Wednesday, 11 March 2020

दिल्ली दंगों के पीछे गहरी साज़िश, यूपी से आए थे 300 दंगाई, पुलिस ने चलाई 400 गोलियां, आंसू गैस के 5 हजार गोले दागे।



दिल्ली दंगों के पीछे गहरी साज़िश ?
यूपी से आए थे 300 दंगाई,
पुलिस ने चलाई 400 गोलियां,
आंसू गैस के 5000 गोले दागे,

इंद्र वशिष्ठ
क्या दिल्ली में हुए दंगों के पीछे कोई गहरी साज़िश है ?  पूर्व नियोजित षड़यंत्र की संभावना को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने साजिश की धारा के तहत भी एक एफआईआर दर्ज की है। 
दंगों में पचास से ज्यादा लोग मारे गए और हजारों करोड़ की संपत्ति का नुक़सान हुआ है।

दिल्ली में तीन दिनों तक हुए साम्प्रदायिक दंगों पर संसद में हुई चर्चा पर जवाब देते हुए गृहमंत्री ने यह जानकारी दी।

गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि इतने कम समय में इतने बड़े पैमाने पर दंगें फैलना तभी संभव है जब षड़यंत्र हो। दंगों के पीछे पूर्व नियोजित षड़यंत्र है इसकी संभावना का पता लगाने के लिए ही साजिश का मामला दर्ज किया गया है।
उत्तर प्रदेश से आए थे 300 दंगाई-
गृह मंत्री ने कहा  कि अभी तक की जांच में पता चला कि तीन सौ से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश से यहां दंगा करने आए।
इससे यह साबित होता है कि दंगों के पीछे गहरी साज़िश है। साजिश का पर्दाफाश करने और साजिश रचने वालों को पकड़ने के लिए ही दिल्ली पुलिस ने साजिश की धारा के तहत भी एक एफआईआर दर्ज की है।

1100 दंगाइयों की पहचान फेस आइडेंटीफिकेशन साफ्टवेयर से हो चुकी है। उससे ही यह पता चला है कि तीन सौ से ज्यादा लोग उत्तर प्रदेश से यहां दंगा करने आए थे। 
पुलिस ने दंगाइयों के चेहरे पहचानने के लिए  इस साफ्टवेयर में वोटर कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य सरकारी डाटा डाला है। उत्तर प्रदेश से भी डाटा लिया गया। उससे स्पष्ट यह साबित होता है कि यह गहरी साज़िश है।

अमित शाह ने कहा कि साफ्टवेयर धर्म नहीं देखता, कपड़े नहीं देखता। सिर्फ चेहरा और कृत्य यानी करतूत देखकर पहचान करता है।
पुलिस की 40 टीम दंगाइयों को पकड़ने में जुटी हुई हैं।

पुख्ता सबूत पर ही गिरफ्तारी-
गृह मंत्री ने कहा कि इस मामले में गिरफ्तारी उसी की होगी जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत होंगे। उन सबूतों को पहले आला पुलिस अफसर जांचेंगे। ताकि कोई निर्दोष नहीं पकड़ा जाए। वैज्ञानिक साक्ष्य गिरफ्तारी का आधार होगा। साक्ष्य, बयान की वीडियोग्राफी भी कराई जा रही है। 

एसआईटी-
दंगों की जांच के लिए दो विशेष जांच टीम गठित की गई है। एसआईटी गंभीर अपराध के 49 मामलों की जांच कर रही है।

दंगें के लिए पैसा दिया-
दंगें कराने के लिए पैसा देने के मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

36 घंटों में दंगों पर काबू कर लिया-
अमित शाह ने संसद कहा कि कहा कि 24 फरवरी को दोपहर दो बजे दंगे होने की पहली सूचना और 25 फरवरी की रात 11 बजे दंगे की अंतिम सूचना पुलिस को मिली थी। दंगें 36 घंटे तक चले। 36 घंटे में दंगों को शांत करने में पुलिस सफल रही।

12 थानों के इलाके दंगाग्रस्त -
20 लाख की आबादी वाले 12 थानों के इलाकों में दंगे हुए।
सुरक्षा बलों की 80 कंपनियां तैनात दंगाग्रस्त इलाके में अभी तक तैनात हैं।
700 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गई है। 2647 लोगों को गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया है।

दंगों के वीडियो और सीसीटीवी कैमरे की फुटेज का 25 से ज्यादा कंप्यूटरों पर एनालिसिस किया जा रहा है।

पुलिस ने 400 गोलियां चलाई-
गृहमंत्री ने बताया कि दंगों पर काबू पाने के लिए पुलिस ने 400 से ज्यादा गोलियां चलाई और आंसू गैस के 5000 गोले दागे गए।

दंगें भड़काने में सोशल मीडिया का इस्तेमाल-
दंगें भड़काने के लिए सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल किया गया है। ऐसे 60 सोशल मीडिया एकाउंट का पता चला है जो दंगें से पहले बनाए और दंगों के बाद 26 फरवरी को बंद कर दिए गए।

गृह मंत्री ने कहा कि सोशल मीडिया एकाउंट बंद कर देने से अपराधी बच नहीं जाएंगे।
जिन्होंने भी दंगा करने की हिमाकत की है। वह कानून की गिरफ्त से एक इंच भी इधर उधर नहीं भाग पाएगा।
 दंगों को दिल्ली में फैलने नहीं देने में दिल्ली पुलिस ने बहुत जिम्मेदारी से काम किया है।


उल्लेखनीय है कि दिल्ली पुलिस के अनेक पूर्व आयुक्त तक खुल कर कह चुके हैं कि तीन दिन तक दंगों को रोकने में पुलिस बुरी तरह फेल हो गई थी।
इन दंगों ने केंद्रीय खुफिया एजेंसी और पुलिस की खुफिया एजेंसी की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगा दिया हैं।




Saturday, 29 February 2020

दिल्ली में दंगों ने खोली IPS की पोल, गृहमंत्री की भूमिका पर सवालिया निशान।


दिल्ली में दंगों ने खोली IPS की पोल, 
गृहमंत्री की भूमिका पर सवालिया निशान।

इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली  के कई इलाकों में 3-4 दिनों तक दंगाइयों का राज़ रहा। दंगाई पिस्तौल, पेट्रोल बम, लाठी-डंडों और पत्थर से लोगों पर हमला करते रहे। मकान, दुकान, स्कूल और धार्मिक स्थल में आग लगाते रहे। दंगाइयों ने दिल्ली पुलिस के हवलदार समेत चालीस से ज्यादा लोगों की जान ले ली।
तीन दिन तक दंगों को रोकने में पुलिस विफल रही। लेकिन इस मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में किसी भी आईपीएस अफसर या एसएचओ के खिलाफ कोई विभागीय  कार्रवाई भी अब तक नहीं की गई है।

किसी भी इलाके में दंगे होना स्थानीय थाना पुलिस और खुफिया तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर देता है।
दंगें होने के बाद कई दिनों तक उस पर काबू ना कर पाना आईपीएस अधिकारियों की काबिलियत पर सवालिया निशान खड़े कर देता है।
पुलिस का काम लोगों की जान-माल की रक्षा करने का होता है। पुलिस अपना यह काम करने में बुरी तरह फेल हो गई।

सांप्रदायिक दंगों के लिए बकायदा एसओपी है यानी दंगों के हालात में क्या कदम उठाए जाने चाहिए तय है। 
इसके बावजूद दंगों  में इतने लोगों की जान चली गई और संपत्ति का नुक़सान हुआ है।
इन दंगों के मामले में यह भी साफ़ है कि दंगों पर नियंत्रण के लिए पर्याप्त पुलिस बल नहीं भेजा गया। 
इससे पता चलता है कि दंगों की स्थिति का आकलन करने में अफसरों द्वारा लापरवाही बरती गई। इसलिए दंगाइयों पर नियंत्रण पाने में देरी हुई।

ख़ुफ़िया तंत्र और पुलिस की लापरवाही/विफलताओं के लिए संबंधित पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
पुलिस बल के मुखिया होने के नाते तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए ।
इसके बाद विशेष पुलिस आयुक्त ( कानून एवं व्यवस्था) सतीश गोलछा, संयुक्त पुलिस आयुक्त आलोक कुमार, जिला पुलिस उपायुक्तों वेद प्रकाश सूर्य और अमित शर्मा और दंगाग्रस्त इलाके के एसीपी और एसएचओ के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि दंगाइयों द्वारा किए पथराव में अमित शर्मा भी घायल हुए हैं।

दंगों के कारण डीसीपी दीपक मिश्रा को हटाया गया-
साल 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद  सीलमपुर, जाफराबाद और वेलकम इलाके में दंगे हुए थे।
दंगें होना और उन पर काबू पाने में देरी होना पुलिस अफसरों की पेशेवर काबिलियत पर सवाल खड़े कर देता है। 
इसलिए उस समय उत्तर पूर्वी जिले के तत्तकालीन डीसीपी दीपक मिश्रा का तबादला कर दिया गया था। 

कहा तो यहां तक जाता है कि तत्कालीन पुलिस कमिश्नर मुकुंद बिहारी कौशल ने दीपक मिश्रा के भविष्य/ नौकरी को ख़राब होने से बचा लिया था। वर्ना दीपक मिश्रा की नौकरी ख़तरे में पड़ सकती थी। मुकुंद बिहारी कौशल ने दीपक मिश्रा को न केवल बचाया बल्कि उसे पश्चिम जिला में तैनात कर दिया।

पुलिस अफसरों के मुताबिक असल में हुआ यह बताते हैं कि उस समय पुलिस ने लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना तरीके से इतनी अंधा धुंध गोलियां चलाई थी कि उसका जवाब देना भारी पड़ गया था। गोलियों का हिसाब किताब दिखाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।
बताया जाता है कि एक आईपीएस अफसर ने तो  साफ़ मना कर दिया था कि गोलियों का हिसाब पूरा करने के लिए उसका नाम गोली चलाने वालों में शामिल न किया जाए।
दक्षिण भारतीय यह आईपीएस कुछ समय पहले ही विशेष आयुक्त के पद से रिटायर हुए हैं।

डीसीपी हटाया-
शाहीन बाग और जामिया में धरना प्रदर्शन करने वालों पर गुंडों द्वारा गोलियां चलाईं गई।
 लोगों की सुरक्षा में लापरवाही बरतने के लिए तत्तकालीन डीसीपी चिन्मय बिस्वाल को हटा दिया गया।

स्पेशल कमिश्नर को‌ हटाया-

पिछले साल तीस हजारी कोर्ट में वकीलों ने पुलिस वालों को जमकर पीटा, आगजनी और तोड़फोड़ की।

इस मामले में भी विशेष पुलिस आयुक्त कानून व्यवस्था संजय सिंह और उत्तरी जिले के तत्तकालीन एडिशनल डीसीपी हरेंद्र सिंह का तबादला कर दिया गया।
 हरेंद्र सिंह को तो वकीलों ने बुरी तरह पीटा था। हालांकि इन दोनों के तबादले से पुलिस में जबरदस्त रोष पैदा हो गया था।

गृहमंत्री की भूमिका पर सवालिया निशान-

ऐसे में जब दंगों में चालीस से ज्यादा लोगों की जान चली गई और सैंकड़ों लोग घायल हो गए। लेकिन अभी तक किसी भी आईपीएस अफसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं किया जाना गृह मंत्री अमित शाह और उपराज्यपाल अनिल बैजल की भूमिका पर सवालिया निशान लगाते हैं।

प्रधानमंत्री के काफिले के रास्ते में अगर कोई व्यक्ति गलती से भी आ जाता है। तो उसे सुरक्षा में गंभीर चूक माना जाता है। पुलिस अफसरों तक के खिलाफ  कार्रवाई की जाती है।
क्या चालीस से ज्यादा लोगों की जान जाना  गंभीर मामला नहीं है? 
या सिर्फ प्रधानमंत्री की जान की ही कीमत है ?
आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं?
आम आदमी की जान की रक्षा करने में पुलिस की यह जबरदस्त चूक है।

दंगें में एक पुलिसकर्मी के शहीद होने से पुलिस का मनोबल प्रभावित होता है। चालीस से ज्यादा लोगों के मरने का आम लोगों को भी गहरा सदमा लगता है। 

भड़काने वाले भाषण देने वाले नेताओं के खिलाफ पुलिस अफसर अगर पहले ही कार्रवाई कर देते तो दंगे होने से रोके जा सकते थे।










Wednesday, 26 February 2020

कमिश्नर की वर्दी पर लागा दंगों का दाग़, अमूल्य पटनायक एक बार फिर नाकारा साबित।



पुलिस कमिश्नर एक बार फिर नाकारा साबित।
कमिश्नर की वर्दी पर लागा दंगों का दाग़  ।

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली में हुए दंगों ने पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक को एक बार फिर से नाकारा और विफल कमिश्नर साबित कर दिया। 
अमूल्य पटनायक दंगों के बदनुमा दाग़ लेकर कमिश्नर पद से रिटायर होंगे। दंगें में शहीद हुए दिल्ली पुलिस के हवलदार रतन लाल समेत सभी बेकसूर लोगों की मौत के लिए पुलिस कमिश्नर ही जिम्मेदार हैं। पुलिस का काम लोगों की सुरक्षा और कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने का है। इसलिए पुलिस बल का मुखिया होने के नाते पुलिस कमिश्नर ही जिम्मेदार है। 

इसके अलावा जिले के डीसीपी,एसएचओ से लेकर बीट में तैनात सिपाही तक भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। वसूली के लिए तो गलियों की खाक तक छानने वाली थाना स्तर की पुलिस अगर सतर्क होती तो इतनी बड़ी तादाद में लोगों के एकत्र होने की सूचना पहले ही मिल जाती और उनको जमा होने से रोका जा सकता था।   

ख़ुफ़िया एजेंसियों की पोल खुल गई-

इन दंगों ने दिल्ली पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। इसलिए पूर्वी दिल्ली में लगातार तीन दिनों तक हुए दंगों से गृहमंत्री अमित शाह की काबिलियत पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
देश की राजधानी में तीन चार-दिनों तक दंगे होते रहे और उन पर काबू पाने में पुलिस कमिश्नर विफल रहे। 

कई पूर्व आईपीएस अधिकारियों  का भी  कहना हैं कि सीएए के विरोध में धरना प्रदर्शन लंबे समय से चल रहा है। इस आंदोलन के कारण ही हिंसा हुई है। ऐसे में पुलिस को पहले से ऐसे लोगों की पहचान करनी चाहिए थी और उन पर नजर रखना चाहिए थी जो इस आंदोलन को उकसा रहे थे। इससे हिंसा शुरू ही नहीं हो पाती। हिंसा ने पुलिस के ख़ुफ़िया तंत्र की पोल खोल दी।
ख़ुफ़िया तंत्र अगर सही तरह से काम कर होता तो दंगे होने से रोक सकते थे।
संवेदनशील इलाकों में लोगों के बीच क्या सुगबुगाहट चल रही है। इसकी भनक खुफिया तंत्र लगाने में विफल रहा या उसने गंभीरता से कोई कोशिश ही नहीं की।
पुलिस का ख़ुफ़िया तंत्र और थाने में बीट के सिपाही भी अगर सतर्क होते तो पहले ही जानकारी मिल जाती। जिसके आधार पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करके स्थिति को बिगाड़ने से बचाया जा सकता था।

पुलिस शुरू से ही सतर्कता और सख्ती बरतती तो हालात बेकाबू नहीं होते-

हल्का लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले दागना, पुलिस ने जाफराबाद से लेकर भजनपुरा तक हुए उपद्रव के दौरान शुरू में यही रवैया अपनाया।
दंगाई पिस्तौल, लाठी-डंडों से लैस होकर चल रहे थे। पत्थर और पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे। मकान, दुकान और धार्मिक स्थल को आग लगाई गई। खुलेआम हथियार लहराए जा रहे थे। गोलियां चलाई जा रही थी। लेकिन पुलिस बचाव की मुद्रा में दिखाई दी। क्योंकि पुलिस की तादाद कम थी। इसलिए पुलिस दंगाइयों को पकड़ने की कोशिश करने की बजाए उनको खदेड़ने की कोशिश करती रही।
जाफराबाद में खुलेआम फायरिंग करने और पुलिस वाले पर पिस्तौल तानने वाले शाहरुख को भी पुलिस ने तुरंत मौके पर ही नहीं पकड़ा।
25 फरवरी की शाम को यानी दंगों के तीसरे दिन पुलिस को दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए। हिंसाग्रस्त इलाकों में कर्फ्यू लगाया गया।

आईपीएस की काबिलियत पर सवाल-

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस के पास ही इतने अधिकार है कि उसे दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए किसी से आदेश के लिए इंतजार की जरूरत ही नहीं है। घटनास्थल पर मौजूद पुलिस अफसर खुद ही दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए फैसला ले सकते हैं। इसके बावजूद तीन दिन तक दंगों पर काबू न पाया जाना पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अधिकारियों की काबिलियत पर सवाल खड़े करता है।

लोकतंत्र में शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन करना सबका अधिकार है।
शांतिपूर्वक आंदोलन करने वाले लोगों की सुरक्षा व्यवस्था करना पुलिस का काम है।
शाहीन बाग/ जामिया के आंदोलनकारियों पर गुंडों द्वारा 2-3 बार गोलियां चलाई गईं। इससे पुलिस की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया। 

अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा में दम है तो खुद गोली मार कर दिखाएं।-

दिल्ली विधानसभा के  चुनाव के दौरान मंत्री अनुराग ठाकुर द्वारा "देश के गद्दारों को गोली मारो सालो" को जैसे भड़काने वाले भाषण खुलेआम दिए गए। इसके बाद ही शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे लोगों पर गुंडों द्वारा गोलियां चलाई गईं। हालांकि  गोली चलाने के मामले में एक नाबालिग और कपिल गुर्जर को मौके पर ही पकड़ गया। 
अनुराग ठाकुर की तरह ही कपिल मिश्रा ने भी इसी तरह भड़काने वाले भाषण दिए। लेकिन पुलिस ने इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
गोली मारने का जो काम वह उकसा कर दूसरों से करवाना चाहते हैं। वह खुद क्यों नहीं करके दिखाते हैं ?
असल में ये नेता धूर्त होते हैं लोगों को इनके बहकावे और उकसाने में नहीं आना चाहिए। लोगों को ख़ास कर युवाओं को अपनी जिंदगी ऐसे लोगों के चक्कर में बर्बाद नहीं करना चाहिए। नेता तो राज सुख  भोगता है और इनके उकसाने में आने वाला गोली चला कर जेल भोगता है।  लोगों में अगर जरा भी अक्ल है तो इन नेताओं से कहना चाहिए कि तुम खुद जाकर गोली मार कर दिखाओ तो पता चलेगा कि तुम दोगले नहीं हो। लोग अगर ऐसे नेताओं को पलट कर जवाब देने लग जाएं तो इनकी अक्ल ठिकाने लग जाएगी। 

कपिल मिश्रा जानबूझकर अपने समर्थकों के साथ उस जगह गया जहां पर मुस्लिम महिलाओं द्वारा शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन किया जा रहा था। इस वजह से दंगे हुए और आसपास के इलाकों में भी फ़ैल गए।

सत्ता सुख ही असली धर्म-
यह वही कपिल मिश्रा है जिसे मंत्री पद से हटा दिया तो उसे  केजरीवाल में बुराईयां ही बुराईयां दिखाई देने लगी और केजरीवाल के खिलाफ बोलने लगा। उसके पहले यह आराम से न केवल मंत्री पद का सुख भोग रहा था बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में बहुत ही अपमानजनक भाषा में मंच से बोलता था। अनुपम खेर के सामने मोदी के बारे में बदतमीजी से बोलने का उसका वीडियो दुनिया ने देखा है। सत्ता सुख पाने के लिए फिर वह मोदी के चरणों में ही गिर गया। 
इन जैसे लोगों का एक ही धर्म है कि किसी भी तरह सत्ता सुख मिल जाए।
अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके कपिल मिश्रा को लोगों ने भी नकार दिया।  
सुर्ख़ियो में रहने के लिए अनुराग ठाकुर और कपिल मिश्रा जैसे बयानवीर लोग भड़काने वाले बयान देते है।

गोलियां चली पर आपा नहीं खोया-
जिस मुस्लिम समुदाय के लोगों को दंगों के लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है। जिनकी महिलाएं पर्दे में रहती हैं।
उस समुदाय की महिलाओं द्वारा इतने लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से शाहीन बाग में धरना दिया जा रहा है।  गुंडों द्वारा उन पर गोलियां भी चलाई गईं इसके बावजूद इन लोगों ने आपा नहीं खोया और संयम का परिचय दिया। 
सरकार का कोई नुमाइंदा इन लोगों से बात करने या उनको समझाने के लिए शाहीन बाग नहीं गया। इन लोगों को गृहमंत्री आदि के निवास तक मार्च तक करने नहीं दिया गया। अब ऐसे में इनकी बात सरकार तक कैसे पहुंचे। सरकार की नीयत और कानून सही है तो वह इन लोगों से मिलने और बात करने से क्यों डरती है।

सत्ता के लठैत आईपीएस-
पुलिस की भूमिका - शांतिपूर्वक धरना, प्रदर्शन और मार्च की इजाजत न देकर पुलिस लोगों के संवैधानिक/ लोकतांत्रिक अधिकार का हनन कर रही है। 
सरकार चाहे किसी भी दल की हो पुलिस कमिश्नर और आईपीएस अफसर हमेशा सत्ता के लठैत की तरह ही काम करते हैं।
आईपीएस अफसर महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती के लिए नेताओं के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। 
कांग्रेस के राज में 2011 में  रामलीला मैदान में रात के समय तत्कालीन पुलिस कमिश्नर बृजेश कुमार गुप्ता और आईपीएस धर्मेंद्र कुमार के नेतृत्व में  पुलिस ने सोते हुए महिलाओं और बच्चों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस का इस्तेमाल कर फिंरगी राज़ को भी पीछे छोड़ दिया। सलवार पहन कर भाग रहे रामदेव को पकड़ा था।

सरकार का विरोध करना देशद्रोह नहीं होता-

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता का कहना है कि जब तक कोई प्रदर्शन हिंसात्मक नहीं हो जाता,तब तक सरकार को उसे रोकने का अधिकार नहीं है।
सरकारें हमेशा सही नहीं होती। बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के खिलाफ है। 

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि अफसोस की बात है कि आज देश में असहमति को देशद्रोह समझा जा रहा है। असहमति की आवाज को देश विरोधी या लोकतंत्र विरोधी करार देना संवैधानिक मूल्यों पर चोट है। 
सरकार और देश दोनों अलग हैं। सरकार का विरोध करना आपको देश के खिलाफ खड़ा नहीं करता।
हाल के दिनों में विरोध करने वालों को देशद्रोही बता दिया गया। उन्होंने कहा अगर किसी पार्टी को 51 फीसदी वोट मिलता है तो इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी 49 फीसदी लोग पांच साल तक कुछ नहीं कहेंगे। लोकतंत्र 100 फीसदी लोगों के लिए होता है। इसलिए हर किसी को लोकतंत्र में अपनी भूमिका का अधिकार है।















Friday, 14 February 2020

महिला की FIR दर्ज न करने वाले सदर बाजार थाने को CP, IPS ने चुना सर्वश्रेष्ठ थाना। घिटोरनी थाने को भी सर्वश्रेष्ठ थाना चुना जाना चाहिए

महिला की FIR दर्ज न करने वाले सदर बाजार थाने को IPS ने चुना सर्वश्रेष्ठ थाना।
घिटोरनी थाने को भी सर्वश्रेष्ठ थाना चुना जाना चाहिए-

इंद्र वशिष्ठ

लूट की शिकार हुई महिला की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करने वाले सदर बाजार थाना को दिल्ली पुलिस का सर्वश्रेष्ठ थाना चुना गया है। शिकायतकर्ता की शिकायत तक रिसीव नहीं करने वाले फर्श बाजार थाना को भी सर्वश्रेष्ठ थाना चुना गया है।

दिल्ली पुलिस के काबिल आईपीएस अफसरों द्वारा तीन थानों को सर्वश्रेष्ठ थाना घोषित किया गया है। इनमें प्रथम स्थान सदर बाजार थाना,दूसरा स्थान कालकाजी थाना और तीसरा स्थान फर्श बाजार थाना को मिला है। इन थानों के एस एच ओ को पुलिस दिवस पर आयोजित समारोह में ट्राफी दे कर सम्मानित किया जाएगा।

इस मामले से पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और  आईपीएस अधिकारियों की भूमिका पर सवालिया निशान लग गया है।

सर्वश्रेष्ठ सदर बाजार थाना की करतूत-

महिला लुटी और कार के नीचे आते-आते बची।  सदर बाजार थाना पुलिस ने एफआईआर तक  दर्ज नहीं की--

16 सितंबर 2019 को सदर बाजार इलाके में स्कूटर सवार  लुटेरे ने एक महिला से चेन छीनने में ऐसा झटका मारा कि वह सड़क पर गिर गई। महिला के पीछे से वैन और सामने से कार आ रही थी महिला कार के नीचे आते-आते बची। पुलिस को 100 नंबर पर  कॉल की गई। पीसीआर महिला को थाने ले गई। पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।
महिला से एक सादे काग़ज़ पर शिकायत लिखवा ली गई। महिला के पति ने खुद लोगों के पास जाकर सीसीटीवी फुटेज दिखाने की गुहार लगाई। इसके बाद वारदात का सीसीटीवी फुटेज सामने आया। वारदात की जगह पर पुलिस का सीसीटीवी कैमरा भी लगा हुआ है लेकिन वह शो-पीस बन हुआ है।
 आरोप है कि सीसीटीवी फुटेज पुलिस को दिए जाने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। वारदात को अंजाम देने के बाद भी वह लुटेरा इलाके में ही घूमता देखा गया। सीसीटीवी फुटेज में लुटेरे के स्कूटर का नंबर भी साफ़ है। 23 सितंबर को समाचार पत्र में यह मामला उजागर होने पर  पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।

महिला डीसीपी मोनिका भारद्वाज के होते हुए पीड़ित महिला की रिपोर्ट न दर्ज करने से पुलिस का संवेदनहीन चेहरा उजागर हो गया।

वैसे अपराध कम दिखाने के लिए एफआईआर दर्ज न करने में डीसीपी मोनिका भारद्वाज माहिर हैं।
मोनिका भारद्वाज ने पश्चिम जिला की डीसीपी रहते हुए 88 वारदात एक ही एफआईआर में दर्ज करने का कारनामा किया था।
यह जग जाहिर है कि सदर बाजार थाना को दिल्ली के सबसे मलाईदार थानों में गिना जाता है।
सड़क और पटरी पर अतिक्रमण कर धंधा करने वाले पुलिस की उगाही का बहुत बड़ा जरिया है।
आईपीएस अधिकारियों के अलावा पूरी दुनिया को  यह सब कुछ दिखाई देता है

फर्श बाजार थाना की करतूत-

10 फरवरी 2020 को एक व्यक्ति फर्श बाजार थाना में शिकायत दर्ज कराने गया। उसने अपनी लिखित शिकायत पुलिस को दी। शिकायतकर्ता एसएचओ ए के सिंह से मिला। लेकिन पुलिस ने शिकायत पत्र को रिसीव तक करने से मना कर दिया। शिकायतकर्ता के वकील सत्य प्रकाश शर्मा ने स्पेशल कमिश्नर (कानून- व्यवस्था) सतीश गोलछा को फोन किया तब सतीश गोलछा के दखल के बाद शिकायत पत्र को रिसीव किया गया और उस पर मुहर लगाई गई।

पुलिस कमिश्नर और आईपीएस की भूमिका पर सवालिया निशान-

जिस सदर बाजार थाने में लुटेरों की शिकार महिला की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की जाती है। जिस फर्श बाजार थाने में आम आदमी का  शिकायत पत्र रिसीव तक नहीं किया जाता है। उन थानों को सर्वश्रेष्ठ थाना चुना जाना पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगाता है।

शिकायत पत्र रिसीव तक नहीं करते-

वैसे यह हाल पूरी दिल्ली के थानों में है। बिना सिफारिश या पैसे दिए बिना आम आदमी की शिकायत रिसीव तक नहीं की जाती है यानी उसके शिकायत पत्र पर पुलिस मुहर तक आसानी से नहीं लगाती।
ओखला औद्योगिक इलाके में एक फैक्टरी के मालिक  ने बताया कि कुछ दिन पहले उसे अपनी शिकायत रिसीव कराने यानी मुहर लगवाने के लिए पांच हजार रुपए देने पड़े।


घिटोरनी थाने को भी  सर्वश्रेष्ठ थाना चुना जाना चाहिए-

मेट्रो में एक लड़की के सामने एक युवक द्वारा अश्लील हरकतें करने की शर्मनाक वारदात सामने आई। घबराई हुई लड़की ने हिम्मत कर मोबाइल से आरोपी की फोटो खींच ली।
लड़की इस मामले में एफआईआर दर्ज कराने मेट्रो के घिटोरनी थाने गई। वहां कोई महिला सिपाही नहीं थी। वहां मौजूद हवलदार को लड़की ने सारी बात बताई। इसके बावजूद हवलदार ने एफआईआर दर्ज करने से साफ़ मना कर दिया। लड़की ने पुलिस की महिला हेल्पलाइन पर मदद मांगी तब एफआईआर दर्ज की गई। लड़की ने टि्वट कर आपबीती बताई।

पुलिस कमिश्नर नाकारा-
 डीसीपी और एस एच ओ के खिलाफ कार्रवाई करने की तो पुलिस कमिश्नर में हिम्मत नहीं हैं। इसलिए पुलिस कमिश्नर सदर बाजार थाना की तरह घिटोरनी थाने को भी सर्वश्रेष्ठ थाना तो घोषित कर ही सकते हैं।

इन मामले ने पुलिस के महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने के दावे की एक बार फिर से धज्जियां उड़ाई हैं।








Saturday, 18 January 2020

CBI अफसरों के नाम पर रिश्वत मांगने वाले दो लोगों को CBI ने गिरफ्तार किया।




सीबीआई अफसरों के नाम पर रिश्वत मांगने वाले दो लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया।

इंद्र वशिष्ठ

सीबीआई के अफसरों के नाम पर रिश्वत मांगने वाले दो लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया है।

सीबीआई को सूचना मिली थी कि कुछ लोग सीबीआई अफसरों के नाम पर उन लोगों से रिश्वत मांग रहे हैं जिनके खिलाफ सीबीआई या केंद्रीय जांच एजेंसियों में मामले हैं।
इस सूचना के आधार पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया और दो लोगों को गिरफ्तार किया है। अभियुक्तों के नाम हैं  वाई मणिवर्धन रेड्डी निवासी हैदराबाद और सेल्वम रामाराज निवासी मदुरई तमिलनाडु।

ये दोनों अभियुक्त और कुछ अन्य लोग उन लोगों को धमकी दे रहे थे और मोटी रिश्वत मांग रहे थे जिनके खिलाफ केंद्रीय प्रवर्तन एजेंसियों में मामले है।

अभियुक्तों ने सीबीआई में दर्ज़  बैंक धोखाधड़ी के मामले के एक आरोपी से संपर्क किया और उसका मामला निपटाने के लिए सीबीआई के अफसरों के नाम पर रिश्वत मांगी।

अभियुक्तों ने मोबाइल  पर फोन कर खुद को सीबीआई अफसर के रूप में भी पेश किया।

वाई मणिवर्धन गुंटूर में जाकर सीबीआई मामले के आरोपी से मिला और दो दिन में रिश्वत न देने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

सीबीआई ने इस सिलसिले में चेन्नई में दो, हैदराबाद, मदुरै और शिवकाशी में एक-एक स्थान पर छापेमारी की। कई मोबाइल फोन और दस्तावेज आदि बरामद हुए हैं।







DSP की आतंकवादियों से सांठ-गांठ, खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान, NIA ने जांच शुरू की।

आतंकवादियों और डीएसपी की सांठ-गांठ से
खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान।

आतंकवादियों के मददगार  डीएसपी के खिलाफ एनआईए की जांच शुरू।

इंद्र वशिष्ठ

हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों के साथ गिरफ्तार किए गए कश्मीर पुलिस के डीएसपी देविंद्र सिंह मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी( एनआईए) ने शुरू कर दी है।
गृह मंत्रालय के आदेश के बाद एनआईए ने इस मामले में दोबारा से एफआईआर दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर दी है।

खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान--
कश्मीर पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पता चला है कि  डीएसपी देविंद्र सिंह लंबे समय से इन आतंकवादियों के संपर्क में था। यह भी खुलासा हुआ है कि 2018 में भी इन आतंकवादियों को लेकर जम्मू गया था। यहीं नहीं वह आतंकवादियों को अपने घर में पनाह देता था।
इस मामले ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार की खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवालिया निशान लगा दिया है। डीएसपी देविंद्र सिंह लंबे समय से आतंकवादियों को पाल पोस रहा था और खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
इस मामले में खुफिया एजेंसियों के अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादियों के साथ जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी देविंद्र सिंह को कश्मीर पुलिस ने 11 जनवरी को गिरफ्तार किया था। 
खुफिया सूचना के आधार पर इनको उस समय पकड़ा गया जब यह एक कार में  काजीगुंड इलाके में नेशनल हाईवे पर जा रहे थे।
डीएसपी देविंद्र सिंह के साथ हिजबुल मुजाहिदीन के टॉप कमांडर नवीद बाबू और आतंकवादी अलताफ सवार थे। इनके पास से हथियार और गोला-बारूद भी बरामद हुए थे।
इनके खिलाफ काजीगुंड थाने में मामला दर्ज किया गया था।
आतंकवादी नवीद बाबू पर दक्षिण कश्मीर में 11 गैर कश्मीरियों की हत्या में शामिल होने का आरोप है। जिनमें मजदूर और ट्रक ड्राइवर शामिल थे। नवीद पूर्व एसपीओ भी रहा है।

आतंकवादियों के साथ जम्मू कश्मीर के डीएसपी देविंद्र सिंह के पकड़े जाने के कारण मामले की गंभीरता को देखते हुए इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई है।

जम्मू कश्मीर पुलिस की हिरासत में देविंद्र सिंह से पूछताछ के दौरान  पता चला कि  उसने दोनों आतंकवादियों को चंडीगढ़ में कुछ महीने तक घर मुहैया कराने के लिए 12 लाख रुपए लिए थे।
डीएसपी देविंद्र सिंह आतंकवादी नवीद बाबू को पिछले साल जम्मू ले गया था और उसके बाद शोंपियां लौटने में भी उसकी मदद की थी।
डीएसपी देविंद्र सिंह की चल अचल संपत्ति की भी जांच भी शुरू कर दी गई है। उसकी दिल्ली, पंजाब और जम्मू कश्मीर में मौजूद संपत्तियों के बारे में भी जानकारी इकट्ठा की जा रही है।

डीएसपी  पहले भी विवादों में-
श्रीनगर एयरपोर्ट पर एंटी हाइजैकिंग टीम में तैनात डीएसपी देविंद्र सिंह साल 2013 में उस समय चर्चा में आया था जब संसद हमले में शामिल अफज़ल गुरु ने एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें दावा किया गया था डीएसपी देविंद्र सिंह ने उसे संसद हमले में शामिल एक आतंकवादी को दिल्ली साथ ले जाने और उसके रहने की व्यवस्था करने को कहा था।




Friday, 3 January 2020

लुटे-पिटे को भी धोखा देती है पुलिस। शांति,सेवा,न्याय का दावा खोखला। जागो लोगों FIR जरुर दर्ज़ कराओं।



जागो लोगों जागो FIR जरुर दर्ज़ कराओं।
लुटे-पिटे को भी धोखा देती है पुलिस।  
शांति, सेवा,न्याय का दावा खोखला, 
अपराध पर अंकुश के लिए सारे अपराध दर्ज करना ही एकमात्र रास्ता,

इंद्र वशिष्ठ

दिल्ली में दिनोंदिन अपराध बढ़ रहे है। अपराध बढ़ने का मुख्य कारण है पुलिस का वारदात को सही दर्ज न करना। अपराध के  मामले सही दर्ज होंगे तो अपराध में वृद्धि उजागर होगी और पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का दवाब बनेगा। पुलिस यह चाहती नहीं इसलिए पुलिस की कोशिश होती है कि अपराध के मामले कम से कम दर्ज किए जाए या फिर हल्की धारा में दर्ज किया जाए। लेकिन ऐसा करके पुलिस एक तरह से अपराधियों की ही मदद करती हैं। इसीलिए  बेख़ौफ़  लुटेरों ने आतंक मचा रखा है। महिला हो या पुरुष कोई भी कहीं पर भी सुरक्षित नहीं हैं।
लूटपाट और लुटेरों पर अंकुश लगाने में नाकाम पुलिस अपराध के आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का दावा करने में जुटी हुई हैं। 
अपराध और अपराधियों पर अंकुश का एकमात्र रास्ता आंकड़ों की बाजीगरी बंद हो-
अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने का एकमात्र और सटीक रास्ता सिर्फ अपराध के मामलों को सही दर्ज करना ही है। अपराध को दर्ज न करके आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम होने का झूठा दावा करने की पुलिस में परंपरा है।
 ऐसी बाजीगरी से ही पुलिस कमिश्नर अपने को सफल कमिश्नर साबित करने की कोशिश करते है इसी तरीके से एसएचओ और डीसीपी अपने को सफल अफसर दिखाते है। केंद्र में सरकार चाहे किसी दल की हो उसकी शह पर ही पुलिस यह तरीका अपनाती है। सरकार भी आंकड़ों की इस बाजीगरी के दम पर कानून-व्यवस्था अच्छी होने का झूठा दावा करती है। सिर्फ तत्कालीन  पुलिस कमिश्नर वी एन सिंह और भीम सेन बस्सी ने ही ईमानदार कोशिश की थी कि अपराध के मामले सही दर्ज किए जाए। भीमसेन बस्सी को कुछ हद तक इसमे सफलता भी मिली थी। 
जागो लोगों जागो - लुटे-पिटे को भी धोखा देती है पुलिस-  
पुलिस मोबाइल फोन/चेन/पर्स की लूट/स्नैचिंग,चोरी, या जेबतराशी के शिकार हुए लोगों को बहका कर उनसे ही यह लिखवा लेती है कि उनका मोबाइल या अन्य सामान गिर / खो गया है या शिकायतकर्ता को खुद ही ऑन लाइन लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने को कह देते है। शिकायतकर्ता महिला हो तो उसे कह देते है कि केस दर्ज कराओंगी तो अपराधी की पहचान करनी पड़ेगी, कोर्ट में भी चक्कर काटने पड़ेंगे आदि। पुलिस वाले इस अंदाज में महिला को " समझाते" है कि महिला को लगता कि पुलिसवाला उसका शुभचिंतक है और पुलिस के बहकावे में आकर वह पुलिस के मुताबिक अपनी रिपोर्ट लिख देती है। आपके लिए, आपके साथ, सदैव की दुहाई देने वाली पुलिस इस तरह लोगों के साथ धोखा करती है। अपराध की एफआईआर न दर्ज करने के लिए पुलिस ऐसा करती है।
लोगों को पुलिस के बहकावे में नहीं आना चाहिए और अपराध की एफआईआऱ सही धारा में ही दर्ज कराने के लिए अड़ना चाहिए। क्योंकि अपराध दर्ज होगा तो रिकार्ड में आएगा और अपराधियों को पकड़ने का पुलिस पर दवाब बनेगा। 
लूट, मोबाइल/चेन स्नैचिंग, चोरी,जेबकटने के मामलों में लोग पुलिस को सही सूचना देते हैं। लेकिन पुलिस पीड़ित को लॉस्ट रिपोर्ट पकड़ा देती है। ज्यादातर लोग इस लॉस्ट रिपोर्ट को ही एफआईआऱ समझते है। कई लोग यह सोचते है कि एफआईआऱ की बजाए लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने से उनको क्या फर्क पड़ेगा यह भी पुलिस रिपोर्ट तो है ही। यह सोच ही गलत है। लोगों को मालूम नहीं कि ऐसा करके पुलिस के साथ साथ वह भी अपराधियों की मदद कर रहे है। दूसरा उनको मालूम नहीं की जिस लॉस्ट रिपोर्ट के आधार पर वह यह मान रहे है कि पुलिस अपराधी को पकड़ लेगी और उनका सामान बरामद हो जाएगा। तो आप भ्रम में हैं क्योंकि जब पुलिस ने एफआईआऱ ही दर्ज नहीं की तो वह तफ्तीश ही नहीं करेगी । तो ऐसे में उनके सामान की बरामदगी को तो सवाल ही नहीं उठता।
सावधान- 
इस तरह के अपराध पर लोगों की सतर्कता और जागरुकता से  भी अंकुश लगाया जा सकता हैं। 
सड़क पर ,मेट्रो रेल, बस में लोग चौकन्ना रह कर लुटेरों /झपटमारों/ चोरों के शिकार होने से बच सकते हैं। 
पुलिस से भी चौकन्ना रहें-
लुट जाने के बाद भी लोगों को चौकन्ना रहना चाहिए। अगर आप चौकन्ना नहीं रहे तो लुट जाने के बाद ठगे भी जा सकते हैं।आपको धोखा देने वाले पुलिस वाले हो सकते हैं।
आप सोचेंगे कि पुलिस भला क्यों और कैसे धोखा दे सकती हैं।
इन उदाहरणों से यह जान लें कि पुलिस कैसे धोखा देती हैं। 
23 नवंबर 2019 को पहाड़ गंज इलाके में उत्तराखंड निवासी मार्शल आर्ट के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सतीश जोशी का महंगा मोबाइल फोन लुटेरों ने छीन लिया। सतीश जोशी पहाड़ गंज थाना गए और एफआईआर दर्ज करा दी। 
झपटमारी को चोरी में दर्ज़ कर दिया--
सतीश जोशी की एफआईआर देख कर इस पत्रकार ने उनको बताया कि पुलिस ने झपटमारी की बजाए चोरी की धारा में रिपोर्ट दर्ज की हैं यह सुनकर वह हैरान रह गए।
सतीश जोशी ने पुलिस को बताया भी था कि वह पत्रकार हैं इसके बावजूद पुलिस ने उनके साथ भी खेल कर दिया। पुलिस ने चोरी की ई-एफआईआर उनको थमा दी।
जबकि इस संगीन अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता की झपटमारी की  धारा  के तहत एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए थी।

महिला हो या पत्रकार सब को मूर्ख बनाती हैं पुलिस-

 4 अक्टूबर 2019, प्रशांत विहार निवासी ज्योति राठी की सोने की चेन लुटेरों ने छीन ली। प्रशांत विहार थाना पुलिस ने कहा " मैडम ऐसा रोजाना होता हैं क्या करें।" पुलिस ने झपटमारी की बजाए चोरी में एफआईआर दर्ज कर दी। ज्योति ने इस मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया तब पुलिस ने एफआईआर में झपटमारी की धारा जोडी।

16 सितंबर 2019, सदर बाजार थाना इलाके में लुटेरों ने एक महिला की चेन छीन ली गई। महिला के पति ने सीसीटीवी कैमरे के फुटेज भी पुलिस को दिए। लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की। मामला मीडिया में आने के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई।

लोगों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पुलिस ने उनके साथ हुई वारदात की सही एफआईआर दर्ज की  है या नहीं है। यानी लूट को लूट और चोरी को चोरी में ही दर्ज़ किया गया है। 

लोगों के जागरूक न होने के कारण ही पुलिस लूट, झपटमारी को चोरी में या लॉस्ट रिपोर्ट में दर्ज़ कर देती है ।-
एफआईआर/ ई-एफआईआर और लॉस्ट रिपोर्ट सभी  के प्रिंट आम आदमी को  एक जैसे ही लगते हैं। इस लिए उन्हें पुलिस की धोखाधड़ी का पता नहीं चलता।

लूट-झपटमारी का शिकार हुआ व्यक्ति तो रिपोर्ट दर्ज करा कर निश्चित हो जाता हैं कि उसने तो एफआईआर दर्ज करा दी और अब पुलिस अपराधी को पकड़ कर उसका सामान वापस दिला देगी।
लेकिन पुलिस जब लूट, झपटमारी, चोरी को कानून की सही धारा में एफआईआर ही दर्ज नहीं करती तो भला अपराधी को पकड़ने की कोशिश क्यों करेगी। 

एफआईआर और लॉस्ट रिपोर्ट में अंतर को पहचाने-

ऑन लाइन एफआईआर- चोरी के मामले में ऑनलाइन एफआईआर दर्ज किए जाने की व्यवस्था है। गाड़ी , मोबाइल, या कुछ भी चोरी होने पर व्यक्ति खुद भी ऑनलाइन ई-एफआईआर दर्ज कर सकता है। जेबकटने ,बैग से  सामान चोरी होने पर चोरी की रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए लेकिन पुलिस ज्यादातर मामलों में चोरी की रिपोर्ट दर्ज करने की बजाए लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज कर देती। 

लॉस्ट रिपोर्ट- वस्तु, दस्तावेज आदि खो जाने पर व्यक्ति खुद भी ऑनलाइन लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज कर सकता है।
इसके लिए थाने जाने की जरूरत नहीं है।
लॉस्ट रिपोर्ट सिर्फ पुलिस को दी गई एक सूचना भर है जिसके आधार पर मोबाइल फोन का दूसरा सिम, लाइसेंस या अन्य दस्तावेज दोबारा बनवा सकते हैं। इससे ज्यादा इसका कोई महत्व नहीं है। इसलिए अगर आप यह सोचते हैं कि लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने से पुलिस आप का सामान बरामद करने की कोशिश करेंगी तो आप भ्रम में हैं।
मोबाइल फोन छीनने या चोरी होने के मामले में पुलिस का रटा-रटाया जवाब होता है कि फोन सर्विलांस पर लगा दिया गया है। दिल्ली पुलिस की मोबाइल फोन बरामद करने की दर बहुत ही शर्मनाक है।

अपराध की एफआईआर दर्ज होने पर आंकड़ों के माध्यम से पता चलता है कि किस तरह का अपराध बढ रहा है। पुलिस पर अपराधी को पकड़ने का दबाव रहता है। 
अपराध दर्ज न करने से या लूट/ झपटमारी/ चोरी को सामान गुम होने का मामला बना कर "लॉस्ट रिपोर्ट" में दर्ज़ कर पुलिस अपराधियों की ही मदद कर रही है। इसलिए अपराधी बैखौफ है और अपराध दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।
लॉस्ट रिपोर्ट दर्ज करने से पुलिस अपना काम आसान करती हैं। झपटमारी, चोरी के दर्ज़ मामलों को सुलझाने में पुलिस ज्यादा रुचि नहीं लेती तो भला गुम हुए मामलों की तो उसे बिल्कुल परवाह नहीं होती।

अपराध दर्ज होगा तभी  अंकुश लगेगा अपराध और अपराधी पर-- 
अपराध सभी दर्ज हो और सही धारा में दर्ज होने पर ही अपराध और अपराधियों की  सही तस्वीर सामने आएगी । अपराध की सही तस्वीर के आधार पर ही अपराध और अपराधियों से निपटने की कोई भी योजना सफल हो सकती है। 
अपराध को दर्ज न करना या हल्की धारा में दर्ज करना अपराधी की मदद करना और अपराध को बढ़ावा देना है। मान लो एक लुटेरा पकड़े जाने पर 100 वारदात करना कबूल करता है लेकिन उसमें से दर्ज दस भी नहीं पाई जाती है अगर 100 की 100 वारदात दर्ज होती तो लुटेरे को सभी मामलों में जमानत करानी पड़ती ,जेल में काफी समय तक रहता। जमानत और इतने केसों को लड़ने के लिए उसे वकीलों को इतना पैसा देना पड़ता कि उसकी हालत खराब हो जाती। इसके अलावा इतने सारे केस में से कुछ में तो सजा होने की संभावना रहती । ऐसे में वह लंबे समय तक जेल में रहता। इस तरह अपराध और अपराधी पर अंकुश लग सकता है। अब हालात ये है कि अपराधी को मालूम है कि पुलिस सारी वारदात दर्ज नहीं करती है इसलिए वह बेखौफ वारदात की सेंचुरी बनाता है। पकड़ा भी जाता है तो जल्द जेल से बाहर आकर फिर से वारदात करने लगता है।


आम आदमी के नहीं वीवीआईपी के लिए पुलिस-

प्रधानमंत्री की भतीजी और जज के मोबाइल छीनने के मामले में पुलिस ने चौबीस घंटे में लुटेरों को पकड़ लिया। पुलिस सिर्फ वीवीआईपी लोगों, नेताओं और वरिष्ठ नौकरशाह के फोन तो तुरंत बरामद कर देती है। आम आदमी के छीने/ लुटे/ चोरी हुए फ़ोन बरामद करने में पुलिस की रत्ती भर भी रुचि नहीं होती। आम आदमी की रिपोर्ट तक आसानी से दर्ज नहीं की जा रही हैं।