फ इतना कहने भर से आप की जिम्मेदारी खत्म हो जाती हैं। देश की राजधानी में दंगों की साज़िश रच कर दंगों को अंजाम दिया गया तो क्या यह आपके और आपकी पुलिस और खुफिया तंत्र के फेल हो जाने को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है ?

यूपी से 300 दंगाई आए थे यह बात गृहमंत्री कह रहे हैं तो गृहमंत्री जी यूपी में भी आपकी सरकार है यह बात आपके अलावा यूपी पुलिस और खुफिया एजेंसी की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते है।
 ख़ुफ़िया एजेंसियों के जासूसों को इस बात की ज़रा भी भनक नहीं लगी कि दिल्ली ही नहीं यूपी में भी सैकड़ों लोग दिल्ली में जाकर दंगा करने की साज़िश रच रहे हैं।

 कार्रवाई क्यों नहीं की-

सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम लिए बगैर गृहमंत्री ने उन्हें और वारिस पठान आदि के  भड़काने वाले भाषणों को  दंगे भड़काने के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

गृहमंत्री की यह बात  अगर सही भी मान ली जाए तो क्या गृहमंत्री बता सकते हैं कि इन नेताओं के खिलाफ उन्होंने कानूनी कार्रवाई करके उनको जेल में क्यों नहीं डाला ? 
गृहमंत्री  क्या बता सकते हैं कि "देश के गद्दारों को गोली मारो सालो" को जैसे भड़काने वाले भाषण देने वाले अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा आदि ने क्या शांति स्थापित करने के लिए यह बयान दिए थे ? 
गृहमंत्री जी सोनिया हो या अनुराग ठाकुर का भड़काने वाला मामला अगर आप वाकई निष्पक्ष होकर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करते तो पता चलता कि आपने दंगों को होने से रोकने की कोशिश की थी।
चाणक्य ने कहा था कि राजा वहीं सफल होता हैं जिसका ख़ुफ़िया तंत्र मजबूत होता है।


बातों से नहीं कर्म से पटेल बनो-
सरदार पटेल की बात करने से ही कोई सरदार पटेल नहीं बन जाता है। सरदार पटेल जैसा बनने के लिए उनकी तरह ईमानदारी से बिना भेदभाव के ठोस/ सख्त कदम उठाने चाहिए।
गृहमंत्री  दंगों के होने और रोकने में नाकाम आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ अगर कार्रवाई करते तो वह एक नजीर पेश कर सकते थे।
गृहमंत्री माफी मांगना कब सीखेंगे-
गृहमंत्री अपनी जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहने के लिए बिना झिझके दंगों के होने के लिए खुद की जिम्मेदारी लेते और माफी भी मांग लेते तो इससे उनका कद न केवल बढ़ता बल्कि अच्छी परंपरा शुरू करने का श्रेय भी मिलता।
ऐसा क़दम ही उनको पहले के गृह मंत्रियों से अलग दिखाता।
लेकिन अफसोस अमित शाह ने भी वैसा ही किया जैसा पहले के गृहमंत्री भी करते थे। पुलिस को सत्ता के लठैत की तरह इस्तेमाल किया जाता है इसलिए नेता पुलिस अफसरों को बचाते हैं।


दूसरे के पाप गिनवाने से अपने पाप कम नहीं हो जाते-

गृहमंत्री ने कहा कि कांग्रेस के राज में सबसे ज्यादा दंगें हुए थे।  
क्या कांग्रेस के पाप गिनवाने से भाजपा के पाप कम हो जाएंगे ?
अफसोस की बात है कि भाजपा 84 में दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार को और कांग्रेस गुजरात दंगें की बात करके एक-दूसरे के पाप गिनवाने में ही लगे रहते हैं।
लेकिन दंगों के लिए कोई माफी तक नहीं मांगता।





Thursday, 12 March 2020

पुलिस की तारीफ कर गृहमंत्री ने खुद को बचाया। गृहमंत्री और पुलिस कमिश्नर माफ़ी मांगना कब सीखेंगे ?

पुलिस की तारीफ कर गृहमंत्री ने खुद को बचाया,
गृहमंत्री और पुलिस कमिश्नर माफ़ी मांगना कब सीखेंगे ?

इंद्र वशिष्ठ
दंगों के लिए क्या कभी कोई प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और पुलिस कमिश्नर माफ़ी मांगना सीखेंगे ?
दिल्ली दंगों में पचास से ज्यादा लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए।
लेकिन गृहमंत्री ने संसद में दंगों में मारे लोगों की मौत पर सिर्फ दुःख जता कर अपना कर्तव्य पूरा समझ लिया। 
क्या गृहमंत्री के लिए सिर्फ दुःख जताना ही पर्याप्त है ?  गृहमंत्री को माफी मांगनी चाहिए थी। दंगों को रोकने में विफल आईपीएस के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी।

दिल्ली में तीन दिनों तक लगातार हुए दंगों को रोकने में पुलिस बुरी तरह फेल हो गई। 

पुलिस और खुफिया तंत्र की पोल खुल गई-

केंद्रीय खुफिया एजेंसियों और दिल्ली पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र की पोल इन दंगों ने खोल दी। 
लेकिन गृहमंत्री को तो पुलिस का काम इतना अच्छा लगा कि उन्होंने संसद में पुलिस की जमकर तारीफ की। 

पुलिस की तारीफ कर खुद को बचाया गृहमंत्री ने-
सच्चाई यह है कि पुलिस की तारीफ गृहमंत्री ने पुलिस के लिए नहीं की, अपितु अपने बचाव के लिए की है। पुलिस गृहमंत्री के अधीन है। दंगों के होने और उनको रोकने में पुलिस अफसरों के फेल होने ने गृहमंत्री को फेल साबित कर दिया।
गृहमंत्री अगर पुलिस के फेल होने की बात स्वीकार करते तो यह सीधे तौर पर गृहमंत्री को फेल साबित कर देता।
इसलिए पुलिस की तारीफ गृहमंत्री ने अपने आप को बचाने के लिए की है।

36 घंटे दंगे होना शर्मनाक -

दंगें तीन दिन तक चले लेकिन गृहमंत्री घंटों के हिसाब से यह तर्क दे रहे हैं कि दंगें 36 घंटे तक ही चले।
गृहमंत्री की नजर में शायद देश की राजधानी में 36 घंटे तक दंगे होना सरकार और पुलिस के लिए शर्मनाक नहीं है।  36 घंटों तक भी दंगे होना क्या यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पुलिस बुरी तरह फेल हो गई।

दंगों की साज़िश होती रही ख़ुफ़िया एजेंसी सोती रही--
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि दंगों के पीछे गहरी साज़िश की संभावना है। 
गृहमंत्री का यह कहना ही उनकी काबिलियत पर सवालिया निशान लगाते है। 
गृहमंत्री जी क्या सिर्फ इतना कहने भर से आप की जिम्मेदारी खत्म हो जाती हैं। देश की राजधानी में दंगों की साज़िश रच कर दंगों को अंजाम दिया गया तो क्या यह आपके और आपकी पुलिस और खुफिया तंत्र के फेल हो जाने को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है ?

यूपी से 300 दंगाई आए थे यह बात गृहमंत्री कह रहे हैं तो गृहमंत्री जी यूपी में भी आपकी सरकार है यह बात आपके अलावा यूपी पुलिस और खुफिया एजेंसी की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते है।

आतंकवादियों का पता लगाने वाले दंगों की साज़िश का पता लगाने में फेल-
केंद्रीय खुफिया एजेंसी समय-समय पर आतंकियों के बारे में सूचना पुलिस को देती है ख़ास कर स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर। पुलिस उनके फोटो के पोस्टर भी लगवाती है यह बात दूसरी है कि आजतक शायद ही  उन पोस्टर के आधार पर कभी कोई आतंकवादी पकड़ा गया होगा।
इस उदहारण के माध्यम से यह बताने की कोशिश है जब आपकी खुफिया एजेंसी एक- दो आतंकवादी के बारे में भी सूचना जुटा लेती है तो खुफिया एजेंसी के जासूसों को इस बात की ज़रा भी भनक नहीं लगी कि दिल्ली ही नहीं यूपी में भी सैकड़ों लोग दिल्ली में जाकर दंगा करने की साज़िश रच रहे हैं।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम लिए बगैर गृहमंत्री ने उन्हें और वारिस पठान आदि के  भड़काने वाले भाषणों को  दंगे भड़काने के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

गृहमंत्री की यह बात  अगर सही भी मान ली जाए तो क्या गृहमंत्री बता सकते हैं कि इन नेताओं के खिलाफ उन्होंने कानूनी कार्रवाई करके उनको जेल में क्यों नहीं डाला ? वर्ना अब यह कहने से तो यह ही लगता है कि सिर्फ राजनीति करने के लिए विपक्ष पर आरोप लगाया गया है।
गृहमंत्री  क्या बता सकते हैं कि "देश के गद्दारों को गोली मारो सालो" को जैसे भड़काने वाले भाषण देने वाले अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा ने क्या शांति स्थापित करने के लिए यह बयान दिए थे ? 
गृहमंत्री जी सोनिया हो या अनुराग ठाकुर का मामला अगर आप वाकई निष्पक्ष होकर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करते तो पता चलता कि आपने दंगों को होने से रोकने की कोशिश की थी।
चाणक्य ने कहा था कि राजा वहीं सफल होता हैं जिसका ख़ुफ़िया तंत्र मजबूत होता है।

पुलिस और खुफिया तंत्र फेल हो जाने से
गृहमंत्री की काबिलियत पर सवालिया निशान लग गया है।

गृहमंत्री जी विपक्ष की बात तो माना कि राजनीति प्रेरित होती हैं। लेकिन
दिल्ली पुलिस के कई पूर्व कमिश्नरों तक ने खुल कर कहा कि दंगों के लिए पुलिस अफसर जिम्मेदार हैं। इन पूर्व पुलिस कमिश्नरों का यह बयान बहुत अहम है क्योंकि कोई भी आईपीएस अफसर बिना गंभीर/ ठोस वजह के अपनी पुलिस की कभी बुराई नहीं करता है। दंगों में इतने लोगों की मौत ने ही शायद इन पूर्व पुलिस आयुक्तों को सच्चाई कहने के लिए प्रेरित किया होगा।

लोगों की जान माल की रक्षा करने की जिम्मेदारी पुलिस की होती हैं पुलिस अपने इस कर्तव्य का पालन करने में बुरी तरह फेल हो गई।
गृहमंत्री और सरकार इस सच्चाई को स्वीकार करने में डर रही है।

बातों से नहीं कर्म से पटेल बनो-

सरदार पटेल की बात करने से ही कोई सरदार पटेल नहीं बन जाता है। सरदार पटेल जैसा बनने के लिए उनकी तरह ईमानदारी से बिना भेदभाव के ठोस/ सख्त कदम उठाने चाहिए।
गृहमंत्री  दंगों के होने और रोकने में नाकाम आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ अगर कार्रवाई करते तो वह एक नजीर पेश कर सकते थे।

गृहमंत्री माफी मांगना कब सीखेंगे-
गृहमंत्री अपनी जिम्मेदारी को निभाने में विफल रहने के लिए बिना झिझके दंगों के होने के लिए खुद की जिम्मेदारी लेते और माफी भी मांग लेते तो इससे उनका कद न केवल बढ़ता बल्कि अच्छी परंपरा शुरू करने का श्रेय भी मिलता।
ऐसा क़दम ही उनको पहले के गृह मंत्रियों से अलग दिखाता।
लेकिन अफसोस अमित शाह ने भी वैसा ही किया जैसा पहले के कांग्रेस के गृहमंत्री भी करते थे। पुलिस को सत्ता के लठैत की तरह इस्तेमाल किया जाता है इसलिए नेता पुलिस अफसरों को बचाते हैं।

दूसरे के पाप गिनवाने से अपने पाप कम नहीं हो जाते-

गृहमंत्री ने कहा कि कांग्रेस के राज में सबसे ज्यादा दंगें हुए थे।  
क्या कांग्रेस के पाप गिनवाने से भाजपा के पाप कम हो जाएंगे ?
अफसोस की बात है कि भाजपा 84 में दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार को और कांग्रेस गुजरात दंगें की बात करके एक-दूसरे के पाप गिनवाने में ही लगे रहते हैं।
दंगों के लिए कोई  माफी तक नहीं मांगता है। 

आईपीएस बने सत्ता के लठैत-
सरकार किसी भी दल की हो दंगों के मामले में  कभी कोई गृहमंत्री आईपीएस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते हैं।
दूसरी ओर ऐसे आईपीएस अफसर भी है जो भर्ती के समय कसम खाते है कि  संविधान, कानून के अनुसार ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करेंगे। लेकिन महत्वपूर्ण पद पाने के लिए उस कसम पर ख़ाक डाल कर नेताओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। 
रिटायरमेंट के बाद भी अच्छा पद पाने के लिए ही सेवा में रहते हुए ऐसे आईपीएस अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से नहीं करते। खाकी को ख़ाक में मिलाने वाले
ऐसे आईपीएस खुद नतमस्तक हो कर अपनी लगाम नेताओं के हाथ में सौंप देते हैं फिर कहते हैं कि हमारे तो हाथ नेताओं ने बांध रखें हैं। 
यह बात दूसरी है भ्रष्टाचार करते समय पुलिस के यह दोनों हाथों पूरी तरह खुल जाते हैं। 
दंगों के होने और उनको रोकने में नाकाम रहने के लिए पुलिस अफसर ही जिम्मेदार होते हैं ।